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कोरोना वायरसः जो 102 साल पहले की गलतियों को दोहराए उसका नाम अमेरिका है...


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अमेरिका में पिछले 24 घंटे में कोरोना वायरस की वजह से 2350 लोगों की मौत हुई है। लगभग 24 हजार संक्रमण के मामले आए हैं। इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले गिरना। अमेरिका में लॉकडाउन और पाबंदियों के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी अमेरिका के 50 में से 40 राज्यों में स्कूल खोलने के पक्ष में हैं, जबकि 35 से अधिक राज्य अर्थव्यवस्था को खोलने की योजना पेश कर चुके हैं। लेकिन जिस तरह कोरोना से मौतों का सिलसिला अमेरिका में बढ़ता जा रहा है, उससे लगता नहीं है कि इसने इतिहास से कुछ सबक सीखा है। पूरी दुनिया में कोरोना महामारी से 2 लाख 58 हजार से ज्यादा की मौत हो चुकी है, जबकि इनमें से अकेले अमेरिका में ही 72 हजार से ज्यादा की जान गई है। फिर भी लगता है इसने 1918 के स्पेनिश फ्लू महामारी से लॉकडाउन जल्दी हटाने के खतरों से कुछ सीखा नहीं है। 1918 में स्पेनिश फ्लू महामारी के दौरान जब अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को राज्य ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों में छूट दी, तो अचानक संक्रमण के मामले चरम पर पहुंच गए। महामारी का दूसरा दौर लौटकर आया, जो अमेरिकी इतिहास में विनाशकारी साबित हुआ। तब सैन फ्रांसिस्को ने स्पैनिश फ़्लू से जंग में ठीक वही गलती की, जो आज कई अमेरिकी राज्य कर रहे हैं।
तकरीबन 100 साल पहले सैन फ्रांसिस्को में हर किसी को फेस मास्क पहनने का आदेश दिया गया था, लेकिन आज अमेरिकी राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति ही इन नियमों की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं। स्पेनिश फ्लू के संक्रमण के बीच सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इन पाबंदियों ने असर दिखाना शुरू किया और नए मामलों की संख्या में हफ्ते भर में भारी गिरावट दिखनी शुरू हो गई। लेकिन, कोरोना वायरस के खिलाफ मौजूदा जंग में अमेरिका में संक्रमण की रफ्तार हल्की धीमी होने के बाद नेताओं ने सार्वजनिक समारोहों और आयोजनों पर से पाबंदी हटा ली। महज महीने भर के बाद ही बताने लगे कि अब मास्क पहनना जरूरी नहीं है। हालांकि, बाद में यह गलती सुधारी गई। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कोरोना वायरस ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और अब एक आकलन है कि मई के आखिरी सप्ताह के बाद से हर दिन लगभग दो लाख कोरोना वायरस के मामले आएंगे और रोजोना 3000 अमेरिकियों की जान इस वायरस की भेंट चढ़ने वाले हैं। ऐसे में वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं कि अमेरिका को 100 साल पहले की गलतियों के साथ मौजूदा गलतियों को भी सुधारने की जरूरत है। उसे हड़बड़ी में लॉकडाउन खत्म करने से पहले 100 बार सोचने की जरूरत है।
आइए जानते हैं कि 1918 में कैसे स्पेनिश फ्लू गिरफ्त में अमेरिका फंसा और आज वह उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है। 1918 में पहले विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद अमेरिकी सैनिक अपने देश लौट रहे थे। इसी दौरान सैनिकों का एक जत्था सितंबर 1918 में सैन फ्रांसिस्को पहुंचा और अपने साथ यह घातक महामारी भी लेते आए। जब अधिकारियों को इसका पता चला, तो उन्होंने 18 अक्टूबर को 'सार्वजनिक मनोरंजन के सभी स्थानों' को बंद करने का आदेश दिया। लेकिन फ्लू के मामले बढ़ रहे थे और 21 अक्टूबर 1918 तक लोगों को आदेश दिया गया कि वे सार्वजनिक जगहों पर फेस मास्क पहनकर निकलें या फिर जेल जाने के लिए तैयार रहें। बिना मास्क के पकड़े जाने पर जेल के अलावा उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जाता था। नवंबर की शुरुआत में पूर सैन फ्रांसिस्को में स्पेनिश फ्लू के 20,000 मामले आ चुके थे और लगभग 1,000 की मौत हो चुकी थी। लेकिन अक्टूबर की तुलना में संक्रमण की संख्या में तेजी से कमी आने लगी थी। इस वजह से राज्य में सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क की अनिवार्यता सहित सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया।
लोग गलियों में जश्न मनाने लगे, सिनेमाघरों और स्टेडियमों में भारी संख्या में भीड़ जुटने लगी। ऐसा लगा कि अब स्पेनिश महामारी पूरी तरह नियंत्रण में चुकी है। लेकिन लगभग 15 दिनों के बाद ही भयंकर आपदा आ गई और फिर से फ्लू का संक्रमण व्यापक स्तर पर तेजी से फैलने लगा। अब सरकार में बैठे लोगों के बीच एक-दूसरे को कसूरवार ठहराने का दौर शुरू हो गया। कहा जाने लगा कि महामारी के दोबारा शुरू होने की वजह पहले लगाई गई तमाम पाबंदियों को जल्दबाजी में हटाना है।
1 जनवरी 1919 के बाद एक दिन में लगभग 600 नए मामले आए थे और शहर में फिर से महामारी को रोकने की कोशिश शुरू की गई। अधिकारियों ने पहले की लगाई गई पाबंदियों को फिर से लागू कर दिया। यानी सोशल डिस्टेंसिंग को लागू कर दिया गया। फिर से बिना फेस मास्क पहने बाहर नहीं निकल सकते थे। पार्कों, स्कूलों, थिएटर, स्टेडियम, औद्योगिक संस्थानों सभी को बंद कर दिया गया। लेकिन इस बार इन नियमों को पालन कराना पहले की तरह आसान नहीं था। जैसे आज अमेरिका में घरों में रहनेके आदेश के खिलाफ लगभग सभी राज्यों में लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है, तब लोगों ने मास्क लगाने के फैसले के खिलाफ 'एंटी-मास्क लीग'  बना लिया। जिस तरह आज ट्रंप प्रदर्शनकारियों के साथ नजर आते हैं, भले ही उनकी राजनीतिक और चुनावी मजबूरी हो, तब भी जनता के दबाव के कारण मास्क की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया। लेकिन इसका नतीजा यह निकला कि अकेले सैन फ्रांसिस्को में स्पेनिश फ्लू के 45,000 से अधिक मामले आए। यह पहले लागू किए गए लॉकडाउन की तुलना में दोगुना से भी अधिक संख्या थी।
आज अमेरिका ठीक उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है, जो उसने 102 साल पहले की थी। आज पूरे अमेरिका में 72 हजार से अधिक लोगों की कोरोना वायरस महामारी से मौत हो चुकी है, लेकिन पाबंदियों में ढील को लेकर अमेरिकियों और राष्ट्रपति ट्रंप की जिद लाखों अमेरिकियों की जान ले सकती है। हालांकि, ट्रंप तो पहले ही कह चुके हैं कि अगर मौतों की संख्या को एक से दो लाख के बीच रख पाएं, तो यह उनकी सबसे बड़ी सफलता होगी, जो फिलहाल असफलता की ओर ही बढ़ती जा रही है।

कोरोना संकट, इटली का सिसली वाया ‘द गॉडफादर’ डॉन विटो कॉर्लियोन

इतालवी माफिया सेत्तिमो मिनेयो 
आपमें से अधिकांश लोगों ने डॉन विटो कॉर्लियोन का नाम ज़रूर सुना होगा। नहीं, तो माइकल कॉर्लियोन का तो जरूर ही। अच्छा यह भी नहीं तो यूरोप का एक देश है, इटली। इसे जानते ही होंगे। ख़ैर चलिए... जो लोग डॉन विटो और माइकल कोर्लियोन को जानते हैं, उनके लिए तो ठीक है। लेकिन इटली के नाम से वाकिफ लोगों को बता दूं कि कॉर्लियोन सरनेम वैसा ही जैसे किसी शहर या कस्बे के नाम पर कुछ लोग अपना सरनेम रख लेते हैं। दक्षिणी इटली में स्थित एक शहर है सिसली। वही सिसली जहां के द गॉडफादर के डॉन विटो कॉर्लियोन रहने वाले थे। कॉर्लियोन भी दरअसल सिसली का एक नगर या कस्बा कह लीजिए। यहीं विटो एंडोलिनी का जन्म हुआ था, जो बाद में यहां से निकलकर अमेरिका के न्यू यॉर्क तक पहुंच गया और वहां माफिया की दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत कायम की। अपराध की दुनिया की इस सल्तनत को विटो कॉर्लियोन के छोटे बेटे माइकल कॉर्लियोन आगे बढ़ाया... तब से या उससे पहले से ही इटली का सिसली अपराध और माफिया का गढ़ माने जाने लगा। हालांकि, सिसली में माफिया के पांव मज़बूत होने के पीछे उसकी कमोबेश रॉबिनहुड छवि भी है। जैसा कि अमूमन होता है कि माफिया फैमिली अपने इलाके के लोगों को आर्थिक और कुछ अन्य तरीकों से मदद करती रहती है, जिससे लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति होती है। लेकिन माफिया की यह मदद एक तरफा नहीं होती, उस मदद के बदले लोगों को एक भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।
ख़ैर, कहानी फिल्मी हो उससे पहले लौटते हैं अपने असल मुद्दे पर। हम सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी की गिरफ्त में है। दुनिया भर में ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मौतों का सिलसिला सबसे पहले तेजी से यूरोप के इटली में बढ़ना शुरू हुआ। जैसे-जैसे कोरोना का संकट यहां बढ़ता गया संगठित गैंग और माफिया ने अपने वर्चस्व का खेल भी शुरू कर दिया। माफिया यहां जरूरतमंदों के घरों तक खाना पहुंचा रहा है, तो लोगों को पैसे से मदद भी कर रहा है। लोगों को अच्छी तरह पता है कि माफिया की मदद लेना सही नहीं है। उन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। लेकिन, इटली में संकट बड़ा है। लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। छोटे-मोटे काम करने वाले या भारत की तरह दिहाड़ी मजदूरी की तरह काम करने वालों का रोजगार पूरी तरह चौपट हो चुका है। उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ चुकी है। ऐसे में उन्हें द गॉडफादरफिल्म के डायलॉग ‘I’m going to make him an offer he can’t refuse.’ की तरह माफिया के ऑफर को ठुकरा नहीं सकते। एक तो लोगों की मजबूरी सबसे बड़ी और दूसरी तरफ मना किसे करना है, उसका जोखिम भी नहीं ले सकते।
सिसली में लोगों की मजबूरी का आलम यह है कि खुद कुख्यात माफिया फैमिली का एक सदस्य कहता है, लोग मुझे फोन करते हैं। वे फोन पर रोते हैं। मुझे कहते हैं कि उनके बच्चों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। एक महिला मुझे हर दिन बुलाती है। उसके पांच बच्चे हैं और उसे पता नहीं है कि बच्चों को कैसे खिलाना है?’
माफिया परिवार का यह सदस्य कहता है कि अगर ग़रीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाना माफिया कहलवाना है, तो उसे माफिया होने पर गर्व है। दरअसल, कोरोना वायरस तो नया है, लेकिन सिसली में जरूरतमंदों को खाने का पार्सल बांटना यहां की माफिया फैमिली की पुरानी रणनीति रही है।
सिसली की खुफिया एजेंसी और सरकारी मशीनरी में ऊंचे ओहदे पर काबिज निकोला ग्रेटरी कहते हैं कि माफिया का मकसद लोगों की बीच अपनी विश्वसनीयता और साख को हासिल करना है। माफिया खुद को यहां सरकार के विकल्प के रूप में पेश करता आया है और वह इस संकट में लोगों की मदद करके अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग सरकार की जगह उनकी ओर विकल्प के रूप में देखें। ऐसा हो भी रहा है, क्योंकि इन इलाकों तक सरकार की मदद पहुंच नहीं रहा है। इटली में पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी दर काफी बढ़ी है। अर्थव्यवस्था की हालत पहले से डंवाडोल है और मौजूदा कोरोना संकट ने उसकी कमर तोड़ दी है। लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत कहीं से भी भले ही माफिया से मदद मिल रही है, वे ले रहे हैं। हालांकि, एंटी माफिया संगठन के लिए काम करने वाले एक शख्स का कहना है, यह बात लोगों को भी पता है कि खतरनाक है। उन्हें मालूम है कि यह कुछ वैसा ही है कि अगर तुम मेरी पीठ खुजलाते हो तो मैं तुम्हारी खुजलाऊंगा। यानी मदद एक तरफा नहीं है।
वह बतलाते हैं कि शुरू में तो माफिया इन छोटी-छोटी मदद के बदले कुछ नहीं मांगते हैं। लेकिन सभी को किसी-न-किसी रूप में इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, सिसली के पालेर्मो में रहने वाले एक व्यक्ति मार्सेलो को अपना रेस्तरां बंद करना था। उसे माफिया से ऑफऱ मिला, जिसे वह इनकार नहीं कर सका। कुछ पैसे उसके अकाउंट में डाले गए और कुछ कैश में दिए गए। मार्सेलो बताते हैं कि बाद यही माफिया आपसे वसूली भी करते हैं।
इसका एक उदाहरण यह भी है कि जब स्थानीय चुनाव होते हैं, तो माफिया फैमिली के लोग उन लोगों के पास जाते हैं, जिनकी उन्होंने मदद की होती है। फिर उनके बीच बातचीत कुछ इस तरह शुरू होती है, क्या मैं तुम्हे याद हूं? जब तुम्हें जरूरत थी तो मैंने तुम्हारी मदद की थी। और अब मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। फिर वे अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने का दबाव बनाते हैं, जिसे लोग मना नहीं कर सकते। मार्सेलो बताते हैं कि सिसली में माफिया सरकार से कई गुना अधिक प्रभावशाली है। संकट के समय में वह हमेशा लोगों की मदद के लिए पैसे के दरवाजे खोल देता है। सरकार कहीं पीछे छूट जाती है या जब तक सरकार की मदद पहुंचती है, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है।
कुछ इस तरह इटली में माफिया सरकार की नाकामी का फायदा अपना वर्चस्व मजबूत करने में अपनी रॉबिनहुड छवि को भुना रहा है।

कोरोना संकट, चीन का WHO और UN में वर्चस्व, अभी असली खेल बाक़ी है

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कोरोना वायरस को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जुबानी जंग जारी है। इन दोनों के बीच एक तीसरा है, जो कोरोना वायरस को सही तरीके से कंट्रोल नहीं करने को लेकर सिर्फ अमेरिकी ही नहीं, बल्कि कई देशों के निशाने पर है। बहरहाल, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ को कठघरे में खड़ा किया है। ट्रंप ने इस पर चीन के लिए किसी पीआर एजेंसी की तरह काम करने का आरोप लगाया है। ट्रंप ने साफ कहा, 'मुझे लगता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को शर्म आनी चाहिए, क्योंकि वह चीन के लिए एक पीआर एजेंसी की तरह है।'
ट्रंप अपने बेतुके बयानों या फिर अजीबोगरीब दावों के लेकर भले विवादों में रहे हों, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर वह पूरी तरह न सही, तो काफी हद तक सही हैं। अब देखिए न कि कैसे चीन न सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन को अपने हितों के लिए हाईजैक कर रहा है। आख़िर किस तरह चीन इन संगठनों में अपने पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों को ऊंचे और प्रभावी पदों पर बिठाकर काम कर रहा है? चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र और इससे जुड़े संगठनों में लगभग हर बड़े और अहम ओहदों से अपने हितों को साधने वाले फैसले करा रहा है।
आप मौजूदा कोरोना संकट में भले इन वैश्विक संगठनों को लेकर ट्रंप की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन चीन अपनी नीतियों में लगातार सफल होता जा रहा है। ज़रा सोचिए जिस चीन से कोरोना वायरस शुरू हुआ, वहां और अमेरिका में क्या हालात हैं। अमेरिका में अभी तक 11 लाख से ज्यादा केस आ चुके हैं, जबकि 65 हजार के पास लोगों की मौत हो चुकी है। चीन में लगभघ 83 हजार मामले और मौतें 4633 हुई हैं। इससे पहले अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध यानी ट्रेड वॉर चरम पर था, लेकिन एक झटके में कोरोना वायरस ने अमेरिकी महाशक्ति के अस्तित्व को ही हिला कर रख दिया।
अब आइए देखते हैं कि चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र के जरिए कैसे अपनी विस्तारवादी और आधुनिक औपनिवेशिक शक्तियों का प्रसार कर रहा है। जो लोग संयुक्त राष्ट्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को करीब से देख रहे हैं, उनके लिए डब्ल्यूएचओ का चीन के प्रति रवैया कोई आश्चर्य नहीं है। चीन ने पिछले कई वर्षों में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कई संगठनों के प्रमुख के रूप में अपने नागरिकों को नियुक्त किया या करवाया है। चीन के उप कृषि मंत्री 2019 के बाद से संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि एजेंसी (UN Food and Agriculture) का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके बाद चीन के डाक और दूरसंचार मंत्रालय में अपना करियर शुरू करने वाले झाओ हौलिन को संचार नेटवर्क के लिए तकनीकी मानकों को स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण संगठन इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया। झाओ ने ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए 5जी के इक्विपमेंट को दुनिया भर में पहुंचाने के लिए हुवावे की मदद की।
पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने चीन के पूर्व विदेश उप मंत्री लियू झेनमिन को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग में अहम पद पर नियुक्त किया। यहां तक ​​कि यूएन की एजेंसी अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन जो वैश्विक हवाई यात्रा को नियंत्रित करती है, इसके प्रमुख के भी तौर पर चीनी नागरिक फेंग लियू को बनाया गया है। लियू पर कोरोना वायरस मामले को लेकर ताइवान को लूप से बाहर रखने का आरोप लगाया गया है।
यूएन जैसे वैश्विक संगठनों में चीनी नागरिकों का प्रभुत्व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ताकत और वर्चस्व को बतलाता है। हालांकि, यह भी एक हक़ीकत है कि पिछले कुछ वर्षों में खासकर ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की ओर यूएन हो या डब्ल्यूएचओ काफी हद तक निष्क्रियता दिखी, जिसका बखूबी फायदा चीन ने उठाया। जैसा कि चीन ने अपने हितों के यूएन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को रीटूल करने की कोशिश की। चीन में अमेरिका में सशक्त नेतृत्व की कमी का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है और वह इसमें सफल भी रहा है। अगर इसी संदर्भ में देखें, तो ट्रंप सरकार की ओर से डब्लूएचओ की फंडिंग रोकने और उसके बाद चीन की ओर से उसके फंड में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाने का फैसला, इसी का एक प्रमाण है। यानी अमेरिका का कमजोर नेतृत्व चीन के लिए वरदान साबित हुआ।

लोकतंत्र को लगा कोरोना रोग, हुआ वायरस से संक्रमित


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कोरोना वायरस का शुक्रिया! मुझे पता है कि ऐसा नहीं कहना चाहिए, लेकिन मौजूदा कोरोना वायरस महामारी में कुछ छोटी-छोटी खुशियां हैं। कुछ इन्हीं शब्दों में रूस का एक शख्स अपनी भावनाओं को ज़ाहिर करता है। स्वाभाविक सी बात है कि इसकी वजहें भी होंगी। दरअसल, रूस में व्लादिमीर पुतिन वर्ष 2000 से ही सत्ता में हैं। राष्ट्रपति का उनका मौजूदा कार्यकाल 2024 में खत्म होने वाला है। लेकिन पुतिन ने 2024 के बाद भी 12 साल तक पद पर बने रहने का संवैधानिक जुगाड़ कर लिया। बस एक पेच बाकी रह गया था। रूस की संसद से पुतिन के 2036 तक सत्ता में बने रहने के लिए विधेयक पास हो चुका है। बस जनमत संग्रह कराना बाकी रह गया, जो 22 अप्रैल को होने वाला था। लेकिन कोरोना वायरस महामारी की वजह से इसे फिलहाल टाल दिया गया है। पिछले 20 वर्षों से पुतिन ही रूस के मालिक बने बैठे हैं। कभी संविधान का सहारा लेकर, तो कभी संविधान संशोधन के जरिए। सवाल उठते हैं, तो विपक्ष की आवाज का गला घोंट दिया जाता है।
कुछ इसी तरह का हाल या थोड़ा मुस्तफा कमाल पाशा के देश तुर्की का है। दरअसल, यह हक़ीकत है कि मौजूदा समय में सबसे बड़ा ख़तरा लोकतंत्र पर मंडरा रहा है। कोरोना वायरस ने इस ख़तरे को संजीवनी दी है या कहें कि लोकतंत्र भी कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया है। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश की तमाम खूबियां इस महामारी की चपेट में आ रही हैं या आ चुकी हैं। ऐसा इसलिए कि इस महामारी की वजह से अधिकांश देशों को मनमानी करने की छूट मिल चुकी है। उन पर नजर रखने या सवाल करने पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
भारत में ही एक उदाहरण देता हूं कि मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री राहत कोष के होते हुए पीएम केयर्स नाम से एक अलग ट्रस्ट बना लिया। अभी तक आपदा या महामारी के लिए प्रधानमंत्रा राहत कोष में ही चंदा या दान दिया जाता था, लेकिन अब पीएम केयर्स। लेकिन इसकी पारदर्शिता पर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। जब विपक्ष की तरफ से इसकी राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में ट्रांसफर करने की मांग की गई, तो सिरे से खारिज कर दिया गया। अब ख़बर है कि पीएम केयर्स के फंड का सरकार ऑडिट भी नहीं करवाएगी। हालांकि, पहले प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का भी नहीं होता था। लेकिन सवाल उठता है कि जब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष का भी नहीं होता था, तो पीएम केयर्स फंड का भी क्यों नहीं होना चाहिए? अगर नहीं होना चाहिए, तो एक कोष के होते दूसरे की जरूरत क्यों हैं? यहीं से मंशा पर सवाल उठता है।
अब लौटते हैं यूरोपीय देशों की तरफ जहां कोरोना वायरस के साथ-साथ लोकतंत्र का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। पूरे यूरोप में चुनावों को स्थगित किया जा रहा है। अदालतों ने बेहद अहम केसों को छोड़कर बाकी की सुनवाई ही बंद कर दी है। हंगरी में सरकार की तरफ से उठाए गए कदमों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। हंगरी की सरकार ने कोरोना वायरस की आड़ में ऐसा प्रस्ताव पास किया है या करने वाला है, जिससे जब तक कोरोना महामारी के कारण आपातकाल लगा रहेगा, तब तक मौजूदा सरकार की सत्ता में बनी रहेगी। कोई चुनाव नहीं होगा। यानी हंगरी की सरकार आपातकालीन स्थिति के तहत अनिश्चितकाल तक शासन करेगी।
मौजूदा हालात में यूरोप के कम-से-कम 15 देशों ने आपातकाल की घोषणा की है। कुछ देशों ने आपातकाल नहीं लगाया, लेकिन जनता पर पाबंदी को लेकर सख्त कदम उटाए हैं। पोलैंड में सरकार आपातकाल लागू करने को लेकर अड़ी हुई है। इसकी वजह भी है। यहां 10 मई को राष्ट्रपति का चुनाव होना है। अगर आपातकाल लगता है, तो चुनाव को स्वाभाविक रूप से टाल दिया जाएगा। इसी तरह फिलीपींस की संसद से एक कानून पास किया गया, जिसके तहत राष्ट्रपति रॉड्रिगो डुत्रेतो को आपातकाल में असीमित अधिकार दिया गया है। कंबोडिया में एक कानून का मसौदा बनाया गया है। यह भी राष्ट्रीय आपातकाल से जुड़ा है। अगर कानून की शक्ल ले लेता है, तो सरकार को बेइंतहा मार्शल पावर मिल जाएगा और वहां के नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों में व्यापक कटौती की जाएगी।
उधर, इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का सोशल डिस्टेंसिंग वाला प्रदर्शन जारी है, लेकिन नेतन्याहू किसी तरह सत्ता पर फिर से कब्जा करने में सफल दिख रहे हैं। अमेरिका पहले ही स्टेट लेवल प्रेसिडेंशियल प्राइमरी चुनाव को रद्द कर चुका था।
अभी आने वाले दिनों में आइवरी कोस्ट, मलावी, मंगोलिया, डॉमिनिकन रिपब्लिक जैसे कई देशों में चुनाव होने वाले हैं, लेकिन यहां भी इसी तरह का ख़तरा मंडरा रहा है।  
एशियाई देशों में बात करें, तो श्रीलंका में भी कोरोना वायरस की वजह से संसदीय चुनाव दो महीने के लिए स्थगित कर दिए गए हैं। राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने निर्धारित समय से छह महीने पहले 2 मार्च को संसद भंग कर दी थी। तब उन्होंने 25 अप्रैल को मिडटर्म चुनाव कराने की बात कही थी। अब नई तारीख 20 जून की दी गई है। आपको बता दें कि इन्हीं गोटबाया राजपक्षे ने अपने भाई महिंदा राजपक्षा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।
कुल मिलाकर हक़ीकत यही है कि कोरोना वायरस ने न सिर्फ इंसानों का कत्लेआम किया, बल्कि यह लोकतंत्र का दमन करने के लिए तैयार है। यह दमन वायरस नहीं, बल्कि इसकी आड़ में तानाशाही सोच वाले नेता/सरकारें कर रही हैं। चाहे यूरोपीय देश हों, रूस या फिर भारत की मोदी सरकार... तो तैयार रहिए कोरोना की जंग के बाद लोकतंत्र की अस्थियां समेटने के लिए...

ईरान-पाकिस्तान में धार्मिक ज़िद, कोरोना का रिलिजयस कनेक्शन

कोरोना वायरस महामारी पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। लेकिन एक देश है तुर्कमेनिस्तान, जो ईरान से सटा। हर देश कोरोना वायरस संक्रमण खत्म करने में जुटा है। पर तुर्कमेनिस्तान में कुछ अलग ही तरीका अपनाया गया है। यहां कोरोना शब्द पर ही बैन लगा दिया गया है। यहां कोरोना बोलने और लिखने वालों पर कार्रवाई हो रही है। मास्क पहनने पर पहले ही बैन है। अगर कोई नियमों को तोड़ता है, तो उसे जेल हो सकती है। दरअसल, तुर्कमेनिस्तान ईरान के दक्षिण में है। ईरान में कोरोना से 4110 लोगों की मौत हो चुकी है। 66 हजार से ज्यादा संक्रमित हैं। (10 अप्रैल 2:22 बजे तक) लिहाजा, तुर्कमेनिस्तान में इस तरह की पाबंदी पर कई देशों ने नाराजगी जाहिर की है।
फोटोः इंटरनेट
लेकिन, एक कहानी यही से शुरू होती है कि जब ईरान सटे तुर्कमेनिस्तान का रवैया कुछ अजीब है, तो यहां से पाकिस्तान की हालत कैसे ख़राब होती जा रही है। हम उस पर भी बात नहीं करेंगे। हम बात करेंगे ईरान की, जो एशिया में कोरोना वायरस की उत्पत्ति माने जाने वाले देश चीन को भी मौतों के मामले में पीछे छोड़ चुका है। साथ ही, इसी बहाने पाकिस्तान वाले कुछ इलाकों की भी बात करेंगे। तो फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में बलूचिस्तान प्रांत की सीमा चौकी तफ्तान से 6,500 तीर्थयात्रियों को अपने-अपने घर पाकिस्तान लौटने की इजाजत दी गई. ये सभी कोरोना के संदिग्ध बताए जा रहे थे। ये सभी शिया तीर्थयात्री थे, जिन्होंने ईरान में क़ौम और मशहद जैसे पाक जगह की यात्रा की थी।
चीन ने फरवरी की शुरुआत में ही कोरोना वायरस संक्रमण के बारे में आगाह किया था। लेकिन ईरान ने कोई ध्यान नहीं दिया और चीन से लोगों का आना जारी रहा। यहां कौम में दुनिया भर से इकट्ठा हुए लोगों को क्वांरटीन करने का कोई बंदोबस्त नहीं किया गया। इस तरह ईरान ने अपने इस शहर को कोरोना वायरस का केंद्र या गढ़ बनने की एक तरह से इजाजत दे दी थी। भले ही अनजाने में। इसके अगले ही महीने यानी मार्च में पूरे मध्य पूर्व में लगभग 17,000 मामले कोरोना वायरस के दर्ज किए गए। इन 17 हजार मामलों में से 90 प्रतिशत का ताल्लुक ईरान से था। ईरान को सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनई ने 3 मार्च को कहा था कि कोरोना कोई बड़ी त्रासदी नहीं है। इस त्रासदी पर लोगों की दुआएं और पवित्र स्थल कहीं अधिक भारी है। लेकिन ईरान के 13 आला अधिकारियों की मौत और 30 के संक्रमित होने के बाद खामेनई ने महामारी के लिए अमेरिका को कोसना शुरू कर दिया।

उधर, तफ्तान में पाकिस्तान की ओर से क्वारंटीन में रखे गए हजारों लोगों की वायरस से सुरक्षा का शायह ही ध्यान रखा गया। लोगों भेड़ों की तरह एक टेंट में ठूस कर रखा गया। इससे जो लोग संक्रमित नहीं थे, वे भी वायरस की चपेट में आ गए। सारे के सारे शिया मुसलमान थे और अधिकांश का ताल्लुक पाकिस्तान के सिंध प्रांत से था। सिंध में ही 2.2 करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर कराची है। चूंकि इनमें से किसी भी तीर्थयात्री में वायरस संक्रमण की जांच नहीं की गई, तो एक तरह से ये पूरे पाकिस्तान में वायरस फैलाने का जरिया बन गए। आज पाकिस्तान में 4489 लोग (हालांकि टेस्टिंग कम होने से आंकड़ा कम है) संक्रमित हैं औऱ 65 की जान जा चुकी है।
जिस तरह तबलीगी जमात को दिल्ली के निजामुद्दीन में धार्मिक कार्यक्रम किया। उस तरह जमात ने पाकिस्तान में भी अपना सालाना कार्यक्रम किया था। पाकिस्तानी अख़बार 'डॉन' की रिपोर्ट के अनुसार, 10 मार्च को हुए कार्यक्रम में 70 से 80 हजार लोगों ने शिरकत की थी। हालांकि, तबलीगी जमात ने दावा किया कि उनके कार्यक्रम में ढाई लाख से ज्यादा लोग पहुंचे थे। इसमें 40 देशों से करीब 3000 लोग शामिल थे। पाकिस्तान की तबलीगी जमात ने भी न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दूसरों देशों में भी वायरस फैलाने का काम किया। इसमें शामिल किर्गिस्तान के कम-से-कम दो नागरिकों और दो फिलिस्तीनियों ने वापस देश के लिए उड़ान भरी। उनकी वजह से फिर गाजा पट्टी में वायरस फैला। इसी तरह, मलेशिया में तबलीगी जमात की धार्मिक सभा की वजह 620 लोगों को कोरोना हुआ। बाद ये सभी दक्षिण एशिया लौटे और फिर क्या हुआ होगा, आप सोच सकते हैं। 
पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमण के लिहाज से सबसे असुरक्षित जगह मस्जिद है, जहां लोग दिन में पांच बार नमाज के लिए आते हैं और कंधे-से-कंधा सटाकर खड़े होते हैं। पाकिस्तान में तकरीबन 5 लाख मस्जिद हैं। यहां 1947 के बाद के शुरुआती दिनों में ज्यादातर शुक्रवार को ही मस्जिदों में नमाज पढ़ते थे, लेकिन आज अधिकांश लोग पड़ोस की मस्जिदों ही हर रोज दिन में पांच बार नमाज करते हैं। अब लोग इतनी बार मिलेंगे और भीड़ में इकट्ठा होंगे, तो वायरस का संक्रमण किस रफ्तार से होगा?जब पाकिस्तान ने लॉकडाउन का फैसला किया, तो मस्जिद की सभाओं को नजरअंदाज करना पड़ा, क्योंकि अधिकांश मौलवी इसके ख़िलाफ़ थे। न्यूजवीक पाकिस्तान के खालिद अहमद बताते हैं कि तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने इस मामले को सर्वोच्च इस्लामी संस्था जमीयत अल-अजहर या अल-अजहर यूनिवर्सिटी मिस्र को इस मामले को रेफर किया। इसके बाद ही सभी मस्जिदों को बंद करने की नसीहत दी गई। फिर भी कुछ मौलवी इसके पक्ष में नज़र नहीं दिखते, लेकिन सऊदी अरब ने मक्का और मदीना को बंद करने का फैसला कर लिया। पाकिस्तान ने बीच का रास्ता निकाला, जो बेतुका औऱ नासमझी वाला लगता है। यहां फैसला किया गया कि मस्जिदें बंद नहीं होंगी, लेकिन नमाज के दौरान पांच से अधिक लोगों का समूह साथ में नहीं होगा।
कुछ इस तरह से कोरोना वायरस से जंग जीतने के लिए रेत पर तस्वीर बनाई जा रही है और जीतने की तमन्ना भी पाली जा रही है।

कोरोना वायरस, हिंदू-मुसलमान और श्वेत-अश्वेत


कोरोना वायरस। पूरी दुनिया इस महामारी से लड़ रही है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी लड़ाई भी चल रही है। सांप्रदायिकता की। नस्लवाद की। श्वेत-अश्वेत की और हिंदू-मुसलमान की। भारत में जब तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के मामला सामने नहीं आया था, तब तक कोरोना से हमारी जंग सही चल रही थी। टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने दिल्ली दंगों के बाद हिंदू-मुसलमान बंद ही किया था कि यह एक नई महामारी आ गई। उनकी मेहनत और ऊर्जा वैसी नहीं दिख रही थी, क्योंकि देश एकजुट होकर इस वैश्विक आपदा का सामना कर रहा था। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम की मीडिया तक में हम एकजुट होकर लड़ रहे थे, लेकिन तभी नया मसाला मिला। तबलीगी जमात का। यहीं से कोरोना से जंग ने रुख मोड़ लिया।
अमेरिका में बंदूक की दुकान पर कतार में लोग। फोटोः इंटरनेट
पूछा जाने लगा कि आख़िर यही 'चंद लोग' हमेशा 'अल्लाहु अकबर' कह कर क्यों फट जाते हैं? कश्मीर से लेकर गाजा तक और नाइजीरिया से लेकर सीरिया तक, यही 'चंद लोग' दशकों से कत्लेआम क्यों मचा रहे? अगर आप कहते हैं कि कौम या मजहब को गाली मत दो तो आपको एक और सवाल का जवाब देना पड़ेगा। "जमात वालों ने अपनी करतूतों से बिरादरों के लिए एक नया शब्द गढ़ा है- थूकलमान। इसकी कड़ी निंदा करता हूं।अब थूकलमान शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है, आपको समझ आ रहा होगा। हालांकि, जिसके लिए और जिस संदर्भ में किया गया, उसकी पुष्टि हो नहीं पाई। आज चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी लगे हैं। फिर अस्पतालों से ऐसे वीडियो नहीं आए। ख़ैर मेरी चिंता यह नहीं है।
दरअसल, दिक्कत यह नहीं है कि यह सब भारत में हो रहा है। पूरी दुनिया में यही खेल चल रहा है। भारत में हिंदू-मुसलमान चल रहा है, तो अमेरिका में ब्लैक और व्हाइट यानी अश्वेत और श्वेत। हमारे यहां सांप्रदायिकता है, तो अमेरिका में भी एक तरह सांप्रदायिकता है, जिसे रेसिज्म यानी नस्लवाद कहते हैं। वह कैसे आइए देखिए। आज अमेरिका कोरोना वायरस की वजह से सबसे अधिक प्रभावित देश है। यहां (भारतीय समय के अनुसार रात 12:56 तक 24 घंटे में 1529 से ज्य़ादा मौतें हुईं, जबकि कुल मौत 12,400 वहीं, कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 3 लाख 90 हजार तक पहुंच गई। इतनी मौतों और संक्रमण के लोगों में भय सताने लगा है कि अगर राशन और खाने-पीने का सामान खत्म हुआ, तो फिर अराजकता की स्थित हो जाएगी। ऐसे में लोग गन कल्चर यानी बंदूक का रुख कर चुके हैं। यहां बंदूकों की दुकानों पर लोगों की कतारें देखी जा सकती हैं। यह खौफ खासतौर पर अफ्रीकी और एशियाई मूल के अमेरिकियों में देखा जा रहा है।
कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों कैलिफोर्निया,  न्यू यॉर्क और वॉशिंगटन में बंदूक और हथियारों की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है। ऑनलाइन हथियार बेचने वाली दुकान एम्मो डॉट कॉम के मुताबिक, 23 फरवरी के बाद से बिक्री में 68 प्रतिशत की तेजी आई है। कुछ खरीदारों ने बताया कि उन्हें डर है कि कामबंदी के हालात में देश में जरूरी वस्तुओं की कमी आ सकती है। इससे भोजन,  दवा आदि के लिए लूटपाट मच सकती है। ऐसी स्थिति में परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार ही विकल्प होंगे। कई राज्यों में टॉइलेट पेपर से ज्यादा मांग बंदूकों और कारतूसों की हो गई। गन स्टोर्स के बाहर ग्राहकों की वैसे ही लाइन लगने लगी जैसे कि सुपर मार्केट्स में लग रही थी। 20 मार्च को ओरेगन पुलिस ने इंस्टेंट चेक सिस्टम के तहत 3189 आवेदन क्लियर किए। इलिनोय राज्य में भी पांच दिन में बंदूक खरीदने की 19 हजार अर्ज़ियां आ गईं। तुलना करें तो पिछले साल 9 से 20 मार्च के बीच बंदूक खरीदने के 17136 आवेदन आए थे, जबकि इस साल इन्हीं दिनों में 35473 आवेदन आए। कैलिफोर्निया में तो बंदूकों की बिक्री 800 फीसदी बढ़ गई है।
इसी बीच नस्लवाद भी बढ़ने लगा है। कुछ वैसे ही जैसे हमारे यहां एक खास वर्ग इन दिनों हावी है। उसी तरह अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के श्वेत-अश्वेत खाई बढ़ी है। एक रिपोर्ट की मानें, तो ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के दो महीने के भीतर ही 1052 मामले नस्लवाद के दर्ज किए गए। यह मौजूदा समय में भी दिख रहा है, जब कोरोना महामारी की वजह से अमेरिका में अनिश्चितता तेजी से बढ़ी है और लोग अपनी सुरक्षा के लिए बंदूकों की दुकान पर कतारबद्ध होने लगे हैं, जिसमें अधिकांश अश्वेत अमेरिकी हैं। (अगले लेख में विस्तार से...)

मास्क पहनकर यूं 5 करोड़ जान लेने वाले स्पेनिश फ्लू से जीती जंग, अब कोरोना को हराने की बारी

1918 में जब स्पेनिश फ्लू महामारी फैली, तो इससे अमेरिका सहित यूरोपीय देशों में मास्क पहनने की संस्कृति ने जन्म ली। इससे तब 5 करोड़ से अधिक लोगों की जान लेने वाली इस महामारी पर काबू पाने में उम्मीद से अधिक मदद मिली। लेकिन लगता है 100 साल बाद अमेरिका और यूरोपीय देश इस मास्क संस्कृति को भूल गए, जिससे अमेरिका और इटली, स्पेन, जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस जैसे में कोरोना वायरस का कहर बरप रहा। कोरोना वायरस की वजह से रविवार रात 1:38 बजे तक कुल 68,499 में से 51878 मौतें इन्हीं छह देशों में हुई हैं। अब शायद फिर इन्हें मास्क कानून लागू करना पड़े...

फोटोः इंटरनेट
तो हम बातें कर रहे थे स्पेनिश फ्लू की। आख़िर कैसे मास्क कल्चर ने इस महामारी को हराने में मदद की। अभी तक हमने बातें की कि अमेरिका में पहली बार कानून लागू किया गया कि मास्क न पहनना एक अपराध होगा। पॉपुलर कल्चर में इसे लेकर जागरूकता अभियान शुरू किए गए। महामारी से डर के चलते हर कोई मास्क पहन रहा था। इस अभियान ने काम करना शुरू कर दिया। अमेरिका के कई राज्यों जैसे कैलिफोर्निया वगैरह ने भी यही कदम उठाया। मास्क को लेकर अनिवार्यता सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं रही। अटलांटिक देश भी इसी राह पर चले और स्पेनिश फ्लू से बचाव का उपाय मास्क में ही ढूंढ़ा। फ्रांस में एक समिति ने नवंबर 1918 की शुरुआत में मास्क पहनने की सिफारिश की। वहीं, इंग्लैंड का मैनचेस्टर भी इसमें आगे आया। स्पेनिश फ्लू से बचने के लिए जापान में स्टूडेंट प्रोटेक्टिव मास्क पहनकर स्कूल जाते थे। उधर, लॉस एंजिल्स के मेयर ने सरकारी तौर पर मास्क की खरीदारी की और लोगों से मास्क पहनने को कहा।
अब दिसंबर 1918 तक धीरे-धीरे पूरे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में मास्क के इस्तेमाल में तेजी आई। इस दौरान मास्क की मांग इतनी बढ़ गई कि इसे बनाने वाली कंपनियां आपूर्ति को पूरा नहीं कर पा रही थीं।
फिर भी मास्क का चलन हर जगह बढ़ गया। यहां तक कि सफाई कर्मचारी से लेकर पुलिस भी बिना मास्क के नजर नहीं आती थी। युद्ध के मैदानों में सैनिक चेहरे पर मास्क और हाथों में हथियार लिए नजर आते। तब एक मशहूर जुमला चला था कि सैनिक युद्ध के दौरान गैस मास्क पहनें और घरों पर इन्फ्लुएंजा मास्क। दरअसल, जंग के मैदान में गैस चैंबर और इस तरह के खतरनाक गैसों से बचने के लिए सैनिक गैस मास्क पहनते थे। फिर स्पेनिश फ्लू आया, तो उससे बचने के लिए इन्फ्लुएंजा मास्क। तब वॉशिंगटन टाइम्स ने एक रिपोर्ट छापी थी कि घर लौटने वाले सैनिकों के लिए 45 हजार मास्क दिए जाएंगे।
जब 11 नवंबर 1918 को पहला विश्वयुद्ध खत्म हुआ, तो गैस-मास्क बनाने वाली कंपनियों का कारोबार ठप हो गया। ऐसे में उन्होंने स्पेनिश फ्लू से बचाव के लिए इन्फ्लुएंजा मास्क बनाना शुरू कर दिया। उस वक्त अमेरिकी अखबार सैन फ्रांसिस्को क्रॉनिकल ने फ्रंट पेज पर शहर के शीर्ष जजों और नेताओं की मास्क पहने तस्वीर छापी थी। शायद वह 25 अक्टूबर 1918 के दिन का अखबार था।
जल्द ही ऐसा वक्त आ गया कि कोई भी बिना मास्क के नजर नहीं आता। हर तरफ सभी मास्क पहने ही दिखते। बेशक कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने नियमों की धज्जियां उड़ाईं। तब का एक किस्सा है कि एक बॉक्सिंग मैच के दौरान कैलिफोर्निया में लगभग 50 फीसदी पुरुष दर्शकों ने मास्क नहीं पहन रखे थे। आज की तरह हर जगह सीसीटीवी या कैमरे नहीं होते थे। तब इनकी एक फोटो फोटोग्राफर ने ले ली थी। पुलिस ने उस वक्त फोटो को एनलार्ज यानी बड़ा किया और उस तस्वीर का इस्तेमाल करके मास्क न पहनने वालों की पहचान की। सभी को सजा के तौर पर "चैरिटी के लिए दान" करने और फिर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।
तो मास्क पहनने से फायदा हुआ?
दिसंबर 1918 की शुरुआत में लंदन के टाइम्स अखबार ने बताया कि अमेरिका में डॉक्टरों ने साबित किया कि स्पेनिश फ्लू लोगों के संपर्क में आने और संक्रमण की वजह से फैलता है। उस वक्त लंदन के एक अस्पताल में सभी कर्मचारियों और मरीजों को हमेशा मास्क पहने रहने का निर्देश जारी किया गया। अखबार ने एक जहाज के हवाले से इसकी सफलता की कहानी पेश की। टाइम्स ने बताया कि अमेरिका और इंग्लैंड के बीच न्यूयॉर्क से आने वाले जहाजों पर संक्रमण दर अधिक थी। इसके बाद जहाज के सभी चालक दल और यात्रियों को अमेरिका लौटते वक्त मास्क पहनने का आदेश दिया गया। इसके बाद जब जहाज अमेरिका पहुंचा, तो कोई भी यात्री संक्रमित नहीं पाया गया। कुछ इस तरह स्पेनिश फ्लू से बचाव में मास्क की जरूरत और सफलता की कहानी पेश की गई। इस तरह की खबरें तब दुनिया के कई देशों जापान, चीन के अखबारों में सामने आई, जिसमें बताया गया कि मास्क पहनने से संक्रमण की दर कम हो गई।
दिसंबर 1918 आते-आते स्पेनिश फ्लू का दूसरा दौर समाप्त हो गया। अमेरिकी शहरों और राज्यों में स्पेनिश फ्लू के मामले में अनिवार्य रूप से मास्क पहनने के कानून को खत्म करने की जरूरत महसूस की गई और अंततः 10 दिसंबर, 1918 को शिकागो के एक अखबार में इसकी खबर छपी कि अब इस मास्क कानून की जरूरत नहीं रह गई है। संभवतः ऐसा इसलिए था कि मास्क ने संक्रमण से फैलने वाले स्पेनिश फ्लू को पूरी तरह न सही, तो बहुत हद तक या इससे कहीं अधिक काबू पाने में मदद की थी।
अब आज क्या, कोरोना वायरस और फिर वही मास्क की जरूरत

1918 में अमेरिका ने सख्ती और तत्परता से मास्क को अपनाया था। लेकिन, एक सदी बाद अमेरिका ही अपनी सफलता से सबक नहीं सीख पाया। उस सबक को सीखा है, एशियाई देशों ने। संभवतः यही वजह है कि आज अमेरिका सहित यूरोप के तमाम देशों को चीन सहित कई देशों से मास्क और दास्तानों का आयात बड़ी संख्या में करना पड़ रह है। एशियाई देशों ने इस वजह से भी मास्क को अपनाया, एक सदी के बीच-बीच में इसने हैजा, टाइफाइड और अन्य संक्रामक रोगों के प्रकोपों ​​से निपटा है। इन संक्रामक रोगों के प्रकोप ने मास्क पहनने वाली संस्कृति जिंदा रखने में मदद की है। वहीं, अमेरिका और यूरोप में ऐसा नहीं देखा गया। अब लगता है कि कोरोना वायरस महामारी से फिर से उनकी सोच में बदलाव आए।

तब मास्क न पहनना अपराध था, और यूं 5 करोड़ जान लेने वाले स्पेनिश फ्लू से जीती जंग

Photo: wsj.com
कोरोना वायरस महामारी की वजह से पांच अप्रैल रात 1 बजे तक 64 हजार 51 लोगों की मौत हो चुकी है। 11 लाख 87 हजार 846 लोग इससे बीमार हैं। सबसे ज्यादा मौतें इटली में 15,362 हुई हैं। वहीं, अमेरिका में अकेले तीन लाख से ज्यादा लोग इससे संक्रमित हो चुके हैं। जबकि इस वायरस ने जहां जन्म लिया यानी चीन इसे लगभग पूरी तर नियंत्रित करने में सफल दिख रहा है। हालांकि, हम बात इस कोरोना वायरस से जंग और उसके तौर तरीके पर करेंगे। आखिर हम कैसे एक वायरस से जंग अपनी ही लापरवाही की वजह से हारते चले जा रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी बात आती है, खुद को सुरक्षित रखना। खुद को सुरक्षित रखने में एक तरीका है मास्क पहनना। इसे लेकर अमेरिका में कई तरह के विवाद चल रहे हैं। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप शुरू से मास्क पहनने के आदेश देने के खिलाफ रहे हैं, लेकिन अब उन्होंने भी हार मान ली है। हालांकि, उन्होंने खुद मास्क न पहनने का फैसला किया है।
अमेरिका की सिएटल पुलिस 1918 में मास्क पहनी नजर आई...तस्वीरः सीएनएन
हमारी कहानी यह भी नहीं है। हमारी बात यह है कि मौजूदा कोरोना वायरस से भी भयानक एक महामारी आई थी स्पेनिश फ्लू। वह भी 1918 में। तब पहला विश्वयुद्ध खत्म हुआ ही था या खत्म होने की कगार पर था। वैसे स्पेनिश फ्लू का मतलब यह नहीं है कि इसकी उत्पत्ति स्पेन में हुई थी। इसका पहला केस अमेरिका में आया। लेकिन, अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड जैसे देशों ने प्रथम विश्वयुद्ध की वजह से कई खबरों या कहें मीडिया पर कई तरह की पाबंदियां लगाई हुई थीं। लेकिन स्पेन में मीडिया न्यूट्र्ल था। वहां इसकी रिपोर्टिंग हुई औऱ आगे चलकर इसी वजह से इसका नाम स्पेनिश फ्लू हुआ। दुनिया की एक तिहाई आबादी इसकी चपेट में आई थी। तकरीबन 5 करोड़ से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। ख़ैर हमारी कहानी यह भी नहीं है।
हम लौटते हैं अपनी मूल बात पर कि कैसे कोरोना महामारी में लोगों ने लापरवाही बरती। लापरवाही यह कि मास्क न पहनना। स्पेनिश फ्लू जब फैला, तब भी दुनियाभर में लोग मास्क पहने नजर आए थे। इसी मास्क ने दुनिया के लोगों को संक्रमण से बचाया था। कहा तो यह भी गया कि अमेरिका में तब कुछ हिस्सों में मास्क न पहनना गैरकानूनी था। यानी अगर आप मास्क नहीं पहनते हैं, तो समझिए आप अपराध कर रहे थे। अगर लेकिन इस बार आख़िर क्या बदला सा दिख रहा है। तब मास्क न पहनना अपराध था, और यूं 5 करोड़ जान लेने वाले स्पेनिश फ्लू से जीती जंग। तब और अब में फिर अंतर क्या है?
तो यह था अंतर। जब कोरोनो वायरस महामारी ने एशिया को चपेट में लेना शुरू किया, तो पूरे महाद्वीप में लोग मास्क पहनने लगे। ताइवान और फिलीपींस जैसे कुछ देशों में तो इसे अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन, पश्चिमी देशों में इसे लेकर एक लापरवाही-सी रही। इंग्लैंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी क्रिस व्हिट्टी ने तो दावा तक किया कि मास्क पहनना कोई जरूरी नहीं है। लेकिन आप जानते हैं स्पेनिश फ्लू और कोरोना वायरस महामारी में यहीं एक बात अहम हो जाती है। स्पेनिश नियंत्रित होने के बाद अक्टूबर 1918 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में महामारी फिर तेजी से फैलने लगी। अस्पतालों में संक्रमितों की संख्या में वृद्धि होने लगी। इसके बाद 24 अक्टूबर, 1918 को सैन फ्रांसिस्को ने मास्क अध्यादेश पारित किया। यह पहली बार था, जब सार्वजनिक रूप से मास्क पहनना अमेरिकी धरती पर अनिवार्य किया गया। सैन फ्रांसिस्को में सार्वजनिक रूप से मास्क अनिवार्य करने के बाद जागरूकता अभियान शुरू हुआ। लोगों को बताया गया कि "मास्क पहनें और अपना जीवन बचाएं! एक मास्क स्पेनिश फ्लू से बचाव की 99% गारंटी है।" मास्क पहनने के बारे में गाने तक लिखे गए। यहां तक कि बिना मास्क के बाहर पाए जाने वाले को जुर्माना या जेल भी हो सकती थी। (आगे जारी...)