क्रिकेट में ख़त्म हुई दादा की दबंगई
केशव की तान पर कलमाडी का खेल
गिल साहब फोटो खिंचाना छोड़िए, ज़रा कॉमनवेल्थ की सुध लीजिए
पाकिस्तान और फिक्सिंग की फांस
लंदन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त वाजिद शम्शुल हसन ने बिना किसी जांच के तीनों क्रिकेटरों को निर्दोष करार दिया और रहमान मलिक ने साजिश का अंदेशा जताया। पर यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि 1983-84 में पाकिस्तानी टीम में शामिल क़ासिम उमर भी आरोप लगे. 1995 में सलीम मलिक पर मैच फ़िक्सिंग का इल्ज़ाम लगा. एलन बोर्डर ने 1993 में पूर्व पाकिस्तानी खिलाड़ी मुश्ताक़ मोहम्मद पर इसी तरह का इल्ज़ाम लगाया था.कहानी बस पाकिस्तानी क्रिकेट तक ही सीमित नहीं है. सटोरियों और क्रिकटरों का नापाक रिश्ता काफी पुराना रहा है.शायद वह साल २०००-०१ का वक़्त था, जब हैंसी क्रोनिए ने मैच फिक्स करने के लिए सटोरियों से रिश्वत लेने की बात क़बूल की थी.आईसीसी ने भ्रष्टाचार से निबटने के लिए एक विशेष इकाई बनाई है, लेकिन 'स्प्रेड बेटिंग' के कारण इस समस्या पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा है. कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि मैच फिक्सिंग में दामन तो कमोबेश सभी देशों के खिलाडियों का हुआ है. पर सबसे अधिक पाकिस्तान का. इस वजह से उस पर सबसे अधिक नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह डिनायल मोड से निकल कर डूइंग मोड में आये और अपने पाक दामन को नापाक होने से बचाए.
बाय-बाय ब्राजील के बाद अलविदा अर्जेंटीना
हैरान हूँ ब्राज़ील की हार से
फीफा का फीवर यानी फुटबॉल का खुमार
आईपीएल से डगमगाया सरकार का इंद्रासन
शिक्षा व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठते रहते हैं। पर इसकी जड़ में अहम सवाल को अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। अभी तो आईपीएल देश की सभी समस्याओं पर इस कदर हावी है कि बाकी किसी भी मसले पर बात करना बेमानी ही है। चूंकि शिक्षा में गिरावट के लिए सरकार का रोल बहुत व्यापक है। इसलिए वह अपने दायित्वों से बचने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। कभी आईपीएल विवाद में अड़ंगा डालकर तो कभी फोन टैपिंग का मामला सामने लाकर तो कभी किसी और तरीके से। उसे हमेशा खतरा बना रहता कि कहीं जनता जागरूक हो गई तो उसके खिलाफ कहीं बगावती तेवर न अपना ले। जनता की जागरूकता से सरकार की सत्ता ठीक उसी तरह डगमगाने लगती है, जैसे पुराणों में वर्णित कथा के मुताबिक, जब कोई आम आदमी भी तपस्या करता तो इंद्र को हमेशा भय सताता की यह तपस्या उसकी गद्दी छीनने के लिए की जा रही है। फिर इससे बचने के लिए वह दस तरह की तरकीबें आजमाता। काम, क्रोध, लोभ, मोह माया इत्यादि शत्रुओं को वह उस तपस्या को भंग करने के लिए भिरा देते थे। कभी रंभा तो कभी मेनका की मोहनी मूरत का सहारा लेते। हमारी सरकार भी ठीक यही करती है। सबसे पहले बाबरी मस्जिद पर लिब्रहान कमेटी की रिपोर्ट आई तो अपनी नाकामी से बचने के लिए रंगनाथ का मामला लीक हो गया। जिसके तहत अल्पसंख्यक मुसलमानों को आरक्षण देना था। जब यह मामला तूल पकड़ा तो गुजरात में गोधरा दंगा पर रिपोर्ट सामने पटक दिया। फिर महंगाई के मामले में घिरती नजर आई तो नरेंद्र मोदी को एसआईटी के सामने पेश कराकर उससे ध्यान भंग कराया। मोदी का मामला खत्म हुआ तो आईपीएल में अपने कारिंदे थरूर के जरिए बखेरा खड़ा दिया। यह सबसे बखेरा ही तो है। क्योंकि यदि सरकार के इरादे स्पष्ट होते तो अब जो वह वित्त मंत्री और आयकर विभाग जांच के नाम पर तमाशा कर रही है, वह पहले भी कर सकती थी। जब आईपीएल शुरू हुआ तब भी केंद्र में वही सरकार थी, जो आज तीन साल बाद है। सत्ता परिवर्तन से इसका कोई लेना देना नहीं है। एक तरह से कहें तो इंद्र की तरह सरकार घबरा और डर गई है।
थरूर के लगातार ट्विटिंग से सरकार की किरकिरी रूक नहीं रही थी तो उसे भी तो मजा चखाना था। इसी बीच कहीं से उड़ती खबर आई कि थरूर तीसरी शादी करेंगे। उनकी भावी पत्नी ने आईपीएल में हाथ आजमाए हैं। थरूर को आखिर उनकी औकाद बता दी गई । फिर महज तीन साल में ही आईपीएल से ललित मोदी दुनिया की सबसे ताकतवर बोर्ड बीसीसीआई को चुनौती दे रहे हैं। पहले शरद पवार की चूलें हिली। वह भी आए दिन कांग्रेस की कमीजें फाड़ रहे थे। जब थरूर ने अपना वर्चस्व दिखाना चाहा तो मोदी ने उनकी एक न चलने दी। मोदी ने अपने मोहरे से थरूर का गरूर तो चूर कर ही दिया। इससे सरकार को लगा कि बात काफी आगे निकल गई है तो उसने ठान लिया कि अब किसी कीमत पर मोदी को मिट्टी में मिलाकर ही वह दम लेगी। मोदी के लिए बाहर का रास्ता तैयार वह कर ही चुकी है। अभी क्लाइमेक्स तो बाकी ही है। बात निकल चुकी है, पर लगता नहीं कि दूर तलक जाएगी।
मोदी से मिलेगी थरूर को मात
खेलों को मनोरंजन के लिए खेला जाता है। पर इस खेल पर भी राजनीतिक खेल शुरू हो चुका है। आईपीएल अपनी शुरुआत से ही दौलत का खेल बन चुका है। लेकिन अब नेताओं और फिल्मी सितारों ने इसे पैसा कमाने का पेशा बना लिया है। हम अन्य खेलों को वैसे ही भूल चुके हैं, जैसे हम बीमारी,गरीब़ी,अशिक्षा,बेकारी,भ्रष्टाचार,नक्सलवाद और आतंकवाद को भूल गए। आईपीएल निश्चित तौर पर पैसे का ही खेल है। यहां खराब से खराब खेलने वाला भी एक सीज़न में 40 लाख रु. की कमाई कर रहा है. वो भी ऐसे में जब भारत की 35 फ़ीसदी आबादी को दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं। हाल में नक्सलियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दुया। पर अब कोई भी चिदंबरम के सामने अपना माइक नहीं घुसेड़ रहा है। कहां तो इस्तीफे की पेशकश चिदंबरम ने की थी। पर अब देना पड़ रहा है थरूर को। अमेरिकी बेस बॉल चीयर लीडर्स की तर्ज़ पर खेल के दौरान मैदान में कम से कम कपड़े पहन कर लड़कियों के नाचने का कई जगहों पर विरोध हुआ. कहा गया कि ये भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ है। अब तो आरोप यह भी लग रहे हैं कि आईपीएल के जरिए सारा काला पैसा सफेद किया जा रहा है। पहले एनजीओ के जरिए यह काम होता था। पर उसकी साख पर भी बट्टा लग चुका है। इसलिए यह नया तरीका निकाला गया। इस पूरे प्रकरण में शशि थरूर के शामिल होने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वह कोई पहले नेता नहीं हैं, जो इस तरह से इस खेल में सामिल हैं। हां इतना जरूर है कि जिसकी चोरी पकड़ी जाती है, वही चोर कहलाता है। और, थरूर की चोरी पकड़ी गई है। वह खुलेआम डाका करने निकले थे। नतीजतन उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक बात और है कि दो दिन पहले तक ललित मोदी खूब सुर्खियों में रहे। फिलहाल वह पर्दे के पीछ हो गए हैं। दरअसल सारे प्रकरण से एक बात सामने आती है वह यह कि हम नौटंकी और सोप ओपेरा के ज़माने में रह रहे हैं और यहाँ कोई बात तब तक सच नहीं है जब तक कि टेलीविज़न उस पर अपनी मुहर नहीं लगा देते। जैसे ही ललित मोदी ने शशि थरूर पर हमला बोला मीडिया ने भी अपनी भाषा तुरंत बदल दी। आखिर इसकी वजह क्या है? यह भी सोचने का विषय है। करोड़ों का यह खेल चैनलों को अभ भी टीआरपी दे रहा है। पर मैच के लिए नहीं, बल्कि खबरों के लिए।
भारत की सबसे बड़ी समस्या
इंडियन प्रीमियर लीग का सही मैच अब शुरू हुआ है। क्रिकेट के मैदान से राजनीतिक गलियारे में अब खूब चौक-छक्के लगने लगे हैं। कल तक जो विपक्षी दल नक्सलवाद, महंगाई, गुदरात दंगों में नरेंद्र मोदी से जवाब-तलब, लिब्रहान आयोग, रंगनाथ कमीशन आदि मुद्दों को लेकर संसद तक नहीं चलने देती थी। वह अब आईपीएल का मैच लोकसभा और राज्यसभा में खेलने लगी है। हाल मे सानिया मिर्जा तक को लेकर राजनीतिक पार्टियां ने खूब तमाशा खड़ा किया। मानों भारत में अब गरीबी, बढ़ती महंगाई, कम हो रहे रोजगार के अवसर, आर्थिक मंदी, कॉमनवेल्थ क नाम पर गरीब और निचले तबके का विस्थापन की समस्या से कहीं बढ़कर आईपीएल हो चुका है। सानिया मिर्जा की शादी का मुद्दा बड़ा हो गया है। बात सिर्फ राजनीतिक दलों की ही नहीं है। हमारा मीडिया जिस तरह की खबरें दिखा रहे है, वह भी कम दिलचस्प नहीं है। देश का सबसे तेज चैनल का तमगा लिए घूमने वाला नंबर एक चैनल खबर के नाम पर लोगों का मनोरंजन करती दिखती है। इन खबरिया चैनलों पर मनोरंजन के नाम पर भी भौंडा पर दिखाया जाता है। आधे घंटे के कॉमेडी शो में संवादों के द्विअर्थी मतलब और अधनंगी तस्वीरों में नहाती रियलिटी शो की नायिकाएं। यह सब पड़ोसा जाता है। बात चाहे खुद को सबसे विश्वसनीय कहने वाले चैनल की ही क्यों न हो। उसका तमाशा भी कम नहीं है। कुछ खुलेआम करते है, कुछ बहुत ही चालाकी से और चुपके-चुपके। अपने लाइफ-स्टाइल वाले चैनल से किंगफिशर के कैलैंडर शूट की अधनंगी मॉडल की तस्वीरें ज्यादातर लोगों को भले ही पसंद आता हो, पर इसे वह न्यूज चैनल पर शायद ही देखना चाहते होंगे। यदि देखना भी चाहते हैं तो क्या हमारी यही जिम्मेदारी है। शायद इसी लिए पाकिस्तान में भौडी और खबरों के नाम पर नंगा नाच करने वाले चैनलो पर प्रतिबंध लगाने की बात हो रही है। यह काफी हद तक सही भी है। हमें अपने दुश्मन में हमेसा बुराइयां ही नहीं देखनी चाहिए। राम भी कहा करते थे कि रावण भले ही बुरा है, फिर भी उन्होंने लक्ष्मण को रावण के पास ज्ञान के पास भेजा था।
खैर अब वापस असली मसलों पर आते हैं। देश की बड़ी आबादी को यहां किस तरह बेवकूफ बनाया जा रहा है। जनता को पता हो या न हो पर कुछ लोग तो इस मैदान के बाहर के खेल को भली भांति खेल रहे हैं और अरबों खहरों के वारे-न्यारे कर रहे हैं। पहले कहा जाता था कि एनजीओ के जरिए ब्लैक मनी को व्हाइट बनाया जाता था। अब आईपीएल में 1500 करोड़ तक की टीम की खरीदना किसी के मेहनत की गाढ़ी कमाई होगी। कोई कुंभ के दौरान गंगा में डुबकी लगाकर भी कहे तो मुझे यकीन नहीं होगा। आईपीएल क इतना बड़ा दांव भारत में फेंका गया है कि दो वक्त की रोजी रोटी को तड़पने वाले का मामला कहीं खो सा गया है। हमारे मुल्क के गरीब भी अपनी गरीबी, लाचार और बेबस जिंदगी के अभिशप्त है। यह उनके पूर्व जन्मों का पाप है। तभी तो वह गरीब से और गरीब बनते जा रहे हैं। वह अमीरों को अमीर बनाने का काम करते हैं। पर उनकी किस्मत पर किसी ने जैसे कालिख पोत दी हो।
द्रविड़ यानी द वॉल की दीवानगी
का कुल औसत सचिन से भी आगे निकल गया था और गेंदबाजों के लिए उनका विकेट सबसे कीमती हुआ करता था.कुछ साल पहले द्रविड़ ने कहा था कि ऑफ साइड ड्राइव के मामले में भगवान के बाद तो सौरव गांगुली ही हैं. गांगुली ने इसके बदले में कुछ नहीं कहा. लेकिन ज़रा सोचिए यदि वह कुछ कहते तो शायद यही कि ऑन साइड में द्रविड़ की होड़ भगवान के साथ है.
द्रविड़ के साथ अक्सर ऐसा रहा कि पहले उन्हें खारिज कर दिया गया और बाद में उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से हर आलोचक को खामोश कर दिया. टेस्ट क्रिकेट द्रविड़ के मिजाज से मेल खाता है. ऐसे में यह कल्पना आसान है कि द्रविड़ का असली रूप खेल के इस संस्करण में ही दिख सकता है. लेकिन एकदिवसीय क्रिकेट और अब युवाओं का कहे जाने वाले खेल आईपीएल में उनका बल्ला ख़ूब बोल रहा है. द्रविड़ आज अपनी आईपीएल टीम बेंगलुरू की ओर से सबसे ज़्यादा रने बनाने वाले खिलाड़ी हैं.
करिअर के शुरुआती और आखिरी दोनों दौर में द्रविड़ जैसे खिलाड़ी के साथ जिस तरह बर्ताव किया गया यह देखकर खराब लगता है. इंग्लैंड के दौरे पर उनके लिए जो गड्ढ़ा खोदा गया था उससे बाहर निकलने में द्रविड़ को दो साल लग गए. वक्त बुरा हो तो साथी भी साथ छोड़ देते हैं. इस सीरिज के बाद कुछ जूनियर खिलाड़ियों ने भी उनकी आलोचना की थी. यहां तक कि उनकी फील्डिंग भी खराब हो गई. 14 पारियों में वे कोई शतक नहीं बना सके. लगातार यह कहा जाने लगा कि उनका वक्त खत्म हो गया है. दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड के खिलाफ उनके शतक आलोचकों को शांत करने में नाकामयाब रहे. मगर इसके बाद न्यूजीलैंड सीरिज में भी जब उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया तो सब खामोश हो गए. फिर अहमदाबाद और कानपुर की पारियों में उसी पुराने द्रविड़ की झलक दिखी. अभी हाल में बांग्लादेश के खिलाफ उसी द्रविड़ को एकबार फिर देखने को मिला. चोटिल होकर मैच से बाहर होने के पहले टेस्ट करियर का 29वां शतक ठोक अपनी सफलता की तरकश में एक और तीर शामिल कर चुके थे. इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी यदि द्रविड़ वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए, जितनी सफलता उनके समकालीन सचिन और गांगुली ने की तो बस यही कही जा सकता है कि क्रिकेट के इतिहास में द्रविड़ जैसे सितारा ने ग़लत वक्त पर अपनी चमक बिखेरने की कोशिश की. लेकिन वह वक्त भी आएगा जब क्रिकेट के इतिहासकार द्रविड़ की एक अलग ही गाथा लिखेंगे.
द्रविड़ की दीनता या दिलेरी
सौरव गांगुली ने 131 रन बनाए और गांगुली का भी वह पहला मैच था. यह कोई पहला उदाहरण नहीं है. द्रविड़ की किस्मत ही कुछ ऐसी रही है. ज़रा याद कीजिए जब भारत ने कोलकाता के ईडेन गार्डेन में ऑस्ट्रेलियाई टीम के लगातार सोलह टेस्ट मैच जातने के रिकॉर्ड को तोड़ा था. उस टेस्ट में भी द्रविड़ के योगदान को कतई नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. उस टेस्ट में द्रविड़ ने 180 रन का आंकड़ा छुआ तो उन्हीं के साथ दूसरे छोर पर खड़े वीवीएस लक्ष्मण ने 281 रन की पारी खेल डाली. द्रविड़ के साथ यह नाइंसाफी किसी और ने नहीं, बल्कि ख़ुद उनकी तक़दीर ने ही की. वह हमेशा बड़े पेड़ के ही तले दबे रहे. उनकी उपलब्धि किसी से भी कम नहीं है. पर जब जब द्रविड़ ने विशिष्ट प्रदर्शन किया, कोई दूसरा खिलाड़ी उनसे बेहतर खेल गया. वनडे मैच में जब उन्होंने उस समय का अपना सबसे बड़ा स्कोर 145 रन बनाए तो उसी पारी में सौरव गांगुली ने 183 रनों की पारी खेली. एक बार फिर जब द्रविड़ ने अपना यह रिकॉर्ड तोड़ते हुए न्यूजीलैंड के खिलाफ 153 रन मारे तो उसी पारी में सचिन तेंदुलकर ने नाबाद रहते हुए 186 रन ठोक डाले. इससे यह अंदाज़ा लगाना आसान मालूम पड़ता है कि द्रविड़ गलत दौर में पैदा हो गए जिसकी वजह से उन्हें सचिन तेंदुलकर और गांगुली जैसे खिलाड़ियों की छाया में खेलना पड़ा. लेकिन द्रविड़ ने हमेशा अपनी अहमियत साबित की. कई दफ़ा तो इन भारतीय दिग्गजों से बेहतर खेल दिखाया. जब भारतीय टीम के धुरंधर एक एक कर ताश के पत्तों की तरह ढेर हो जाते हैं तो यही दीवार टीम इंडिया की बुनियाद मज़बूत करता है. श्रीलंका के खिलाफ अहमदाबाद में खेले गए टेस्ट में 32 रन पर भारत के चार विकेट गिर गए थे. सहवाग, तेंदुलकर, लक्ष्मण पैवेलियन लौट चुके थे, मगर दर्शकों की उम्मीदें कायम थीं. इसलिए कि द्रविड़ क्रीज पर थे. उन्होंने निराश भी नहीं किया और भारत को 400 रनों के पार ले गए.
सचिन चालीसा
जय सचिन क्रिकेट गुण सागर,
जय क्रिकेटईश पृथ्वी लोक उजागर खेलदूत अतुलित बल दामा,
रमेश पुत्र तेंदुलकर नामा सदाचारी सचिन सतरंगी ,
कीर्तिमान बनावे जीत के संगी कंचन वर्ण छोटे कद का,
सर पे हेलमेट ,घुंगराले केशा हाथ बल्ला और गेंद विराजे ,
सर पे चक्र सह तिरंगा साजे ब्रैडमैन सम भारती नंदन ,
तेज प्रताप महा जग वंदन बल्लेबाज गुनी अति चातुर ,
राष्ट्र काज करिबे को आतुर सचिन को खेल देखबे को रसिया ,
अपनों काम काज सब छडिया सुक्ष्म रूप धरि विकेट गिरावा ,
बिकट रूप धरि रन बनावा भीमरूप धरि शतक बनाए ,
भारत की हार बचाए विश्वकप में जब विपत्ति आई ,
पहुचा फ़ाइनल लाज बचाई तुम उपकार धोनी कीन्हा ,
नए आए तबहु कप्तानी दीन्हा तुम्हारो मंत्र धोनी माना,
विश्वविजेता भय सब जग जाना भारत की जीत के काजही ,
शोकाकुल लौट आये अचरज नाही दुर्गम मैच भारत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते क्रिकेट द्वार के तुम रखवाले,
होत ना कोई चिंता रे जीत मिले तुम्हारी शरना ,
तुम रक्षक हार को डर ना अपने रिकॉर्ड तोड़ो आपे ,
सब टीमें नाम से कापे गेंदबाज कोई सामने ना आवे ,
सचिन तेंदुलकर जब नाम सुनावे मास्टर ब्लास्टर सचिन जंगी,
हार मिटात जीत के संगी संकट ते सचिन छुडावे,
जब मन क्रम वचन से लग जावे ।
पाचो द्वीप परताप तुम्हारा
है प्रसिद्द जगत उजियारा...
कंगारूओं का दबदबा बरकरार
गंभीर यानी रन मशीन
भारत बांग्लादेश के साथ दो टेस्ट मौचों की सीरीज़ जीत गया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एकदिवसीय सीरीज़ में हमें मात मिली थी। वह भी श्रीलंका के हाथों, जिसे हमने अपने घर में हराया था। लेकिन इन सबके बीच गंभीर एक अहम खिलाड़ी साबित हुए हैं। वह भले ही डॉन ब्रेडमैन का रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए। लेकिन उससे भी ज़्यादा उपलब्धि हासिल कर दिखाया। हालांकि द्रविड़ का जबड़ा टूटने से दुख हुआ। मुमकिन है वह अफ्रीका के साथ होने वाले अहम टेस्ट मुक़ाबले में टीम का हिस्सा न बन पाएं। यूं तो युवराज भी चोट से जूझ रहे हैं।अजब खेल के गज़ब खिलाड़ी
सिक्सर किंग हुए आउट
चैंपियंस ट्रॉफी में अभी भारत का आग़ाज़ भी नहीं हुआ था कि भारतीय टीम नंबर एक पर क़ाबिज़ हो गई। हालांकि, इसके पहले भी वह श्रीलंका के साथ सीरिज़ में चोटी पर पहुंची थी। लेकिन यहां से लुढ़कने में भी उसे एक दिन से अधिक नहीं लगे। वजह प्रदर्शन में निरंतरता की कमी। फिर यहां तो भारत बिना खेले ही किंग बन गया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो अब उसके सामने होगी। किस तरह धोनी के रण बांकुड़ें अपनी लाज बचाने में क़ामयाब होते हैं। साउथ अफ़्रीका में ही २०-२० का विश्व चैंपियन जीतने का कारनामा धोनी की सेना ने किया था। लेकिन उस बार के सिक्सर किंग युवराज सिंह चोटिल होकर टीम को मंझधार में छोड़ चुके हैं। शायद गुरु गैरी के सेक्स ज्ञान से टीम इंडिया को कुछ फ़ायदा हो जाए। हालांकि एक बात सोचने वाली है कि पुराने खिलाड़ियों को दोबारा क्यों शामिल किया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि अफ्रीका की तेज़ पीचों पर भारतीय टीम के ताश की पत्तों की तरह भरभरा कर गिरने का डर तो चयनकर्ताओं को नहीं सता रहा था। यही सोचकर उन्होंने द्रविड़ को शामिल तो नहीं किया। हालांकि इसकी संभावना अधिक और आशंका कम है। यदि आप सोच रहे हैं कि पिछली बार की तरह यह यूथ टीम भी कारनामा कर दिखाएगी तो नाहक ही यह खाब मत पालिए। वो २०-२० था यह ५०-५० है। वेस्टइंडीज में २०-२० का हाल तो आपको पता ही है। कहीं हस्र वही तो नहीं होने वाला। एक हिंदुस्तानी होने के नाते मैं तो चाहूंगा कि टीम इंडिया जीत हासिल कतरे। लेकिन डर तो रहता ही है। टीम इंडिया है इसका कोई भरोसा नहीं। युवराज जो खेवनहार हो सकते थे, कलाई की चोट ने भारत की मानों कमर तोड़ दिए। हालांकि सचिन अभी भी जब तक टीम हैं हिम्मत तो नहीं ही हारा जा सकता है। फिर टीम इंडिया के पास तो अब गुरू गैरी का कामसूत्र भी है। कहीं यह ही भारत का बेड़ा पार लगा दे। वैसे भी बॉलिंग में आशीष नेहरा को छोड़ कोई भी गेंदबाज़ फॉर्म में नज़र भी नहीं आ रहा है। कुल मिलाकर भारत का भरोसा चैंपियंस ट्रॉफी में पुराने खिलाड़ियो, सचिन, द्रविड़ और नेहरा के अलावा गुरू गैरी की सेक्सरसाइज पर ही टिकी है.
कंगारूओं के क़िले में सेंध
इंगलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को एशेज सीरीज़ में २-१ से मात देकर ये साबित कर दिया कि किस तरह शिखर पर पहुंचने के बाद का रास्ता सिर्फ नीचे की ही ओर आता है जब तक कि आप ख़ुद को वहां टिके रहने के क़ाबिल नहीं बना लेते। कई दफ़ा ये बहस का मुद्दा भी बना कि एक- दो सीरीज़ में हार से ही ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत पर सवालिया निशान लगाना मुनासिब नहीं हो सकता। लेकिन यदि देखें तो पिछले कुछ सीज़न में उसकी हालत वाकई में ख़स्ता बनी रही। दऱअसल अब ऑस्ट्रेलिया अपने खेल में ही मात खाता नज़र आ रहा है। इस बार इंगलैंड के हाथों मुंहकी खाने के बाद कम से कम ये बात तो साबित हो ही जाती है। याद कीजिए भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा, किस क़दर परेशान किया था, कंगारूओं ने। इस बार ठीक वैसा ही बर्ताव उनके साथ ब्रिटेन में हुआ। जिस तरह सिडनी टेस्ट भारत जीत रहा था, लेकिन माइकल क्लार्क और पोंटिंग के बदनीयती ने ऐसा होने नहीं दिया। ज़मीन को छूने के बावजूद क्लीन कैच करार देना और पोंटिंग का अंपायर की जगह आउट का निर्णय देना भला कौन भूल सकता है ? ठीक यही कंगारूओं के साथ स्ट्रॉस एंड कंपनी ने किया। दोनों के बीच जो टेस्ट एक विकेट न गिर पाने की वजह से ड्रॉ हो गया, कितना चपलता के साथ उसे स्ट्रॉस ने बचाया, तब पोंटिग की भन्नाहट बिल्कुल सामने आ गई थी, लेकिन उन्हें याद रखनी चाहिए कि आसमान का थूका अपने मुंह पर ही गिरता है।अब कंगारूओं की टेस्ट रैंकिंग गिरकर चौथे पायदान पर आ गई है। अपना खोया रूतबा हासिल करना फिलहाल तो दूर की कौड़ी नज़र आ रही है, पोंटिंग एंड कंपना को। वजह साफ है, गेंदबाज़ी में न तो पहले जैसी धार है न ही फिल्डिंग में फुर्ती और न ही बल्लेबाज़ी में बादशाहत। मैक्ग्रा, शेन वार्न, गिलक्रिस्ट, हेडेन और लैंगर जैसे खिलाड़ियों के संन्यास के बाद मानो यह टीम बुरी तरह बिखड़ गई है।एक चैंपियन की हार का मलाल किसे नहीं होता, क्रिकेट का प्रशंसक होने के कारण कंगारूओं के क्रिकेट के खेलने के अंदाज़ का कायल बहुत सारे रहे होंगे, मैं भी था। लेकिन जब अपनी क़ाबिलियत को तराशने के बजाय उस पर कोई घमंड करने लगे तो उसका अंजाम भी क्या होता है, ऑस्टेलियाई क्रिकेट टीम हमारे सामने है।
फ़िर वही टीम लाया हूँ
आत्ममुग्ध हो जाते हैं।
पहला टेस्ट जीतने के बाद जो हालत है इंडिया की उससे तो यही लगता है। यहाँ तक की टीम फौलो ऑनभी नहीं बचा सकी। सबसे बड़ी कमजोरी तो बौलिंग के के क्षेत्र में रही और कैच टपकाना तो हमारी आदत है ही। नहीं तो ये हालत नहीं होती। न्यूजीलैंड की टीम न इस विशाल स्कोर तक पहुँचती न ही हमें फौलो ऑन खेलना पड़ता। अब इंडिया पर हार के खतरे का बादल मडराने लगा है।ये हालत तो उस समय से है जब भी हम विदेशी पिचों पर खेलने जाते है। हमेशा लगता है की इस बार तो हम उस फोबिया से बाहर निकल आयें है जब कहा जाता था की हम विदेशी पिचों पर नहीं जीत सकते। लेकिन हमने जीतना शुरू किया, उसके बाद कुछ ज़्यादा आत्ममुग्ध हो जाते हैं और अपनी कोशिशों को कम कर देतें हैं।


