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गृह राज्य मंत्री का बेटा... जज साहेब अदालतें मंदिर की घंटी बन चुकी हैं...

देश की न्याय व्यवस्था मंदिर के घंटे की तरह हो गई है। कोई भी आ रहा है और बजाकर चला जा रहा है। मंदिर के घंटे को बजाने का भी एक तय समय होता है, लेकिन न्याय व्यवस्था के साथ जिस तरह घंटी बजाई जा रही है, उसका को नियत समय नहीं है। देश के गृह राज्य मंत्री के बेटे से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर तक इस सिस्टम की घंटी नहीं, बैंड बजा रहे हैं। बस उम्मीद सिर्फ आम जनता, दबे-कुचले लोगों, जिनके पास दौलत नहीं है, प्रभावशाली नहीं है, उनसे की जाती है कि वे देश के तमाम कायदे-कानून को सर पर बिठाकर रखें। हालिया घटनाक्रम ने इस मीडिया, न्यायिक, पुलिसिया और राजनीतिक सिस्टम में भरोसे को खाई में ही धकेलने का काम किया है।

बॉलिवुड के बादशाह शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान इन दिनों मुंबई के ऑर्थर रोडजेल में बंद हैं। अदालत ने आर्यन को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा है। मामला क्रूज रेव पार्टी से जुड़ा है। शनिवार को कुल 18 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। आर्यन खान के वकील ने मैजिस्ट्रेट कोर्ट में जमानत की अर्जी दी। खारिज हो गई। शनिवार को वकील ने सेशन कोर्ट का रुख किया। मामला खींचेगा। इस बीच, समझने की बात है कि शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान के पास से किसी भी तरह का ड्रग्स नहीं मिला है। एनसीबी के हवाले से कई मीडिया संस्थान खबरें चला रहे हैं कि आर्यन ने माना है कि ड्रग्स का सेवन किया। जमानत पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में आर्यन के वकील ने मैजिस्ट्रेट को बताया कि आर्यन खान ने ड्रग्स को लेकर अपना ब्लड टेस्ट देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन एनसीबी के अधिकारियों ने सैंपल लेने से मना कर दिया। दो बातें साफ हैं...1. आर्यन खान के पास से ड्रग्स नहीं मिला। 2. सेवन का शक था, तो एनसीबी ने मेडिकल क्यों नहीं कराया यानी यहां भी आर्यन से कुछ हासिल नहीं हुआ।
अब चलते हैं उत्तर प्रदेश के लखमीपुर खीरी। यहां केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे पर चार किसानों पर खुलेआम जीप चढ़ा देने का आरोप है। मंत्री जी बेटे का बचाव करते रहे। आरोपी बेटा अपना बचाव करता है। हक है, करिए। लेकिन हत्या के आरोपी की गिरफ्तारी कब होती है। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
क्या हत्या के दूसरे के मामले में पुलिस इसी तरह मंत्री जी के बेटे की तरह नोटिस भेजकर बुलाती। दुनिया जानती ही कि अगर आम आदमी छोटा-मोटा अपराध कर दे, तो हवालात की हवा खाने तुरंत भेज दिया जाता है। यहां मंत्री जी के बेटे की आवभगत होती रही। हत्या के आरोपी को 5-6 दिनों के बाद गिरफ्तार किया गया। मंत्री जी के बेटे को भी 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेजा गया। आर्यन खान के पास से ड्रग्स बरामद भी नहीं हुआ, फिर भी पहले वह दो-तीन दिनों तक एनसीबी की हिरासत में रहा। फिर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में। यहां मंत्री जी का बेटा, चार लोगों पर गाड़ी चढ़ाने के चार दिन बाद तक मौज करते रहे, फिर 10 घंटे पूछताछ हुई। फिर गिरफ्तारी के बाद अरेस्ट किया गया। दूसरी बात यह कि जिसके पास से ड्रग्स तक बरामद नहीं हुआ, न सेवन का पता करने के लिए मेडिकल कराया गया। उधर, गुजरात के अडानी मुंद्रा पोर्ट से 3000 किलोग्राम की हेरोइन बरामद हुई। इस मामले में एनसीबी की सक्रियता किसी मुर्दा की तरह नजर आती है।

एनसीबी का कहना है कि आर्यन खान के वॉट्सऐप चैट से पता चलता है कि मुमकिन है कि वह नियमित तौर पर ड्रग्स का सेवन करता हो। यानी एनसीबी कंफर्म नहीं है। आर्यन के वकील ने कहा कि फुटबॉल के बारे में चैट है। एनसीबी का यह भी कहना है कि यह संभव है कि गिरफ्तार लोगों के तार जुड़े हो और उन्होंने पार्टी में शामिल होने की योजना बनाई। इससे आर्यन खान ने इनकार किया। एनसीबी का बड़ा दावा है कि आर्यन खान एक प्रभावशाली परिवार से हैं। अगर उन्हें जमानत पर छोड़ा गया तो वह सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। बिल्कुल सही बात है कि आर्यन एक प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखता है, तो क्या मंत्री जी का बेटा किसी चरवाहे के घर का है, जिसके पास फूस का घर है औऱ वह किसी सबूत से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। इसीलिए पुलिस उसे चार-पांच दिनों तक छुट्टा छोड़े रखती है। फिर पूछताछ के लिए आने के लिए नोटिस भेजती है। जरा सोचिए, क्या आपको इस तरह की छूट मिलती? हत्या का आरोप ही छोड़िए, किसी की गाड़ी का एक्सिडेंट ही हो जाता और गलती से कोई जख्मी हो जाता तो भी इतनी रियायत आपको मिलती क्या? यहां मंत्री जी का बेटा पुलिस के नोटिस भेजने के एक दिन बाद तब आता है, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है। सुप्रीम कोर्ट जैसा कि इस तरह के मामलों में रिवाज है, सख्त टिप्पणी के बाद मामले को लंबे समय के लिए बोरिया-बिस्तर में डाल देता है। पेगासस जासूसी वाले में जिस-जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, अखबारों के पहले पन्ने पर हेडिंग बनी खबर। लेकिन अब उस मामले का क्या हुआ? इसी तरह लखीमपुर खीरी मामले में एक दिन की सुनवाई के बाद जज साहेब लोग छुट्टी पर चले गए और सुनवाई छुट्टियों के बाद करेंगे। जनता की जिंदगी की कीमत का फैसला छुट्टियों के बाद होगा।

भारत-पाकिस्तान... दो मुल्क, पर राजनीति एक!


पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान... इस पाकिस्तान की कोई बात नहीं करना चाहता। चाहता भी है, तो बस तोप-बंदूकों की जुबान में। कोई पाकिस्तान की बर्बादी का जश्न मनाना चाहता है, तो कोई पाकिस्तान का नाम भर लेकर ही हिंदुस्तान में राष्ट्रवाद की अलख जगाना चाहता है। उसका नाम लेकर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के सिवा पाकिस्तान से उसका कोई और राब्ता नहीं।
कमोबेश यही हालात सरहद के उस ओर भी हों! यहां के हुक्मरानों की तरह वहां भी सत्तानशीं के लिए हिंदुस्तान की फिक्र बस इसलिए होती है कि पावर पॉलिटिक्स में कहीं से कमजोर न नजर आएं। उनके ख्यालों में जनता हमेशा से इन सबके बाद की प्राथमिकताओं में रही है, अगर रही भी है तो! 
Photo: Internet
डॉन वेबसाइट के मुताबिक, पाकिस्तान में कोरोना वायरस के कुल मामले तकरीबन दो लाख के आंकड़े तक पहुंच चुकी है। चार हजार से ज्यादा की मौत हो चुकी है। हिंदुस्तान में यही संख्या पांच लाख से अधिक है और यहां 15 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। सीमा के दोनों तरफ आर्थिक हालात किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान की थोड़ी ज्यादा खस्ती होगी। लेकिन दोनों मुल्कों में राजनीति अजीब ही करवट ले रही है।
वरिष्ठ पाकिस्तानी कॉलमनिस्ट खालिद अहमद इंडियन एक्सप्रेस में लिखते हैं कि जब इमरान खान ने 2018 में देश की बागडोर संभाली तो अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही खराब थी। उन्हें विरासत में मिली इस खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से निपटने की चुनौती मिली। लेकिन इमरान के करिश्मा यानी उनकी पर्सनैलिटी से उनकी चुनौती और कई गुना बढ़ गई। वह एक तेज गेंदबाज की तरह आक्रामक थे, बतौर कप्तान काम पूरी तरह खत्म करना चाहते थे, लेकिन राजनीति समझौतों और वक्त के साथ तालमेल बिठाने का नाम है। आज लगभग दो साल बाद भी हालात कम नहीं हुए हैं। विपक्ष कहीं दिख नहीं रहा है, लेकिन कोरोना वायरस महामारी और टिड्डियों के हमले से उनकी पार्टी पाकिस्तान-तहरीके-इंसाफ जबरदस्त दबाव में है। अंदरखाने पार्टी में सिरफुटौव्वल चल रहा है। कई मंत्रियों के विभाग छीने जा रहे हैं, तो कई को सख्त निर्देश दिए जा रहे हैं। फवाद चौधरी के नाम से सभी वाकिफ हैं। पहले सूचना मंत्री थे, लेकिन ओहदा छीन लिया गया और साइंस एंड टेक्नॉलजी मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई। उनके बिना सुरताल की बोली ने इमरान की छवि बहुत खराब की है। इमरान की दो सबसे बड़ी ताकते हैं उनकी दोनों विपक्षी पार्टियां- पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी)। लेकिन सेना और नेशनल अकांउटबिलिटी बिल (नैब) की वजह से पूरे परिदृश्य से नदारद हैं।
अब हिंदुस्तान लौटते हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ताकत क्या है? सोचिए... कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार। महात्मा गांधी नहीं, गांधी परिवार मतलब नेहरू, सोनिया और राहुल गांधी। जब भी कोई संकट या समस्या आती है तो क्या हमारे देश के प्रधानमंत्री नेहरू और गांदी परिवार पर हमला बोलना शुरू नहीं करते। क्या बीजेपी नेहरू और गांधी परिवार के पीछे नहीं पड़ जाती है? हालिया उदाहरण ही ले लीजिए। चीन से सीमा विवाद चरम पर है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर सारे प्रवक्ता तक नेहरू-गांधी परिवार के पीछे नहीं पड़ गए हैं। अब गांधी परिवार ने 45 साल से ज्यादा वक्त तक देश पर शासन किया है तो जनता का मिजाज भी उनसे खफा-खफा है। वह पिछले छह साल से सत्ता में काबिज बीजेपी सरकार की जगह अब भी विपक्ष से ही सारे सवालों के जवाब की उम्मीद करती है। या ऐसा कहें कि जनता के दिमाग को इस तरह फीड कर दिया गया है कि वह सरकार से सवाल पूछने की हिमाकत ही नहीं कर सकती।
इसकी मिसाल यह है कि जब चीन हम पर बार-बार चढ़ रहा है, तो प्रधानमंत्री से लेकर बीजेपी के सारे आला नेता उसे जवाब देने की जगह नेहरू-गांधी परिवार का झुनझुना जनता के अहं को संतुष्ट करने के लिए बेच रही है। सरेआम झूठ बेचा जा रहा है। प्रधानमंत्री जी सर्वदलीय बैठक में कहते हैं कि लद्दाख में झड़प हुई। हमारे 20 जवान शहीद हो गए, लेकिन कोई हमारी सीमा में घुसा ही नहीं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा कहते हैं कि मौजूदा समस्या की जिम्मेदारी नेहरू की है। बीजेपी अध्यक्ष कहते हैं कि एक परिवार की गलतियों के कारण 43 हजार स्क्वेयर किलोमीटर (यह कितना सही है कोई फैक्ट चेकर ही बताए) भूमि चली गई। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से 90 लाख की फंडिंग की गई। लद्दाख से बीजेपी सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल का मानना है कि कांग्रेस के शासन में चीन ने डेमचोक सेक्टर के उसके इलाके तक कब्जा कर लिया।मतलब चीन ने भारत से जंग जैसे हालात छेड़ रखे हैं और सारी लड़ाई कांग्रेस के खिलाफ लड़ी जा रही है।
पाकिस्तान में इमरान खान देश की बर्बाद होती अर्थव्यवस्था पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। आतंकवाद को शह देने के कारण अबी एफएटीएफ की लिस्ट में वह बना हुआ है। बिजली संकट सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है, जिससे उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं। पिछले महीने पाकिस्तान में एक विमान हादसे में 97 लोगों की जान चली गई, तो पता चला कि यह किसी तकनीकी खामी नहीं, बल्कि पायलट आपस में कोरोना महामारी की चर्चा कर रहे थे। इस कारण वह विमान संभाल नहीं पाए और हादसा हो गया। फिर पता चला कि पाकिस्तान का हर तीसरा पायलट फर्जी डिग्री और लाइसेंस लेकर फ्लाइट उड़ा रहा है। आसमान में विमान उड़ाते हुए पायलट कोरोना की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री कोरोना के मामले में खामोश हैं। वह पाकिस्तानी असेंबली में बोलते भी हैं, तो ओसामा बिन लादेन को शहीद तक बता जाते हैं। कश्मीर पर बाज नहीं आते।
यह कुछ ऐसा मसला है कि जनता भूखे मर जाएगी, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार से सवाल नहीं करेगी। ठीक उसी तरह जैसे हिंदुस्तान में जनता राष्ट्रवाद और विपक्ष का नाम आते ही मोदी सरकार के खिलाफ सवालों को सुनने से पहले कान बंद कर लेती है। आखिर पाकिस्तान हमारा पड़ोसी देश ही तो है। 1947 से पहले तो हमारा ही हिस्सा था। क्या हुआ जो दो अलग-अलग मुल्क बन गए। एक ही परिवार को दो भाई भी अलग होता ही है, लेकिन इस अलगाव या बंटवारे के बावजूद दोनों की फितरत तो वही रहती है। पाकिस्तान-हिंदुस्तान की भी यही हालत है। दोनों मुल्कों के नेताओं की नब्ज भी वही है।

इकोनॉमी, कोरोना अब चीन-नेपाल, हमारा लीडर बजा रहा बस गाल

नरेंद्र मोदी... नाम तो सुना ही होगा... देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उनका सबसे बड़ा हथियार है, उनकी सोच। सार्थक या घातक, उसका फैसला जनता कर चुकी है। जनता से वह कुछ इस तरह पेश आते हैं, “जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे...लेकिन जनता को जो चाहिए, उसके लिए जरूरी है, वह नहीं कहते। मौजूदा समय और संकट कुछ ऐसा ही है। देश नेतृत्व संकट से गुजर रहा है, लेकिन वह जनता को अभी भी नए रैपर में राष्ट्रवाद और कांग्रेस विरोध की पुरानी टॉफी खिलाते जा रहे हैं।
अब ज़रा याद करिए भारतीय क्रिकेट का वह दौर... जब सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, सदगोपन रमेश, आकाश चोपड़ा, नयन मोंगिया जैसे खिलाड़ी किसी देश के खिलाफ उतरते थे, तो कागजों पर टीम हमेशा बीस ही नजर आती थी। लेकिन मैदान में उतरते ही सारी गलतफहमी ढेर हो जाया करती थी। देश की हालत भी कुछ वैसी ही है। 56 इंच के कप्तान प्रधानमंत्री से लेकर तेजतर्रार गृहमंत्री और आर्थिक मोर्चे पर आग उगलने वालीं वित्त मंत्री सीतारमण जी। बीच में कभी रोबिन सिंह ऑलराउंडर के तौर पर आए थे...
इसमें कोई शक नहीं कि आज रिपब्लिक ऑफ इंडिया यानी भारत नेतृत्व के गंभीर संकट से गुजर रहा है। देश की हालत उसी दौर के क्रिकेट की तरह हो चुकी है।
PM Modi with Chinese President. Photo: Internet
हमारे सामने अभी तीन बड़ी समस्याएं हैं। कोरोना महामारी, चीन से तनाव और आर्थिक संकट। बाकी सारी समस्याएं इनकी बाई-प्रोडक्ट हैं। हालांकि, अगर आप क्रमवार देखेंगे तो सबसे पहली समस्या आर्थिक मोर्चे पर थी। इस मोर्चे पर सरकार लगातार नाकामयाब साबित रही। जब सारे तीर-तुक्के असफल साबित हुए, तो जीडीपी से लेकर बेरोजगारी के आंकड़ों में हेरफेर से भी बाज नहीं आई। इसका चर्चा खूब हो चुकी है। इन असफलताओं के बावजूद मोदी की सरकार लगातार दूसरी बार सत्ता में आने में सफल रही। तो इस मोर्चे पर बात करना एक तरह से बेमानी या फिर जनता ही इस काबिल है कि वह सामने खाई देखकर भी उसमें छलांग लगाने को एंडवेंचर का नाम देती है।
दूसरे मोर्चे की बात करते हैं। करोनो महामारी। इस मोर्चे पर भी सरकार नोटबंदी की तरह बिना किसी तैयारी के मैदान में उतर गई। लाखों लोग सड़कों पर आ गए। पैदल ही अपने घरों को कूच करने लगे। कई जान गई, तो कई की जान ली गई। लेकिन यहां भी गलतियों से सीखने की जगह पुराने ट्रिक्स के भरोसे सरकार काम करती रही। जब कोरोना संकट हाथ फिसलने लगा, तो राज्य सरकार के मत्थे जिम्मेदारिया मढ़ी जाने लगीं। राजनीतिक रंग-रोगन में इस महामारी से सामना किया जाने लगा। पहले पश्चिम बंगाल, फिर महाराष्ट्र। हर रोज ऐसे फरमान आने लगे कि उस फरमान को समझाने के लिए एक नया फरमान जारी किया जाने लगा। यहां भी अपने सबसे मजबूत हथियार झूठ और सांप्रदायिकता से मोदी सरकार अपनी नाकामयाबी पर पैबंद लगाती दिखी। इस कोशिश में आईटी सेल और लगभग रेंग रही मीडिया ने बखूबी साथ दिया। जब भी बाजारों या धार्मिक स्थलों में भीड़ दिखती तो मुसलमान एंगल खबरों और सोशल मीडिया पर पसरा मिलता। हम इसको भी छोड़ते हैं, क्योंकि अब महामारी को लेकर दावे औऱ वादे कितने भी किए जाएं, अब सबकुछ भगवान भरोसे ही छोड़ दिया गया है। नहीं, तो टेस्टिंग, क्वांरटीन, मेडिकल साजोसामान, स्वास्थ्य-व्यवस्था के चर्चे होते न कि हिंदू-मुसलमानों के। बीजेपी राज्यों में पीपीई किट को लेकर घोटाले हुए, प्रदेश अध्यक्ष को इस्तीफा तक देना पड़ा। लेकिन, हुआ क्या? हुआ यह कि कोरोना महामारी के नाम पर कुछ गैर-बीजेपी राज्यों की सरकार गिराने की कोशिश की गई। एक राज्य में सरकार बना भी ली गई। कुछ में दूसरे दलों के विधायकों को खरीदा गया। कुल जमा यही कामयाबी है इस कोरोना के खिलाफ सरकार की लड़ाई का।
अब लौटते हैं चीन पर। न तो वहां कोई हमारी सीमा में घुसा हुआ है और न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है।अब यह मशहूर डायलॉग तब तक गूंजता रहेगा, जब तक दुनिया रहेगी। इस पर कई सवाल उठ चुके हैं कि जब न कोई घुसा है, तो फिर 20 जवान हमारे शहीद गोटियां खेलते हुए तो नहीं ही हुए। अगर किसी देश का प्रधानमंत्री इस तरह का गैर-जिम्मेदराना बयान दे, तो उस देश की सरहद की सुरक्षा भी भगवान भरोसे ही हो सकती है। इस मुद्दे पर भी ज्यादा बोलना सूरज को दिया दिखाने के बराबर है। फिर भी कुछ बातें तो की ही जा सकती है। कहां तो सरकार को मुंहतोड़ जवाब चीन को देना था, लेकिन सारी ऊर्जा और पैसा नेहरू और कांग्रेस पार्टी को जवाब देने में खर्च किया जा रहा है। जब देश के प्रधानमंत्री के बयान को ही आधार बनाकर दुश्मन देश हम पर ही आरोप लगाए, तो इससे ख़तरनाक नेतृत्व देश के लिए कुछ नहीं हो सकता है। इसमें पत्रकारों की फौज भी सरकार के बचाव में खुलेआम कूद गई है। कुछ पत्रकारों ने बाकायदा सोशल मीडिया पर लिखा इतिहास की गलतियों की सजा भविष्य को भुगतना पड़ता है। लेकिन उन्होंने तो वर्तमान को सिरे से गोल ही कर दिया। आखिर वर्तमान क्या है?, जिसकी पर्देदारी की जा रही है। कौन और कब, किस मकसद से क्या बोल रहा है? यह याद रखा जाना चाहिए। बाकी पड़ोसी देशों की जिक्र ही क्या किया जाए? नेपाल से हमारा रोजी-बेटी का संबंध आज से नहीं, बल्कि वर्षों से है। लेकिन वह लगातार भारत की ओर शत्रुता भरे कदम उठाता जा रहा है। पाकिस्तान से ताल्लुक पहले से ही खराब हैं। श्रीलंका हमारे हाथ से कब का निकल चुका है। रूस से पहले से जैसे संबंध रहे नहीं। अमेरिका में ट्रंप का बड़बोलापन कभी खुद उन्हें तो कभी उनके साथ ताल्लुक रखने वाले देश और नेताओं को बीच सड़क पर नंगा करके रख देता है।
लेकिन यहां सवाल उठता है कि आखिर हर मोर्चे पर हमारा नेतृत्व इतना विफल क्यों है?
चार मार्च 2020 की इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर है। खबर विदेश मंत्रालय के हवाले से लिखी गई है कि पिछले पांच साल में नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं पर करीब 446.52 करोड़ रुपये खर्च किए। जब किसी देश का मुखिया विदेश यात्राओं पर इतना खर्च करे, तो लगभग सारे देशों से न सही पड़ोसियों से ताल्लुक बेहतर होने की गारंटी ली ही जा सकती है। लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर नाकामयाबी की कीमत आज देश को चुकानी पड़ रही है। और इसकी जिम्मेदारी आईटी सेल और बिकाऊ मीडिया के जरिए उसी नेहरू और कांग्रेस पार्टी पर डाली जा रही है, जिसकी बदौलत मोदी सत्ता में हैं।

कोरोना संकट में भी गेस्ट टीचरों का हक छिनती सरकार, केजरीवाल-भाजपा सब मिले हुए हैं


टीचर यानी शिक्षक। दिल्ली सरकार के स्कूलों में सबसे ज्यादा ढिंढोरा स्कूलों की सफलता का ही पीटा गया है। लेकिन आप जानते हैं कि किस कीमत पर यह किया गया? शिक्षकों के शोषण और अब उनकी जान की कीमत पर...
10 मई को एक ख़बर आई। ख़बर यह थी कि रोहिणी में पति-पत्नी की कोरोना वायरस से मौत हो गई। पहले पति की जान गई, उसके बाद पत्नी की। महिला दिल्ली सरकार के स्कूल में कॉन्ट्रैक्ट टीचर थी। इस लॉकडाउन में भी स्कूलों में जरूरतमंदों को राशन बांटने की ड्यूटी सरकार की तरफ से लगाई गई थी। आख़िर सरकार की लापरवाही की क़ीमत उस महिला को चुकानी पड़ी। क्या सरकार को यह अंदाज़ा नहीं था कि ऐसे में ड्यूटी लगाना खतरनाक हो सकता है। एक तरफ नौकरी पक्की नहीं और कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचर से काम भरपूर लेने के मामले में दिल्ली की सरकार सबसे अव्वल है और उस पर वाहवाही बंटोरने में भी आगे। लेकिन ये कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचर अपनी जान दांव पर लगाकर काम कर रहे या करते हैं, फिर भी उनकी जिंदगी को स्थायित्व देने की एक छोटी-सी पहल भी नहीं की जाती है।
अब पूरा मामला यह भी देख लीजिए। देश भर में लॉकडाउन है, तो दिल्ली में भी है। दिल्ली तो सबसे ख़तरनाक रेड जोन में है। कंपनियां बंद हैं। दुकानें बंद हैं। जिन लोगों के पास स्थायी रोजगार नहीं हैं, उनके आय का साधन भी बंद है। ऐसे में उनके घरों का राशन और तमाम खर्चों का इंतजाम भी बंद हैं। इसी में दिल्ली सरकार ने एक नोटिस जारी कर स्कूलों में कॉन्ट्रैक्ट/गेस्ट टीचरों का कॉन्ट्रैक्ट भी खत्म कर दिया।
PM Modi, DElhi CM Kejriwal and Sisodia. Pic: Internet
दरअसल, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने के साथ ही इन स्कूलों में पढ़ाने वाले गेस्ट टीचर का लॉकडाउन जैसे महासंकट में आय का जरिया भी बंद हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने 5 मई को एक आदेश जारी किया। आदेश में कहा गया, सभी गेस्ट टीचर का भुगतान सिर्फ 8 मई 2020 तक और गर्मियों की छुट्टियों में अगर उन्हें ड्यूटी के लिए बुलाया जाता है, तो उसके पैसे दिए जाएंगे। पिछले सप्ताह शिक्षा विभाग ने स्कूलों में 11 मई से 30 जून तक के लिए गर्मियों की छुट्टियों की घोषणा की थी। यानी इस अवधि में गेस्ट टीचरों को एक भी पैसा/सैलरी नहीं मिलने वाली है, क्योंकि उन्हें एक तरह से दिहाड़ी मजदूरों की ही तरह सरकार भुगतान करती है। इसे कुछ इस तरह समझिए कि जिस तरह दिहाड़ी मजदूर काम पर जिस दिन जाता है, उसे सिर्फ उसी दिन के पैसे मिलते हैं। अगर वह किसी दिन छुट्टी करता है, तो उस दिन के पैसे कट जाते हैं। जबकि कोई परमानेंट नौकरी वाले व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। उसे ली गई छुट्टियों के बदले भी पैसे मिलते हैं। गेस्ट टीचर के साथ तो दिहाड़ी मजदूरों से भी बुरा हाल है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दिन-रात खुद को खपा देने वाले गेस्ट टीचर को नैशनल होलीडे यानी गांधी जयंती, बुद्ध पूर्णिमा जैसे सरकारी छुट्टियों के पैसे भी कटते हैं।
ख़ैर लौटतें हैं असल मुद्दे पर। एक अनुमान के मुताबिक, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में लगभग 20 हजार गेस्ट टीचर हैं। कोरोना वायरस महामारी यानी कोविड-19 की वजह से एहतियातन मार्च में दिल्ली के स्कूलों को बंद कर दिया गया था। इस दौरान गेस्ट टीचर परमानेंट शिक्षकों की ही तरह घर से काम करते रहे। गेस्ट टीचर स्कूल के एडमिनिस्ट्रेटिव काम के अलावा ऑनलाइन क्लास भी लेते रहे। यहां तक कि कुछ गेस्ट टीचरों को कोविड-19 से प्रभावितों को राहत का सामान बांटने के लिए कई राहत केंद्रों और स्कूलों में ड्यूटी सौंपी गई। हर साल की तरह इस साल भी गर्मियों की छुट्टियां घोषित की गईं। लेकिन एक अंतर है। कोविड-19 से पहले हर साल गर्मियों की छुट्टियों में भी स्कूल पूरी तरह बंद नहीं होते थे। मिशन बुनियाद और एक्स्ट्रा क्लासेज के लिए समर कैंप होते थे। इनमें लगभग 70 प्रतिशत गेस्ट टीचरों को ड्यूटी के लिए बुलाया जाता था। इस साल हालात बिलकुल अलग हैं। सभी गेस्ट टीचरों को घरों पर रहने की मजबूरी है और इस दौरान उनकी आय का जरिया भी बंद होगा। कई गेस्ट टीचर यूपी, हरियाणा, राजस्थान, एमपी और उत्तराखंड से हैं और दिल्ली में किराए पर रहते हैं। अब वे लॉकडाउन के दौरान खुद बेबस और लाचार महसूस कर रहे हैं, क्योंकि जब न आय होगी तो भला कैसे कमरे का किराया चुकाएंगे। कैसे उनका जीवन चलेगा।
दिल्ली सरकार इनके लिए कुछ कर सकती थी। एक तरफ सरकार कह रही है कि इस लॉकडाउन और कोविड-19 संकट में कोई किसी को नौकरी से न निकालें। कोई किसी की सैलरी न काटे, लेकिन सरकार खुद गेस्ट टीचर के साथ एक क्रूर तानाशाह की तरह पेश आ रही है। दिल्ली के गेस्ट टीचरों के साथ सरकार का रवैया कुछ ऐसा है कि लॉकडाउन और कोविड-19 में गेस्ट टीचरों के सामने आर्थिक तंगी जैसे हालात हैं और उधर सरकारनुमा तानाशाह बीन बजा रहा है।
Delhi BJP Chief Manoj Tiwari. Pic: Internet
दरअसल, यह चुनाव का वक्त नहीं है। अगर होता तो हर पार्टी का नेता इनकी बातें कर रहा होता। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का ड्रामा याद ही होगा आप लोगों को... किस तरह एलजी को ड्राफ्ट भेजा, फिर एलजी ने बोला हमें मिला नहीं...वहीं, दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी तो चुनावों के दौरान गेस्ट टीचरों के हक़ में हाईकोर्ट में पार्टी फंड से केस लड़ने की बात तक कही थी। हालांकि, बकौल इंडियन एक्सप्रेस- मनोज तिवारी ने दिल्ली के एलजी को पिछले सप्ताह एक चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने चिट्ठी में कहा कि केंद्र सरकार और श्रम मंत्रालय पहले ही आदेश जारी कर चुका है कि इस महामारी के दौरान किसी की सैलरी कटौती नहीं की जानी चाहिए। 
तिवारी ने लिखा, “केंद्र सरकार के इन निर्देशों को ध्यान में रखते हुए इस मुश्किल घड़ी में जब तक स्कूल खुल नहीं जाते, तब तक गेस्ट टीचरों को सैलरी दी जानी चाहिए, ताकि वे अपने परिवार का ध्यान रख सकें। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं दिख रहा है। जहां तक मुझे पता चला है कि 11 मई से गेस्ट टीचरों की सेवा खत्म करने के बाद भी कई स्कूलों के प्रिंसिपल गेस्ट टीचरों से बेगारी का काम लेना चाहते/चाहती हैं। उन्हें कई प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन जब उनका कॉन्ट्रैक्ट ही नहीं है, तो फिर स्कूलों के प्रिंसिपल इस तरह का काम कैसे ले सकते हैं? यह है तनाशाही रवैया। लेकिन दिल्ली सरकार को तो बस मतलब है तो खुद की पीठ खुजाने और थपथपाने से।

प्रधानमंत्री जी कह दीजिए मैं झूठ नहीं बोलता, क्योंकि आपके वादे चीख-चीखकर झूठ की गवाही दे रहे हैं

-    इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त हैं,वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए।
जो सामान्य व्यक्ति हवाई चप्पल पहनकर घूमता है, वह मुझे हवाई जहाज में दिखाना है। 
यह दोनों ही बयान इसी देश के प्रधानमंत्री के हैं। या तो ये दोनों ही बयान झूठे हैं या प्रधानमंत्री झूठे हैं। अगर ऐसा भी नहीं है, तो उनके सारे दावे कागज़ी हैं और बातें बेमानी हैं। इस देश में लॉकडाउन है। बसें बंद हैं। ट्रेन बंद है और बंद है सारा मुल्क। अगर नहीं बंद है, तो देश के हुक्मरानों के झूठे दावे, झूठा वादा और दिलासा।
आज सुबह जब आंख खुली, तो खबर 17 मजदूरों के ट्रेन से कटकर होने वाली मौत की थी। प्रधानमंत्री का ट्वीट था, जिसमें उनका दुख था, लेकिन नहीं था तो मजदूरों का दर्द समझने वाला दिल। जिन मजदूरों की जांन गई, वे कौन थे? अपने घर ही तो जा रहे थे... ट्रेन की पटरियों पर लेटे थे कि ट्रेन आई और रौंदती हुई चली गई। पटरियों पर बिखरी सूखी रोटियां बता रही हैं कि आख़िर भूख ने किस कदर परेशान किया होगा? किन हालातों में अपने घरों के लिए निकले होंगे...
लॉकडाउन से प्रवासी मज़दूरों से सबसे ख़राब स्थिति मजदूरों की है। न काम है और न ही रहने को छत। फिर किस मुंह से किस सरकार के भरोसे शहरों में रुके रहें। 45 दिनों से देश बंद है और बंद हैं हुक्मरानों के दिल और दिमाग। वे नहीं समझना चाहते इनका दुख और दर्द। कोई 100 किलोमीटर पैदल चला जा रहा है, तो कोई साइकल से भागा जा रहा है। पुलिस लाठियां भांज रही हैं। प्रेग्नेंट महिलाएं हाईवे से सफर ऐसे तय कर रही हों, जैसे चंद मिनट में रफ्तार उन्हें हजारों मील दूर घर पहुंचा देगी। लेकिन, यह कोई बस नहीं है और न ही सेना के जहाज, जो विदेशों से अमीरों को लाने के लिए उड़ानें भर चुकी हैं। यहां पैदल जाना है, रास्ते में भूख को पेट दबाकर मार देना है।
चलते-चलते थक गए...टांगों में दर्द हो रहा है... जब 5-7 की बच्ची... 7-8 साल का बच्चा... अपने मां-बाप के साथ सड़कों पर यूं ही पैदल निकल पड़े हैं कि आख़िर कभी तो उस घर को पहुंचेंगे, जहां कोई अपना होगा...इस शहर की अमीरी और सरकारों की बेरहम नीतियों, झूठ से दूर कोई अपना तो होगा। 
आख़िर कौन हैं ये लोग...क्या ये सभी वही हैं, जिसके लिए देश के प्रधानमंत्री कहते हैं, ‘’इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए’’... क्या ऐसा हो रहा है... उन्हीं की पार्टी का एक मुख्यमंत्री प्रवासी मजदूरों को अपने घर जाने से सिर्फ इसलिए रोकता है कि उस राज्य के बिल्डर (अमीरों) कहते हैं कि मजदूर चले गए तो हमारा काम कौन करेगा...फिर इतनी ही चिंता है, तो मजदूरों का 45 दिनों से ख्याल क्यों नहीं रखा... बेंगलुरु में मजदूर जब कहता है, हम इन हालातों में रहने की जगह अपने घर पर मरना पसंद करेंगे...कर्नाटक के मुख्यमंत्री मजदूरों और फंसे लोगों को ले जाने वाली ट्रेन कैंसिल करने का फैसला करते हैं, तो देश के प्रधानमंत्री का ट्विटर जवाब दे जाता है...प्रवासी मजदूर अपने राज्यों/घरों को जाने के लिए गुजरात के सूरत में प्रदर्शन करते हैं, तो प्रधानमंत्री के ट्वीट से देश के इन गरीबों के लिए एक ट्वीट नहीं निकलता...एक शब्द खर्च नहीं होता।
आख़िर जवाब भी चाहिए, तो बस ट्विटर पर ही क्यों? क्या सरकार ट्विटर के भरोसे चल रही है? अगर चल ही रही है, तो फिर ऐसी तमाम ख़बरों से हुजूर नावाकिफ तो नहीं ही होंगे कि सात महीने के गर्भवती महिला लगातार 12 घंटे चले जा रही है...न पैसा है और न ही खाना...न सरकार-प्रशासन से कोई मदद। घर कब पहुंचेंगे, इसका भी कोई अंदाज़ा नहीं। लेकिन, प्रधानमंत्री का पुराना भाषण याद कीजिए...मैं चाहता हूं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही सुविधाएं देश के गरीबों को मिल रही हैं?
प्रधानमंत्री की पार्टी के सहयोग से बिहार में सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की पार्टी का उप-मुख्यमंत्री जबरन 222 मजदूरों को वापस भेज देता है, ताकि दूसरे राज्यों में श्रमिकों की कमी न हो...जब दूसरें राज्यों से मजदूरों को अपने गृह राज्य (बिहार) लाने की बात होती है, तो कभी ट्रेन की कमी, कभी बस की कमी, तो कभी पैसे की कमी का रोना रोती है सरकार...लेकिन लौट चुके लोगों को वापस भेजने वाली सरकार का मुखिया कैसा है? इस पर उप-मुख्यमंत्री अखबारों में इश्तिहार देकर ढिंढोरा पीटता है कि दूसरे राज्यों को बिहार की श्रम शक्ति का एहसास हुआ... कैसी सोच है यह? कतई ही गिरी हुई मानसिकता और उससे भी बदतर कही जाएगी। लेकिन इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
जब प्रधानमंत्री लॉकडाउन का सख्ती से पालन करने की बात कहते हैं, तो उन्हीं की पार्टी का मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) सरेआम उनकी बातों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बसों को दूसरे राज्य में भेजते हैं, ताकि फंसे हुए लोगों को अपने राज्य ला सकें...दूसरे राज्य का मुख्यमंत्री बंगले झांकता रहता है कि मुझे तो प्रधानमंत्री की बातों का पालन करना है....केंद्र सरकार के नियमों का हवाला देकर वह दूसरे राज्यों से अपने लोगों को न बुलाने को लेकर अपनी मजबूरी जाहिर कर देता है...
 अगर इन हताश प्रवासी मजदूरों की पीड़ा प्रधानमंत्री की आत्मा को नहीं झकझोर पा रही है, तो आख़िर क्या बचता है? सऊदी अरब से लोगों को लाने के लिए पांच उड़ानें...इन मजदूरों के नसीब में हाईवे पर पैदल चलने की मजबूरी है, क्योंकि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही वे सुविधाएं हैं, जो अमीरों को मिल रही है?
बाक़ी जगहों को छोड़ दीजिए देश के दिल दिल्ली में जहां, प्रधानमंत्री निवास के 10 किलोमीटर के दायरे यानी आईटीओ से मजदूरों का एक जत्था पैदल ही बिहार के भागलपुर जाने के लिए 1000 किलोमीटर से अधिक दूर के सफर पर निकल पड़ता है। लेकिन प्रधानमंत्री का ट्विटर शांत रहता है... एक शब्द या एक बार भी मुंह से नहीं निकलता कि मेरे देश के गरीबों मत जाओ...मैं तुम्हारे लिए हर वह इंतजाम करूंगा, जो इस देश के अमीरों को मिल रहा है...
कहां तो वंदे भारत मिशन के तहत एयर इंडिया की फ्लाइट से सिर्फ एक व्यक्ति को लेकर सिंगापुर के लिए उड़ान भरता है, लेकिन लाखों बेबस प्रवासी मजदूरों के लिए चलती भी है, तो क्या...वह ट्रेन जो 40 दिनों बाद चलाने का फैसला लिया गया। वह ट्रेन जिससे जाने पर किराया खुद उन मजबूरों को देना है, जिनकी नौकरी छीन गई है।
ग़रीब तो ग़रीब है, उसे अमीरों की ऐशो-आराम नहीं बस सम्मान की जिंदगी ही दे दीजिए प्रधानमंत्री जी। बस इतनी ही गुजारिश है आप से...देश में हर जगह त्राहिमाम है, कोरोना का संकट बड़ा है, लेकिन इस संकट की आड़ में अव्यवस्था, अराजकता और अनैतिकता बढ़ रही है।

डॉक्टरों के काट रहे पैसे, पैदल चलते हुए मर जा रहे लोग...तो यह किसका सम्मान है साहेब?

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भारत में कोरोना वायरस के अभी तक (4 मई दोपहर 1 बजे तक) 42 हजार 533 मामले आ चुके हैं। 1373 लोगों की मौत हुई है। यही आधिकारिक आंकड़ा है। 30 अप्रैल को कोरोना से संक्रमितों की यह संख्या 32 हजार थी। उससे पहले 20 अप्रैल को 16 हजार यानी 30 अप्रैल को देश में कोरोना मरीजों की संख्या दो गुनी हो गई। अब चार दिन भी ठीक से नहीं हुए कि 10 हजार से अधिक केस और हो गए।
रविवार को सेना ने कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में पुष्पवर्षा और फ्लाई पास्ट किया। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से अहमदाबाद तक। देश के प्रमुख शहरों के जिन अस्पतालों में कोविड-19 पीड़ितों का इलाज हो रहा है, वहां भी हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। यह फैसला किसका था। स्वाभाविक रूप से सरकार का ही होगा। इस सरकार को कोरोना वॉरियर्स के सम्मान का बहुत ख्याल है, लेकिन इस कोरोना की वजह से सुरक्षा किट और बुनियादी जरूरतों की कमी से जूझ रहे डॉक्टरों और लोगों का ज़रा भी ध्यान नहीं। एक प्रेग्नेंट महिला लेबर पेन में बच्चे की डिलिवरी के लिए कश्मीर में 100 किलोमीटर तक पैदल चलती है। इसका ख्याल नहीं है। मणिपुर में अधिकांश डॉक्टर कोरोना मरीजों का इलाज काली पट्टी बांधकर कर रहे हैं, क्योंकि सरकार ने उनकी सैलरी में भत्ते को काटने का फैसला किया है। उन्हें मरीजों के इलाज के लिए बुनियादी सुरक्षा किट और मास्क नहीं मिल रहे हैं। डॉक्टर इस वैश्विक महामारी के समय सबसे अधिक काम कर रहे हैं, लेकिन क्या सरकार के इस कदम से उनका मनोबल बढ़ा होगा।
50 साल का एक शख्स महाराष्ट्र से अपने घर उत्तर प्रदेश जाने के लिए साइकल से निकलता है। तकरीबन 390 किलोमीटर तक साइकल चलाने के बाद वह मध्यप्रदेश पहुंचता है और वहीं दम तोड़ देता है। अभी उसे घर पहुंचने के 1600 किलोमीटर और साइकल चलानी थी। सरकार ने मजदूरों के लिए अब जाकर कुछ ट्रेनें चलाने का फैसला किया है, लेकिन मूल किराया पर 50 रुपये और जोड़कर ले रही है। तो क्या 50 साल के उस व्यक्ति की मौत के बाद उसके परिवार वाले खुद को सम्मानित महसूस कर रहे होंगेमध्य प्रदेश में फंसे महाराष्ट्र के सैकड़ों मजदूरों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा और अब वे घर जाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो इन प्रदर्शनों से उनका सम्मान बढ़ा होगा? चंडीगढ़ की खबर है कि जीएमसीएच-32 में ड्यूटी दे रहे जूनियर रेजिडेंट को न तो पीपीई किट दिया जा रहा है और न ही एन-95 मास्क। अधिकारियों का कहना है कि पीपीई और एन-95 की पूरे देश में कमी चल रही है। थोड़ी परेशानी में काम करना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को जब देश में पहली बार लॉकडाउन की घोषणा की थी, तो कुल कोरोना मरीजों की संख्या सिर्फ 496 थी। तब देश को बंद करने का फैसला किया गया। अब यह संख्या 42 हजार से भी ज्यादा हो चुकी है, तो ठीक उल्टा फैसला लिया जा रहा है। साफ संकेत हैं कि शुरू से ही सरकार के पास इस महामारी से लड़ने की न तो कोई योजना थी और न ही उसे कुछ सूझ रहा था। बस बीच-बीच में हेडिंग और मीडिया मैनेजमेंट की बदौलत वाहवाही लूटने के लिए बयानबाजी और भाषणबाजी की जाती रही। कभी ताली-थाली, तो कभी दीये जलाना तो कभी सेना के विमानों से पुष्पवर्षा। पुष्पवर्षा कर डॉक्टरों का सम्मान किया गया, लेकिन उन्हें पीपीई किट नहीं दिया जा रहा है। आख़िर यह कैसा और किसका सम्मान है। कोरोना वॉरियर्स का तो बिलकुल नहीं।
मध्य प्रदेश के इंदौर-उज्जैन सीमा पर 18 के आसपास मजदूर मिक्सर मशीन से घर जाते पुलिस की चपेट में आ जाते हैं। यह तो वाकई देश के लिए सम्मान की बात है। गुजरात के सूरत से इलाहाबाद तकरीबन 1300 किलोमीटर का सफर। गोद में सालभर या उससे भी छोटा बच्चा। एक हाथ में सूटकेस। तेज धूप और लू-हवा के बीच चलती एक महिला की तस्वीर तो वाकई सम्मान करने वाली ही तस्वीर होगी। दरअसल, हम सवाल नहीं करना चाहते। सवाल करना गुनाह हो गया है। जब जिम्मेदार लोगों से सवाल नहीं किए जाएंगे, तो किससे पूछा जाएगा कि इस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या विपक्ष जिम्मेदार है? क्या मुसलमान जिम्मेदार है? (जारी...) 

कोरोना संकट, चीन का WHO और UN में वर्चस्व, अभी असली खेल बाक़ी है

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कोरोना वायरस को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जुबानी जंग जारी है। इन दोनों के बीच एक तीसरा है, जो कोरोना वायरस को सही तरीके से कंट्रोल नहीं करने को लेकर सिर्फ अमेरिकी ही नहीं, बल्कि कई देशों के निशाने पर है। बहरहाल, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ को कठघरे में खड़ा किया है। ट्रंप ने इस पर चीन के लिए किसी पीआर एजेंसी की तरह काम करने का आरोप लगाया है। ट्रंप ने साफ कहा, 'मुझे लगता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को शर्म आनी चाहिए, क्योंकि वह चीन के लिए एक पीआर एजेंसी की तरह है।'
ट्रंप अपने बेतुके बयानों या फिर अजीबोगरीब दावों के लेकर भले विवादों में रहे हों, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर वह पूरी तरह न सही, तो काफी हद तक सही हैं। अब देखिए न कि कैसे चीन न सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन को अपने हितों के लिए हाईजैक कर रहा है। आख़िर किस तरह चीन इन संगठनों में अपने पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों को ऊंचे और प्रभावी पदों पर बिठाकर काम कर रहा है? चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र और इससे जुड़े संगठनों में लगभग हर बड़े और अहम ओहदों से अपने हितों को साधने वाले फैसले करा रहा है।
आप मौजूदा कोरोना संकट में भले इन वैश्विक संगठनों को लेकर ट्रंप की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन चीन अपनी नीतियों में लगातार सफल होता जा रहा है। ज़रा सोचिए जिस चीन से कोरोना वायरस शुरू हुआ, वहां और अमेरिका में क्या हालात हैं। अमेरिका में अभी तक 11 लाख से ज्यादा केस आ चुके हैं, जबकि 65 हजार के पास लोगों की मौत हो चुकी है। चीन में लगभघ 83 हजार मामले और मौतें 4633 हुई हैं। इससे पहले अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध यानी ट्रेड वॉर चरम पर था, लेकिन एक झटके में कोरोना वायरस ने अमेरिकी महाशक्ति के अस्तित्व को ही हिला कर रख दिया।
अब आइए देखते हैं कि चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र के जरिए कैसे अपनी विस्तारवादी और आधुनिक औपनिवेशिक शक्तियों का प्रसार कर रहा है। जो लोग संयुक्त राष्ट्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को करीब से देख रहे हैं, उनके लिए डब्ल्यूएचओ का चीन के प्रति रवैया कोई आश्चर्य नहीं है। चीन ने पिछले कई वर्षों में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कई संगठनों के प्रमुख के रूप में अपने नागरिकों को नियुक्त किया या करवाया है। चीन के उप कृषि मंत्री 2019 के बाद से संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि एजेंसी (UN Food and Agriculture) का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके बाद चीन के डाक और दूरसंचार मंत्रालय में अपना करियर शुरू करने वाले झाओ हौलिन को संचार नेटवर्क के लिए तकनीकी मानकों को स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण संगठन इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया। झाओ ने ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए 5जी के इक्विपमेंट को दुनिया भर में पहुंचाने के लिए हुवावे की मदद की।
पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने चीन के पूर्व विदेश उप मंत्री लियू झेनमिन को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग में अहम पद पर नियुक्त किया। यहां तक ​​कि यूएन की एजेंसी अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन जो वैश्विक हवाई यात्रा को नियंत्रित करती है, इसके प्रमुख के भी तौर पर चीनी नागरिक फेंग लियू को बनाया गया है। लियू पर कोरोना वायरस मामले को लेकर ताइवान को लूप से बाहर रखने का आरोप लगाया गया है।
यूएन जैसे वैश्विक संगठनों में चीनी नागरिकों का प्रभुत्व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ताकत और वर्चस्व को बतलाता है। हालांकि, यह भी एक हक़ीकत है कि पिछले कुछ वर्षों में खासकर ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की ओर यूएन हो या डब्ल्यूएचओ काफी हद तक निष्क्रियता दिखी, जिसका बखूबी फायदा चीन ने उठाया। जैसा कि चीन ने अपने हितों के यूएन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को रीटूल करने की कोशिश की। चीन में अमेरिका में सशक्त नेतृत्व की कमी का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है और वह इसमें सफल भी रहा है। अगर इसी संदर्भ में देखें, तो ट्रंप सरकार की ओर से डब्लूएचओ की फंडिंग रोकने और उसके बाद चीन की ओर से उसके फंड में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाने का फैसला, इसी का एक प्रमाण है। यानी अमेरिका का कमजोर नेतृत्व चीन के लिए वरदान साबित हुआ।

हिंदुस्तान किससे लड़ रहा है? कोरोना या फिर मुसलमानों से...

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कोरोना धर्म देखकर नहीं होता। लेकिन धर्म देखकर आरोप लगाया जा रहा है कि किसी धर्म की वजह से कोरोना फैल रहा है। ख़ैर 'कोरोना धर्म देखकर नहीं होता इसलिए सबको एकजुट रहकर कोरोना से लड़ाई लड़नी है।' यह बिलकुल हालिया बयान है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की। जबकि दिल्ली में ही धर्म देखकर कोरोना फैलाने के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार बताने की कई घटनाएं हुई हैं। मैं जहां रहता हूं, वहां का आंखों देखा हाल है। एक बीट कॉन्स्टेबल को कुछ लोग कहते हैं कि सब्जी बेचने वाले मुसलमानों को इस मोहल्ले में आने से रोकें। वह कॉन्स्टेबल मना कर देता है और कहता है कि मैं किसी को मुसलमान-हिंदू देखकर नहीं रोकूंगा। हालांकि, वह इससे रोकता भी नहीं है और कहता है कि अगर आपको हिंदू-मुसलमान देखकर रोकना है, तो रोको।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह चुके हैं कि कोरोना से इस जंग को हमें मिलकर लड़ना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, कोरोना वायरस नस्ल, धर्म या पंथ के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। इसलिए इसके खिलाफ हमारी लड़ाई में एकता और भाईचारे को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हम सभी इस लड़ाई में एकजुट हैं। हालांकि, उनकी यह प्रतिक्रिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के मानवाधिकार संगठन द्वारा कोरोना वायरस के संदर्भ में मुसलमानों को निशाना बनाए जाने और देश में चलाए जा रहे इस्लामोफोबिक कैंपेन की निंदा करने के घंटों बाद आई। दरअसल, भारत में मुसलमान कोरोना वायरस संकट का खामियाजा भुगत रहे हैं। क्योंकि हर बात पर हर दिन यहां न्यूज चैनलों से लेकर सोशल मीडिया और लोगों के पर्सनल वॉट्सऐप ग्रुप में देश में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को लेकर मुसलमानों को हो दोषी ठहराया जा रहा है। यह दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के बाद 100 फीसदी पढ़ गया है। एक पार्टी विशेष के नेता और पार्टी से जुड़े संगठन कोरोना आतंकवादतक जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं। दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश यानी भारत में इस कोरोना वायरस संकट के बीच अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा, व्यापारिक बहिष्कार और नफरत फैलाने वाले बयानों में तेजी से वृद्धि आई है।
भारत में कोरोना वायरस के अभी तक 26 हजार 496 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। 824 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर तबलीगी जमात के कोरोना मामलों को देखें, तो भारत में हर पांच से एक केस का ताल्लुक इसी से है। फिर बाकी चार का किससे है? मार्च में तीन दिनों धार्मिक जलसे में तकरीबन 8 हजार लोग इकट्ठा हुए थे। उसके पहले इस देश में कोरोना वायरस अपना रंग दिखाने लगा था। लेकिन मार्च की इस घटना के बाद देश में क्या चल रहा है? कोरोना का इस्लामीकरण। बड़ी सभाओं या देश में लॉकडाउन से पहले तबलीगी जमात ने दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में बड़ी धार्मिक सभा का आयोजन किया था। जमात के प्रवक्ता मुजीब-उर-रहमान का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च को 21 दिनों का लॉकडाउन लागू किए जाने के बाद वहां फंसे लोगों को रहने की जगह मुहैया कराई गई।
फिर छापे मारी हुई। कई विदेशी भी वहां से निकले। संक्रमण का खतरा बढ़ता चला गया। लोगों ने खुद को छिपाना भी शुरू कर दिया। देश में एक तरफ जहां कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों पर हमला हो रहा है। इलाज करने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को उनके पड़ोसी ही उनके खुद के घरों में रहने पर हंगामा मचा रहे हैं। एक डॉक्टर की मौत पर तो लोगों ने उनके दफनाने को लेकर बवाल मचा दिया। जब इस तरह का सोशल स्टिग्मा चल रहा हो, तो भला कौन खुद की पहचान जाहिर करेगा। हालांकि, जरूरत इस बात की है कि इसे लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाए, लेकिन जागरूकता अभियान की जगह मुसलमानों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है।
मुसलमानों को निशाना बनाकर झूठी खबरें/फेक न्यूज़ फैलाना शुरू कर दिया गया। कथित रूप से अधिकारियों पर उनके थूकने की खबरें फैलाई गई। बाद में यह झूठ साबित हुआ। सरकार की तरफ से भी कैसे इस बहस को आगे बढ़ाया गया, उसकी मिसाल भी देख लीजिए। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस धार्मिक कार्यक्रम का नाम लिया। ब्रिटिश अखबार की वेबसाइट मेल ऑनलाइन के मुताबिक, उन्होंने 5 अप्रैल को कहा कि वायरस के मामलों की संख्या के 4.1 दिनों में दोगुनी हो रही थी। यह रफ्तार 7.4 दिनों की होती, 'अगर तबलीगी जमात की वजह से कोरोना के अतिरिक्त मामले सामने नहीं आते।
उसी दिन दिलशाद मोहम्मद ने अपनी जान ले ली। हिमाचल प्रदेश के रहने वाले दिलशाद ने जमात के दो लोगों को अपनी बाइक पर लिफ्ट दी थी। और जमात को लेकर पूरे देश में दहशत और कलंक का माहौल इतना फैला दिया गया कि इससे उसने अपनी जान ले ली। वहां के एसपी ने भी इस आत्महत्या के मामले को स्टिग्मा यानी कोरोना को लेकर सामाजिक कलंक को जिम्मेदार ठहराया।
राजस्थान में एक गर्भवती मुस्लिम महिला को उसके धर्म के कारण सरकार अस्पताल में भर्ती करने से मना कर दिया गया। इसकी वजह से महिला के पेट में पल रहे सात महीने के बच्चे की मौत हो गई।
उत्तराखंड में कुछ हिंदू युवाओं ने फल बेचने वाले मुसलमान शख्स को सामान बेचने से रोक दिया। हालिया मामला यह है कि झारखंड के जमशेदपुर के कदमा में एक फल की दुकान पर लिखा था, विश्व हिंदू परिषद द्वारा अनुमोदित दुकान। मुसलमानों की दुकानों का बहिष्कार और इस तरह की दुकानों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दिल्ली से सटे गुड़गांव के एक मस्जिद में गोलीबारी की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल को 15 मिनट के लिए अपनी स्वेच्छा से लोगों को घरों की लाइट बंद करने की अपील की। यह पूरी तरह से स्वैच्छिक था, लेकिन हरियाणा में एक मुसलमान परिवार ने लाइट बंद नहीं की, तो उसके पड़ोसियों ने हमला बोल दिया। यह तो चंद उदाहरण हैं।
इससे पहले डॉक्टर कोरोना को लेकर पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि कोरोना महामारी से अधिक इसे लेकर सोशल स्टिग्मा अधिक लोगों की जान ले सकता है। यहां पहले से ही मुसलमानों के खिलाफ रोज नई बहस खड़ा करने की कोशिश की जाती है और ऐसे में जब कोरोना वायरस ने भारत में दस्तक दी, तो मुस्लिम पहले ही बैकफुट पर नजर आए।