ठंड बढ़ी या ग़रीबी

लोग कह रहे हैं कि ठंड ज्यादा है। क्या वाक़ई? क्या इससे ज्यादा ठंड कभी नहीं पड़ी। या कहीं नहीं पड़ती? दिलीप मंडल साहब अपने फेसबुक के स्टेटस मैसेज पर लिखते हैं, 'जो पत्रकार लिख रहे हैं कि ठंड से इतने लोग मरे...उतने लोग मरे, वे या तो बेवकूफ हैं या फिर शब्दों का अर्थ बदलने की सत्ता की साजिश में हिस्सेदार। कोई भी आदमी ठंड से नहीं मरता, गरीबी से मरता है। अगर ठंड से लोग मरते तो अलास्का, आइसलैंड और स्कैंडेनेवियाई देशों में कोई जीवित नहीं बचता, जहां साल में कई महीने तक तापमान शून्य से काफी नीचे रहता है।' यह बात सौ फ़ीसदी सच है...हम लोग ठंड का हो हल्ला मचाकर ग़रीबी को ठंड से ढकने की कोशिश करते हैं...दुख की बात तो यह कि सफल भी हो जाते हैं..यह एक कड़वी हक़ीकत जो आज के हमारे चिल्लाऊ पत्रकार बंधु समझना नहीं चाहते। दूसरी बात यह है कि आज जो सत्ता की साज़िश में शामिल नहीं है, वह सत्ता का दलाल बनकर काम कर रहा है। मतलब दोनों हालातों में मरना उसी को है जो दशकों से मरता आया है। और उसी की मौत का तमाशा दिखाकर या छापकर हमारे बंधु अपनी अय्याश ज़िंदगी जीते हैं। और, ग़रीब ठंड में मरता है, गर्मी में लू से मरता है बरसात में बाढ़ से मरता है और तो और  इलाज न होने की हालत में छोटी-मोटी बीमारियों से मरता है। वैसे मरना सबको हो, लेकिन उसका मरना औरों के मरने से अलग होता है। पैसे वालों को न तो सर्दी लगती है न गर्मी। उनके लिए तो यह बस उल्लास और कौतूहल की चीज है। हमारे लिए भी यह किसी कौतूहल से कम नहीं। मैं क्या कर रहा हूं, बस लिख रहा हूं या कभी दिल नहीं मानता तो किसी ग़रीब को कुछ दे देता हूं। लेकिन, रेत के मैदान में एक बूंद पानी कुछ नहीं कर सकता। उसी तरह यह करना भी ठेस पहुंचाता है।

9 comments:

  1. दोनों में ही होड़ लगी है।

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  2. बेहतरीन पोस्ट लेखन के लिए बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है - पधारें - बूझो तो जाने - ठंड बढ़ी या ग़रीबी - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा

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  3. एकदम सही लिखा है, मरना गरीब को ही होता है।

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  4. संख्तिप्त और सटीक पोस्ट !
    इस नज़रिए से बहुत कम सोचा गया है कि यदि लोग ठण्ड से मरते तो ठन्डे देशों में कोई जीवित न रहता...मँहगाई, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, घोटाले अपने चरम पर है और सक्षम लोग इसे कौतूहल का विषय मान कर पढ़ लिख लेटे हैं सुबह की चाय के साथ...

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  5. कृपया संख्तिप्त को संक्षिप्त पढ़ा जाय

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  6. जी सत्य कहा आपने
    दर्द पीडा,चुभन सिहरन सब अकिंचनों को ही तो मिलती है

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  7. पद्म सिंह जी बहुत बहुत धन्यवाद और गिरीश मुकुल जी आपका भी. दरअसल आज के वक़्त की यही सच्चाई है.

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  8. गरीबी ही बडी है हमेशा गरीब ही पिसता है।

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  9. yahi to garibon kee badkismati hai

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