तो क्या ज़ी न्यूज के संपादक ने ऑफिस आने के लिए साथी पत्रकारों को धमकी दी...


ज़ी न्यूज में पत्रकारों को कोरोना हुआ उससे दिक्कत नहीं है। वे सभी जल्दी स्वस्थ होकर फिर से लौटें। यही दुआ है। लेकिन दिक्कत इस बात से हैं कि किस तरह से खुद को बड़ा पत्रकार कहने वाले और रामनाथ गोयनका सम्मान से सम्मानित तिहाड़ी संपादक ने अपने साथियों को धमकाया। प्रमाणिक ख़बरें है कि जब ज़ी न्यूज़ में एक के बाद 13 लोग संक्रमित पाए गए तो तिहाड़ी संपादक ने मोटिवेशनल स्पीचदिया।
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कोरोना वायरस का मामले आने के बाद सबसे ज़ी न्यूज के स्टाफ को WION बिल्डिंग में शिफ्ट किया गया। इस पर एक पत्रकार ने कथित तौर कहा, ‘क्या हम सभी तब्लीगी हैं?’ इसके बाद रामनाथ गोयनका (पता नहीं किन-किन लोगों को मिल जाता है, उन्हें भी जिन्होंने दलाली के बदले तिहाड़ की सैर कर ली हो) अवॉर्डी संपादक जी ने मोटिवेशनल स्पीचदिया और कहा, “ घबरा क्यों रहे हों? मैं भी कैरियर (कोरोना का वाहक/फैलाने वाला) हो सकता हूं। पर काम कर रहा हूं न।इसके बाद बाकियों से धमकी भरे लहजे में कहा गया, “जो लोग बहाना बनाके ऑफिस नहीं आ रहे हैं, उनको हम देख रहे हैं...कब तक नहीं आएंगे? 5, 10 या फिर 15 दिन...
अब यह तो हाल है... (और इनपुट का इंतजार...)

महंथजी की सरकार और यूपी पुलिस की लाठियों से छलकती 'मर्दानगी'


लोग सवाल कर रहे हैं... आख़िर कोई पुलिस, जो एक इंसान भी होता है, वह इतना क्रूर और अमानवीय कैसे हो सकता है। आपको उत्तर प्रदेश पुलिस के दानवीय और राक्षसी चेहरे से रूबरू कराने वाले कुछ विडियो से रूबरू कराता हूं। फिर सोचिए यह पुलिस का काम है...या पुलिस अपनी वर्दी का धौंस दिखाकर हैवानियत पर उतर आई है, क्योंकि कोरोना वायरस की वजह से उस पर काम का दबाव ज्यादा है और ऊपर से पहले जो ऊपरी माल यानी घूस मिलता था वह मिलना बंद हो गया है, जिससे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है, क्योंकि यही पुलिस अमीरों के घर पर उनके बच्चों के जन्मदिन के मौके पर केक लेकर जा रही है, लेकिन गरीबों के बुजुर्गों को लाठियों से मार रही है। बुजुर्गों को तो छोड़िए, उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गरीब बच्चे को भी नहीं बख्शा है। उसके साथ इतनी हैवानियत भला क्यों? क्योंकि वह गरीब का बच्चा है... शर्म है...
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महोबा पुलिस एक बुजुर्ग की पिटाई करती हुई। अमीरों के बच्चो के लिए यही पुलिस बर्थडे में केक लेकर पहुंच रही है, जबकि गरीबों के बुजुर्गों को लाठियों से स्वागत कर रही है। यही है दोहरा चेहरा सरकार पुलिस का... हालांकि, महोबा पुलिस के ट्विटर अकाउंट से कहा है है कि इस मामले में जांच के साथ कार्रवाई की जा रही है।
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यह वीडियो उत्तर प्रदेश के नोएडा की है। महिलाएं राशन के लिए बाकायदा लाइन में लगी हैं, लेकिन पुलिस आती है और लाइन में लगी महिलाओं पर अपने पौरुष बल का प्रयोग करने लगती है। यह योगी आदित्यनाथ की पुलिस है। जहां नियमों का पालन करने वाले लोगों और महिलाओं को भी पुलिस की लाठी खानी पड़ती है। फिर से कहूंगा कि जो गरीब महिलाएं खुद बाहर आकर बेबसी में राशन ले रही हैं और वह भी लाइन में लगकर, ताकि अपने बच्चों का पेट भर सकें, उन्हें लाठी मिल रही है, जबकि कोठियों और फ्लैटों में अमीरों के घर पुलिस सरकारी गाड़ी से जन्मदिन का केक पहुंचा रही है। बहुत बहादरी का काम कर रहा महिलाओंहाथ उठाकर। बकौल पुलिस विभाग इस मामले में प्रारंभिक जांच पर घटना की सत्यता स्थापित की गई है। उपनिरीक्षक सौरभ शर्मा को तुरंत निलंबित कर, विभागीय कार्यवाही शुरू की गई है।
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यह घटना उत्तर प्रदेश के ही बरेली की है। एक बच्चा फल की ठेली के पास खड़ा था, क्योंकि उसके पिता नहाने गए थे। तभी पुलिस वाले आए और डंडों से ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। मासूम बच्चे को डंडे से बेरहमी से पीटा। शायद पुलिसवालों का अमीर के घर पहुंचाने वाले बर्थडे केक खत्म हो गया था, तो बच्चे को डंडों से पीटना शुरू कर दिया।
अब बताइए भला कोई इतना क्रूर कैसे हो सकता है? क्या यह बालक भेदभाव का शिकार हुआ? एक तरफ जहां पुलिस टीम केक लेकर घर पर पहुंच रही है, क्योंकि उसका पिता लेफ्टिनेंट है। वहीं, यह बच्चा इसलिए शिकार हुआ क्योंकि इसका पिता फल का ठेला लगाता है?
कायदे से इन सभी पुलिसवालों को 15 अगस्त के दिन परमवीर चक्र देना चाहिए। गरीबों पर बहादुरी जो दिखाई है।
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लॉकडाउन में पलायनः यह अंधा नहीं, सुप्रीम कोर्ट का धंधेबाज कानून है...

सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन में प्रवासी मजूदरों की घर वापसी और हादसों में उनकी मौतों के मामले पर याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत का कहना है कि अगर लोग रेलवे ट्रैक पर सो जाएंगे तो इसमें क्या किया जा सकता है? जिन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया है, उन्हें कोर्ट कैसे रोक सकता है?
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सुप्रीम कोर्ट की यह बात पूरी तरह सही है। आखिर अदालतें कैसे रोक सकती है कि कोई पैदल क्यों जा रहा है?  इस शीर्ष अदालत का चीफ (पूर्व) जस्टिस तो उन्हीं मामलों की सुनवाई करेगा, जिसमें खुद पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा हो। मजेदार बात कि अपने ऊपर लगे आरोपों की सुनवाई के बाद जज साहब खुद के पक्ष में फैसला भी सुना देते हैं।
ऐसे में जब सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कोर्ट के लिए यह निगरानी करना असंभव है कि कौन ट्रैक पर चल रहा है और कौन नहीं चल रहा है? सही बात है। सुप्रीम कोर्ट तो बस इस बात की निगरानी करेगा कि जब गुजरात हाईकोर्ट ने बीजेपी के एमएलए और राज्य के कानून मंत्री को अयोग्य ठहरा दिया, तो उसकी अयोग्यता के फैसले पर कैसे विराम लगाना है।
मजदूरों और बेसहारा लोगों को लेकर आखिर याचिका में क्या कहा गया था? यही न कि अदालत केंद्र सरकार से सड़कों पर चलने वाले प्रवासी मजदूरों की पहचान करने, उन्हें भोजन और रहने का ठिकाना देने के लिए कहे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को क्या फर्क पड़ता है कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे पटरियों पर सो रहे 16 मजदूर मालगाड़ी की चपेट में आएं या फिर उत्तर प्रदेश के औरैया में भीषण सड़क हादसे में 24 मजदूरों की मौत हो जाए। ये मजदूर तो अपनी गलती और खुद की मर्जी से जा रहे हैं न... तो इन मजदूरों की ही जवाबदेही बनती है कि उनके साथ क्या होता है सही बात है कि सुप्रीम कोर्ट उनके साथ क्या कर सकता है? तब तो सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन को हटवा देना चाहिए। वायरस से मजदूर मरते हैं तो मरने दें। इससे पहले 31 मार्च को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सड़कों पर अब एक भी दिहाड़ी मजदूर नहीं है। बजाय केंद्र सरकार के इस झूठ पर लताड़ लगाने के लिए कोर्ट मजदूरों को ही दोषी ठहरा रहा है। 
देशव्यापी लॉकडाउन की वजह मजदूरों के पास अब नौकरी और रहने के लिए ठिकाना नहीं है। इस वजह से हजारों मजदूर हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर जा रहे हैं। कोई पैदल चल रहा है, तो कोई साइकल चलाकर जा रहा है तो कोई ट्रक पर बैठकर अपने गांव जा रहा है। लेकिन जज साहब को इन मामलों पर सुनवाई से क्या मतलब? जज साहब को तो बस खास बंगले, सड़क पर आवारा पशुओं के घूमने से आपत्ति होती है, गाड़ी के शीशे पर काली फिल्म की मोटाई से दिक्कत होती है? इन सब मामलों पर सुनवाई के लिए बहुत समय है। दरअसल, मजदूरों का मामला गरीबी से जुड़ा है। इन मामलों की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का कोई हित नहीं जुड़ा है। मामला जैसे ही राजनीतिक या फिर अमीरों से जुड़ा हो तो जज साहब तुरंत कुर्रसी लेकर बैठ जाएंगे और फैसला भी उनके हक में सुना देंगे। लेकिन पैदल चल रहे बेबस प्रवासी मजदूरों के हादसों की याचिका पर सुनवाई से साफ मना कर देंगे।
जज साहब को यह भी नहीं दिखता कि कोई 15 दिनों से चल रहा है। मध्य प्रदेश जाना है। बच्चे को चोट लगी है, तो खाट पर लेटा कर कंधे पर ढोते हुए उसे ले जा रहे हैं। महिला सड़कों पर बच्चे को जन्म दे रही है, कोई पैदल ही चलकर दम तोड़ दे रहा है। जज साहब को यह भी नहीं दिखता कि किसी ने पैर गंवाए तो सने कृत्रिम पांव से दोबारा चलना सीखा होगा, लेकिन क्रूर हालात इम्तिहान ले रहे हैं, अब वो पैदल परिवार के साथ शहर से घर को निकली है तमाम मुश्किलों के बावजूद उसका हौसला टूटा नहीं है, लेकिन क्या यह सब देखने के बावजूद सरकार कहां है? सरकारों को तो छोड़िए, अदालतों को क्यों लकवा मार गया है?
कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनवाने और आतंकवाद के आरोपी के मामलों कीसुनवाई के लिए आधी रात में खुलने वाली देश की सबसे बड़ी अदालत आज वाकई अंधी हो गई। लॉकडाउन के बीच सुप्रीम कोर्ट दूसरे कई मामलों को लंबित करके रखता है। लेकिन, सत्ता और भाजपा से अघोषित ताल्लुक रखने वाले रिपब्लिक टीवी के मालिक और सेलिब्रिटी एंकर अर्नब गोस्वामी की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में मामला सामने आने के चंद घंटों में ही समय दे दिया गया, जबकि प्रवासी मजदूरों के घर जाने जैसे अहम मामलों को प्राथमिकता नहीं मिली। अब प्राथमिकता तो छोड़िए, मजदूरों की याचिका को सुनने लायक भी नहीं माना।
जबकि यही सुप्रीम कोर्ट लॉकडाउन में तमिलनाडु में शराब की दुकानों को बंद करने के फैसले को पलटकर उसे खोलने का फैसला देता है। लेकिन मजदूरों की याचिका सुनने के लायक नहीं मानता। अगर हालिया कुछ फैसलों को देखें, तो कैसे सुप्रीम कोर्ट वक्त-दर-वक्त जन-विरोधी फैसले करता चला गया है और तमाम फैसले अमीरों और सरकार के पक्ष में देता गया। चाहे पटना हाई कोर्ट के फैसले को पलटने की ही बात क्यों न हो? कहां तो संविधान समानता की बात करता है और जब बिहार में स्थायी और अस्थायी शिक्षकों की सैलरी समान करने की बात आई तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में अपना दे दिया। हाल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता रिटायर हुए हैं। इस मौके पर विदाई समारोह में उन्होंने भी खुद माना कि जब कोई किसी गरीब की आवाज उठाता है तो कोर्ट को उसे सुनना चाहिए और जो भी गरीबों के लिए किया जा सकता है वो करना चाहिए। जज ऑस्ट्रिच यानी शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छिपा सकते।
(जारी...)

मजदूरों का पलायनः आख़िर भागने की चुल काहे मची है इनको? कभी घर से तो कभी घर को भागना...


12 मई की घटना है। 35 साल के रंजन यादव पिछले तीन दिनों से सड़कों पर ऑटो भगा रहे थे। उस ऑटो को जिसे उन्होंने महज छह महीने पहले ही खरीदा था। 12 मई तक उन्होंने मुंबई से अपने घर पहुंचने के लिए करीब 1500 किलोमीटर की दूरी भी तय कर ली थी। घर अब बस 200 किलोमीटर के फासले पर रह गया था, तो ऑटो की स्पीड थोड़ी बढ़ा दी। तभी एक ट्रक से ऑटो जा टकराई। इस हादसे में रंजन की पत्नी और 6 साल की बेटी की मौत हो गई। रंजन यादव कहते हैं, कहां तो 1500 किलोमीटर की दूरी तय कर ली थी, सोचा था लॉकडाउन में अपने परिवार के साथ घर पर रहूंगा। लेकिन अब अपनी पत्नी और बेटी का शव लेकर घर जा रहा हूं।
आपको क्या लगता है? अगर सरकार सोच-समझकर लॉकडाउन लगाती। मजदूरों और रंजन यादव जैसे लोगों को घर पहुंचाने का इंतजाम करती, तो यह हादसा रुक नहीं सकता था। तब रंजन अपनी हंसती-खेलती 6 साल की बेटी और पत्नी के साथ घर पर खुशहाल जिंदगी जी रहे होते। लेकिन, सरकार की नासमझी और ऑटो चलाकर अपना जीवन गुजर बसर करने वाले रंजन की तो दुनिया ही बर्बाद हो गई। आख़िर कौन है इसका जिम्मेदार?
12 मई की ही घटना है। बिहार के बांका जिले के रहने वाले सुदर्शन दास दिल्ली के नांगलोई से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए था, ताकि ट्रेन पकड़ सकें। लेकिन रास्ते में किसी ने उनके टिकट और दो जोड़ी कपड़ों से भरा भाग साफ कर दिया। जब स्टेशन पहुंचे तो आंखों में आंसू और चेहरे पर मजबूरी थी। वह बताते हैं, मेरी पत्नी प्रेग्नेंट है। 9 महीने हो चुके हैं और कभी डिलिवरी हो सकती है। मैं यहां था, ताकि कुछ पैसे कमा सकूं और बच्चे के जन्म के समय घर पहुंच सकूं।
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सुदर्शनदास जैसे लोग आखिर क्यों घर जाना चाहते हैं? क्या दिल्ली में रहने के लिए उन्हें खाना नहीं मिल रहा है। मेरे एक साथी ने पूछा कि आखिर ये लोग पैदल भागे क्यों जा रहे हैं? कभी घर से भागकर नौकरी के लिए आते हैं, तो कभी यहां से घर के लिए। उन्होंने बोला, इतनी भी भागने की चुल काहे मची है इनको। कभी घर से भागेंगे तो कभी घर को भागना। सुदर्शन दास जैसे लोगों के पास है क्या उनके इस सवाल का जवाब।
रोहित कुमार को गुड़गांव से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुरी अपने घर जाना है। वह बताते हैं कि कुछ महीने पहले ही घर से आया था। जहां काम करता हूं, वहां कॉन्ट्रैक्टर ने बोला कि अब काम बंद है, तो सैलरी नहीं दे सकता। दो महीने तक इंतजार के बाद सारे पैसे खत्म हो गए। आखिर कब तक यह चलेगा किसी को पता नहीं। कभी खाना मिल पाता है, तो कभी नहीं। आखिर हम अपने घर जाएं, नहीं तो क्या करें? यहां किसके भरोसे रहें?
यह खबर हरियाणा की है। गुड़गांव में एक शख्स और उसके बेटे ने मणिपुर के इंफाल की रहने वाली 19 साल की लड़की की पिटाई कर दी। बाप-बेटे का आरोप था कि वह लड़की कोरोना वायरस फैला रही थी। मतलब कुछ भी और किसी भी तरह का आरोप लगाकर लोगों की पिटाई शुरू है। कुछ दिनों पहले तबलीगी जमात की आड़ में मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा था और अब सहूलियत के हिसाब से लोग अपना एजेंडा और खुन्नस निकालने के लिए किसी को भी टारगेट बना ले रहे हैं।
अपने घरों को लौट रहे इन तमाम लोगों पर मेरे कुछ दोस्तों और राष्ट्रवाद की अलख जगा रहे लोगों को सवाल कई हैं। पिछले दिनों ही मेरे मित्रों कुछ सवाल उठाए कि देश स्पेशल ट्रेनें चलने के बाद दिल्ली ने 41, महाराष्ट्र ने 36, गुजरात ने 33 कोरोना पॉजिटिव बिहार भेजे हैं। अन्य राज्य भी भागीदार हैं. ये तो रैंडमली टेस्ट के नतीजे हैं। मेरे इन्हीं मित्र को फिक्र होती है कि आखिर ये लोग भागे क्यों जा रहे हैं? कभी घर से भागकर नौकरी के लिए आते हैं, तो कभी यहां से घर के लिए।
लेकिन यही मित्र भूल जाते हैं कि जब वंदे भारत मिशन के तहत 12 मई को विदेशों से 351 लोग तमिलनाडु पहुंचे और उनमें से कई कोरोना पॉजिटिव पाए जाते हैं, तो उन पर सवाल उठाने के बजाय उनकी अंगुली टेढ़ी हो कर मुसलमानों की तरफ घूम जाती है। यह तो साफ बात है कि कोरोना वायरस हिंदुस्तान में पैदा नहीं हुआ। यहां बीमारी विदेशों से आने वाले लोगों ने फैलाई है। लेकिन विदेशों से आने वाले उन लोगों के लिए हमारे यही मित्र भागने जैसा कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उनकी नजरों में विदेशों से जो भारतीय आ रहे हैं, वे वहां फंसे हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में जो मजदूर फंसे हैं और अगर वे अपने-अपने गृह राज्यों को लौटना चाह रहे हैं, तो उनके हिसाब से यह लौटना नहीं, बल्कि भागना है। गजब की थ्योरी लाई है राष्ट्रवादी और छद्म दक्षिणपंथी विचारकों ने।
हम अपने घर से भेजे गए पैसों से अपना खाना-पानी चला रहे हैं। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हमें तो यह भी पता नहीं है कि हम जिंदा घर लौटेंगे भी या नहीं। पंजाब के फगवाड़ा से अपने घर बिहार के भोजपुर जिले के लिए निकले 21 साल के ब्रिज किशोर का यह कहना है। करीब 1500 किलोमीटर का सफर है, जबकि 150ल किलोमीटर की दूरी वह साइकल से नाप चुके हैं। ब्रिज किशोर बताते हैं, मैं पंजाब के अमृतसर के एख मील में काम करता था, लेकिन वह बंद हो चुका है। हमारे रहने-खाने का कोई इंतजाम नहीं है। मुझे तो घर से पापा ने 800 रुपये भेजे तो उससे साइकल खरीदी और पिछले तीन दिनों से यही चला रहा हूं। पता नहीं कब पहुचूंगा। पहुंचूंगा भी या नहीं।
ऐसे कई मामले हैं, जो आपको दिखेंगे। अगर आप देखना चाहें। कोई अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को लेकर हाइवे पर चला जा रहा है। कोई बैलगाड़ी में कभी खुद तो कभी पत्नी को एक बैल की जगह जुतते हुए घरों को लौट रहा है। कोई जुगाड़ से स्केटिंग की गाड़ी बनाकर अपनी गर्भवती पत्नी और बच्चे को उस पर ढोकर ले जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चे इस तपती गर्मी में पैदल चले जा रहे हैं। आखिर कौन हैं ये लोग? क्यों जाना चाहते हैं? क्या वाकई इनको भागने की चुल्ल मची है? नहीं... आपको तब तक समझ नहीं आएगा, जब तक आपके अंदर दिल नहीं होगा। बस हिंदु-मुसलमान के चश्मे को उतारकर खुद को उनकी जगह रखकर देखें, तो अपनी जान की परवाह किए बिना हजारों किलोमीटर का सफर पैदल और जोखिम में कैसे काटे जा रहे हैं।

कोरोना संकट में भी गेस्ट टीचरों का हक छिनती सरकार, केजरीवाल-भाजपा सब मिले हुए हैं


टीचर यानी शिक्षक। दिल्ली सरकार के स्कूलों में सबसे ज्यादा ढिंढोरा स्कूलों की सफलता का ही पीटा गया है। लेकिन आप जानते हैं कि किस कीमत पर यह किया गया? शिक्षकों के शोषण और अब उनकी जान की कीमत पर...
10 मई को एक ख़बर आई। ख़बर यह थी कि रोहिणी में पति-पत्नी की कोरोना वायरस से मौत हो गई। पहले पति की जान गई, उसके बाद पत्नी की। महिला दिल्ली सरकार के स्कूल में कॉन्ट्रैक्ट टीचर थी। इस लॉकडाउन में भी स्कूलों में जरूरतमंदों को राशन बांटने की ड्यूटी सरकार की तरफ से लगाई गई थी। आख़िर सरकार की लापरवाही की क़ीमत उस महिला को चुकानी पड़ी। क्या सरकार को यह अंदाज़ा नहीं था कि ऐसे में ड्यूटी लगाना खतरनाक हो सकता है। एक तरफ नौकरी पक्की नहीं और कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचर से काम भरपूर लेने के मामले में दिल्ली की सरकार सबसे अव्वल है और उस पर वाहवाही बंटोरने में भी आगे। लेकिन ये कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचर अपनी जान दांव पर लगाकर काम कर रहे या करते हैं, फिर भी उनकी जिंदगी को स्थायित्व देने की एक छोटी-सी पहल भी नहीं की जाती है।
अब पूरा मामला यह भी देख लीजिए। देश भर में लॉकडाउन है, तो दिल्ली में भी है। दिल्ली तो सबसे ख़तरनाक रेड जोन में है। कंपनियां बंद हैं। दुकानें बंद हैं। जिन लोगों के पास स्थायी रोजगार नहीं हैं, उनके आय का साधन भी बंद है। ऐसे में उनके घरों का राशन और तमाम खर्चों का इंतजाम भी बंद हैं। इसी में दिल्ली सरकार ने एक नोटिस जारी कर स्कूलों में कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचरों का कॉन्ट्रैक्ट भी खत्म कर दिया।
PM Modi, DElhi CM Kejriwal and Sisodia. Pic: Internet
दरअसल, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने के साथ ही इन स्कूलों में पढ़ाने वाले गेस्ट टीचर का लॉकडाउन जैसे महासंकट में आय का जरिया भी बंद हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने 5 मई को एक आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया, सभी गेस्ट टीचर का भुगतान सिर्फ 8 मई 2020 तक और गर्मियों की छुट्टियों में अगर उन्हें ड्यूटी के लिए बुलाया जाता है, तो उसके पैसे दिए जाएंगे। पिछले सप्ताह शिक्षा विभाग ने स्कूलों में 11 मई से 30 जून तक के लिए गर्मियों की छुट्टियों की घोषणा की थी। यानी इस अवधि में गेस्ट टीचरों को एक भी पैसा/सैलरी नहीं मिलने वाली है, क्योंकि उन्हें एक तरह से दिहाड़ी मजदूरों की ही तरह सरकार भुगतान करती है। इसे कुछ इस तरह समझिए कि जिस तरह दिहाड़ी मजदूर काम पर जिस दिन जाता है, उसे सिर्फ उसी दिन के पैसे मिलते हैं। अगर वह किसी दिन छुट्टी करता है, तो उस दिन के पैसे कट जाते हैं। जबकि कोई परमानेंट नौकरी वाले व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। उसे ली गई छुट्टियों के बदले भी पैसे मिलते हैं। गेस्ट टीचर के साथ तो दिहाड़ी मजदूरों से भी बुरा हाल है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दिन-रात खुद को खपा देने वाले गेस्ट टीचर को नैशनल होलीडे यानी गांधी जयंती, बुद्ध पूर्णिमा जैसे सरकारी छुट्टियों के पैसे भी कटते हैं।
ख़ैर लौटतें हैं असल मुद्दे पर। एक अनुमान के मुताबिक, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लगभग 20 हजार गेस्ट टीचर हैं। कोरोना वायरस महामारी यानी कोविड-19 की वजह से एहतियातन मार्च में दिल्ली के स्कूलों को बंद कर दिया गया था। इस दौरान गेस्ट टीचर परमानेंट शिक्षकों की ही तरह घर से काम करते रहे। गेस्ट टीचर स्कूल के एडमिनिस्ट्रेटिव काम के अलावा ऑनलाइन क्लास भी लेते रहे। यहां तक कि कुछ गेस्ट टीचरों को कोविड-19 से प्रभावितों को राहत का सामान बांटने के लिए कई राहत केंद्रों और स्कूलों में ड्यूटी सौंपी गई। हर साल की तरह इस साल भी गर्मियों की छुट्टियां घोषित की गईं। लेकिन एक अंतर है। कोविड-19 से पहले हर साल गर्मियों की छुट्टियों में भी स्कूल पूरी तरह बंद नहीं होते थे। मिशन बुनियाद और एक्स्ट्रा क्लासेज के लिए समर कैंप होते थे। इनमें लगभग 70 प्रतिशत गेस्ट टीचरों को ड्यूटी के लिए बुलाया जाता था। इस साल हालात बिलकुल अलग हैं। सभी गेस्ट टीचरों को घरों पर रहने की मजबूरी है और इस दौरान उनकी आय का जरिया भी बंद होगा। कई गेस्ट टीचर यूपी, हरियाणा, राजस्थान, एमपी और उत्तराखंड से हैं और दिल्ली में किराए पर रहते हैं। अब वे लॉकडाउन के दौरान खुद बेबस और लाचार महसूस कर रहे हैं, क्योंकि जब न आय होगी तो भला कैसे कमरे का किराया चुकाएंगे। कैसे उनका जीवन चलेगा।
दिल्ली सरकार इनके लिए कुछ कर सकती थी। एक तरफ सरकार कह रही है कि इस लॉकडाउन और कोविड-19 संकट में कोई किसी को नौकरी से न निकालें। कोई किसी की सैलरी न काटे, लेकिन सरकार खुद गेस्ट टीचर के साथ एक क्रूर तानाशाह की तरह पेश आ रही है। दिल्ली के गेस्ट टीचरों के साथ सरकार का रवैया कुछ ऐसा है कि लॉकडाउन और कोविड-19 में गेस्ट टीचरों के सामने आर्थिक तंगी जैसे हालात हैं और उधर सरकारनुमा तानाशाह बीन बजा रहा है।
Delhi BJP Chief Manoj Tiwari. Pic: Internet
दरअसल, यह चुनाव का वक्त नहीं है। अगर होता तो हर पार्टी का नेता इनकी बातें कर रहा होता। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का ड्रामा याद ही होगा आप लोगों को... किस तरह एलजी को ड्राफ्ट भेजा, फिर एलजी ने बोला हमें मिला नहीं...वहीं, दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी तो चुनावों के दौरान गेस्ट टीचरों के हक़ में हाईकोर्ट में पार्टी फंड से केस लड़ने की बात तक कही थी। हालांकि, बकौल इंडियन एक्सप्रेस- मनोज तिवारी ने दिल्ली के एलजी को पिछले सप्ताह एक चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने चिट्ठी में कहा कि केंद्र सरकार और श्रम मंत्रालय पहले ही आदेश जारी कर चुका है कि इस महामारी के दौरान किसी की सैलरी कटौती नहीं की जानी चाहिए। 
तिवारी ने लिखा, “केंद्र सरकार के इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए इस मुश्किल घड़ी में जब तक स्कूल खुल नहीं जाते, तब तक गेस्ट टीचरों को सैलरी दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने परिवार का ध्यान रख सकें। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। जहां तक मुझे पता चला है कि 11 मई से गेस्ट टीचरों की सेवा खत्म करने के बाद भी कई स्कूलों के प्रिंसिपल गेस्ट टीचरों से बेगारी का काम लेना चाहते/चाहती हैं। उन्हें कई प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन जब उनका कॉन्ट्रैक्ट ही नहीं है, तो फिर स्कूलों के प्रिंसिपल इस तरह का काम कैसे ले सकते हैं? यह है तनाशाही रवैया। लेकिन दिल्ली सरकार को तो बस मतलब है तो खुद की पीठ खुजाने और थपथपाने से।