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क्रिकेट में ख़त्म हुई दादा की दबंगई

क्रिकेट की आईपीएल मंडी एकबार फिर सजी. आईपीएल के पहले सत्र में जिन लोगों ने खिलाड़ियों की नीलामी को लेकर तमाशा खड़ा किया था, वह भी निढाल हो गए. चर्चा रही तो बस दादा की.कोलकाता के प्रिंस और महाराज कहलाने वाले सौरभ गांगुली की. वह भी उनके न बिकने की वजह से. इस मसले पर हो-हल्ला किसी ने किया हो या नहीं, लेकिन दादा के न बिकने की वजह से मीडिया को ज़बरदस्त मसाला मिल गया. सात दिनों तक समाचार दिखा-दिखाकर कि दादा नहीं बिके, दादा नहीं बिके. क्या यह दादा का अपमान है या कोलकाता का. या फिर भारतीय क्रिकेट का. मीडिया को भले ही इनमें से सभी का अपमान लगा हो, लेकिन मेरी मानिये तो क्रिकेट के जानकारों को किसी का अपमान नहीं लगा होगा. मुझे भी नहीं लगा, लेकिन हाँ दुःख बहुत ज्यादा हुआ. दुःख इसलिए कि मैं गांगुली का बहुत बड़ा फैन हूँ और अब मुझे उनकी बल्लेबाजी नहीं देखने को मिलेगी. मुझे आश्चर्य भी हुआ, इसलिए कि दादा ने अपनी टीम में सबसे ज्यादा रन बनाये थे और किसी भी युवा खिलाड़ी से उनका प्रदर्शन कमतर कभी नहीं था. लोग कह रहे हैं उनकी कप्तानी बेअसर रही, एक पल को मैं मान लेता हूँ थी. लेकिन इसके लिए उनके खेल को भला क्यों कसूरवार ठहराया जा सकता है. गांगुली समर्थक ये आस बांध रखे थे कि जब फिर से उन खिलाड़ियों की बोली लगेगी, जो बिके नहीं है, तो गांगुली अच्छी क़ीमत पर बिकेंगे. यह आस मुझे भी थी, लेकिन जब आप बाज़ार में खड़े हों और आपके सामान को कोई खरीदना नहीं चाहता तो आप ज़बरन उसे नहीं बेच सकते. हाँ, इतना ज़रूर कर सकते हैं कि अपने उत्पाद की ऐसी मार्केटिंग करें कि वह बिक ही जाये. आजकल तो कंघी की ऐसी मार्केटिंग हो रही है कि गंजे भी उसे खरीद रहे हैं और दादा तो कोहिनूर हैं. शायद अपनों ने ही उन्हें दगा दिया और जैसा कि कोलकाता टीम के मालिक शाहरुख़ ने भी कहा कि दादा को न खरीदने के फैसला क्रिकेट के जानकारों ने ही किया. उन्होंने कहा कि पहले संस्करण के बाद क्रिकेट से जुड़े मसलों पर फैसला उनके क्रिकेट दोस्त ही करते हैं. निराशा की बात तो यह भी थी कि भी टीम की सहमति से जिन 28 खिलाड़ियों के लिए फिर बोली लगी, उनमें न सौरभ गांगुली का नाम था, न ब्रायन लारा का, न मार्क बाउचर का और न सनथ जयसूर्या का. लेकिन मुझे सबसे अधिक निराशा दादा के न बिकने ससे हुई. उन्हें खेलते देखना शायद अब नसीब न हो.

केशव की तान पर कलमाडी का खेल

पांच दिनों बाद लिख रहा हूँ. राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में ही लिख रहा हूँ. उद्घाटन समारोह बेहद शानदार रहा. एक दिन पहले तक जो दुनिया खेलगांव को गन्दा और बकवास करार दे रही थी, उसके अखबारों और चैनलों में वाहवाही का आलम था. कल तक जो ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों के दल प्रमुख आलोचना करते अघाते नहीं थे, वही आज तैयारियों और इंतजामों से मुत्तासिर हैं. या तो वो पहले झूठे थे या अब. लेकिन इन सब बातों को भी छोड़ दें तो उदघाटन समारोह वाकई भव्य और अनूठा रहा. न इसमें बॉलीवुड का तड़का था और न ही कोई तमाशा. इससे कुछ लोगों का यह गुमान टूटा कि बगैर बॉलीवुड के कोई समारोह सफल नहीं हो सकता. भारत की मूल संस्कृति ने जो रंग जमाया उसकी जगह कोई नहीं ले सकता था. इस समारोह में था तो बस भारतीय संस्कृति और विविधता में एकता का सबसे बड़ा सबूत. दुनिया देख कर दंग और हैरान थी. शायद अब तक जो भारतीय मीडिया खेलों में गंदे धंधे का पर्दाफाश कर रहा था, उसने भी थम कर सोचा और भारत की तहजीब पर बट्टा नहीं लगने दिया. उद्घाटन समारोह की बात कहूं तो केशव की तान ने अभिभूत कर दिया. कलमाडी के सारे कुकर्मों पर पर्दा डाल दिया. उसकी मुस्कान को देख कर ही सभी के चहरे खिल गए होंगे. महज सात साल की उम्र में कोई बच्चा इतनी मस्ती में तबला बजाये यह तो अद्भुत है. मेरी भतीजी ने मुझे फ़ोन किया और कहा...'चाचू आपने उस छोटे बच्चे को देखा, हालाँकि मेरे भतीजी भी सात साल की ही है, फिर भी उसे वह भी बच्चा ही कह रही थी., उसने कहा, उसका नाम केशव है और वह कितना बढ़िया से मुस्कुरा रहा था. ' केशव उस छोटे से समय के प्रदर्शन में सबों का चहेता बन चुका था. उसका नाम सभी के लबों पर था. खेलों के गुनहगार की खोज फिर खेलों के बाद की जायेगी. अभी तो वक़्त है भारतीयता दिखाने का. कल जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम गया. एथलेटिक्स का मुकाबला था. भारत की और से चुनिन्दा खिलाड़ी ही इन स्पर्धाओं में शिरकत कर रहे थे. जाने माने चेहरों में सौ गुना चार मीटर दौड़ में मंजीत कौर और मंदीप कौर  सेमीफाइनल में थीं. इनमें से मंदीप कौर अब फाइनल में खेलेंगी. सौरभ विज भी शौट पुट में थे. यानी गिनती के भारतीय खिलाड़ी. बावजूद इसके लोगों की तादाद कम नहीं थी.  हैरत तो इस बात से हुई और गर्व भी कि जब ऑस्ट्रलियन महिला एथलीट ने सौ मीटर दौर में गोल्ड जीती तो पूरे मैदान के चक्कर लगाये. उस वक़्त लोगों के तालियों की आवाज़ से पूरा स्टेडियम गूँज उठा. यानी सच्ची भारतीयता की झलक सभी सामने थी. यह देखकर मुझे उतना ही मज़ा आया, जितना सभी को आना चाहिए. मुझे लगा यूं ही कोई बात कहने से उसे परख लेना बेहतर होता है. आखिर वही सच्चाई होती है. भारतीयता पर जो लोग सवाल उठाते हैं उन्हें भी ये चीज़ें देख लेनी चाहिए बजाय कोरा विश्लेषण करने के.

गिल साहब फोटो खिंचाना छोड़िए, ज़रा कॉमनवेल्थ की सुध लीजिए

भारत में हर कोई अपनी मर्जी का मालिक है. यह बात हमारे मत्री साहब से लेकर आम जनता तक पर लागू होती है. इस हिसाब से चलें तो एम एस गिल खेलों के खुदा हैं. वह हमारे कहल मत्री हैं. उनकी ज़िम्मेदारी है खेलों को बढ़ावा देना. खेलों की सभ्यता कायम करना है. लेकिन भारतीय खेलों के खुदा ने जों हरक़त मंगलवार को की है, उसे कभी नहीं भूला जा सकता है. आप सभी इस बात से वाकिफ होंगे ही कि हमारे खेलों के खुदा ने क्या किया है. सुशील कुमार मास्को से कुश्ती का गोल्ड मेडल जीत कर लौटे थे. सुशील के चाहने वालों के अलावा मीडिया भी उनका स्वागत में आँखें बिछाए था. साथ में खेल मंत्री गिल भी आ पहुंचे सुशील को बढ़ायी देने. यहाँ तक तो बात ठीक थी, लेकिन खुद सुशील के साथ फोटो खिंचाने के चक्कर में गिल ने सुशील के गुरु सतपाल का अपमान कर दिया. शायद उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि सतपाल से ज्यादा अहमियत वह सुशील के लिए नहीं रखते हैं. आज सतपाल की वजह से ही सुशील शीर्ष पर हैं. उन्हें भी पता था कि खेल मत्री ने उनके गुरु के साथ ठीक नहीं किया.उन्होंने यह बात कही भी. पर खेल मंत्री के भेजे में यह बात शायद घुसी नहीं. शायद खेल मत्री या दूसरे नेताओं को खुद पहले सभ्यता सिखाने की ज़रुरत है. उन्हें ज्यादा ज़रुरत है. मुझे एक वाकया याद आ रहा है. बात चैम्पियंस ट्रॉफी की है. ऑस्ट्रेलिया की टीम विजेता बनी थी. उस वक़्त शरद पवार बीसीसीआई के कर्ता-धर्ता थे. उस समय कंगारू कप्तान रिकी पोंटिंग अपने बाकी साथियों के साथ कप लेकर जश्न माना रहे थे. बीच में पवार आ गए.  उन्हें धक्का देते हुए पोंटिंग ने हटाया कि आप बीच से हट जाइये. इस पर भारत में हल्ला मच गया, पोंटिंग बदतमीज़ है. मीडिया भी यही बता रहा था. इसकी प्रासंगिकता यह है कि यहाँ सुशील के मामले बिलकुल ऐसा न हुआ हो. पर जों भी हुआ बहुत बुरा हुआ. खेल मंत्री को खुद को समझाना चाहिए, वह बार-बार अख़बारों के अगले पन्ने पर चाप सकते हैं. चैनलों में दिख सकते हैं. पर इन खिलाडियों के पास बहुत काम मौका होता है और उनके गुरु को तो और भी कम. एक तो वह रिटायर नौकरशाह हैं. उसके बाद मनमोहन सिंह की कृपा से चोर दरवाजे से राजनीति में घुसे हैं. आपको बता दें कि उन पर पहले भारत में चुनाव करवाने का ज़िम्मा था मतलब यह कि वह निर्वाचन आयुक्त थे. अब समझ सकते हैं कि वह कांग्रेस की सरकार में मंत्री कैसे बने. बस मैं यही कहना चाहता हूँ कि गिल साहब फोटो खिचाना छोडिये ज़रा राष्ट्रमंडल का हालचाल लीजिये. वैसे भी काफी किरकिरी हो चुकी है. भ्रष्ट्राचार कि तो बात ही नहीं कर रहा, उसका हिसाब तो भाई लोग खेलों के बाद करेंगे. दिल्ली में वैसे भी बारिश रोज़ हो रही है, देखिये कहीं किसी स्टेडियम की छत तो नहीं टपक रही है.

पाकिस्तान और फिक्सिंग की फांस

क्रिकेट में मैच फिक्सिंग कोई नयी बात नहीं है. पहले भी यह होता रहा है. शुरुआती दौर में जहाँ यह नैतिकता का लबादा ओढ़े हुए था. धीरे-धीरे इसकी शक्लो शुरात बदलती गयी. पकिस्तान के खिलाडियों के फिक्सिंग में फंसने की भी कहानी भी कोई नयी नहीं है. साथ ही, इसके आरोपों से मुकरने का रिश्ता भी पुराना है. अब तीन पाकिस्तानी खिलाड़ियों- सलमान बट्ट, मोहम्मद आसिफ़ और मोहम्मद आमिर के ख़िलाफ़ आरोप लगे थे कि सट्टेबाज़ी के संबंध में उन्होंने तय समय पर लॉर्ड्स टेस्ट में तीन नो बॉल फेंके. अब इस मामले की पुलिस और आईसीसी जांच कर रही है. बकौल बीबीसी के रिपोर्टर अब्दुर्रशीद शकूर पाकिस्तानी क्रिकेट में पहली बार सट्टेबाज़ी या नाजायज़ तरीक़े से पैसा बनाने की बात पाकिस्तानी तेज़ गेंदबाज़ सरफ़राज़ नवाज़ की ज़ुबानी सुनने को आई थी.उन्होंने 1979-80 में भारत का दौरा करने वाली पाकिस्तानी टीम के कप्तान आसिफ़ इक़बाल की तरफ़ उंगली उठाई थी कि भारतीय कप्तान के साथ उन्होंने जो टॉस किया था उनके अनुसार वह टॉस संदिग्ध था.इसके बाद ताज़ा मामला बहुत कुछ कहता है. लेकिन सबसे हैरत की बात पकिस्तान का रवैया है.पाकिस्तान हर बात पर डिनायल मोड पर रहता है उसकी यही सबसे बड़ी समस्या है. भारत में मुम्बई पर हमला मामले में भी उसने यही रवैया अपनाया और अब भी वह यही कर रहा है.
लंदन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त वाजिद शम्शुल हसन ने बिना किसी जांच के तीनों क्रिकेटरों को निर्दोष करार दिया और रहमान मलिक ने साजिश का अंदेशा जताया। पर यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि 1983-84 में पाकिस्तानी टीम में शामिल क़ासिम उमर भी आरोप लगे. 1995 में सलीम मलिक पर मैच फ़िक्सिंग का इल्ज़ाम लगा. एलन बोर्डर ने 1993 में पूर्व पाकिस्तानी खिलाड़ी मुश्ताक़ मोहम्मद पर इसी तरह का इल्ज़ाम लगाया था.कहानी बस पाकिस्तानी क्रिकेट तक ही सीमित नहीं है. सटोरियों और क्रिकटरों का नापाक रिश्ता काफी पुराना रहा है.शायद वह साल २०००-०१ का वक़्त था, जब हैंसी क्रोनिए ने मैच फिक्स करने के लिए सटोरियों से रिश्वत लेने की बात क़बूल की थी.आईसीसी ने भ्रष्टाचार से निबटने के लिए एक विशेष इकाई बनाई है, लेकिन 'स्प्रेड बेटिंग' के कारण इस समस्या पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा है. कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि मैच फिक्सिंग में दामन तो कमोबेश सभी देशों के खिलाडियों का हुआ है. पर सबसे अधिक पाकिस्तान का. इस वजह से उस पर सबसे अधिक नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह डिनायल मोड से निकल कर डूइंग मोड में आये और अपने पाक दामन को नापाक होने से बचाए.

बाय-बाय ब्राजील के बाद अलविदा अर्जेंटीना

पहले बाय-बाय ब्राजील। अब अलिवदा अर्जेंटीना। विश्वकप में ब्राजील की हार ने क्या कम गम दिए, जो अब अर्जेंटीना ने जले पर नमक छिड़क दिया। कल भी मैंने कहा था, माराडोना मुझे पसंद नहीं हैं। पर, मेसी के लिए अर्जेंटीना को सपोर्ट किया। अब, वह भी खिताबी दौर के क्वार्टरफाइनल से ही बाहर हो गया। मेसी-डोना का जादू नहीं चला। ऑक्टोपस बाबा ने भी जर्मनी के जीतने की भविष्यवाणी की थी। मैं इन भविष्यवाणी पर कभी थोड़ा सा भी यकीन नहीं करता। जर्मनी के जीत जाने पर भी नहीं कर रह हूं। मैच के तीसरे मिनट में ही मुलर ने गोल दाग अपने इरादे जता दिए। हालांकि, मैच में अधिकांश समय अर्जेंटीना हावी रही। गेंद उसके पाले में ही रही। वह जर्मनी टीम की डी में ही मंडराती रही। फिर भी एक गोल नहीं दाग सके कोई अर्जेंटीनाई खिलाड़ी। गोल के 20 मौके मिले, नतीजा-जीरो। वहीं, जर्मनी को 18 उसने चार को गोल में तब्दील किया। क्लोस ने तो कमाल ही कर दिया। दो गोल दाग बता दिया कि वह जर्मनी के लिए क्यों सबसे खास हैं। इस मैच से सबसे ज्यादा खुशी जर्मन चांसलर हुई होंगी। क्योंकि जो बिल क्लिंटन को नसीब नहीं हुआ, वह उन्हें हो गया। क्लिंटन भी अमेरिका का मैच देकने पहुंचे, लेकिन उनकी टीम ने उन्हें खुश होने का अवसर नहीं दिया। यहां मर्केल तो हर गोल के साथ उछलती नजर आ रही थीं। मैच का नायक तो मैं जर्मन के गोलची को करार दूंगा, जिसने अर्जेंटीना के बीस हमलों में से एक को भी सफल नहीं होने दिया। मेस से लेकर त्वेज सभी ने बेइंतहा कोशिश किए, पर हर बार उन्हें नाकामी हाथ लगी। दिल से इस मैच में अर्जेंटीना के साथ था, पर दिमाग कह रहा था जर्मनी जीतेगी। वहीं हुआ। पर, इतने भारी अंतर से वह माराडोना की टीम को धोएगी अंदाजा नहीं था। बेशक, कोच माराडोना इस हार से सबसे ज्यादा आहत हुए होंगे। हमारे एक सर बार-बार कह रहे थे, जर्मनी जीतेगी। मुझे कतई यकीन नहीं था। पर, जैसे ही तीसरे मिनट में अर्जेंटीना गोल खाई, उसेक हारने का डर सताने लगा। लेकिन उसके ताबड़तोड़ जवाबी हमले से लगा, यह माराडोना की टाम है। गॉड ऑफ हैंड के शेर हैं, जल्द ही इस बढ़त को पाट देंगे। लेकिन, घड़ी की सूई के साथ-साथ उनके खिलाफ गोल का अंतर बढ़ता गया। उसके जीतने की उम्मीदें धूमिल होती गई। यही फुटबॉल का रोमांस और रोमांच है। अब मेरी नजर स्पेन पर है। डेविड विला से चमत्कार की उम्मीद है। विला के ‘विल-पावर’ की जरूरत तो स्पेन को भी होगी। पुर्तगाल के खिलाफ वाले फॉर्म को ही उनके प्रशंसक देखना पसंद करेंगे। मेरी तमन्ना तो उससे भी ज्यादा की है। तो दोस्तों स्टे विथ स्पेन एंड विश फॉर विला।

हैरान हूँ ब्राज़ील की हार से

ब्राजील विश्वकप से बाहर हो गया। हार से बहुत आहत हूँ। उसकी हार ने मायूसी कम अफसोस ज्यादा हुआ। यही होता है जब एक टीम जीतती रहती है तो बहुत ही मजबूत और खिताब का दावेदार नजर आती है। हारने पर सारी खामिया सामने आ जाती है। ब्राजील के हारने की पीड़ा मेरे लिए कुछ ज्यादा है। इसकी वजह भी मेरी एक कमजोरी है। दरअसल मैं किसी चीज को चाहता हूं, प्यार करता हूं तो उसे हारते हुए खोते हुए नहीं देख सकता। आजकल इस प्रवृति को लोग पजेसिव कहते हैं। ब्राजील टीम के बारे में भी मेरे साथ है कुछ ऐसा ही है। मुझे उसके हारने की कतई उम्मीद नहीं थी। वह भी नीदरलैंड से तो कभी नहीं। लेकिन, खेल का अंतर सबकुछ चौपट कर दिया। शुरू से ही ब्राजीलियाई खिलाड़ी रफ खेलते नजर आए। फुटबॉल से भिरने की जगह विपक्षी खिलाड़ियों को ही वह गेंद समझते रहे। उन्हें गिराते रहे, खुद गिरते रहे। हालांकि, वह पहले 10 मिनट में ही 1-0 से आगे हो चुकी थी। एक गोल ऑफ साइड होने की वजह से नहीं मिला। पर, बाद में पता नहीं रोबिन्हों को क्या हो गया। पहला गोल करने के बाद वह कुछ ज्यादा ही सनकी हो गए। अपना आपा खो दिया। फैबियानो ने भी अपने फैन्स को काफी निराश किया। उनका शानदार फॉर्म पता नहीं कहां गायब था। काका को दो मौके मिले, लेकिन उनका किक भी गोल में नहीं तब्दील हो सका। दोनों मर्तबा विपक्षी गोलची ने काका के किक को विफल कर दिया। नीदरलैंड और फुटबॉल प्रेमियों के लिए मैच का सबसे शानदार पल और ब्राजील के प्रशंसक और मेरे लिए सबसे निराशा वाला क्षण रहा मैच का तीसरा और ब्राजील के खिलाफ दूसका गोल। एक किक, पहला हेडर ब्राजील का गोलची जुलियो सीजर अपने ही खिलाड़ी से टकराया, फिर हेडर और ब्राजील के खिलाफ नीदरलैंड का दूसरा गोल। यानी एक किक, दो हेडर, एक गोल और इसके साथ ही ब्राजील वर्ल्डकप से बाहर। ब्राजील के हारने का गम बहुत बुरा रहा दोस्तों। अब तो फीफा का यह विश्वकप भी देखने का मन नहीं कर रहा है। पेले का अतिआत्मविस्वास अब उनके बयानों में देखने को नहीं मिलेगा। माराडोना को अक्सर वह निशाने पर रखते हैं। अभी भी मैं ब्राजील का प्रशंसक हूं। उसके लिए अगले वर्ल्डकप का इंतजार करूंगा। फिर भी, अब इस वर्ल्डकप में उसके न होने की हालत में मैं मेसी के लिए अर्जेंटीना को सपोर्ट करने जा रहा हूं। माराडोना कई लोगों के लिए महान खिलाड़ी हैं। पर, वह मुझे पसंद नहीं है। फिर भी लियोनेल मेसी के लिए चियर अप अर्जेंटीना।

फीफा का फीवर यानी फुटबॉल का खुमार

फीफा विश्वकप का खुमार सर चढ़ कर बोल रहा है। जब से दक्षिण अफ्रीका में फुटबॉल का यह महाकुंभ शुरू हुआ है, खेल की कई प्रतियोगिताएं भी साथ चल रही हैं। पर सभी का ध्यान तो फुटबॉल के रोमांचक मुकाबलों पर ही है। चाहे भारत-श्रीलंका-पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच खेला जाने वाला एशिया कप ही क्यों न हो? या फिर टेनिस का विंबलडन। एशिया कप में भारत-पाकिस्तान के बीच मुकाबला अरसे बाद हुआ। भारत जीता भी। यहां तक कि फाइनल में श्रीलंका को पटखनी देकर एशिया कप का सरताज भी बना। पर उतना हो-हल्ला या जोश क्रिकेट का इबादतगाह करे जाने वाले भारत में भी नहीं देख गया। क्रिकेटप्रेमियों की छोड़िए, जब खुद क्रिकेटर और उससे जुड़े तमाम चेहरे भी फुटबॉल फीवर में डूबे हों तो समझा जा सकता है इसकी दीवानगी किस हद तक लोगों के सर चढ़कर बोलती है। आखिर यूं ही नहीं यह खेल दुनिया का सबसे अधिक देखा जाने वाला खेल है। फुटबॉल के खेल में इतनी तेजी है कि युवाओं को यह सबसे अधिक लुभाती है। तेजरफ्तार पसंद युवा ही नहीं, बल्कि वैसे तमाम लोग जो खेलों के रोमांच, खिलाड़ियों की कुशलता और भरपूर मनोरंजन के कायल हैं वह भी पीछे नहीं हैं। शुक्रवार को इसके लीग दौर के सारे मैच खत्म हो गए। अब तक कई उलटफेर हमदेख चुके हैं। शुरुआत में खिताब का प्रबल दावेदार माना जा रहा फ्रांस पहले ही दौर से तो बाहर हुआ ही, पिछली बार की चैंपियन टीम इटली भी स्लोवाकिया जैसी टीम से हारकर अपने घर पहुंच चुकी है। इन दोनों टीमों के शुरुआती दौर में बाहर होने की कोई उम्मीद भी नहीं कर रहा था, पर फुटबॉल जैसे खेल की यही खासियत है। यहां उम्मीदों से नहीं खेल से टीमें जीतती हैं। जरा सी चूक यानी एक खिलाड़ी का लचर प्रदर्शन भी टीम के बाहर होने वजह बन जाती है। फ्रांस की टीम थिएरे हेनरी और एडम- पिएरे जैसे धुरंधरों से लैस थी, फिर भी उन्हें बेआबरू होकर बाहर होना पड़ा। यही कुछ हाल डिफेंडिंग चैंपियन इटली का रहा। हालांकि इटली के लिए सबसे बुरा यह रहा कि उसके तेजतर्रार मिडफील्डर आंद्रेया पिरलो चोट की वजह से दो मैच नहीं खेल पाए। यहां वल्डर्कप में भारत तो कहीं नहीं है, लेकिन एशियाई टीमों में दक्षिण कोरिया और जापान बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं। मेरी फेवरेट टीम तो ब्राजील है, लेकिन अर्जेंटीना के खेल से ज्यादा प्रभावित नजर आ रहा हूं। एक ऐसा वक्त था जब अर्जेंटीना फीफा वर्ल्डकप के क्वालिफाइंग दौर से बाहर होने वाली थी। इसके चलते उसके कोच डिएगो माराडोना की बेहद आलोचना भी हो रही थी। पर अब उसके खेल में जबरदस्त का सुधार देखने को मिल है। लियोनेल मेसी तो कहर ढा रहे हैं। भले ही वह गोल न कर पाए हों, लेकिन गोल के लिए जो मूव वह बनाते हैं, उसकी तारीफ जितनी की जाए उतनी कम है। उधर पुर्तगाल की टीम भी अच्छी खेल रही है, पर क्रिस्टियानो रोनाल्डो में वह बात नजर नहीं आ रही है। हालांकि, वह किसी भी टीम को अकेले मात देने के लिए काफी है। पर, ब्राजील के साथ आखिरी लीग मैंच इतनी बोरिंग रही कि क्या कहूं। शायद दोनों टीमें बेहतरीन खेली। लेकिन भाई हमें तो गोल यानी फैसला चाहिए। खैर प्रतियोगिता के नॉक आउट दौर में पहुंचने से मेरी यह तमन्ना भी पूरी हो जाएगी। वहां इस तरह से गोल रहित मैच तो नहीं देखने पड़ेंगे। ब्रिटिशों ने भी अच्छा खेल दिखाया है, वेन रूनी से सभी को काफी उम्मीदें होंगी। इसके बावजूद मैं ब्राजील का ही सपोर्टर हूं और रहूंगा। अभी तक काका को नहीं देख पाया। अब जबिक मैच मॉक आउट दौर में पहुंच चुका है तो फैबियानो से भी उम्मीद काफी बढ़ गई है।

आईपीएल से डगमगाया सरकार का इंद्रासन

शिक्षा व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठते रहते हैं। पर इसकी जड़ में अहम सवाल को अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। अभी तो आईपीएल देश की सभी समस्याओं पर इस कदर हावी है कि बाकी किसी भी मसले पर बात करना बेमानी ही है। चूंकि शिक्षा में गिरावट के लिए सरकार का रोल बहुत व्यापक है। इसलिए वह अपने दायित्वों से बचने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। कभी आईपीएल विवाद में अड़ंगा डालकर तो कभी फोन टैपिंग का मामला सामने लाकर तो कभी किसी और तरीके से। उसे हमेशा खतरा बना रहता कि कहीं जनता जागरूक हो गई तो उसके खिलाफ कहीं बगावती तेवर न अपना ले। जनता की जागरूकता से सरकार की सत्ता ठीक उसी तरह डगमगाने लगती है, जैसे पुराणों में वर्णित कथा के मुताबिक, जब कोई आम आदमी भी तपस्या करता तो इंद्र को हमेशा भय सताता की यह तपस्या उसकी गद्दी छीनने के लिए की जा रही है। फिर इससे बचने के लिए वह दस तरह की तरकीबें आजमाता। काम, क्रोध, लोभ, मोह माया इत्यादि शत्रुओं को वह उस तपस्या को भंग करने के लिए भिरा देते थे। कभी रंभा तो कभी मेनका की मोहनी मूरत का सहारा लेते। हमारी सरकार भी ठीक यही करती है। सबसे पहले बाबरी मस्जिद पर लिब्रहान कमेटी की रिपोर्ट आई तो अपनी नाकामी से बचने के लिए रंगनाथ का मामला लीक हो गया। जिसके तहत अल्पसंख्यक मुसलमानों को आरक्षण देना था। जब यह मामला तूल पकड़ा तो गुजरात में गोधरा दंगा पर रिपोर्ट सामने पटक दिया। फिर महंगाई के मामले में घिरती नजर आई तो नरेंद्र मोदी को एसआईटी के सामने पेश कराकर उससे ध्यान भंग कराया। मोदी का मामला खत्म हुआ तो आईपीएल में अपने कारिंदे थरूर के जरिए बखेरा खड़ा दिया। यह सबसे बखेरा ही तो है। क्योंकि यदि सरकार के इरादे स्पष्ट होते तो अब जो वह वित्त मंत्री और आयकर विभाग जांच के नाम पर तमाशा कर रही है, वह पहले भी कर सकती थी। जब आईपीएल शुरू हुआ तब भी केंद्र में वही सरकार थी, जो आज तीन साल बाद है। सत्ता परिवर्तन से इसका कोई लेना देना नहीं है। एक तरह से कहें तो इंद्र की तरह सरकार घबरा और डर गई है।

थरूर के लगातार ट्विटिंग से सरकार की किरकिरी रूक नहीं रही थी तो उसे भी तो मजा चखाना था। इसी बीच कहीं से उड़ती खबर आई कि थरूर तीसरी शादी करेंगे। उनकी भावी पत्नी ने आईपीएल में हाथ आजमाए हैं। थरूर को आखिर उनकी औकाद बता दी गई । फिर महज तीन साल में ही आईपीएल से ललित मोदी दुनिया की सबसे ताकतवर बोर्ड बीसीसीआई को चुनौती दे रहे हैं। पहले शरद पवार की चूलें हिली। वह भी आए दिन कांग्रेस की कमीजें फाड़ रहे थे। जब थरूर ने अपना वर्चस्व दिखाना चाहा तो मोदी ने उनकी एक न चलने दी। मोदी ने अपने मोहरे से थरूर का गरूर तो चूर कर ही दिया। इससे सरकार को लगा कि बात काफी आगे निकल गई है तो उसने ठान लिया कि अब किसी कीमत पर मोदी को मिट्टी में मिलाकर ही वह दम लेगी। मोदी के लिए बाहर का रास्ता तैयार वह कर ही चुकी है। अभी क्लाइमेक्स तो बाकी ही है। बात निकल चुकी है, पर लगता नहीं कि दूर तलक जाएगी।

मोदी से मिलेगी थरूर को मात

खेलों को मनोरंजन के लिए खेला जाता है। पर इस खेल पर भी राजनीतिक खेल शुरू हो चुका है। आईपीएल अपनी शुरुआत से ही दौलत का खेल बन चुका है। लेकिन अब नेताओं और फिल्मी सितारों ने इसे पैसा कमाने का पेशा बना लिया है हम अन्य खेलों को वैसे ही भूल चुके हैं, जैसे हम बीमारी,गरीब़ी,अशिक्षा,बेकारी,भ्रष्टाचार,नक्सलवाद और आतंकवाद को भूल गए। आईपीएल निश्चित तौर पर पैसे का ही खेल है। यहां खराब से खराब खेलने वाला भी एक सीज़न में 40 लाख रु. की कमाई कर रहा है. वो भी ऐसे में जब भारत की 35 फ़ीसदी आबादी को दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं। हाल में नक्सलियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दुया। पर अब कोई भी चिदंबरम के सामने अपना माइक नहीं घुसेड़ रहा है। कहां तो इस्तीफे की पेशकश चिदंबरम ने की थी। पर अब देना पड़ रहा है थरूर को। अमेरिकी बेस बॉल चीयर लीडर्स की तर्ज़ पर खेल के दौरान मैदान में कम से कम कपड़े पहन कर लड़कियों के नाचने का कई जगहों पर विरोध हुआ. कहा गया कि ये भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ है। अब तो आरोप यह भी लग रहे हैं कि आईपीएल के जरिए सारा काला पैसा सफेद किया जा रहा है। पहले एनजीओ के जरिए यह काम होता था। पर उसकी साख पर भी बट्टा लग चुका है। इसलिए यह नया तरीका निकाला गया। इस पूरे प्रकरण में शशि थरूर के शामिल होने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वह कोई पहले नेता नहीं हैं, जो इस तरह से इस खेल में सामिल हैं। हां इतना जरूर है कि जिसकी चोरी पकड़ी जाती है, वही चोर कहलाता है। और, थरूर की चोरी पकड़ी गई है। वह खुलेआम डाका करने निकले थे। नतीजतन उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक बात और है कि दो दिन पहले तक ललित मोदी खूब सुर्खियों में रहे। फिलहाल वह पर्दे के पीछ हो गए हैं। दरअसल सारे प्रकरण से एक बात सामने आती है वह यह कि हम नौटंकी और सोप ओपेरा के ज़माने में रह रहे हैं और यहाँ कोई बात तब तक सच नहीं है जब तक कि टेलीविज़न उस पर अपनी मुहर नहीं लगा देते। जैसे ही ललित मोदी ने शशि थरूर पर हमला बोला मीडिया ने भी अपनी भाषा तुरंत बदल दी। आखिर इसकी वजह क्या है? यह भी सोचने का विषय है। करोड़ों का यह खेल चैनलों को अभ भी टीआरपी दे रहा है। पर मैच के लिए नहीं, बल्कि खबरों के लिए।

भारत की सबसे बड़ी समस्या

इंडियन प्रीमियर लीग का सही मैच अब शुरू हुआ है। क्रिकेट के मैदान से राजनीतिक गलियारे में अब खूब चौक-छक्के लगने लगे हैं। कल तक जो विपक्षी दल नक्सलवाद, महंगाई, गुदरात दंगों में नरेंद्र मोदी से जवाब-तलब, लिब्रहान आयोग, रंगनाथ कमीशन आदि मुद्दों को लेकर संसद तक नहीं चलने देती थी। वह अब आईपीएल का मैच लोकसभा और राज्यसभा में खेलने लगी है। हाल मे सानिया मिर्जा तक को लेकर राजनीतिक पार्टियां ने खूब तमाशा खड़ा किया। मानों भारत में अब गरीबी, बढ़ती महंगाई, कम हो रहे रोजगार के अवसर, आर्थिक मंदी, कॉमनवेल्थ क नाम पर गरीब और निचले तबके का विस्थापन की समस्या से कहीं बढ़कर आईपीएल हो चुका है। सानिया मिर्जा की शादी का मुद्दा बड़ा हो गया है। बात सिर्फ राजनीतिक दलों की ही नहीं है। हमारा मीडिया जिस तरह की खबरें दिखा रहे है, वह भी कम दिलचस्प नहीं है। देश का सबसे तेज चैनल का तमगा लिए घूमने वाला नंबर एक चैनल खबर के नाम पर लोगों का मनोरंजन करती दिखती है। इन खबरिया चैनलों पर मनोरंजन के नाम पर भी भौंडा पर दिखाया जाता है। आधे घंटे के कॉमेडी शो में संवादों के द्विअर्थी मतलब और अधनंगी तस्वीरों में नहाती रियलिटी शो की नायिकाएं। यह सब पड़ोसा जाता है। बात चाहे खुद को सबसे विश्वसनीय कहने वाले चैनल की ही क्यों न हो। उसका तमाशा भी कम नहीं है। कुछ खुलेआम करते है, कुछ बहुत ही चालाकी से और चुपके-चुपके। अपने लाइफ-स्टाइल वाले चैनल से किंगफिशर के कैलैंडर शूट की अधनंगी मॉडल की तस्वीरें ज्यादातर लोगों को भले ही पसंद आता हो, पर इसे वह न्यूज चैनल पर शायद ही देखना चाहते होंगे। यदि देखना भी चाहते हैं तो क्या हमारी यही जिम्मेदारी है। शायद इसी लिए पाकिस्तान में भौडी और खबरों के नाम पर नंगा नाच करने वाले चैनलो पर प्रतिबंध लगाने की बात हो रही है। यह काफी हद तक सही भी है। हमें अपने दुश्मन में हमेसा बुराइयां ही नहीं देखनी चाहिए। राम भी कहा करते थे कि रावण भले ही बुरा है, फिर भी उन्होंने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान के पास भेजा था।

खैर अब वापस असली मसलों पर आते हैं। देश की बड़ी आबादी को यहां किस तरह बेवकूफ बनाया जा रहा है। जनता को पता हो या न हो पर कुछ लोग तो इस मैदान के बाहर के खेल को भली भांति खेल रहे हैं और अरबों खहरों के वारे-न्यारे कर रहे हैं। पहले कहा जाता था कि एनजीओ के जरिए ब्लैक मनी को व्हाइट बनाया जाता था। अब आईपीएल में 1500 करोड़ तक की टीम की खरीदना किसी के मेहनत की गाढ़ी कमाई होगी। कोई कुंभ के दौरान गंगा में डुबकी लगाकर भी कहे तो मुझे यकीन नहीं होगा। आईपीएल क इतना बड़ा दांव भारत में फेंका गया है कि दो वक्त की रोजी रोटी को तड़पने वाले का मामला कहीं खो सा गया है। हमारे मुल्क के गरीब भी अपनी गरीबी, लाचार और बेबस जिंदगी के अभिशप्त है। यह उनके पूर्व जन्मों का पाप है। तभी तो वह गरीब से और गरीब बनते जा रहे हैं। वह अमीरों को अमीर बनाने का काम करते हैं। पर उनकी किस्मत पर किसी ने जैसे कालिख पोत दी हो।

द्रविड़ यानी द वॉल की दीवानगी

यह बेहद ही दिलचस्प बात है कि सौरव गांगुली को सबसे सफल कप्तान माना जाता है और उनकी कप्तानी में भारत ने जिन 21 मैचों में जीत हासिल की उनमें टीम के कुल रनों में से 23 फीसदी अकेले द्रविड़ ने बनाए थे. इस दौरान द्रविड़ का कुल औसत सचिन से भी आगे निकल गया था और गेंदबाजों के लिए उनका विकेट सबसे कीमती हुआ करता था.
कुछ साल पहले द्रविड़ ने कहा था कि ऑफ साइड ड्राइव के मामले में भगवान के बाद तो सौरव गांगुली ही हैं. गांगुली ने इसके बदले में कुछ नहीं कहा. लेकिन ज़रा सोचिए यदि वह कुछ कहते तो शायद यही कि ऑन साइड में द्रविड़ की होड़ भगवान के साथ है.
द्रविड़ के साथ अक्सर ऐसा रहा कि पहले उन्हें खारिज कर दिया गया और बाद में उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से हर आलोचक को खामोश कर दिया. टेस्ट क्रिकेट द्रविड़ के मिजाज से मेल खाता है. ऐसे में यह कल्पना आसान है कि द्रविड़ का असली रूप खेल के इस संस्करण में ही दिख सकता है. लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट और अब युवाओं का कहे जाने वाले खेल आईपीएल में उनका बल्ला ख़ूब बोल रहा है. द्रविड़ आज अपनी आईपीएल टीम बेंगलुरू की ओर से सबसे ज़्यादा रने बनाने वाले खिलाड़ी हैं.
करिअर के शुरुआती और आखिरी दोनों दौर में द्रविड़ जैसे खिलाड़ी के साथ जिस तरह बर्ताव किया गया यह देखकर खराब लगता है. इंग्लैंड के दौरे पर उनके लिए जो गड्ढ़ा खोदा गया था उससे बाहर निकलने में द्रविड़ को दो साल लग गए. वक्त बुरा हो तो साथी भी साथ छोड़ देते हैं. इस सीरिज के बाद कुछ जूनियर खिलाड़ियों ने भी उनकी आलोचना की थी. यहां तक कि उनकी फील्डिंग भी खराब हो गई. 14 पारियों में वे कोई शतक नहीं बना सके. लगातार यह कहा जाने लगा कि उनका वक्त खत्म हो गया है. दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के खिलाफ उनके शतक आलोचकों को शांत करने में नाकामयाब रहे. मगर इसके बाद न्यूजीलैंड सीरिज में भी जब उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया तो सब खामोश हो गए. फिर अहमदाबाद और कानपुर की पारियों में उसी पुराने द्रविड़ की झलक दिखी. अभी हाल में बांग्लादेश के खिलाफ उसी द्रविड़ को एकबार फिर देखने को मिला. चोटिल होकर मैच से बाहर होने के पहले टेस्ट करियर का 29वां शतक ठोक अपनी सफलता की तरकश में एक और तीर शामिल कर चुके थे. इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी यदि द्रविड़ वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए, जितनी सफलता उनके समकालीन सचिन और गांगुली ने की तो बस यही कही जा सकता है कि क्रिकेट के इतिहास में द्रविड़ जैसे सितारा ने ग़लत वक्त पर अपनी चमक बिखेरने की कोशिश की. लेकिन वह वक्त भी आएगा जब क्रिकेट के इतिहासकार द्रविड़ की एक अलग ही गाथा लिखेंगे.

द्रविड़ की दीनता या दिलेरी

क्रिकेट के इतिहास में राहुल द्रविड़ के लिए क्या जगह होगी? क्या उन्हें एक महान खिलाड़ी के तौर पर याद किया जाएगा या भारतीय क्रिकेट के दीवार के तौर पर. या फिर एक ऐसे खिलाड़ी के तौर पर जिसकी सफलता हमेशा उसके अपने समकालीन साथी खिलाड़ियों की सफलता के तले दबी रही. अपना पहला ही टेस्ट खेलते हुए द्रविड़ ने 95 रन बनाए. यह किसी भी खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि वह अपने पहले मैच में बेहतर प्रदर्शन करे. द्रविड़ ने यही किया, लेकिन उन्हें बधाई नहीं दी जा सकती थी क्योंकि उसी मैच में सौरव गांगुली ने 131 रन बनाए और गांगुली का भी वह पहला मैच था. यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. द्रविड़ की किस्मत ही कुछ ऐसी रही है. ज़रा याद कीजिए जब भारत ने कोलकाता के ईडेन गार्डेन में ऑस्ट्रेलियाई टीम के लगातार सोलह टेस्ट मैच जातने के रिकॉर्ड को तोड़ा था. उस टेस्ट में भी द्रविड़ के योगदान को कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. उस टेस्ट में द्रविड़ ने 180 रन का आंकड़ा छुआ तो उन्हीं के साथ दूसरे छोर पर खड़े वीवीएस लक्ष्मण ने 281 रन की पारी खेल डाली. द्रविड़ के साथ यह नाइंसाफी किसी और ने नहीं, बल्कि ख़ुद उनकी तक़दीर ने ही की. वह हमेशा बड़े पेड़ के ही तले दबे रहे. उनकी उपलब्धि किसी से भी कम नहीं है. पर जब जब द्रविड़ ने विशिष्ट प्रदर्शन किया, कोई दूसरा खिलाड़ी उनसे बेहतर खेल गया. वनडे मैच में जब उन्होंने उस समय का अपना सबसे बड़ा स्कोर 145 रन बनाए तो उसी पारी में सौरव गांगुली ने 183 रनों की पारी खेली. एक बार फिर जब द्रविड़ ने अपना यह रिकॉर्ड तोड़ते हुए न्यूजीलैंड के खिलाफ 153 रन मारे तो उसी पारी में सचिन तेंदुलकर ने नाबाद रहते हुए 186 रन ठोक डाले. इससे यह अंदाज़ा लगाना आसान मालूम पड़ता है कि द्रविड़ गलत दौर में पैदा हो गए जिसकी वजह से उन्हें सचिन तेंदुलकर और गांगुली जैसे खिलाड़ियों की छाया में खेलना पड़ा. लेकिन द्रविड़ ने हमेशा अपनी अहमियत साबित की. कई दफ़ा तो इन भारतीय दिग्गजों से बेहतर खेल दिखाया. जब भारतीय टीम के धुरंधर एक एक कर ताश के पत्तों की तरह ढेर हो जाते हैं तो यही दीवार टीम इंडिया की बुनियाद मज़बूत करता है. श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद में खेले गए टेस्ट में 32 रन पर भारत के चार विकेट गिर गए थे. सहवाग, तेंदुलकर, लक्ष्मण पैवेलियन लौट चुके थे, मगर दर्शकों की उम्मीदें कायम थीं. इसलिए कि द्रविड़ क्रीज पर थे. उन्होंने निराश भी नहीं किया और भारत को 400 रनों के पार ले गए.

सचिन चालीसा

आपने अभी तक हनुमान चालीसा से लेकर कई चालीसा पढ़ें होंगे...सचीन चालीसा भी...लेकिन यह मेरे मित्र नवीन ने लई चालीसी लीखी है, सचिन की अद्भुद दो सौ रनों का पारी के बाद...उनकी इच्छा थी और भी कि इसे मैं अपने ब्लॉग पर लगाऊं.......
जय सचिन क्रिकेट गुण सागर,
जय क्रिकेटईश पृथ्वी लोक उजागर खेलदूत अतुलित बल दामा,
रमेश पुत्र तेंदुलकर नामा सदाचारी सचिन सतरंगी ,
कीर्तिमान बनावे जीत के संगी कंचन वर्ण छोटे कद का,
सर पे हेलमेट ,घुंगराले केशा हाथ बल्ला और गेंद विराजे ,
सर पे चक्र सह तिरंगा साजे ब्रैडमैन सम भारती नंदन ,
तेज प्रताप महा जग वंदन बल्लेबाज गुनी अति चातुर ,
राष्ट्र काज करिबे को आतुर सचिन को खेल देखबे को रसिया ,
अपनों काम काज सब छडिया सुक्ष्म रूप धरि विकेट गिरावा ,
बिकट रूप धरि रन बनावा भीमरूप धरि शतक बनाए ,
भारत की हार बचाए विश्वकप में जब विपत्ति आई ,
पहुचा फ़ाइनल लाज बचाई तुम उपकार धोनी कीन्हा ,
नए आए तबहु कप्तानी दीन्हा तुम्हारो मंत्र धोनी माना,
विश्वविजेता भय सब जग जाना भारत की जीत के काजही ,
शोकाकुल लौट आये अचरज नाही दुर्गम मैच भारत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते क्रिकेट द्वार के तुम रखवाले,
होत ना कोई चिंता रे जीत मिले तुम्हारी शरना ,
तुम रक्षक हार को डर ना अपने रिकॉर्ड तोड़ो आपे ,
सब टीमें नाम से कापे गेंदबाज कोई सामने ना आवे ,
सचिन तेंदुलकर जब नाम सुनावे मास्टर ब्लास्टर सचिन जंगी,
हार मिटात जीत के संगी संकट ते सचिन छुडावे,
जब मन क्रम वचन से लग जावे ।
पाचो द्वीप परताप तुम्हारा
है प्रसिद्द जगत उजियारा...

कंगारूओं का दबदबा बरकरार

एक तरफ चर्चा है कि विश्व क्रिकेट से ऑस्ट्रेलिया का दबदबा ख़त्म हो रहा है तो दूसरी ओर ऑस्ट्रेलियाई टीम इस बहस को झूठा साबित करने में जुटी है. एक तरफ जहां कंगारूओं ने पाकिस्तान को टेस्ट और एकदिवसीय दोनों में मात दी, वहीं दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया की अंडर नाइनटीन टीम ने भी पाकिस्तान को धूल चटाई. लेकिन सबसे खास बात यह है कि जूनियर कंगारू टीम ने विश्वकप में अपनी जीत सुनिश्चित की. यह तीसरी बार है जब जूनियर ऑस्ट्रेलियाई टीम ने अंडर नाइनटीन के विश्वकप का खिताब अपने नाम किया है. ऑस्ट्रेलियाई टीम ने यह जीत फाइनल में पाकिस्तानी टीम को शिकस्त देकर हासिल की है. उसने पाकिस्तान को 25 रनों से मात दी. यह बेहद ही दिलचस्प है कि पाकिस्तान टीम फाइनल मुक़ाबले को छोड़कर सभी मैचों में विजयी रही थी. इस दौरान आईपीएल में चल रहे विवादों के दौरान पाकिस्तानी टीम ने भारत को भी पटखनी देकर उसे विश्वकप से बाहर का रास्ता दिखाया था. यानी एकबार फिर ऑस्ट्रेलियाई टीम ने विश्व क्रिकेट में अपनी बादशाहत बरकरार रखी है. सिर्फ सीनियर टीम ने ही नहीं, बल्कि जूनियर खिलाड़ियों ने भी जीत की राह पकड़ी है. यदि सीनियर टीम ने चार विश्वकप जीते हैं तो अंडर नाइनटीन टीम का तीसरा विश्व खिताब है.

गंभीर यानी रन मशीन

भारत बांग्लादेश के साथ दो टेस्ट मौचों की सीरीज़ जीत गया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एकदिवसीय सीरीज़ में हमें मात मिली थी। वह भी श्रीलंका के हाथों, जिसे हमने अपने घर में हराया था। लेकिन इन सबके बीच गंभीर एक अहम खिलाड़ी साबित हुए हैं। वह भले ही डॉन ब्रेडमैन का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए। लेकिन उससे भी ज़्यादा उपलब्धि हासिल कर दिखाया। हालांकि द्रविड़ का जबड़ा टूटने से दुख हुआ। मुमकिन है वह अफ्रीका के साथ होने वाले अहम टेस्ट मुक़ाबले में टीम का हिस्सा न बन पाएं। यूं तो युवराज भी चोट से जूझ रहे हैं।
2010 में भारत का पहला टेस्ट। सामने बांग्लादेश की फिसड्‌डी जैसी टीम। फिर भी भारतीय बल्लेबाजों को एक एक रन बनाने के लिए लंबी जद्दोजेहद करनी पड़ी। हालांकि भारत किसी भी तरह मैच जीतने में सफल रहा। लेकिन बांग्लादेश के साथ भारतीय टीम का मुक़ाबला का़फी कुछ कह गया। पर इन सबमें जो सबसे ख़ास बात रही, वह भारतीय टीम के नए भरोसेमंद खिलाड़ी का शतक बनाना। जी हां, बात स़िर्फ टेस्ट मैचों की ही नहीं है। भारतीय टीम का यह खब्बू बल्लेबाज़ क्रिकेट के हर स्वरूप में अव्वल है। चाहे वह एकदिवसीय हो या टी-20। शांत और संयम दिखने वाले गौतम गंभीर पिच पर क़दम रखते ही बल्ले से रनों का अंबार लगाने लगते हैं. तभी तो गंभीर को आजकल भारतीय टीम की नई रन मशीन कहा जाने लगा है. खब्बू बल्लेबाज़ के तौर पर भारतीय टीम में अमिट छाप छोड़ने वाला इस खिलाड़ी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा बोला, तो हर किसी ने कहा कि अब शायद ही भारतीय टीम को गांगुली जैसा बल्लेबाज़ नसीब हो. लेकिन भारतीय टीम को ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा. गांगुली के संन्यास के बाद एक ऐसा खिलाड़ी उभर कर सामने आया, जिसने न स़िर्फ प्रिंस ऑफ कोलकाता की खाली जगह की भरपाई की, बल्कि ख़ुद को उससे भी बेहतर साबित किया. हम बात कर रहे हैं, टेस्ट रैंकिंग में पहले पायदान पर क़ाबिज़ गौतम गंभीर की. गंभीर ने पिछले दो साल यानी टी २० का विश्वकप जीतने के बाद जो भारतीय टीम के लिए योगदान दिया है...वह काबिलेतारीफ़ है.

अजब खेल के गज़ब खिलाड़ी

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के दो मज़बूत और शक्तिशाली स्तंभ। एक दूसरे के चीर प्रतिद्वंद्वी. जहां क्रिकेट का मैदान भी युद्ध का मैदान नज़र आता है. एक टी-20 का पूर्व तो दूसरा मौजूदा चैंपियन, लेकिन आजकल दोनों की हालत खस्ता है. पहले का खिलाड़ी पैसे और ग्लैमर की चकाचौंध में खो गया है तो दूसरा अपने अंदरूनी कलह की वजह से ही परेशान है. अब आपके लिए अंदाज़ा लगाना आसान हो गया होगा कि हम किसकी बात करे रहे हैं? यह कहानी है दुनिया के उन दो देशों की जो क्रिकेट के लोकप्रिय गढ़ माने जाते हैं. हम बात कर रहे हैं भारत और पाकिस्तानी क्रिकेट में आए भूचाल की. इसे भूचाल ही कहना ज़्यादा बेहतर होगा क्योंकि भारतीय खिलाड़ी हैदराबाद में हार के बाद भी जश्न मनाते नज़र आते है तो पाकिस्तानी कप्तान को यह कहना पड़ता है कि उसके हाथों में टीम की कमान तो है, लेकिन खिलाड़ियों पर उनका कोई काबू नहीं है. यही वजह है कि पाकिस्तानी कप्तान थकान का बहाना बनाकर कप्तानी के पद से अपना इस्ती़फा देते हैं. यह उस खिलाड़ी की दास्तां है जिसे संन्यास की घोषणा के बदले टीम की बागडोर मिली थी. शायद यह पाकिस्तान की नियति ही है, जो देश अपने वजूद में आने के समय से ही उथल पुथल में जी रहा है, वहां क्रिकेट जैसे खेलों में इस तरह की बातें बेहद ही आम है. यह हैरान करता है कि जो टीम तेज़ गेंदबाजों का गढ़ माना जाता है, उनके गेंदबाज़ न तो कोई करतब दिखाते नज़र आ रहे हैं और न ही टीम को जीत दिला पा रहे हैं. वहीं भारत की बात करें तो बल्लेबाज़ी के दम पर विरोधियो को पस्त करने वाली टीम के धाकड़ खिलाड़ियों को चंद रन बनाने में ही पसीने छूट रहे हैं. मानों ये सभी क्रिकेट नहीं अजब खेल के गज़ब खिलाड़ी हैं. भारत और पाकिस्तान की समस्याएं एक हैं, लेकिन उनके पहलू और कसूरवार अलग-अलग. पाकिस्तानी क्रिकेट जहां अपने प्रशासकों और खिलाड़ियों के ग़ैर ज़िम्मेदार रवैये से पतन की गर्त में जा रहा है तो भारतीय क्रिकेटर पैसे और ग्लैमर की चकाचौंध में खोते जा रहे हैं. दोनों ही टीमों ने अपने आख़िरी सीरीज़ में हार का स्वाद चखा है. दोनों टीमों ने अपने आखिरी सीरीज़ में हार का स्वाद चखा है और आगे भी डगर आसान नहीं है. यदि सबकुछ ऐेेसे ही चलता रहा तो दोनों देशों में क्रिकेट के लिए कयामत आने से भी इनकार नहीं किया जा सकता. विश्वकप के तारीखों का बिगुल बच चुका है और इनकी तैयारियां क्या गुल खिला रही हैं, ये भी सभी के सामने है. पिछले विश्वकप में दोनों का प्रदर्शन बेहद ही निराशा जनक रहा था फिर भी ये दोनों टीमें अपने इतिहास से सबक लेते नज़र नहीं आ रहे हैं, ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि यदि एकबार फिर पिछले विश्वकप की तरह ख़ुद को दोहराए तो कतई आश्चर्य नहीं.

सिक्सर किंग हुए आउट

चैंपियंस ट्रॉफी में अभी भारत का आग़ाज़ भी नहीं हुआ था कि भारतीय टीम नंबर एक पर क़ाबिज़ हो गई। हालांकि, इसके पहले भी वह श्रीलंका के साथ सीरिज़ में चोटी पर पहुंची थी। लेकिन यहां से लुढ़कने में भी उसे एक दिन से अधिक नहीं लगे। वजह प्रदर्शन में निरंतरता की कमी। फिर यहां तो भारत बिना खेले ही किंग बन गया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो अब उसके सामने होगी। किस तरह धोनी के रण बांकुड़ें अपनी लाज बचाने में क़ामयाब होते हैं। साउथ अफ़्रीका में ही २०-२० का विश्व चैंपियन जीतने का कारनामा धोनी की सेना ने किया था। लेकिन उस बार के सिक्सर किंग युवराज सिंह चोटिल होकर टीम को मंझधार में छोड़ चुके हैं। शायद गुरु गैरी के सेक्स ज्ञान से टीम इंडिया को कुछ फ़ायदा हो जाए। हालांकि एक बात सोचने वाली है कि पुराने खिलाड़ियों को दोबारा क्यों शामिल किया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि अफ्रीका की तेज़ पीचों पर भारतीय टीम के ताश की पत्तों की तरह भरभरा कर गिरने का डर तो चयनकर्ताओं को नहीं सता रहा था। यही सोचकर उन्होंने द्रविड़ को शामिल तो नहीं किया। हालांकि इसकी संभावना अधिक और आशंका कम है। यदि आप सोच रहे हैं कि पिछली बार की तरह यह यूथ टीम भी कारनामा कर दिखाएगी तो नाहक ही यह खाब मत पालिए। वो २०-२० था यह ५०-५० है। वेस्टइंडीज में २०-२० का हाल तो आपको पता ही है। कहीं हस्र वही तो नहीं होने वाला। एक हिंदुस्तानी होने के नाते मैं तो चाहूंगा कि टीम इंडिया जीत हासिल कतरे। लेकिन डर तो रहता ही है। टीम इंडिया है इसका कोई भरोसा नहीं। युवराज जो खेवनहार हो सकते थे, कलाई की चोट ने भारत की मानों कमर तोड़ दिए। हालांकि सचिन अभी भी जब तक टीम हैं हिम्मत तो नहीं ही हारा जा सकता है। फिर टीम इंडिया के पास तो अब गुरू गैरी का कामसूत्र भी है। कहीं यह ही भारत का बेड़ा पार लगा दे। वैसे भी बॉलिंग में आशीष नेहरा को छोड़ कोई भी गेंदबाज़ फॉर्म में नज़र भी नहीं आ रहा है। कुल मिलाकर भारत का भरोसा चैंपियंस ट्रॉफी में पुराने खिलाड़ियो, सचिन, द्रविड़ और नेहरा के अलावा गुरू गैरी की सेक्सरसाइज पर ही टिकी है.

कंगारूओं के क़िले में सेंध

इंगलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को एशेज सीरीज़ में २-१ से मात देकर ये साबित कर दिया कि किस तरह शिखर पर पहुंचने के बाद का रास्ता सिर्फ नीचे की ही ओर आता है जब तक कि आप ख़ुद को वहां टिके रहने के क़ाबिल नहीं बना लेते। कई दफ़ा ये बहस का मुद्दा भी बना कि एक- दो सीरीज़ में हार से ही ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत पर सवालिया निशान लगाना मुनासिब नहीं हो सकता। लेकिन यदि देखें तो पिछले कुछ सीज़न में उसकी हालत वाकई में ख़स्ता बनी रही। दऱअसल अब ऑस्ट्रेलिया अपने खेल में ही मात खाता नज़र आ रहा है। इस बार इंगलैंड के हाथों मुंहकी खाने के बाद कम से कम ये बात तो साबित हो ही जाती है। याद कीजिए भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा, किस क़दर परेशान किया था, कंगारूओं ने। इस बार ठीक वैसा ही बर्ताव उनके साथ ब्रिटेन में हुआ। जिस तरह सिडनी टेस्ट भारत जीत रहा था, लेकिन माइकल क्लार्क और पोंटिंग के बदनीयती ने ऐसा होने नहीं दिया। ज़मीन को छूने के बावजूद क्लीन कैच करार देना और पोंटिंग का अंपायर की जगह आउट का निर्णय देना भला कौन भूल सकता है ? ठीक यही कंगारूओं के साथ स्ट्रॉस एंड कंपनी ने किया। दोनों के बीच जो टेस्ट एक विकेट न गिर पाने की वजह से ड्रॉ हो गया, कितना चपलता के साथ उसे स्ट्रॉस ने बचाया, तब पोंटिग की भन्नाहट बिल्कुल सामने आ गई थी, लेकिन उन्हें याद रखनी चाहिए कि आसमान का थूका अपने मुंह पर ही गिरता है।
अब कंगारूओं की टेस्ट रैंकिंग गिरकर चौथे पायदान पर आ गई है। अपना खोया रूतबा हासिल करना फिलहाल तो दूर की कौड़ी नज़र आ रही है, पोंटिंग एंड कंपना को। वजह साफ है, गेंदबाज़ी में न तो पहले जैसी धार है न ही फिल्डिंग में फुर्ती और न ही बल्लेबाज़ी में बादशाहत। मैक्ग्रा, शेन वार्न, गिलक्रिस्ट, हेडेन और लैंगर जैसे खिलाड़ियों के संन्यास के बाद मानो यह टीम बुरी तरह बिखड़ गई है।एक चैंपियन की हार का मलाल किसे नहीं होता, क्रिकेट का प्रशंसक होने के कारण कंगारूओं के क्रिकेट के खेलने के अंदाज़ का कायल बहुत सारे रहे होंगे, मैं भी था। लेकिन जब अपनी क़ाबिलियत को तराशने के बजाय उस पर कोई घमंड करने लगे तो उसका अंजाम भी क्या होता है, ऑस्टेलियाई क्रिकेट टीम हमारे सामने है।

फ़िर वही टीम लाया हूँ

नेपियर में टीम इंडिया की हालत देखकर तो यही लग रहा है की हम हमेशा ही
आत्ममुग्ध हो जाते हैं।
पहला टेस्ट जीतने के बाद जो हालत है इंडिया की उससे तो यही लगता है। यहाँ तक की टीम फौलो ऑनभी नहीं बचा सकी। सबसे बड़ी कमजोरी तो बौलिंग के के क्षेत्र में रही और कैच टपकाना तो हमारी आदत है ही। नहीं तो ये हालत नहीं होती। न्यूजीलैंड की टीम न इस विशाल स्कोर तक पहुँचती न ही हमें फौलो ऑन खेलना पड़ता। अब इंडिया पर हार के खतरे का बादल मडराने लगा है।ये हालत तो उस समय से है जब भी हम विदेशी पिचों पर खेलने जाते है। हमेशा लगता है की इस बार तो हम उस फोबिया से बाहर निकल आयें है जब कहा जाता था की हम विदेशी पिचों पर नहीं जीत सकते। लेकिन हमने जीतना शुरू किया, उसके बाद कुछ ज़्यादा आत्ममुग्ध हो जाते हैं और अपनी कोशिशों को कम कर देतें हैं।