थ्री इडियट्स

३ इडियट्स दिल को छू जाने वाली लगी। जब भी इस फिल्म के कैरेक्टर रोते हैं तो हमें रोना आता है, उनके हंसने पर हंसी। काफी समय बाद एक ऐसी फिल्म बनी है, जो सही मायनों में फिल्म की कसौटी पर खरा उतरती है, जिसे बारबार देखने को जी चाहता है। देखने को जी इसलिए चाहता है कि इस फिल्म की कहानी में एक पैशन है, ज़िंदगी जीने का नज़रिया है। आमिर ख़ान की फिल्मों से हमें हमेशा उम्मीद रहती है कि उनकी फिल्म दर्शकों और तमाम लोगों को एक लीक से हटकर फिल्म देगी। लेकिन इस पर आमिर उससे भी कहीं आगे निकल गए। उम्मीद से दोगुना मिला इस बार। यह एक ऐसी फिल्म जिसने आज के पच्चानवे फ़ीसदी युवाओं के दिल की व्यथा बता दी। आज हम में अधिकतर वही करते हैं जो हमारा दिल नहीं करता है। कभी मम्मी-पापा की उम्मीदों का बोझ उठाते हैं, तो कभी परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारियों को निभाने की मजबूरी। सबसे बड़ी बात की पड़ोस वाले शर्मा जी क्या कहेंगे। यदि हम में कोई साहस का फ़ैसला लेता भी है तो सफल हो जाने पर बधाई और कुछ नहीं हो पाया तो ज़िंदगी भर ताने सुनने को मिलते हैं। यही है ज़िंदगी की सही तस्वीर। हमारे मां बाप, दादा-दादी जो सदियों से करते आ रहे हैं हम भी वही कर रहे हैं। ज्ञान तो हमें मिल रहा है पर हममें कोई
वाकई काबिल नहीं बन पा रहा है। फिल्म को देखते समय कई बार हम मन मसोस कर रह जाते हैं। हम में हरकोई यह चाहता है कि दुनिया उसकी मुट्ठी में रहे, वह ज़िंदगी की तमाम ख़ुशियां हासिल करे, उसका जो जी चाहे वहीं करे...लेकिन वह कर नहीं पाता है...इस बात को बड़े ही निराले अंदाज़ में आमिर ही कर सकते थे, कि तकरीबन तीन घंटे की लंबी फिल्म बनने के बावजूद यह फिल्म दर्शकों को बोर नहीं करती है। नहीं तो आज कई ऐसे फिल्म हैं जो बनती है डेढ़ या दो घंटे की दर्शक एक घंटे में ही सिनेमा हॉल से पैसे गंवा कर वापस भाग आते हैं। हालांकि इस फिल्म में भी एक दो जगह थोड़ा बोझिल एहसास होता है, जिसे आमिर की काबिलियत के मने पकड़ पाना बेहद ही मुश्किल है। मोना की डिलिवरी के वक़्त का समय और आख़िर में जब फरहान और राजू साइलेंसर के साथ आमिर से मिलने लद्दाख पहुंचते हैं, करीना को भगाकर वे ले जाते हैं, वहां तक तो ठीक है लेकिन आमिर को वांगरू के रूप में आना एक्सपेक्टेड था और थोड़ा अति कर गया। लेकिन इसे भी आप इनजॉय कर सकते हैं। यही आमिर की ख़ूबी है। फिर भी आख़िर में यही कहूंगा यह फिल्म आपकी ज़िंदगी का ऑल इज़ वेल है।

तनहा दिल मेरा

पुराने साल को अलविदा,
नए को सलाम करता है हर दिल...
पर कुछ ऐसे भी हैं,
जिनकी कई यादें जुड़ी हैं,
पुराने साल से...
उसकी राहें, गलियां नए साल में भी
वही पुरानी यादें दिलाएंगी....
दिल कसमसा कर रह जाएगा
एकबार फिर...
फिर किसी की पहलू की तलाश में
खो जाएगा मेरा मन...
किसी अजनबी को पना बनाने की जद्दोजहद में
ग़ुम हो जाएगा ये तन्हा दिल...
दिन के उजाले में जब ये दिल
तनहा महसूस करता है...
रात के अंधेरों की तो बात करना भी बेमानी।

चाहत

चलो एक बार फिर जी लें हम साथ-साथ,

न कोई आशा न उम्मीद हो दफ़न दिल में

कभी खुश तो कभी ग़मी में जीना अब छोड़ दें।

चलो चाहत की इस दुनिया को

एक बार फिर से गुलज़ार किया जाए।

किसी मोहब्बत एक बार फिर किया जाए।

याद तो आती है गुज़रे पलों की

लेकिन ये पल भी अब हमारा नहीं रहा।

किसी की नज़रों ने इसे भी बेग़ाना बना दिया है।

चलो एक बार फिर सभी

चाहत की दुनिया में जी कर देख लें

यादें शेष रह जाती हैं

जब तन्हा होता हूं तो तुम्हारी याद आती है,
जब भीड़ में होता हूं, फिर भी तुम्हारी याद आती है,
क्या करूं तुम्हारे बग़ैर सिर्फ़ तुम्हारी ही याद आती है।

कोहरे की धुंध में कहीं खो गई वो यादें,
जो मुझे कभी परेशान किया करती थी,
यादें आती हैं, यादें जाती भी हैं,
पर ये भी सच है कि कुछ यादें,
दिलों में एक ज़ख्म छोड़ जाती हैं।
महसूस करता हूं तुम्हें हर पल
लम्हा दर लम्हा, ज़ख्म दर ज़ख्म,
एक टीस उठती है, ज़ुबां फिर ख़ामोश हो जाती है।
पर अब किया है फ़ैसला हमने,
छोड़ देंगे उन गलियों को, भूल जाएंगे हरेक लम्हे को
मुंह मोड़ लेंगे हर उस महफिल से,
जिससे जुड़ी हुई है तुम्हारी यादें।
कोई वजह नहीं, कोई कसक नहीं
वस यूं ही तय की है ज़िंदगी अपनी.

प्रधानमंत्री अमेरिका चले गए, कौन लेगा सुध!

संसद का सत्र चल रहा है। इसके पहले दिन गन्ना किसानों ने अपनी मांगों कों लेकर संसद और जंतर मंतर पर डेरा डाला। फिर भी पीएम अमेरिका गए। महंगाई आसमान पर है, दिन में ही तारे नज़र आने लगे हैं, सब्जि और आटा सहित कई ज़रूरी सामानों को ख़रीदते-ख़रीदते। इधर मधु कोड़ा ख़रबों की संपत्ति चपत करने के बाद भी पकड़ में नहीं आ रहा है। उधर अमेरिका चीन के सामने घुटने टेक कर भारत को लॉलीपॉप थमा रहा है। कोड़ा कांग्रेस की मदद से ही मुख्यमंत्री बना। राजनीति में आने से पहले कोड़ा कोयला खादान में काम करता था। हालांकि उसे राजनीति में बीजेपी लेकर आई, लेकिन सीएम बनाया कांग्रेस ने। अंदरूनी समस्याएं सुलझ ही नहीं रही हैं और पीएम चले गए अमेरिका से संबंध बनाने। शायद उन्हें नहीं मालूम जब तक हम अपने नाव की छेद को बंद नहीं करते तब तक नाव के डूबने का ख़तरा बरकरार ही रहने वाला है। ख़ैर इन सब बातों को छोड़ दीजिए, बातें हैं सब बातों का क्या? लेकिन ज़रा फ़ुर्सत मिले तो ठहर कर इन पर ग़ौर करने की जहमत ज़रूर उठाइए, तो आपको ख़ुद के कुछ सवालों को जवाब ज़रूर मिल जाएगा। लेकिन मेरा एक सवाल यह भी है कि पीएम अमेरिका चले गए।
ज़रा एक और बात पर नज़रे इनायत कीजिएगा। सबसे पहले अमेरिका में हुए नाइन इलेवन के हमले को याद कीजिए और उसके ठीक साल भर बाद मनाए जाने वाली बरसी को भी। अमेरिकी राष्ट्रपति उस हमले के बरसी के दिन कहां थे, क्या वो भारत, जापान, चीन या इज़रायल के दौरे पर थे। जी नहीं, वो किसी विदेशी दौरे पर नहीं थे। अमेरिकी राष्ट्रपति हमले में मारे गए लोगों को अपनी श्रद्धांजलि दे रहे थे, ठीक किसी आम अमेरिकी की तरह। उनसे यही अपेक्षा भी की जा रही थी। यही अमेरिकी राष्ट्रपति की संवेदनशीलता है या कहें कि अपने मुल्क के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी। लेकिन क्या आप यही आपने मुल्क यानी भारत के आंग्रेज़ी दां प्रधानमंत्री से यही उम्मीद कर सकते हैं, यदि हां तो यहीं आपकी उम्मीदों का चिराग हवा की झोंकों से बूझ जाएगा। मुमकिन हो हम या आप कुछ बहाना तलाश लें कि पीएम का अपना प्रोटोकॉल होता है, वो जो कर रहे हैं, देश की तरक्की और नीतियों के हिसाब ही कर रहे हैं। यदि हम यही सोचते हैं हम हमारी सोच को दोष नहीं दे सकते। हमारी सोच भी अंग्रेज़ियत के चश्मे में मिल गई है। लेकिन मैं परेशान हूं, हताश हूं और निराश भी। मैं संतुष्ट नहीं हूं। एक बेचैनी है। तड़प है। विपक्षी पार्टी बीजेपी हिंदुओं का ठेकेदार बन चुकी है तो तथाकथित समाजवादी पूंजीपतियों के इशारे के बग़ैर सर भी नहीं हिला सकते। आम आदमी अब आम नहीं रहा, तबाह हो गया। दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने वाले हैं, इसी दौरान शीला दीक्षित को दिल्ली को शंघाई और पेरिस बनाने की सूझी। दिल्ली की ग़रीबी दूर करने की सूझी। ग़रीबी ख़त्म हो या न हो, पर ग़रीबों को ख़त्म करने का उन्होंने पूरा बंदोबस्त कर लिया है। बस किराया दोगुना हो चुका है, लोगों को दाल और आटा मिल नहीं रहा है, इसलिए सरकार ख़ुद इन्हें बेचने सड़कों पर उतर आई है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ, इसी नारे से चुनाव जीता कांग्रेस ने, पर वो हाथ भी अब शायद मैली हो गई। उससे इतनी बदबू आने लगी है कि आम आदमी का दम ही घुटने लगा है। फिर भी प्रधानमंत्री अमेरिका चले गए। हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री लोगों को उसके हाल पर छोड़ कर अमेरिका चले गए इसका ग़म नहीं है ग़म तो इस बात का है कि छब्बीस इलेवन के शहीदों की बरसी तक वो क्या नहीं क सकते थे, शायद नहीं तभी तो चले गए। बेहद ज़रूरी था। या सब नज़रों का धोखा।

अजब खेल के गज़ब खिलाड़ी

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के दो मज़बूत और शक्तिशाली स्तंभ। एक दूसरे के चीर प्रतिद्वंद्वी. जहां क्रिकेट का मैदान भी युद्ध का मैदान नज़र आता है. एक टी-20 का पूर्व तो दूसरा मौजूदा चैंपियन, लेकिन आजकल दोनों की हालत खस्ता है. पहले का खिलाड़ी पैसे और ग्लैमर की चकाचौंध में खो गया है तो दूसरा अपने अंदरूनी कलह की वजह से ही परेशान है. अब आपके लिए अंदाज़ा लगाना आसान हो गया होगा कि हम किसकी बात करे रहे हैं? यह कहानी है दुनिया के उन दो देशों की जो क्रिकेट के लोकप्रिय गढ़ माने जाते हैं. हम बात कर रहे हैं भारत और पाकिस्तानी क्रिकेट में आए भूचाल की. इसे भूचाल ही कहना ज़्यादा बेहतर होगा क्योंकि भारतीय खिलाड़ी हैदराबाद में हार के बाद भी जश्न मनाते नज़र आते है तो पाकिस्तानी कप्तान को यह कहना पड़ता है कि उसके हाथों में टीम की कमान तो है, लेकिन खिलाड़ियों पर उनका कोई काबू नहीं है. यही वजह है कि पाकिस्तानी कप्तान थकान का बहाना बनाकर कप्तानी के पद से अपना इस्ती़फा देते हैं. यह उस खिलाड़ी की दास्तां है जिसे संन्यास की घोषणा के बदले टीम की बागडोर मिली थी. शायद यह पाकिस्तान की नियति ही है, जो देश अपने वजूद में आने के समय से ही उथल पुथल में जी रहा है, वहां क्रिकेट जैसे खेलों में इस तरह की बातें बेहद ही आम है. यह हैरान करता है कि जो टीम तेज़ गेंदबाजों का गढ़ माना जाता है, उनके गेंदबाज़ न तो कोई करतब दिखाते नज़र आ रहे हैं और न ही टीम को जीत दिला पा रहे हैं. वहीं भारत की बात करें तो बल्लेबाज़ी के दम पर विरोधियो को पस्त करने वाली टीम के धाकड़ खिलाड़ियों को चंद रन बनाने में ही पसीने छूट रहे हैं. मानों ये सभी क्रिकेट नहीं अजब खेल के गज़ब खिलाड़ी हैं. भारत और पाकिस्तान की समस्याएं एक हैं, लेकिन उनके पहलू और कसूरवार अलग-अलग. पाकिस्तानी क्रिकेट जहां अपने प्रशासकों और खिलाड़ियों के ग़ैर ज़िम्मेदार रवैये से पतन की गर्त में जा रहा है तो भारतीय क्रिकेटर पैसे और ग्लैमर की चकाचौंध में खोते जा रहे हैं. दोनों ही टीमों ने अपने आख़िरी सीरीज़ में हार का स्वाद चखा है. दोनों टीमों ने अपने आखिरी सीरीज़ में हार का स्वाद चखा है और आगे भी डगर आसान नहीं है. यदि सबकुछ ऐेेसे ही चलता रहा तो दोनों देशों में क्रिकेट के लिए कयामत आने से भी इनकार नहीं किया जा सकता. विश्वकप के तारीखों का बिगुल बच चुका है और इनकी तैयारियां क्या गुल खिला रही हैं, ये भी सभी के सामने है. पिछले विश्वकप में दोनों का प्रदर्शन बेहद ही निराशा जनक रहा था फिर भी ये दोनों टीमें अपने इतिहास से सबक लेते नज़र नहीं आ रहे हैं, ऐसे में तो यही कहा जा सकता है कि यदि एकबार फिर पिछले विश्वकप की तरह ख़ुद को दोहराए तो कतई आश्चर्य नहीं.

निराशा, हताशा या उदासी

मीडिया में ख़बरें आती-जाती रहती हैं। इसका काम भी है, दिखना और उसका नतीजा क्या निकलता है इसकी परवाह कोई नहीं करता। हां, यदि कोई असर पड़ता हैतो उसका क्रेडिट लेना कभी नहीं भूलते। ये हमारी दिखाई गई रिपोर्ट का ही असर है, फलाने चैनल का इंपैक्ट, ...इतना ही नहीं ख़बरे नीचे एक्सक्लूसिव बैंड में दिखती हैं, पर दिख हर चैनल पर रहा होता है। व्यक्तिगत ज़िंदगी में बड़ी बड़ी और उसूल एवं आदर्शों की बातें करने वाले टीवी पर आते आते कि तरह की ख़बरे दिखाने लगते हैं यह हर कोई जानता है । अक्सर सुनने को मिलता है मालिक के हाथों पत्रकार मजबूर हैं, लेकिन कल के पत्रकार जो उस जगह पर पहुंच गए हैं, जहां उनके बूते कुछ भी करना आसान होता है, वह भी इसी दलदल का हिस्सा बन गए हैं। कल के दिग्गज और सफल पत्रकार आज एक सफल व्यवसायी बन गए हैं।
प्रभाष जी चले गए और उनके साथ चला गया पत्रकार धर्म का एक अहम और बड़ हिस्सा। अब चंद लोग उनके खाली जगह को हथियाने और क़ब्ज़ा करने में लगे हैं। कोई हैरत नहीं वो कामयाब भी हो जाएंगे। लेकिन उनकी यह कामयाबी पत्रकारिता के लिए बड़ी नाकामयाबी साबित होगी। अभी ख़ुद मीडियाकर्मी चापलूसों और कामचोरों से घिरे हैं। उन्होंने अपने आसपास समर्थकों का एक ऐसा चक्रव्यूह बना लिया है कि जिसे भेदना आज के किसी भी अर्जुन के बूते की बात नहीं रह गई है। मैं यह नहीं कहता कि सब जगह निराशा, हताशा या उदासी घर कर गई है, और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। बेहतर भविष्य के लिए ज़रूरत है, हम ख़ुद को बेहतर बनाए। दूरों के दुख का उल्लास मनाने के बयाज ख़ुद के सुख पर हर्षित और उल्लासित हों.

वो ख़ुद ख़राब है

सबसे पहले शुरू करता हूं बद्र साहब की चंद पंक्तियों से,
नाहक ख्याल करते हो दुनिया की बातों का,
जो तुम्हें ख़राब कहे, वो ख़ुद ख़राब है।
और मैं भी मानता हूं कि.
यह सोचते सोचते अब आदत सी हो गई है,
कि हर कोई कहता है ख़राब मुझे,
कल उसका एसएमएस आया था,
वो भी कह रही थी ख़राब मुझे।
जमाना चिट्ठी पत्री और तार से होते-होते
अब एसएमएस तक आ गया,
शायद इसीलिए ख़राब बनने का दौर भी
लोगों को है भा गया।
कल वायदा किया था मैंने उसे,
अबकी तुमसे मिलूंगा ज़रूर,
पर मेरा ये वायदा भी,
रहा हर वायदे की तरह।

अब उनसे कहां होती है मुलाक़ातें
न बातें, न वो जज्बात, न कोई ख्याल,
सब अधूरी छूट गई, उस मोड़ पर
जब आख़िरी बार देखा था उसे
दांतों में उंगली दबाए मुस्कुराते हुए,
न जाने कहां गई वो बातें, मुलाक़तें।

वक़्त बीतता गया, हम ठहर से गए
वो जमाने क साथ बढ़ती गई,
हम इंतज़ार करते रहे, सोचते रहे...

पार्टी चालीसा की

आजकल सभी राजनीतिक दल किसी न किसी वजह से परेशान नज़र आ रहे है। आइए देखते हैं, कि किस तरह की उनकी समस्या है और कोशिश यह भी का निदान क्या है,.............सभी राजनीतिक दलों को सबसे पहले मेरा नमन,
१ बीजेपी हुई बहरी, इसे बचाओ,
२ सपा (समाजवादी पार्टी) इसे मत सताओ
३ बसपा को पूरे देश में बसाइए, तभी कल्याण है।
४ तृणमूल कांग्रेस- तृण यानी घास यानी जड़ से जोड़े रखो,
५ जेडीयू- जल्द जनता से जुड़िए, बिहार उपचुनाव के नतीजों के बाद
६ राजद- लालू जी जनता की सेवा करते करते राजा बन गए अब राजशाही छोड़िए,
७ लोकजनशक्ति- नाम लोकजनशक्ति लेकिन नहीं इसके पास कोई शक्ति, अब करते रहिए पासवान जी भक्ति
८ वाम मोर्चा- अब वक़्त आ गया है मोर्चा लेने का,
९ मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) - मन से लग जाइए एक नए महाराष्ट्र के निर्माण में।
१० एनसीपी- कांग्रेस की पिछलग्गू
११ शिवसेना- ये वाक़ई शिव सैनिक हैं, ज़रा सावधान रहिएगा, मनसे के बाद इन्ही की बारी है।
१३ कांग्रेस- आजकल इनकी कारगुजारियों के तले ही तो दबी है, भारतीय जनता। कांग्रस की जय हो

पीएम की संवेदनशील चिट्ठी

माफ़ी से किसी का पेट नहीं भरता है. यह हम भी जानते हैं और आप भी. यह बात हमारे प्रधानमंत्री जी भी जानते हैं. हमारी वजह से हत्या होती है तो हम जेल में होते हैं, भले ही ग़ैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज़ हो. जिसमें फ़ांसी की सज़ा नहीं सुनाई जाती है. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री जी ने किया तो वह भी माफ़ है, लेकिन उन्हें कौन बताए कि माफ़ी से किसी मजलूम के परिवार का पेट नहीं भरने वाला. प्रधानमंत्री जी के सुरक्षा में जितने लोग लगे रहते हैं उतने में न जाने कितने भारतीयों के दो वक़्त की रोटी का तज़ाम हो जाए. इस बात को वह भी जानते हैं और ख़ूब समझते भी हैं. लेकिन फिर भी मजबूर हैं, किसके हाथों. कोई मजबूरी नहीं, ये मजबूरी है भारतीय जनता की. उसके रहनुमा उन्हें कुचलते हुए चलते हैं, फिर भी कोई हर्ज नहीं. कहते हैं, लोकतंत्र में जनता अहम होता है, नेता नहीं. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने साबित किया कि जनता नहीं नेता ही ख़ास होता है. आम आदमी तो हमेशा से ही आम रहा है, वह रहेगा भी. प्रधानमंत्री जी के क़ाफिले की सुरक्षा की वजह से एक शख्स की जान चली गई. प्रधानमंत्री जी ने अंग्रेज़ी भाषा में एक चिट्ठी लिखकर माफ़ी मांग ली और उनका अपराध हो गया माफ़. क्या यह अंग्रेज़ी में लिखी माफ़ी का असर है या प्रधानमंत्री होने का अभयदान. या दोनों. ये अजीब इत्तेफाक है, हमारे प्रधानमंत्री जी हिंदी नहीं समझते इसलिए उन्होंने चिट्ठी अंग्रज़ी में लिखी और जिसकी मौत हुई उसका परिवार अंग्रेजी नहीं समझ सकता इसलिए वह हिंदी के अलावा कुछ भी नहीं समझ सकता और वह प्रधानमंत्री जी ने क्या माफ़ी मांगी है वह भी नहीं समझ सका. इस तरह पीएम साहब की माफ़ी एक तरह से वहीं माफ़ी का मक़सद पता चल गया. उनकी संवेदनशीलता का भी अंदाज़ा लग गया. बस चंद लोगों ने बताया कि पीएम साहब ने आपके पति की मौत पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है और माफ़ी मांगी है. और माफ़ी चिट्ठी लेकर गए कलेक्टर साहब ने चिट्ठी पर साइन भी करवा लिए, आप कह सकते हैं जबरन. पर उस महिला का सवाल शेष ही रहा माफ़ी से किसी पेट नहीं भरता. यहां एक बात और अहम है कि पीएम साहब ने अपना अफ़सोस तो ज़ाहिर कर दिया और सुरक्षा अधिकारियों को और संवेदनशील होने की बात भी कह दी, लेकिन उनकी इस सलाह की ऐसी तैसी तो कलेक्टर साहब ने वहीं कर दी, जो उनकी चिट्ठी लेकर उस मरहूम परिवास के पास गए थे. उस वक़्त शोक संतप्त परिवार, जिसका पति मरा था, वह बेचारी रो रही थी और कलेक्टर साहब उससे साइन करवा रहे थे कि ये सुनिश्चित हो जाए कि पीएम साहब की चिट्ठी सही हाथों में पहुंच चुकी है, ताकि कल को यदि कोई कहे कि उन्हें कोई माफ़ीनामा नहीं मिला तो उनके पास साइन के बाद सबूत के तौर पर पावती तो हो दिखाने के लिए. जिसे दिखाकर वह कह सकते हैं कि वह सच बोल रहे हैं और चिट्ठी सही हाथों में सुपुर्द किया. यह कोई लाखों या करोड़ों का मुआवजा थोड़े ही जिसे डकारा जा सकता है।
बशीर बद्र ने बिल्कुल सही कहा है,
वो नहीं मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया
उसे याद करे न दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया।
यही बात उस परिवार को भी याद रखनी चाहिए, क्योंकि पीएम साहब से उम्मीद बस उतनी ही है जितना बिल्ली के गले में घंटी बांधना। जिसकी कोई हिमाकत नहीं कर सकता। क्योंकि वह पीएम हैं। वह कह रहे हैं कि माफ़ी दीजिए तो समझ लीजिए मिल भी गई। वह कह रहे हैं, वह संवेदनशील हैं तो वाक़ई वह हैं.

मर्दों की मानसिकता

यह जमाना है, अधुनिकीकरण का। 21वीं सदी का और इस सदी में भारत भी काफ़ी तरक्की कर रहा है। आधुनिकता के लबादे में भारतीय समाज ख़ुद को पाकर फूले नहीं समा रही है। अक्सर हमें सुनने को मिलता है, अशिक्षा ही अधिकतर समस्याओं की जड़ होती है। बलात्कार जैसी घटनाएं कुंठा की भावना की वजह से होती हैं। यह कुंठा की भावना अशिक्षित लोगों में अधिक होती है. यदि इन कुंठित लोगों का शारीरिक और मानसिक विकास ढंग से हो तो यह कुंठा की भावना उनके के लिए व्यक्तित्व विकास में सहायक होता है। इसी तरह की बातें हमें सिखाई जाती हैं। लेकिन, मुनिरका में जो कुछ हुआ मामला ठीक इसके विपरीत था। यहां कुकृत्य एक आला दर्जे के शिक्षित इंसान ने किया। आईआईटी में शोध करने वाला छात्र ने। हालांकि यह का मामला अब शांत हो चुका है। मीडिया ने भी इसे कुछ अधिक तवज्जो नहीं दिया। मीडिया भी मर्दों की मुट्ठी में है। अखबारों की बात करें तो वहां भी चंद पैराग्राफ के अलावा कुछ भी देखने को नहीं मिला। मुनिरका का मामला किस बात की ओर इशारा करती है, थोड़ी बहुत झलक हमें एनडीटीवी पर देखने को मिली थी। रवीश न्यूज़ टेन में ख़ुद की एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार करके ला थे। दरअसल, ख़ुद रवीश ने मुनिरका में काफ़ी अरसा बीताया है, सो उन्हें इसी बहाने मुनिरका की याद आ गई होगी। कुछ भी हो मणिपुरी छात्रा के साथ हुए हादसे को बड़े ही मार्मिक अंदाज़ में उठाया। मणिपुर या पूर्वोतर के लोग क्यों भारत से नहीं जुड़ पाते इसकी वजह भी इसी वाकये से सामने आती है। दरअसल, आज जब हम महिला सशक्तिकरणकी बात करते हैं तो लगता है ख़ुद के साथ छलावे के अलावा कुछ भी नहीं लगता। महज़ चंद अधिकार और आज़ादी देकर हम समझने लगे हैं कि महिलाओं के लिए बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, लेकिन यह हमारी सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। एकबार फिर इसे साबित किया मुनिरका में हुए इस कलंकी वारदात ने। जिसने हमारे समाज को कलंकित किया। यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि भारतीय समाज में महिलाओं की क्या हैसियत है। हम मर्दों के लिए उनकी क्या उपयोगिता और अहमियत है। कहते हैं कि दिल बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है। इसी तरह हम भी कभी कभी दिल बहलाने के लिए उनके संदर्भ में कुछ अच्छी बातें कर जाते हैं। लेकिन कु, बात तो यही है कि हम मर्द उसे अभी भई अपने पैरों की जूती समझना ही बेहतर समझे हैं हो सकता हैं मैं कुछ मामलों में ग़लत होउं, लेकिन मेरी बात काफ़ी हद तक सही है। आज़ादी के इतने सालों बाद जब आज हमारे देश की कमान भले ही अप्रत्यक्ष तौर पर एक महिला के हाथों में है, उके बावजूद महिलाओं की ऐसी हालत कुछ नहीं, बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है.

सबसे बड़ा मीडिया

आजकल हर काम बहुत बड़ा हो रहा है। कोई भी घटना हो रही है, वह देश की सबसे बड़ी घटना ही हैं। हालांकि, इसका पैमाना क्या है, मुझे नहीं मालूम। पर बताया तो कम से कम ऐसा ही जा रहा है। मीडिया में तो यही कुछ चल रहा है। पहले राजधानी का हाइजैक। एक चैनल के लिए यह दुनिया का शायद भारत का सबसे बड़ा ट्रेन हाइजैक था। उसके बाद कल राजस्थान में इंडियन ऑयल डिपों में आग लगी यह भी भारत की कुछ ने तो बताया कि यह दुनिया की सबसे बड़ी आग थी। इस तरह की ख़बरे आजकल देखने और सुनने को मिल रही है। शायद हम सभी भाग्यशाली हैं, हमें दुनिया की बड़ी घटनाओं के गवाह बन रहे हैं। लेकिन, दुर्भाग्य यह कि ये सारे घटना बेहद ही दुखद हैं। भाषा के लिहाज़ से देखें तो कई चैनल यह बता रहे थे कि राजस्थान में आग के बढ़ने की संभावना है। तरस आता है, ऐसे ऐंकरों के भाषा के ज्ञान पर । वे आग बढ़ने पर ख़ुश हो रहे थे या दुखी। दरअसल, संभावना एक सकारात्मक शब्द है। होना तो यह चाहिए था कि इसकी जगह आशंका जताई जाती। लेकिन जो मैं जानता हूं वही सही है। और मैं इसी तरह इसका इस्तेमाल करूंगा। तो करते रहिए। वाक़ई में निराशा होती है.

लाल सलाम के क़त्लेआम की वजह

पूंजीवाद और विकास के नाम पर आदिवासियों और समाज में हाशिए पर रह गए लोगों को उनकी ज़मीन और अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है. यदि ये तबका कोशिश भी करे तो इनकी आवाज़ भी सांप के फन की तरह कुचल दिया जाता है. शायद इन्हें नहीं मालूम जब यहीं देश के सत्ताधीशों को निगलेंगे तो कोई बचाने वाला भी नहीं होगा. दरअसल, आज देश के चंद गिने-चुने लोगों के पास अथाह संपत्ति है और अधिकांश लोग ऐसे हैं जो अपनी न्यूनतम ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पाते हैं. जो लोग दूसरों के महल बनाते हैं उन्हें सिर छुपाने के लिए फूस की झोपड़ी भी मयस्सर नहीं, जो औरों के लिए क़ीमती कालीन बुनते हैं, वे सारा जीवन ग़रीबी और अंधकार में बिता देते हैं. आज हालात ऐसे हो गए हैं कि क़ानून का पालन करने वाले निराश और हताश हो गए हैं जबकि क़ानून तोड़ने वाले सरकार पर हावी हो चुके हैं. नक्सलवाद का यह विकृत रूप हर रोज़ लगों की जानें ले रहा है. हररोज़ कोई न कोई मांग सूनी हो रही है, बच्चे अनाथ हो रहे हैं. आख़िर इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा. सरकार तो कतई नहीं लेगी. बस चंद मुआवजा देकर अपने फर्ज़ पूरी समझती है. लेकिन, क्या वाक़ई यही समस्या का निदान है. लोगों के बीच तो ऐसी चर्चा चल रही है कि नक्सलियों से निपटने का कारगर तरीक़ा यही है तो हमें नहीं चाहिए, मुआवजा और हम दुआ (बद्दुआ) करते हैं कि नक्सली सरकार में बैठे आला नेताओं अधिकारियों के भी मार डाले, फिर हम चंदा जमा कर सरकार को मुआवजा देंगे. हताशा की चरम स्थिति लोगों पर इस क़दर हावी होने लगी है कि वे अब ऐसी दुआएं करने लगे हैं. उन्हें समझ में आने लगा है कि उनके (ग़रीबों-लाचारों) वोटों से बनी सरकार उनका कभी भला नहीं कर सकती है. यह काफी हद तक सही भी है, तभी तो लोग कहते नज़र आते हैं कि भारत के लोग वोटर नहीं होते और यहां चुनावी पर्व नहीं होते तो आम लोगों के लिए चुनाव जीतने के नाम पर जो कुछ भी जन-कल्याण का काम हो जाता है, वह भी नहीं होता. ज़रा नीति-नियंताओं की कारास्तानी देखिए जिस नक्सलवाद से देश जूझ रहे हैं, जिन परेशानियों ने लोगों को नक्सली बनने पर मजबूर किया, उस वजह पर कभी ध्यान नहीं देते. संपत्ति की विषमता संसाधनों का असमान वितरण. कोई करोड़ों रूपए की दौलत से अय्याशी की ज़िंदगी जी रहा है तो देश की 77 फ़ीसदी लोग हररोज़ महज 20 रूपए से भी कम पर अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं. इन 77 फ़ीसदी में भी अधिकांश यदि सुबह की रोटी जुटा पाता है तो शाम के लिए उसे तरसना पड़ता है. यह सोचते-सोचते ही फिर सुबह हो जाती है कि उनके छोटे-छोटे बच्चे आज भी भूखे पेट रोते-बिलखते सो गए. इस तरह पिता का प्यार और मां की ममता हर रोज़ दम तोड़ती है. अपने लाडले को दो वक़्त की रोटी का फर्ज़ निभाने में. ऐसे में फाइव-स्टार और एसी की हवा खाने वाले इन ग़रीब मजलूमों की स्थिति में सुधार के कोई नीतियां बनाते हैं तो उसकी हक़ीक़त समझना कतई मुश्किल नहीं है. जब हवाई सफ़र में इकॉनमी क्लास में सफ़र करने वालों के लिए कैटल क्लास की संज्ञा दी जाती है तो इन ग़रीब और मजलूमों के लिए कैसी सोच और भावना होगी बताने की शायद ज़रूरत भी नहीं है.
हाल में, छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा ज़िला हो, या महाराष्ट्र का गढ़चिरौली इलाक़ा कत्लेआम का खेल यहां ख़ूब खेला गया. हम केवल इन्हीं इलाक़ों की बात क्यों करें, देखा जाए तो नक्सलियों का प्रभाव क्षेत्र दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है, जहां नक्सलियों का तांडव सर चढ़ कर बोला रहा है. लोग इतने ख़ौफ़जदा हैं कि घर से निकलना भी उनके लिए जान गंवाने ले कम नहीं है. पुलिस प्रशासन पर नक्सलियों का क़हर इस क़दर आजकल टूट रहा है कि हर 10-15 दिन में कोई न कोई बड़ी वारदात सुनने को मिल ही जाती है, जिसमें पुलिस वाले थोक के भाव में मारे जा रहे हैं.

लाल सलाम को सलामी

साल 1967 के दौर में नक्सलबाड़ी से जो चिंगारी उठी, उसने भारत को अपनी आगोश में ले लिया. आज हालात ऐसे हैं कि बंगाल कि यह चिंगारी आंध्रप्रदेश के गांवों तक पहुंच चुकी है. लेकिन सत्ता की मंशा कभी इसे सुलझाने की नहीं रही. देश में जब जनता पार्टी की सरकार थी तब उसी दौर में पिपरा, पारस बीघा, मसौढ़ी अरवल, कंसारा से लेकर बेलछी जैसे दर्जनों कांड हुए जिसमें दलित और कमज़ोर लोगों की सामूहिक हत्याएं की गईं. जब बेलछी कांड हुआ तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हाथी पर चढ़कर बेलछी पहुंची थीं. आज भी ऐसे हालातों में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं आया है, कत्लेआम होती रहती हैं, नेता मुआवजा की घोषणा करते रहते हैं, मानों ये कह रहे हों कि बस यही लाख- दो लाख आपके जान की क़ीमत है. नक्सलवाद की समस्या को टटोलें तो कभी आंध्र, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ तो कभी बिहार झारखंड में यह हमेशा अपना सर उठाता रहा है. सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन आज जिस मुकाम तक पहुंच चुका है, उससे यह कतई नहीं माना जा सकता कि यह वही नक्सलवादी आंदोलन है, जो बंगाल के नक्सबाड़ी से शुरू हुआ था. जिसकी अगुवाई चारू मजूमदार और कानू संन्याल जैसे नेताओं ने की. एक वक़्त ऐसा था जब देश का पूरा अल्पसंख्यक बुद्धिजीवी वर्ग भी इस आंदोलन के पक्ष में खड़ा दिखाई देता था. ग़रीब-गुर्बा से लेकर समाज में हाशिए पर जीने को मजबूर लोगों का हमेशा से इसे जन समर्थन मिलता रहा. यहां तक कि सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने वाले नक्सलियों के कुछ समर्थक तो सरकार में भी थे. लेकिन, आज नक्सलवाद की वही स्थिति जानना है तो आप उन लोगों के बीच जाइए, जो हररोज़ इनके संगीनों का शिकार हो रहे हैं. उस मां से पूछिए जो अपने बेटे का चिता सामने देखती है, उस पिता से पूछिए जो अपने बेटे को ही अपना कंधा दे रहे हैं. हाल में, नक्सलियों के हाथों मारे गए पुलिस अधिकारी फ्रांसिस के बेटे से पूछिए. इस तरह जवाब तलाशने के लिए आपको कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. ऐसे अनगिणत उदाहरण हैं जो नक्सलवाद के बदलते स्वरूप की तस्वीर आपकी आंखों के सामने घूमने लगेंगे.
हालांकि, एक बात तो तय है कि सरकारी नीति-निर्धारक तय नहीं कर पा रहे हैं, इस हालात के लिए कौन सी स्थितियां ज़िम्मेदार हैं. नक्सलवाद को लेकर सरकारें जिस तरह से अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकती रही हैं, इसे समझना कतई मुश्किल नहीं है. आज देश के सात से भी अधिक राज्यों में नक्सली अपना क़हर बरपा रहे हैं. देश के क़रीब दर्जन भर राज्यों में इन माओवादियों ने सत्ता को खुलेआम चुनौती दे रखी है. चाहे वह छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, ओडीसा, बिहार, बंगाल उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे राज्य ही क्यों न हों. कुछ इलाक़ों या कहें कि कुछ राज्यों में में तो इनकी समानांतर सरकारें भी चल रही हैं तो कतई ग़लत न होगा. क्या यह बुरा होगा कि नक्सलवाद का मसला सुलझा लिया जाए. यह मसला सुलझ भी सकता है, लेकिन इससे नक्सलवाद पर चलने वाली कुछ लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगीं. ये कौन लोग हैं. कौन हैं, जो हर समस्या को उसके उसी रूप बरकरार रखना चाहते हैं. आख़िर, ये क्यों चाहते हैं कि समाज के हाशिए पर और विकास के नाम जो लोग पिछड़ गए हैं, उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले उनका ही ख़ून बहाए. जब तक इस सवाल को हम नहीं समझ लेते तब तक किसी भी समस्या की तरह नक्सलवाद को भी नहीं सुलझा सकते. चाहे सरकार कोई नीति बनाए, नक्सलवाद से लड़ने के नाम पर सलवा जुड़ूम बनाए गए, लेकिन पिसता तो वही आम आदमी है. जिसकी आवाज़ देश के हुक्मरानों तक नहीं पहुंचती.

नक्सलवाद की राम कहानी

होती हैं बड़े लोगों की बड़ी बातें,
उनके सामने सब छोटे हो जाते.
जुबां ख़ामोश ही रखो अपनी
बरख़ुरदार हो जाओगे बर्बाद नहीं तो.
चारों ओर हा-हाकार मचा है, नक्सलवाद का.
पीएम, सीएम सब सर खपा रहे हैं
फिर भी कुछ हो नहीं पाता है.

सुबहो-शाम इसी मगन में रहते हैं,
कि कब कसेगा नकेल नक्सलवाद पर.
लाखों-करोड़ों के होटल में रहने वाले,
पॉलिसी बनाते हैं फकीरों की.
शहीद हो गया फ्रांसिस झारखंड में,
लड़ते-लड़ते नक्सलियों से,
नहीं मिली थी उसको लेकिन
सैलरी 6 महीने से.

कैसे कहते हैं हम लड़ पाएंगे
ऐसे नक्सलवाद से.
इसी विषमता के लिए लड़ रहे हैं नक्सलवादी,
पुलिस भी है शिकार उसी विषमता का.
फिर भी हो गया शहीद फ्रांसिस
करके नेताओं को आबाद. बनने लगी हैं फिर से नीतियां,
लड़ने नक्सलवाद से, देखें क्या-क्या होता है.
यह नकस्लवाद कितना बढ़ाता है.
क्योंकि, जब-जब होता हैं कुर्बान कोई
नेता करते हैं ऐलान कोई.
सुना दिया है फरमान इन्होंने,
नहीं करेंगे बर्दाश्त अब,
ऐसे नक्सलवाद को.
अमां मियां पहले करलो काम कोई.

जंपिंग जसवंत की राजनीतिक चाल

जिस दिन जसवंत सिंह को बीजेपी से निकाला गया, उसी दिन लग गया कि जसवंत सिंह राजनीति महत्वकांक्षा को आख़िर कब तक दरकिनार करके रखते हैं। कांग्रेस तो जा नहीं सकते थे, इसलिए राजस्थान की गद्दी जिसके लिए वसुंधरा से पंगा लेते रहे, वहां इन्हें मिल नहीं सकती थी. सो कांग्रेस का दरवाज़ा उन्होंने ख़ुद बंद कर रखी थी. दूसरा विकल्प, बीजेपी के मसले पर आरएसएस की दिलचलस्पी के बाद घर वापसी की तो वो भी मुमकिन नहीं हो पाया.
तीसरा विकल्प उनके पास दरअसल विकल्प नहीं, ये प्रस्ताव था. अमर सिंह की तरफ़ से समाजवादी पार्टी के लिए. इसकी संभावना प्रबल थी क्योंकि बीजेपी से निकाले गए या ख़ुद निकल गए कल्याण सिंह भी वहीं हैं. साथ ही, सपा दूसरे दलों के बाग़ियों को कुछ ज़्यादा ही सम्मान करती आई है. लेकिन जसवंत वहां भी नहीं गए. मतलब इरादा साफ़ था. दोयम दर्ज़े के राजनेता बनना उन्हें पसंद नहीं, हो भी क्यों ? जो सिपाही भारतीय सेना में हमेशा फ्रंट से मुक़ाबला किया हो वो भला दूसरों के कंधे पर बंदूक रख गोली चलाने लगे. ऐसे में एक ही विकल्प बचता था, जसवंत सिंह के पास. अपनी ख़ुद की पार्टी बनाएं. इसके लिए उनकी कवायद बहुत दिनों से चल रही थी. और अब उनकी मेहनत परवान चढ़ गई. ख़बरों में ऐसा कहा जा रहा है कि वो एंटी बीजेपी और एंटी कांग्रेस समूह की अगुआई करते नज़र आएंगे. इस समूह का नाम लोक मोर्चा है. जिसके संयोजक जदयू से निकाले गए नेता और पूर्व विदेश राज्य मंत्री दिग्विजय सिंह को बनाया गया है. सिंह ने ख़ुद बताया कि लोक मोर्चा को लेकर चर्चा बहुत पहले से ही हो रही थी. अगस्त में इसकी बैठक मुंबई में हुई भी थी. एक तरह देखा जाए इसमें तमाम बाग़ी हुए नेता ही सक्रिय भूमिका में नज़र आ रहे हैं. मसलन, झारखंड के पूर्व विधानसभा भी इस समूह में शामिल हैं. मुंबई के ही एक नेता राज शेट्टी भी इसके सदस्य बने हैं. यदि दिग्विजय सिंह की माने तो कई बुद्धिजीवियों का भी उन्हें समर्थन हासिल है. अब कितने अल्पसंख्यक बुद्धिजीवी इनके साथ हैं, इसका ख़ुलासा तो वक़्त आने पर ही होगा. फिलहाल सिंह के मुताबिक़ प्रभाष जोशी और एम जे अकबर जैसे हस्ती का नाम वो बता रहे हैं. जिनका सहयोग और समर्थन लोक मोर्चा को मिल रह है. बताया तो ये भी जा रहा है कि यह समूह महाराष्ट्र विधानसभा में भी अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है. मतलब, अभी से ही सक्रियता दिखाने की पुरजोर कोशिश चल रही है. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इस तरह के समूह कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख पाते हैं, इतिहास भी इस बात का गवाह है कि इस तरह कई समूहों आए और कई गए भी. ऐसे में इसका क्या हस्र होता है, यह देखना भी काफी दिलचस्प होगा.

गांधी उपनाम का जलवा

कभी आपने सोचा है, नेहरू का ख़ानदान गांधी ख़ानदान कैसे बन गया। आख़िर क्या वजह रही कि पंडित नेहरू ख़ानदान का उपनाम बाद में चलकर गांधी उपनाम में बदल गया। हममें कई लोग सोचते होंगे कि और हो सकता है कई लोग न भी जानते हों, कि इंदिरा गांधी ने जब फिरोज़ गांधी से शादी की तो भारतीय परंपरा के मुताबिक़, पति का उपनाम ही ख़ानदान का उपनाम बन जाता है। इसीलिए, इंदिरा गांधी के बाद जिस भी नेहरू वंशज ने भारत पर राज किया चाहे वह राजीव हों या अब राहुल उनके नाम में गांधी उपनाम लग गया। कई लोग यहां तक अफवाह फैला चुके हैं कि फ़िरोज़ गांधी महात्मा गांधी दूर के रिश्तेदार थे। लेकिन ऐसा नहीं। दरअसल फिरोज़ गांधी एक पारसी फैमिली से ताल्लुक़ रखते थे। उनके पिता का नाम जहांगीर गांधी था। ऐसा भी कहा जाता है कि फ़िरोज़ गांधी ने अपना उपनाम गैंडी (Gandy) से गांधी कर लिया। फ़िरोज़ से शादी के पहले इंदिरा गांधी अपना पूरा नाम इंदिरा नेहरू लिखती थी।
लेकिन, इस गांधी उपनाम में भी ग़जब का जादू है। इसी उपनाम की बदौलत नेहरू वंशज भारत पर अभी तक शासन कर रहे हैं। यदि इसमें हक़ीक़त नहींहै तो क्यों फिरोज़ गांधी गुमनामी के अंधेरे में खो गए। बावजूद इसके कि वो भी एक राजनीतिक शख्स थे। लोकसभा के सांसद थे। लेकिन, उनका नामोनिशान सत्ता के गलियारे तक नहीं है। आख़िर, क्यों। इसकी सबसे बड़ी वजह यह भी हो सकती है, कांग्रेस पार्टी यह बख़ूबी जानती है कि या कहें कि नेहरू परिवार कि गांधी (महात्मा) के उपनाम के मोहजाल से इस देश की जनता का निकलना काफी मुश्किल है, जब तक यह देश भारत रहेगा, गांधी का जलवा बरकरार रहेगा। इसी का फंडा कांग्रेस अपना रही है।

बापू, तुम ऐसे क्यों थे !

आज बापू का जन्मदिन है। मतलब ड्राई डे। कम से कम सरकारी मतलब तो यही होता है। छुट्टियां ऊपर से बोनस में। मैं फिलहाल दिल्ली में हूं, तो बात दिल्ली की ही करूंगा। आज भी में ऑफिस आया। वह भी जल्दी। इसलिए नहीं कि जानबूझ कर। घर से तो चला था उसी टाइम पर, जिस पर मैं रोज़ चलता हूं। दरअसल, पहले पहुंचने की वजह यह है कि आज ट्रैफिक की भीड़भाड़ बिल्कुल नहीं थी। बस, सरपट सरपट तेज़ गति से चली जा रही थी। चारों तरफ़ सन्नाटा और सुनसान सड़कें। मतलब कम ट्रैफिक की वजह से आज जल्दी पहुंच गया।

ख़ैर, क्या आपने कभी सोचा है कि गांधी, गांधी क्यों थे। हो सकता है आपको ये थोड़ा अटपटा लगे। लेकिन इसमें बहुत बड़ा रहस्य छुपा हुआ है। वह भी आज के गांधी परिवार की। हमारे भविष्य के प्रधानमंत्री की। सबसे पहले आज का एक अजीब वाकया मैं आपको सुनाता हूं। आज मेरी मुलाक़ात एक ऐसे इंसान से हुई जिसे आप आम आदमी कह सकते हैं। मैंने गांधी जी की बात उनसे छेड़ दी। वह भी मेरे साथ न्यूज़ चैनल देखने में मशगूल थे। बापू की कुछ दुर्लभ तस्वीरें दिखाईं जा रही थीं, जो वाकई दुर्लभ थीं। मैं आश्चर्य कर रहा था कि कैसे एक इंसान बस एक धोती में अपनी ज़िंदगी गुजार सकता है। वह काम बापू ने किया। नेहरू की कांग्रेस पार्टी आज सादगी का खेल खेल रही है, लेकिन गांधी ने इसे दशकों तक जिया। (नेहरू की कांग्रेस पार्टी इसलिए क्योंकि गांधी उसे भंग कर जनता की सेवा में लगाना चाहते थे, पर नेहरू ने उसे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अचूक हथियार बना लिया.) कैसे कोई बस सच बोलकर इतनी बड़ी क्रांति कर सकता है। कैसे दूसरों पर बग़ैर हाथ उठाए ही उसे परास्त कर सकता है। जब देश आज़ादी की जश्न मना रहा हो तो, वह इंसान जिसने वाक़ई में आज़ादी दिलाई हो, वह तब भी लोगों के ज़ख्म भरने का काम कर रहा हो। (जब सारा देश और आज़ादी की लड़ाई के ज़्यादातर अगुवा आज़ादी की ख़ुशिया मना रहे थे, उस वक़्त बापू हिंदू-मुस्लिम दंगे रोकने में लगे थे, उनकी सेवा और लोगों की जान बचाने का काम कर रहे थे। उस भीषण दंगे ने बापू अंदर तक हिला दिया था, ऐसी आज़ादी की उम्मीद तो कतई नहीं चाह रहे थे। जबकि नेहरू सहित कई पुरोधा सत्ता की बंदरबांट में लगे थे ) इन्हीं सब ख़ूबियों की वजह से गांधीजी मुझे एक विचित्र और एक अद्भुत शक्ति नज़र आते हैं। जिसे समझन के लिए बेहद सरल और साधरण समझ की ज़रूरत है। जिसे आज हम भूलते जा रहे हैं।


हां, तो मैं बात कर रहा था उस विचित्र वाकये की। मुझे उन्होंने बताया कि गांधी जल्दी चले गए, मतलब गोडसे ने मार दिया अच्छा हुआ। नहीं तो देश का और कबाड़ा कर दिया होता। ये सोच आज के टुवाओं की है,। लेकिन सोचने वाली बात है कि यदि कुछ लोग भी ऐसा सोचते हैं तो आख़िर क्यों...क्या ये भी गोडसे मानसिकता वाले लोग हैं। या फिर अब के संघी मिजाज़ वाले...या कहीं ये कांग्रेसी तो नहीं, जो बस गांधी के नाम को भुना कर आज भी सत्ता की चाबी अपने पास ही रखना चाहते हैं। जब राहुल गांधी ये बयान देते हैं कि आज भी आम लोगों तक १० पैसा भी नहीं आम लोगों तक नहीं पहुंचता तो मुझे शक़ होता है कि कांग्रेसी भी वही कर रहे हैं, जो बाक़ी संघी या गोडसे मानसिकता वाले लोग कर रहे हैं।


अगले अंक में आपके बताएंगे कि कैसे नेहरू का परिवार गांधी परिवार बना...........क्यों...क्या थी कहानी....मजबूरी थी....या कोई और वजह.........

जब भारी पड़ा जूनियर पत्रकार

ऑफिस आने के 5 मिनट बाद ही आपका जूनियर आपके पास आता है। उसकी हाथों में अंग्रेज़ी में एक लेटर है। जिसका हिंदी अनुवाद करना है। यह काम जूनियर के ज़िम्मे ही है। वह कोशिश करता है। लेकिन असफल रहता है। पूरी तरह नहीं, लेकिन सटीक और ठीक-ठाक भी नहीं। उसके बाद वह आपके पास आता है। आपसे कुछ पूछता है। आप उसे टाल-मटोल अंदाज़ में बताते हैं। ताकि आप थोड़ी देर आराम कर लें। लेकिन बाहर की गर्मी झलने के बाद अब आपको उसकी भी तैश झेलनी पड़ती है। कैसा लगेगा आपको ? एक तो आप थोड़ी देर पहले ऑफिस आए, उसके बाद यदि आपके जूनियर को जिस काम के लिए रखा गया है, वह काम भी ढंग से नहीं कर पा रहा है। बात-बात में पूछने चला आता है। पूछना कोई ग़लत बात नहीं है। लेकिन, हर काम के लिए पूछने जाते हैं, तो आप यहां अय्यासी करने आए हैं. मीडिया की यही कहानी है. रिश्तेदारी, जान-पहचान और जुगाड़ के ज़रिए ये लोग घुसपैठ कर जाते हैं, मीडिया में? जब काम करने की बारी आती है तो दिन में तारे नज़र आने लगते हैं। फिर वही होता है, जो मंजूरे बॉस होता है। आपका जूनियर एक छोटा-सा लेटर अनुवाद नहीं कर पाता. जबकि आपने उसे इसी काम के लिए रखा है. आप चंद समय पहले ऑफिस आते हैं, अपनी जगह पर बैठते हैं, आपका जूनियर आपके पास आता है, फिर पूछता है. इसका अनुवाद कैसे होगा ? आप थोड़ी देर के लिए समाचार पत्र पढ़ते हुए रिलैक्स हो रहे होते हैं। जूनियर को कुछ बताते हैं, कुछ इग्नोर करते हैं. इस पर आपका जूनियर आप पर पिल पड़ता है. आपको घमंडी, दंभी, घटिया क़िस्म का इंसान कहता है. तुम क्या सोचते हो, सब कुछ तुम्हें ही पता है ? अपने आपको तीस मारखां समझते हो, मैंने भी कॉलेज में पढ़ाई की है। तुम्हारा कलीग हूं, तुम्हें बतानी चाहिए , यदि मैं तुमसे कछ डिसकस करता हूं तो तुमको मदद करनी चाहिए (फिर तुम यहां किसलिए हो, रामनाम माला जप कर सैलरी लेने के लिए), समझ लीजिए आपको इतनी श्लोक सुना देता है, जितना आप अपने बॉस से भी नहीं सुनते। वजह यह कि बॉस को आपका काम नज़र आता है। काम भले ही नज़र न आए लेकिन आपके काम की ख़बर तो उसे रहता ही है। लेकिन ज़रा सोचिए, आपको जब जूनियर से ही इस तरह की करारी बातें सुनने को मिले तो आपका मिजाज़ तो दुरूस्त हो ही जाएगा। दुरूस्त ना भी हो तो ठिकाने पर आना लाज़िमी है। लेकिन एक बात तो सोचने वाली है, आख़िर वजह क्या है? एक जूनियर की यह हिम्मत कहां से आई, यह ज़्यादा सोचने की बात नहीं। मीडिया है, तो पूरा मैदान ही साफ़ है।

कास्त्रो की कहानी

हैं तो ये क्यूबा के महान नेता. जिन्होंने क्यूबा को दुनिया के विकसित और अमेरिकी चुंगल से पूरी तरह महफूज रखने में अहम किरदार ही नहीं निभाया, बल्कि इसमें सफलता भी हासिल की. कई बार अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसियों के निशाने पर आने के बावजूद उन्हें मात देने में सफल रहे. फिदेल कास्त्रो, जी हां, हम बात कर रहे हैं महान क्यूबाई नेता फिदेल कास्त्रो की. जिसने पूंजीवाद की फसल को यहां कभी जड़े जमाने का मौक़ा ही नहीं दिया. लेकिन हैरान करने वाली बात है कि यही कास्त्रो अपनी निजी ज़िंदगी में काफी दिलफेंक क़िस्म के इंसान रहे हैं. अभी हैं या नहीं कुछ कह नहीं सकता, लेकिन जो इंसान अपने युवा दौर में अय्यास हो, और उसकी आदत छूट जाए. शायद ही ऐसा मुमकिन है. बररलुस्कुनी का उदाहरण आपके सामने हैं. देश के शासक होने के बावजूद कमसिन बालाओं की शौक़ रखते हैं. फिदेल का लैटिन अर्थ होता है, विश्वासी. लेकिन फिदेल कास्त्रो की अपने इस नाम के बिल्कुल उलट अर्थ को चरितार्थ करते है. एक किताब में उनके निजी ज़िंदगी में जो दावे किए गए हैं, कम से कम उससे तो यही लगता है. अपनी जवानी के दिनों उन्होंने कई महिलाओं से संबंध बनाए और यहां तक कि इन सभी से कम से कम १० बच्चे भी हुए. हालांकि, किताब के इन दावों में कितनी हक़ीक़त है, यह बहस का विषय हो सकता है. क्योंकि कास्त्रो की ज़िंदगी के बारे में बहुत कम बातें ही लोगों को पता है, इसकी वजह यह है कि क्यूबा में मीडिया सरकारी नीतियों के मुताबिक़ काम करती है. ऐसें में किसी भी बात का बाहर आना बहुत ही मुश्किल है. ऐसे में कास्त्रो की निजी ज़िंदगी के बारे में कुछ भी आम जनता तक पहुंचना असंभव ही है. लेकिन एक खोजी पत्रकार ने इन सबका ख़ुलासा अपनी एक किताब में किया है. इसमें फिदेल और उनके भाई राउल कास्त्रो की कई अहम बातें भी बताई गई हैं. इस तरह की किताबें सामने आती रहती हैं. जिसमें विवादास्पद और बड़ी हस्तियों की निजी ज़िंदगी से जुड़ी कई ख़ुफ़िया और गुप्त बातों को सामने लाने का दावा किया जाता है. हालांकि, कई मर्तबा यह एक पब्लिसिटी स्टंट के अलावा कुछ भी नहीं होता. यह किताब एक वामपंथी देश के महान क्रांतिकारी के विवादास्पद जीवन को उजागर करती है तो साज़िश भी हो सकती है, उन्हें इतिहास में बदनाम शख्स बनाने की. लेकिन इसमें कोई सक़ नहीं कि वो क्यबा के एक महान क्रांतिकारी नेता हैं और रहेंगे.

सिक्सर किंग हुए आउट

चैंपियंस ट्रॉफी में अभी भारत का आग़ाज़ भी नहीं हुआ था कि भारतीय टीम नंबर एक पर क़ाबिज़ हो गई। हालांकि, इसके पहले भी वह श्रीलंका के साथ सीरिज़ में चोटी पर पहुंची थी। लेकिन यहां से लुढ़कने में भी उसे एक दिन से अधिक नहीं लगे। वजह प्रदर्शन में निरंतरता की कमी। फिर यहां तो भारत बिना खेले ही किंग बन गया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती तो अब उसके सामने होगी। किस तरह धोनी के रण बांकुड़ें अपनी लाज बचाने में क़ामयाब होते हैं। साउथ अफ़्रीका में ही २०-२० का विश्व चैंपियन जीतने का कारनामा धोनी की सेना ने किया था। लेकिन उस बार के सिक्सर किंग युवराज सिंह चोटिल होकर टीम को मंझधार में छोड़ चुके हैं। शायद गुरु गैरी के सेक्स ज्ञान से टीम इंडिया को कुछ फ़ायदा हो जाए। हालांकि एक बात सोचने वाली है कि पुराने खिलाड़ियों को दोबारा क्यों शामिल किया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि अफ्रीका की तेज़ पीचों पर भारतीय टीम के ताश की पत्तों की तरह भरभरा कर गिरने का डर तो चयनकर्ताओं को नहीं सता रहा था। यही सोचकर उन्होंने द्रविड़ को शामिल तो नहीं किया। हालांकि इसकी संभावना अधिक और आशंका कम है। यदि आप सोच रहे हैं कि पिछली बार की तरह यह यूथ टीम भी कारनामा कर दिखाएगी तो नाहक ही यह खाब मत पालिए। वो २०-२० था यह ५०-५० है। वेस्टइंडीज में २०-२० का हाल तो आपको पता ही है। कहीं हस्र वही तो नहीं होने वाला। एक हिंदुस्तानी होने के नाते मैं तो चाहूंगा कि टीम इंडिया जीत हासिल कतरे। लेकिन डर तो रहता ही है। टीम इंडिया है इसका कोई भरोसा नहीं। युवराज जो खेवनहार हो सकते थे, कलाई की चोट ने भारत की मानों कमर तोड़ दिए। हालांकि सचिन अभी भी जब तक टीम हैं हिम्मत तो नहीं ही हारा जा सकता है। फिर टीम इंडिया के पास तो अब गुरू गैरी का कामसूत्र भी है। कहीं यह ही भारत का बेड़ा पार लगा दे। वैसे भी बॉलिंग में आशीष नेहरा को छोड़ कोई भी गेंदबाज़ फॉर्म में नज़र भी नहीं आ रहा है। कुल मिलाकर भारत का भरोसा चैंपियंस ट्रॉफी में पुराने खिलाड़ियो, सचिन, द्रविड़ और नेहरा के अलावा गुरू गैरी की सेक्सरसाइज पर ही टिकी है.

कॉस्टकटिंग के कारनामें

स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस से राहुल गांधी सफ़र कर रहे थे। मामला था आमलोगों का पैसा बचाने का. हवाईजहाज की जगह ट्रेन से सफ़र के ज़रिए. हां भई इसे मामला ही कहेंगे, इसलिए कि यह अब मामला ही बन गया है...पत्थरबाज़ी के बाद. कहीं राजशेखर रेड्डी का ख़ौफ़ तो नहीं. ख़ैर, नहीं ही होगा. कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दिल्ली से लुधियाना और फिर वापसी का सफ़र शताब्दी ट्रेन से तय किया. उनके रेल कोच में भी कई सीटें सुरक्षा की दृष्टि से या खाली रहीं या फिर सुरक्षाकर्मियों के हवाले कर दी गईं। लेकिन एक बात तो है, राहुल सही में भविष्य के बहुत बड़े खिलाड़ी के रूप में सामने आने की पुरजोर कोशिश में लगे हैं। उनकी यह मेहनत रंग भी ला रही है। लेकिन आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि जितना पैसा राहुल ने ट्रेन के ज़रिए सफ़र करके बचाया, कहीं ज़्यादा बहस उनके सुरक्षा और ट्रेन पर हुए पत्थरबाज़ी में निकल गए. इस तरह के मामले आए दिन देखने और सुनने को मिलते रहते हैं. हमारे या हम जैसे कई लोगों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है. यहां तक कि ट्रेन से यात्रियों के फेंकने का भी मामला आए दिन होते ही रहता है. जिसमें अधिकांश में आरपीएफ और आर्मी वाले शामिल होते हैं. फिर भी कोई हो-हल्ला नहीं मचता. ख़ैर यहां मसला वीवीआईपी से जुड़ा हुआ है, मसलन बहस तो होनी ही चाहिए. जांच इन्क्वाइरी भी बैठा दी गई है. दो-तीन को इतनी जल्दी पकड़ भी लिया गया है. जब मामला इतनी बड़ी शख्सियत से जुड़ा हो तो कार्रवाई जल्दी कैसे न हो. लेकिन इसके पहले जो मैंने मामले गिनाए उनमें कार्रवाई में इतनी जल्दबाज़ी नज़र नहीं आती. शायद इसलिए कि शशि थरूर के शब्दों में हम भी कैटल क्लास वाले ही हैं. लेकिन इन सबके बीच यह बात देखने वाली होगी कि इस तरह से कॉस्ट कटिंग की मुहिम कब तक चलने वाली है. वक़्त-वक़्त पर ऐसी मुहिम सरकार चलाती रहती है, जिसे कुछ नेता पसंद करते हैं तो कुछ को इन सब बातों का कोई असर नहीं पड़ता. सबसे बड़ी बात क्या आपको लगता है कि सरकार और ये तथाकथित नेता कॉस्ट कटिंग के नाम पर जो तामझाम कर रहे हैं, उसका सही में फ़ायदा आम लोगों तक पहुंच पाएगा. और ऐसा करके ये कितना बचत कर रहे हैं, ग़ौरतलब है कि राहुल ने ट्रेन से सफ़र कर तक़रीबन पांच सौ रुपए के आसपास बचाए. मतलब उंट के मुंह में जीरा. जितना काम सरकार कर नहीं रही है, उससे अधिक ढिंढोरा पीट रही है और हम उसके धुन पर भरतनाट्यम कर रहे हैं. क्योंकि ये ढोल हमारे सामने नहीं बज रहे और कहते हैं न दूर के ढोल सुहावने होते हैं.
ग़ौरतलब है कि सोनिया गांधी ने भी इकॉनमी क्लास में मुंबई तक सफर किया, लेकिन यह जानना भी दिलचस्प है कि उस १२२ सीटों वाले एयर इंडिया के प्लेन में महज़ ७२ लोगों को टिकट मिल पाई, क्यों अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं. इससे कितना नुकसान एयर इंडिया को हुआ, इस पर एयर इंडिया कह रहा होगा मैडम आप पहले जैस लावलश्कर से चलती थीं, वैसे ही चलिए. एक तो मंदी का टाइम उस पर कॉस्ट कटिंग के नाम पर कम से कम हमारा कॉस्ट तो मत बढ़ाइए.

दो ज़िदगी का अंतर

एक ज़िंदगी आपके सामने तस्वीरों में है...दूसरी आपकी जेहन में शशि थरूर और एस एम कृषणा की...जो सरकारी आवासों मे न रहकर होटलों में रह रहे थे। मतलब सरकार द्वारा दी गई व्यवस्था से वह भी संतुष्ट नहीं थे। जब एक मंत्री ही ख़ुश नहीं तो जनता की बात न ही की जाए तो बेहतर फिर भी ज़िदगियों की तुलना देख लीजिए आप....ख़ैर अचानक से ख़र्च कटौती की मुहिम सी चल पड़ी है, सरकार द्वारा। इसलिए रहा नहीं गया। सोचा चलिए हर तरफ़ चर्चा-ए-आम यही है, तो कुछ बहस मैं भी कर लूं। ताकि उन सभ्य और कम ख़र्चीले मंत्रियों की भीड़ में कम से कम मैं भी समझदार तो लगूं। ख़र्च कम भले ही न करूं तो कम से कम उस पर बहस तो कर ही सकता हूं। मुझे मालूम है कि शशि थरूर और एस एम कृष्णा जैसी हैसियत नहीं है, मेरी कि उनकी जैसी जिंदगी जीने की सोचूं भी। जनाब को सरकार द्वारा दिया गया गेस्ट हाउस पसंद नहीं आया। यहां तो कई जिंदगियां फुटपाथ पर बीत जाती हैं। यक़ीन न हो तो अपने आसपास ही देख लीजिए, ज़्यादा दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। शशि थरूर इन्होंने जितना समय विदेशों मे गुजारा है, शायद उसी को ध्यान में रखते हुए उन्हें इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन सरकार शायद यह भूल गई कि विदेशों में मंत्रियों का रहन सहन शानो-शौकत वाला होता है। जिसका इंतजाम वह नहीं कर सकी। मसलन, सरलता, सादगी और कमख़र्च का दंभ भरनेवाली सरकार के दो मंत्रियो को क़रीब तीन माह तक दिल्ली के सबसे महंगे पांच सितारा होटल में रहना पड़ा। हालांकि वो दोनों कहते हैं कि अपने ख़र्चे पर होटल में रह रहे थे...लेकिन इसका यक़ीन कैसे हो, ये भी वही तय करते हैं। ख़ैर ये भी सही है कि वो कुछ भी करें हमेशा हमें उनके पीछे नहीं पड़ना चाहिए। आख़िर उनकी भी निजी ज़िंदगी है। लेकिन हमें यह भी याद रखने की जरूरत है कि ऐसे ही निजी ज़िंदगीं के नाम पर ये नेता न जाने कितने लोगों की निजी ज़िदगी से खिलवाड़ करते हैं, दरअसल हक़ीक़त यह है कि ग़रीबों के वोटों से बनी सरकार अमीरों की अमीरी बढ़ाने का काम करती है और इसे देश की तरक़्क़ी बताने से फूले नहीं समाती। ख़ैर चिंता की बात नहीं है अब वित्त मंत्री प्रणव दा की झिड़की के बाद सारे नेताओं में कॉस्ट कटिंग और सादा जीवन, उच्च विचार अपनाने की होड़ सी मच गई है। हालांकि यह तात्कालिक है, यह सभी जानते हैं। और तात्कालिक क्यों है, इसकी भी असलियत मालूम है। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों को इसका सारा क्रेडिट दिया जाना चाहिए। किसी ने सही ही कहा कि, यदि भारत की जनता वोटर नहीं होती और चुनाव के मौसम नहीं होते तो जनता की खोज ख़बर भी लेने वाला कोई नहीं होता। जनता भी वैसे ही नाचने लगती है जैसे नेता नचाने लगता है। अब ये जुमला भी बड़े ज़ोर शोर से उठने लगा है कि वह क्या करे उसे तो सबसे बुरे में से कम बुरे को चुनना है। अरे भाई ऐसा क्यों ? कौन बनता है नेता, बनाता कौन है, किसके बीच से चुन के आता है, तो यह सब बहाना अब पुराना हो चुका। दरअसल यह सारा जुमला अल्पसंख्यक बुद्धिजीवी वर्ग के द्वारा सामने लाया जाता है। उन्हें भी डर लगता है, यदि जनता सही में जागरूक हो जाए तो उनकी अय्यास ज़िदगी का क्या होगा। इसी वजह से ये सब इस तरह का माहौल क्रियेट करते हैं कि असली और जनता के मुद्दे को हाईजैक ही कर लेते हैं और उसे अपने हिसाब से सामने लाते हैं। ज़रूरत है इन सबको सबक सीखाने की, नहीं तो ज़िदगी इसी तरह कीड़ों की माफिक चलती रहेगी। इसके कसूरवार भी हम ही होंगे।

न्यूज़-चैनलों ने बर्बाद कर दिया मीडिया

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों ही मीडिया के रूप हैं। दोनों में फ़र्क़ भी बिल्कुल साफ है। इस क्षेत्र की जहां अपनी सीमाएं हैं, तो वहीं इलेक्ट्रॉनिक के लिए यह बात नहीं कही जा सकती। लेकिन एक हक़ीक़त यह भी है कि दोनों का एक दूसरे पर विश्वास भी नहीं के बराबर ही है। आख़िर इसकी वदह क्या हो सकती है, इस पर लंबी बस चली है और आगे भी चलती रहेगी। इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। इनमें एक दो बातें बिल्कुल सामान्य सी है, जो सभी को सीधे तौर पर समझ में आती भी हैं। यह कि जिस तरह से पल-पल की ख़बरसे हम इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से लोगों तक पहुंचाते हैं, ऐसा कर पाना प्रिंट के लिए नामुमकिन है। और कितनी भी बड़ी ख़बर क्यों न हो, वह कल सुबह तक ही आप तक पहुंचेगी। तबतक टीवी वेले उसकी इतनी कचूमर निकाल चुके होते हैं, कि शायद पाठक उस चीज़ के प्रति उतनी उत्सुकता नहीं लेते जितनी उन्हें किसी घटना के बारे में टीवी से तत्काल मिलती है। इस तरह कई और बातें हैं, जिसका प्रत्यक्ष फ़ायदा टीवी के लोगों को मिलता है। लेकिन आज जिस तरह से न्यूज़-चैनलों की विश्वसनीयता गिरी है, इस मामले में अख़बार वाले (प्रिंट) चैनलों से बाजी मारते नज़र ही नहीं आते, बल्कि उनसे कोसों आगे हैं। और आज के समय में इसके मामने में कोई बदलाव भी नज़र आता नहीं दिखता। इसकी भी साफ वजह है। बाज़ार आज इस क़दर हावी हो चुका है कि चैनलों पर कि उन्हें टीआरपी के अलावा कुछ भी नहीं दिखता। उनकी विश्वसनीयता का आलम यह है कि हाल ही में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री का हवाईजहाज गुम हो गया, इस दौरान पता नहीं इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडीटर विनोद कापड़ी को कहां से ख़बर मिल गई, जहाज का पता चल गया है और मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी सही सलामत हैं। इस ख़बर को सहारा समय ने भी चलाया। जो कि बाद में कोड़ी कल्पना साबित हुई। ख़ैर इंडिया टीवी तो ऐसी कल्पना लोक में विचरता रहता है। लेकिन बात अहम यह है कि टीवी चैनलों ने ख़बर के नाम पर जो खिलवाड़ दिखाना शुरू किय़ा है, उसने तो मीडियी की विश्वसनीयता की ऐसा-तैसी कर दी है। इस मामले में अख़बारों की हालत थोड़ी ठीक ठाक ही है, हालांकि यहां भी ख़बरें पैसे देकर छापने जैसी बातें होती रहती हैं। यक़ीन का लेवल इस क़दर गिरा है कि पत्रकारों के सम्मेलन में एक केंद्रीय मंत्री ने तो यहां तक कह दिया कि मीडिया वाले चाहे जो कुछ भी दिखाते या छापते रहें, हमें कुछ नहीं फ़र्क़ पड़ता। तो ये हालत है मीडिया के विश्वनीयता की। लोग कह रहे हैं, आजकल मीडिया में बहुत बुरा दौर चल रहा है, मैं समझता हूं, वाक़ई। लेकिन यह आर्थिक मंदी का नहीं, बुरा दौर है इसकी पहचान और विश्वसनीयता की मंदी का.

दलालों की दुनिया है, मीडिया !

यहां किसी का टैलेंट काम नहीं देता। न ही आपकी शिक्षा। यह दुनिया है दलालों की, काम आती है तो बस दलाली। कोई चीज़ दूर से जितनी प्यारी लगती है, ज़रूरी नहीं कि उसकी असलियत भी वैसी ही हो। यही हालत मीडिया की है। इस फील्ड में ऐसे कई कलम के दलाल हैं, जिनकी रोजी-रोटी इसी से चलती है। काफी सारे लोग हैं, जो यहां किस तरह टिके हुए हैं, यह शायद बताने की ज़रूरत नहीं। दिन-रात जिस अपराध को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं और अपराधियों के लिए ख़तरे की घंटी बने रहते हैं, दरअसल इनकी पोल-पट्टी खुल जाए तो इन्हीं के गले में वह घंटी बंधी नज़र आएगी। ऐसे कई नाम हैं, जिनसे मैं भी वाकिफ़ हूं, लेकिन नाम न बताने की मज़बूरी है। सबसे बड़ी बात मैं इस सिस्टम से लड़ भी नही सकता, बदलने की कोशिश करूंगा भी तो ख़ुद बदल दिया जाउंगा। कई दफ़ा पत्रकारिता का विद्यार्थी होने के नाते सोचता हूं, क्या सचमुच में इसी को पत्रकारिता कहते हैं। टीवी और प्रिंट के तमाम दिग्गज भारतीय राजनीति में वंशवाद को पानी पी-पीकर कोसते नज़र आते हैं, लेकिन असलियत तो यह है कि उससे भी कहीं ज़्यादा वंश और भाई-भतीजवाद मीडिया में हावी है। फिर ये लोग अपनी गिरेबां में झांकने की जहमत क्यों नहीं उठाते। इनकी न्यूज़ सेंस भी देखिए, ये हर उस चीज को ही दिखाते हैं, जो बिके, उसके अलावा कुछ नहीं। ऐसे में ये एक बनिया से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हक़ीक़त तो यह है कि यह लालच, ठगी, स्वार्थ और लूटखसोट से अधिक कुछ भी नहीं।हम हर बात में अमेरिका और यूरोप की मीडिया का हवाला देते नहीं थकते कि वहां कि पत्रकारिता कैसी है, सच्चाई यह है कि वह तो ठीक ही हैं, लेकिन हमें अपनी मंडियों में तब्दील कर दिया। आज विदेशी निवेश से कई सारे मीडिया हाउस खुल रहे हैं जिनका मक़सद सत्ता को प्रभावित करना और मुनाफ़ा कमाना ही होता है। पत्रकारों की स्थिति वैसी ही है कि वो इस पाक प्रोफेशन में तो आ गए, कुछ इस तरह कि,
मस्जिद तो बना ली दम भर में,
ईमा के हरारत वालों ने,
मन अपना पुराना पापी था,
बरसों में नमाजी बन न सका।
इसी तरह वर्षों के अनुभवी कई पत्रकारों की हालत ऐसी ही है। लेकिन हम बाज़ार या विदेशी निवेश को भी क्यों कसूरवार ठहराएं, पैसे के बग़ैर तो कोई व्यवसाय चल भी नहीं सकता। लेकिन वंश और भाई-भतीजावाद, क्षेत्रीयता का जो दीमक इसे दिन-ब-दिन खोखला करती जा रही, उसके बारें क्या कह सकते हैं। इसका कीड़ा तो हमारे ही अंदर है। इसका इलाज कौन करेगा। हम तो अपनी ही भूलभुलैया में घिरे हैं,
दुष्यंत ने ठीक ही कहा है,
मेले में भटके होते तो कोई घर पहुंचा जाता,
हम घर में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे।

आप भी ख़बर बन सकते हैं !

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री का इस दुनिया से जाना वाकई एक दुखद और संवेदनशील घटना है। लेकिन इसे भी मीडिया ने तमाशा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। सबसे पहले तो इंडिया टीवी, सोच सकते हैं आप जिसके मैनेजिंग एडीटर किसी ख़बर पर बात करते हैं, उस ख़बर के कंफर्म करते हैं, वही ग़लत निकल जाती है। कुछ दिनों पहले रजत शर्मा को शायद इसीलिए बेस्ट एंटरप्रेन्योर का अवार्ड दिया गया था। आप अनुमान लगा सकते हैं, जिसके शीर्ष अधिकारी पत्रकार की ऐसी समझ है, वहां बाक़ियों की क्या हालत होगी राम जाने। उस पर सहारा समय का साथ देना और भी मज़ेदार है। ये सब यह साबित करते हैं कि आजकल किस तरह के पत्रकार तैयार हो रहे हैं। जी हां, पहले पत्रकारिता उनके रगों में होती थी अब कैसे होगी जब ख़ून ही नकली हो। ख़ैर हर बार की तरह इसबार भी मुझे माफ़ कीजिएगा। पहले सोचा करते थे, पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर कुछ करेंगे। लेकिन धंधा बन चुकी इस पेशे में अब करने को कुछ रह नहीं गया। जितना मिर्च मसाला डालेंगे, स्वाद बढ़ता जाएगा। लेकिन ख़तरा यह भी है कि कहीं हाजमा ही न ख़राब हो जाए। ख़बरों के इस दौर में यदि कुछ करने की कोशिश भी करते हैं तो सावधान रहिएगा, ख़तरा है कहीं आप भी एक ख़बर न बन जाए।

एनडीटीवी इंडिया....चला इंडिया टीवी की राह !

लगता है ये कुछ ज़्यादा ही मैंने कह दिया। मुझे इतनी भी बेरूख़ी से इस तरह की बातें नहीं कहनी चाहिए। हो सकता है एनडीटीवी वाले मुझ पर मानहानि का दावा कर दें। लेकिन क्या करूं, लगता है जिन्ना का जिन्न मेरे अंदर भी समा गया है। दिन-रात सपने में आकर अपने वजूद का एहसास दिलाते रहते हैं, क़ायदे साहब। इसलिए जो दिलोदिमाग़ में इस क़दर घर चुका है, उन्हें शब्दों में उकेरने के लिए मज़बूर हूं। इसके लिए मुझे माफ़ कीजिएगा, मैं मज़बूर हूं...ख़ैर, आपने ये पंक्तियां तो सुनी ही होंगी॥
कौन कहता है, आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो, यारो ! एनडीटीवी वालों ने सही में पत्थर उछाला भी था, उनका मिजाज भी शायद दुरूस्त ही था, लेकिन एक ग़लती कर बैठे पत्थर किचड़ में दे मारा। फिर होना क्या था, इस हमाम में वह भी नंगे हो गए। कल तक पब्लिक और दूसरे चैनल वालों को सबक सिखा रहे थे, आज ख़ुद ककहरा भी भूल बैठे। क्या ज़रूरत थी लोगों को सीख देने की जब एक दिन वही सब करना था।हाल में, एनडीटीवी के कई पत्रकारों को अवार्ड मिला लेकिन शायद वे सारे अपनी झोली में बटोरना चाहते थे, रजत शर्मा से बेस्ट एंटरप्रेन्योर का अवार्ड भी छीनना चाहते थे। कोई बात नहीं यह मंशा भी अगले साल पूरी हो ही जाएगी। अब बात कीजिए उनके नए फॉरमेट की जिससे एनडीटीवी का कायाकल्प हुआ है...कभी ६-७ के बीच रहने वाली उनकी टीआरपी दो अंकों में पहुंच गई। कोई बुरी बात नहीं। बधाई हो। लेकिन कैसे ? कभी इंडिया टीवी को यू-ट्यूब चैनल कहते थे, शायद अभी भी। लेकिन यह चैनल भी अब अजब-ग़जब में फंस गया है। ख़बर बिना ब्रेक के रात नौ बजे ज़्यादातर पेज-थ्री की ख़बरें, फिलहाल तीन-चार दिनों से नहीं देख रहा एनडीटीवी तो बदलाव और भी मुमकिन है-पोजिटीव और निगेटिव भी। कभी स्पेशल रिपोर्ट जो कि जान थी वाकई स्पेशल हो चुकी है। मेरे एक मित्र ने बताया अब तो ब्रेकिंग न्यूज़ भी इस पर माशा-अल्ला आने लगे हैं- अगर ज़्यादा ज़रूरी न हो तो घर से न निकलें। ठीक है साहब नहीं निकलेंगे। अपने फेसबुक पर एकबार फिर रवीश कुमार ने आप सभी से राय मांगी है कि आप रात १० बजे किस तरह की ख़बरें देखना पसंद करते हैं, तो बता दीजिएगा मेरी तरफ से भी शायद उनकी अदालत में हमारी फरियादों की सुनवाई हो जाए।
एक बार फिर कहूंगा, कुछ ज़्यादा ही परेशान हो रहा हूं मैं एनडीटीवी इंडिया के लिए। क्या करूं आख़िर जिन्ना साहब मेरा पीछा भी तो नहीं छोड़ रहे। क़ायदे साहब रवीश के सपने में आए, मेरे सपने में भी आए और कहा उस रवीश को समझाते क्यों नहीं, कि जो शीशे के घरों में रहते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारते।

बदल रहा है.....एनडीटीवी----इंडिया.

ख़ुद को बाक़ी चैनलों से अलग बताने वाला न्यूज़ चैनल, एनडीटीवी-इंडिया अब वाक़ई उन सभी से अलग बन चुका है। जिस भी सेमीनार में इसके महान पत्रकार पंकज पचौरी जाते दूसरों पर व्यंग्य करने का एक भी मौक़ा नहीं गंवाते। अब क्या हुआ उनको ? टीआरपी ने कहीं उनका भी मिजाज तो नहीं ख़राब कर दिया। संवेदनशील पत्रकार रवीश कुमार को जिन्होंने कभी स्पेशल रिपोर्ट की शुरूआत करते हुए, न्यूज़ चैनलों में कंटेट को लेकर आंसू बहाते नज़र आते थे। आज भी याद है मुझे रवीश की वो स्पेशल रिपोर्ट जिसमें उन्होंने दूसरे चैनलों को यह कहकर दुत्कारा था कि इनका काम बस पब्लिक को बेवकूफ़ बनाना है, तालिबान और दाउद देखकर आपके जीवन पर क्या फर्क पड़ेगा। प्राइम टाइम में हंसी के फुहारे और राखी को देखकर आप क्या सीख लेना चाहते हैं। ऐसी कई तमाम ज्ञान भरे उपदेश रवीश कुमार ने दिया, जिसे वो ख़ुद समझ भी रहे होंगे, लेकिन राखी का स्वयंवर लगातार कई दिनों तक लोगों को दिखाना उनके लिए क्या साबित करता है। भाई मेरा तो मानना है कि दूसरों को बदलने की जगह आप ख़ुद को दुरूस्त रखिए ना॥तभी तो हम कुछ सीख लेंगे। एक बात आपको बता दूं, रवीश के उस स्पेशल रिपोर्ट के बाद हमारे फ्रेंड सर्किल में इसे लेकर काफी बहस भी हुई थी। काफी सारे रवीश की बातों से सहमत भी थे, जिनमें मैं भी एक था। लेकिन अब अचानक सूरज पश्चिम से कैसे निकलने लगा। यह समझ में नहीं आ रहा है। शायद रवीश कुमार को भी समझ नहीं आ रहा होगा कि जिस स्पेशल रिपोर्ट में कंटेंट को वह दूसरे चैनल वाले को गरिया रहे थे, वहीं अब तालीबान और दाउद जैसी ख़बरें कैसे आने लगीं। एक पंक्ति रवीश की आप भी सुन लीजिए जो उन्होंने उस स्पेशल रिपोर्ट के दौरान उन्होंने पब्लिक और दूसरे चैनल वालों के लिए इस्तेमाल किए थे, थोड़ा इधर-उधर हो सकता है...जब तक आप ख़बर के नाम पर ऐसी (तालिबान और दाउद, पाक का आतंक, कॉमेडी तड़का) चीज़ें देखते रहेंगे॥ ये चैनल वाले ऐसे ही आपके सामने बकर-बकर करते रहेंगे.. मेरी तरफ से यह कि देखते रहिए एनडीटीवी इंडिया-ख़बर वही सच दिखाए.....तो करते रहिए एनडीटीवी पर सच का सामना................

मुझको डुबोया मेरे होने ने।

सबसे पहले आपसे एक सवाल, आपको क्या लगता है फिलहाल प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी की अंदरूनी हालात को लेकर आपकी क्या राय है ? मेरी यह पक्की सोच है कि हममें से ज़्यादातर सोच रहे होंगे यह बिल्कुल ही पतन की ओर है। जिस तरह से एक-एक कर इसके दिग्गज बाहर निकाल दिए गए या इसे छोड़ गए, सबने इसका बंटाधार किया। चाहे वह गोविंदाचार्य हों, उमा भारती, शंकर सिंह बघेला, कल्याण सिंह आदि और अब जसवंत सिंह इन सबने कहीं न कहीं पार्टी को काफी हद तक कमजोर किया है। इसमें को शक नहीं फिलहाल पार्टी के भीतर जितने आला नेता हैं उनका कोई जनाधार नहीं है। सबके सब एक से बढ़कर एक लफ्फाज़ हैं। चाहे वह अरूण जेटली हों या वेंकैया नायडू कोई भी आम जनता में अपनी पहचान नहीं रखते। और फिलहाल जिन राजनाथ के हाथों में पार्टी की कमान है, उनका भी कुछ अता-पता नहीं, यह एक दिशाहीन नेतृत्व द्वारा लोगों का ध्यान, भाजपा को चुनौती दे रही अगली समस्याओं से हटाने की कोशिश है। पार्टी के समक्ष चुनौती है- आडवाणी के बाद कौन? सत्ताधारी नेतृत्व का कांग्रेस का नेतृत्व किस युवा दिशा में जा रहा है सबको दिख रहा है। भाजपा में आडवाणी फ़िलहाल पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं और सुषमा, जेटली, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार जैसे उनके समर्थकों की टोली को अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा। हालांकि अब संकेत मिलने लगे हैं कि आडवाणी कुछ दिनों में राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। फिर भी जिस तरह से संघ का डंडा बीजेपी पर चला है, इसे उसी का असर कहा जाएगा। लेकिन सवाल यह भी है कि इन जेटली, वेंकैया और नरेंद्र मोदी जैसे युवा नेताओं के हाथ में नेतृत्व आने के बाद भी मामला सुलटता नज़र नहीं आ रहा है, वजह साफ है इसके बाद यशवंत सिन्हा जिन्होंने मोर्चा खोलना शुरू कर दिया है और मुरली मनोहर जोशी जो अर्से से ताक में लगे हैं, मुमकिन है वो भी कुछ गुल खिला सकते हैं। इस तरह फिलहाल उस पर से संकट के बादल छंटते नज़र नहीं आ रहे हैं। हां, हो सकता है मामला कुछ दिनों के लिए पर्दे के पीछे चला जाए। लेकिन बग़ैर अमूल-चूल बदलाव के पार्टी में नया जोश भर पाना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल तो ज़रूर है। दरअसल पिछले लगातार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद इसके नेताओं में सत्ता लोलुपता कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी, लेकिन लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरी हार ने इनके सब्र के बांध तोड़ दिया और इनके मन का गुबार बाढ़ की तबाही की तरह पार्टी को डुबाने लगी। दरअसल बीजेपी को तभी चेत जाना चाहिए, जब पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत ने सवाल उठाने शुरू कर दिए थे, लेकिन यह मदमस्त हाथी की तरह झुमती रही, फिर नतीजा आपके सामने है.

मंदी को भी मिलने लगी मात !

ऐसा लग रहा है, मंदी भी अब मात खाने लगी है। हालांकि जैसे जख़्म इसने दिए हैं उससे पूरी तरह उबरनें अभी कुछ वक़्त तो लगेगा ही, क्योंकि मंदी के दौर से पहले जिस रफ़्तार से उभरते विकासशील देशों में पूंजी आ रही थी, उस रफ़्तार में कमी आई है और उसे वापस पुराने स्तर पर आने में समय लगेगा. पिछले दो सालों से जिस तरह से इसने लाखों या कहें तो पूरी दुनिया करोड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया। कइयों ने तो अपनी जान भी दे दी। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसने किस तरह से हमें चपेट में लिया। लेकिन इसकी वदह क्या रही, इसे जानने की सही कोशिश किसी ने ईमानदारी से नहीं की। यदि किया भी तो इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित अमेरिका रहा। जिससे उबरने में उसे अभी काफी वक़्त लगेगा, चाहे ओबामा यस, वी कैन, चेंज़ जैसी पंच लाइनों के सहारे अमेरिका के सुप्रीमों का पद जीत गए हों, उन्हें भी मालूम है कि ही कैन नॉट चेंज़। क्योंकि अमरीका जैसे देश जहाँ की अर्थव्यवस्था खपत पर आधारित है, उन्हें अपना निर्यात बढ़ाने पर ध्यान देना होगा और वो भी ऐसे वक्त में जब एशियाई देशों से आयात बढ़ रहा है। कम से कम फिलहाल तो नहीं ही। लेकिन हां, अर्थव्यवस्था में सुधार के लक्षण दिखने लगे हैं। फ्रांस और जर्मनी के बाद अब जापान भी इस घातक मंदी से उबरने लगा है। जिससे उम्मीद की एक नई किरण जगती है। लेकिन भारत जैसे कुछ ऐसे मुल्क़ हैं, जो इससे प्रभावित कम रहा, लेकिन इसका ख़ूब हो-हल्ला मचाया। ख़ासकर पब्लिक सेक्टर ने तो कुछ ज़्यादा ही कॉस्ट कटिंग के नाम पर लाखों लोगों को नौकरी से निकाल कर, उनकी ज़िंदगी से खिलवाड़ किया। और आलम ये कि उन्हें सरकार की तरफ़ से राहत पैकेज़ दिए जाएं, सत्यम को डूबाया किसी और ने लेकिन उबारने का काम सरकार उस आम लोगों के पैसे से कर रही, जिसे वही निजी क्षेत्र धक्के देकर बाहर निकाल रहे थे। इस तरह के खेल ख़ूब चले और चल रहे हैं, चलते भी रहेंगे। ख़बर तो ये भी है कि कुछ देशों में हालत में जिस तरह का सुधार दिख रहा है वो वहाँ की सरकारों के सहायता पैकेज का नतीजा है और ये ख़तरा ज़रूर है कि पैकेज के असर के खत्म होने के बाद वहाँ मंदी का दौर फिर से शुरू हो जाएगा.
ख़ैर ये ख़बर दिलासा देने वाली है कि मंदी के बादल अब छंटने लगे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए, आइंदा सतर्क रहें, चंद लालची लोगों की वजह से करोड़ों ज़िंदगी को बचेने की कोशिश होनी चाहिए, बजाय उनकी महत्वाकांक्षा को संतुष्ट करने के। जिसने न जाने कितनों के विश्वास के साथ धोख़ा किया।

जिन्ना का जिन्न है ये जनाब !

एक हिंदुस्तान का राष्ट्रपिता तो दूसरा पाकिस्तान का (क़ायदे-आज़म)। दोनों साथ-साथ हैं लेकिन अपने विचारों से कोसों दूर। गांधी कभी अपने कब्र से इस तरह कभी बाहर नहीं आए, जिस तरह जिन्ना बारबार। और हर बार विभाजन की लकीर खींचीं, ज़िदा थे तब भी यही काम किया, लेकिन शायद गांधी की कब्र नहीं है तो वो बाहर नहीं निकलते। वैसे भी ये जिन्ना का जिन्न है जनाब, पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं लेता। न जाने बार जिन्ना कब्र से बाहर निकले, अपनी फितरत की तरह कुछ न कुछ अपने पीछे छोड़ ही जाते हैं। ये वही जिन्ना हैं जो कभी राजनीति से अज़ीज आकर दुबारा वापस न आने की कसम खाकर ब्रिटेन चले गए थे, लेकिन मुस्लिम लीग की बेपनाह गुजारिश के बाद अपने कदम दुबारा हिंदुस्तान में रखे, लेकिन इस बार मिजाज-ए-जिन्ना बिल्कुल जुदा था। ये पहले वाले राष्ट्रवादी जिन्ना नहीं थे, अंग्रेज़ो ने इनके मन में विभाजन के बीज बो दिए थे। इस मसले को पाकिस्तान के नज़रिए से देखें तो हाल के दिनों में वह इतने आरोपों को झेल चुका है कि ख़ुशी का कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं गंवाना चाहता। चाहे ट्वेंटी 20 का वर्ल्ड कप का फ़ायनल हो या जश्ने आज़ादी, बंदूक़ें निकाल कर हवाई फ़ायरिंग शुरू कर देते हैं। आख़िर कर भी क्या सकते हैं, मौक़ा भी तो कभी-कभी मिलता है। एक मौक़ा जसवंत सिंह ने भी दे दिया है, ख़बर है कि शुक्रवार को वो पाकिस्तान भी जा रहे हैं अपनी किताब के प्रमोशन के लिए। लेकिन सोचने वाली बात है कि हर बार बीजेपी को जिन्ना का जिन्न ही क्यों जकड़ लेता है। क्यों एक राष्ट्रवादी पार्टी अपनी दुर्गति पर उतर आती है। दरअसल इन सबके बीच बीजेपी के पतन की कहानी के शुरूआत की वजह ढूंढने की कोशिश करें तो वाजपेयी जी की बीमारी के बाद उनका सक्रिय राजनीति से सन्यास और प्रमोद महाजन की असामयिक मौत ने पार्टी को ऐसा झटका दिया कि वह उससे उबरने की कोशिश में ही ख़त्म हो गई, रही सही कसर पूरी कर दी राजनाथ सिंह ने जो दरअसल राष्ट्रीय स्तर के नेता बनने लायक़ कभी थे ही नहीं, लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन बैठे। और अब आलम ये है कि हाल के लोकसभा चुनाव में मिली मात के बाद तमाम जिम्मेदार नेता सत्ता के बचे-खुछे पदों को हथियाने की कवायद में जुट गए, न तो चिन्तन बैठक में इस पर चिंता जाहिर की गई न ही अपने हार से कुछ सीख ही ले पाई। कभी कुछ पत्रकारों के हाथों में तो कभी आरएसएस के हाथों की कठपुतली बनी रही। लेकिन जिन्ना के जिन्न ने तो इसे टूट के कगार पर ला खड़ा किया है। जिन्ना के बारे में सबसे दिलचस्प बात ये है कि मुस्लिम मुल्क़ पाकिस्तान के जनक के पूर्वज हिंदू थे, जिन्होंने बाद में इस्लाम क़बूल कर लिया. और शुरू में मुस्लिम लीग ज्वाइन करने से इसलिए इन्कार कर दिया था कि यह केवल मुसलमानों की ही बात करता है जबकि अल्पसंख्यक मुसलमानों के रहनुमाई करने से उन्हें कोई एतराज़ नहीं था. लेकिन बाद में यही जिन्ना मुसलमानों के एकमात्र प्रवक्ता बनना चाहते थे।
यही प्रवक्ता रहरह कर बीजेपी में टूट के बीज बोता रहता है।

कंगारूओं के क़िले में सेंध

इंगलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को एशेज सीरीज़ में २-१ से मात देकर ये साबित कर दिया कि किस तरह शिखर पर पहुंचने के बाद का रास्ता सिर्फ नीचे की ही ओर आता है जब तक कि आप ख़ुद को वहां टिके रहने के क़ाबिल नहीं बना लेते। कई दफ़ा ये बहस का मुद्दा भी बना कि एक- दो सीरीज़ में हार से ही ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत पर सवालिया निशान लगाना मुनासिब नहीं हो सकता। लेकिन यदि देखें तो पिछले कुछ सीज़न में उसकी हालत वाकई में ख़स्ता बनी रही। दऱअसल अब ऑस्ट्रेलिया अपने खेल में ही मात खाता नज़र आ रहा है। इस बार इंगलैंड के हाथों मुंहकी खाने के बाद कम से कम ये बात तो साबित हो ही जाती है। याद कीजिए भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा, किस क़दर परेशान किया था, कंगारूओं ने। इस बार ठीक वैसा ही बर्ताव उनके साथ ब्रिटेन में हुआ। जिस तरह सिडनी टेस्ट भारत जीत रहा था, लेकिन माइकल क्लार्क और पोंटिंग के बदनीयती ने ऐसा होने नहीं दिया। ज़मीन को छूने के बावजूद क्लीन कैच करार देना और पोंटिंग का अंपायर की जगह आउट का निर्णय देना भला कौन भूल सकता है ? ठीक यही कंगारूओं के साथ स्ट्रॉस एंड कंपनी ने किया। दोनों के बीच जो टेस्ट एक विकेट न गिर पाने की वजह से ड्रॉ हो गया, कितना चपलता के साथ उसे स्ट्रॉस ने बचाया, तब पोंटिग की भन्नाहट बिल्कुल सामने आ गई थी, लेकिन उन्हें याद रखनी चाहिए कि आसमान का थूका अपने मुंह पर ही गिरता है।
अब कंगारूओं की टेस्ट रैंकिंग गिरकर चौथे पायदान पर आ गई है। अपना खोया रूतबा हासिल करना फिलहाल तो दूर की कौड़ी नज़र आ रही है, पोंटिंग एंड कंपना को। वजह साफ है, गेंदबाज़ी में न तो पहले जैसी धार है न ही फिल्डिंग में फुर्ती और न ही बल्लेबाज़ी में बादशाहत। मैक्ग्रा, शेन वार्न, गिलक्रिस्ट, हेडेन और लैंगर जैसे खिलाड़ियों के संन्यास के बाद मानो यह टीम बुरी तरह बिखड़ गई है।एक चैंपियन की हार का मलाल किसे नहीं होता, क्रिकेट का प्रशंसक होने के कारण कंगारूओं के क्रिकेट के खेलने के अंदाज़ का कायल बहुत सारे रहे होंगे, मैं भी था। लेकिन जब अपनी क़ाबिलियत को तराशने के बजाय उस पर कोई घमंड करने लगे तो उसका अंजाम भी क्या होता है, ऑस्टेलियाई क्रिकेट टीम हमारे सामने है।

बारिश की बोरियत का भी मज़ा है

ये बेहद ही ख़ूबसूरत नज़ारा है, बारिश के बाद की दिल्ली की, जो मुझे काफी अच्छी लगी। य़दि बारिश नहीं होती तो राहुल गांधी मेट्रो से सफर नहीं करते। यही फर्क है बारिश के होने का। हम हर बारिश के बाद सीएम साहिबा को कोसने लगते हैं, कहने लगते है पानी निकासी की कोई व्यवस्था ही नहीं है, निकम्मी हो गई है सरकार। मुझे लगता है और साथ इत्तेफाक़ से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी कि बारिश होगी तो जाम तो लगेगा ही। अब इसमें कोई क्या कर लेगा ? लेकिन इन सबसे अलग आपको इस तस्वीर को देख कर ख़ूबसूरती का एहसास नहीं हो रहा ? मुझे इस खूबसूरती का एहसास करने के लिए बारखम्बा मेट्रो से लाजपत नगर तक पैदल आना पड़ा। आपको लग रहा होगा ये क्या पागलपन है, इतनी दूर पैदल चलने क्या ज़रूरत थी ? लेकिन मैं आपको बता दूं, फिर भी मैं रैश ड्राइविंग करने वाले सारे बस वालों, बीएमडब्ल्यू की रफ्तार इन सबसे आगे था। हालांकि तक़रीबन तीन घंटे में मैंने ये दूरी पैदल चलकर तय की थी। सही में दिल्ली की बारिश का सही लुत्फ तो इसी दिन मैंने उठाई। ऐसा लग रहा था मानो हर चीज़ यहां कितनी ख़ामोश है, बेजान, फीकी वर्षों गुजर जाते हैं यूं ही, कुछ पता नहीं चलता हफ्ते और दिन बड़ी मुश्किल से कटते हैं, और सिर्फ ऊब ही है इनका सिलसिला। लेकिन कल कुछ ऐसा नहीं लग रहा था। सारी चीज़े अपनी जगह थीं पर बेजान और ख़ामोश नहीं, शायद नहीं। वाकई बहुत मज़ा आया कल की बारिश का बहुत सुकून मिला गाड़ियों की लंबी कतारें देखकर।

ख़ान हर किसी के साथ सोए !

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री के लेकर एक नई बात आजकल पाकिस्तान में हड़कंप मचाए हुए है। जी हां, ये बात है पाक क्रिकेटर इमरान खान और बेनज़ीर भुट्टो के शारीरिक नज़दीकियों को लेकर। ये ख़बर नव भारत टाइम्स में छपी है, जिसमें बताया गया है कि ऑक्सफोर्ड में पढ़ने के दौरान दोनों एक-दूसरे के बेहद क़रीब आए थे और इमरान की मां दोनों की शादी को लेकर रज़ामंद भी थीं लेकिन बात कुछ बन नहीं सकी। वो बेनज़ीर ही थीं, जिसने इमरान को लॉयन ऑफ लाहौर कहा था। खान और भुट्टो के बीच सेक्सुअल रिलेशन थे यह इस बात से भी पुख़्ता हो जाती है कि इमरान के एक दोस्त ने कहा था कि, खान हर किसी के साथ सोए थे।

ये सारी बातें इमरान की बायोग्राफी में क्रिस्टोफर स्टैनफर्ड ने लिखी हैं। ध्यान देने वाली बात है कि इस तरह की बातें शायद पाक में किसी प्रधानमंत्री को लेकर पहली बार सामने आई है, वो भी एक मुस्लिम कंट्री में जहां लोकतांत्रिक क़ानूनों की जगह इस्लामी कानून का वर्चस्व बरकरार है और इस तरह की बातें सामने आने के बाद क्या बवाल खड़ा होता है, ये तो बस इंतजार करने और देखने वाली बात होगी। जहां कि उस दिवंगत प्रधानमंत्री बेनज़ीर का पति अभी राष्ट्रपति हैं और इमरान जो इस बात को ग़लत ठहरा रहे हैं, वो भी एक राजनीतिक तंजीम गठित कर पाक राजनीति में एक अहम किरदार निभा रहे हैं।

किताब के हवाले से स्टैनफोर्ड के मुताबिक़ 1975जब बेनज़ीर 21साल की थीं और ऑक्सफोर्ड में सेकेंड यीअर में पढ़ती थीं तभी वो इमरान के क़रीब आईं। बेनज़ीर जहां एक ख़ुले दिमाग और प्रोग्रेसिव सोच वाली महिला थीं जिसने अपनी ज़िदगी का अधिकतर वक़्त पश्चिमी मुल्कों में गुजारा और इमरान ने अपनी शादी इंग्लैंड में ही जेमिमा से की थी। मतलब की दोनों एक खुले विचारों वाले शख़्सियत। इस ख़ुलासे ने पूरे पाकिस्तान में तहलका मचा दिया है। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है य़ा बस कहीं पब्लिसिटी स्टंट तो नहीं, ये कहना ज़रा मुश्किल है क्योंकि बेनज़ीर अब स दुनिया में हैं नहीं और इमरान जिनकी बायोग्राफ़ी में इसका ख़ुलासा किया गया है, इस पूरी बात से इन्कार कर रहे हैं। लेकिन एक बात तो है कि इसने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है, जो आने वाले समय में निश्चित ही एक नया गुल खिलागा। जो कभी दुनिया कि दूसरी पावरफुल महिला थी और पाक जैसे चरमपंथी सियासतदां मुल्क में एक महिला से जुड़ी इस बात का ख़ुलासा ही इस हवा को बवंडर की शक्ल देने को काफी।

ए कॉल टू जिन्ना

आप सोच रहे होंगे जसवंत सिंह के साथ ये कौन है, ये हैं वो आतंकवादी जिसपर न जाने किरने बेग़नाहों का क़त्ल करने का इल्जाम है, जिसे छोड़ने कंधार गए थे, जसवंत सिंह जी।
अब बात जसवंत सिंह को उनके कारनामे के लिए सम्मानित करने का सिलसिला शुरू हो चुका है। शायद एक मुख्य धारा की पार्टी में रहते हुए भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाने की उनकी कवायद रंग लाने लगी है। जी हां, उनको सम्मानित करने का फ़ैसला किया है, ऑल इंडिया मुसलिम मज़लिस ने। इसके उपाध्यक्ष यूसुफ हबीब औऱ प्रवक्ता बदरकाजमी ने कहा कि जसवंत सिंह ने वो काम किया है जिसे कांग्रेस हमेशा से अपमानित करती आई है। उनका कहना था कि जसवंत सिंह ने जिन्ना की एक सही तस्वीर पेश की जिसे कभी कोई हिंदुस्तानी समझ ही नहीं पाए...इस तरह की और तमाम बातें मुस्लिम मजलिस ने कही, जिसे दोहराना शायद मुनासिब नहीं क्योंकि बात फिर अपनी ही थाली में छेद करने वाली हो जाएगी।
लेकिन इन सब के बीच जो एक बात सोचने वाली है कि आखिर बीजेपी के ही नेता जिन्ना को महान और सेक्युलर बनाने पर क्यों तुले हुए हैं। और जब भी ऐसा होता है, पार्टी अपने को उससे अलग कर लेती है और व्यक्तिगत मसला बताकर किनारा कर लेती है। लेकिन सोचने वाली बात है कि बीजेपी में कैसे व्यक्ति हैं कि उन्हें अपनी बात कहने के लिए भी व्यक्तिगत होना पड़ता है, ख़ैर ये बात वो व्यक्ति नहीं कहता है कि ये मेरी व्यक्तिगत सोच है, जो सारा बखेड़ा खड़ा करता है।

अगर जसवंत सिंह जिन्होंने एक अलग ही इतिहास लिखने का काम किया है , यदि उनके इतिहास पर नज़र डालें, तो नेशनल डिफेंस अकादमी का एल्युमिनाई, जिसने देश की सेवा एक विदेश, वित्त और रक्षा मंत्री के तौर पर की। सबसे बड़ी बात ये कि जसवंत सिंह बीजेपी के भीतर सबसे प्रभावशाली शख़्सियत हैं जिनका बैकग्राउंड आरएसएस से नहीं है। हो सकता है शायद इसीलिए ऐसी हिमाकत की हो, जिन्ना को महान बताने की जबकि आडवाणी का हश्र वो देख चुके थे। अब इनका क्या होगा राम जाने। इसके पहले भी सुर्ख़ियों में आने के लिए जसवंत जी किताबें लिखते रहे है- ए कॉल टू ऑनर को कौन भूल सकता है, जब उन्होंने पीएम ऑफिस में जासूस होनी की बात कहकर सनसनीख़ेज ख़ुलासा किया था, जिसे वो कभी भी सच साबित नहीं कर सके। इस बार उन्होंने कोशिश नहीं बकायदा बताया है कि नेहरू और सरदार पटेल विभाजन के लिए कसूरवार थे और सारा दोष जिन्ना के उपर गढ़ दिया गया। साथ ही जिन्ना और गांधी के विचारों की समानता की भी बात की है। शायद उम्र की इस दहलीज पर कुछ करने को था नहीं, पार्टी पहले ही लुटपिट चुकी है, राज्यसभा में विपक्ष के नेता का पद भी हाथ से चला गया सो लगे जिन्ना का जिन्न बोतल से निकालने। अब होगा क्या , शायद रामजी अयोध्या से आकर कुछ करें तो बात बने।

और बात बन ही गई, जसवंत सिंह को आख़िरकार बीजेपी से चलता कर ही दिया गया। बड़े बेआबरू होकर पार्टी से निकलना पड़ रहा है।

जसवंत पर भारी जिन्ना का जिन्न

पहले आडवाणी , अब जसवंत। उसके बाद पता नहीं कौन। आख़िर ऐसा क्यों है कि हिंदुत्व का पुरजोर वकालत करने वाली पार्टी आजकल हिंदुओं के बजाय मुसलमानों पर ज़्यादा ध्यान दे रही है। आडवाणीजी को पीएम बनना था, सो उसकी तैयारी वो पहले से ही करने लगे लेकिन दांव उल्टा पड़ गया, कहने वाले कहते हैं कि अपनी छवि सुधारने के चक्कर मे कन्फ्यूजिया गए कि करना क्या है और बोलना क्या, इसलिए जनता उनको समझ नहीं सकी। लेकिन जसवंत सिंह को क्या हो गया, न तो अभी कोई चुनाव होने वाले हैं और न ही कुछ ऐसा कि इस तरह की बातें वो कर सकें, क्योंकि जब बीजेपी के लोग इस तरह की बातें जब करते हैं तो ख़ुद को उदारवादी बनाने के बहाने सुर्ख़ियों में आने का बहाना ढ़ंढ़ते हैं। वही काम जसवंतजी कर रहे हैं। एक अलग ही इतिहास लिखने का काम किया है, जसवंत सिंह ने। वैसे भी बीजेपी वालों को इतिहास लिखने में खासी दिलचस्पी रहती है, आपको याद ही होगा, जब सत्ता में थी ये पार्टी तो कैसे-कैसे इतिहास लिखने का काम कर रही थी।
दरअसल जसवंतजी जिन्ना को महान और नेहरू और सरदार पटेल को भी विभाजन के लिए कसूरवार बता कर ये जताने की कोशिश कर रहे है,
" कैसे हम इल्जाम लगाएं, बारिश की बौछारों पर।
हमने ख़ुद तस्वीर बनाई, मिट्टी की दीवारों पर।। "
सिवाय बखेड़ा खड़ा करने के और कुछ भी मक़सद नहीं होता है इनका। ये वही जसवंतजी हैं, जो आतंकवादियों को अपने साथ छोड़ने प्लेन में कंधार तक जाते हैं। उनके गृह-मंत्री अपनी किताब में कहते हैं, मुझे इस बात की कोई जानकारी ही नहीं थी।
दरअसल बीजेपी आजकल संक्रमण के दौर से गुजर रही है, किसी भी नेता का कुछ अता-पता नहीं कब क्या बोलना है। वैसे भी हमारे नेताओं में भी अब किताबें लिखने का भूत सवार होने लगा है, चलिए वैसे भी कहा गया है, खाली दिमाग़ शैतान का घर।

भूख है तो सब्र कर ।


क्या इतने प्रेम और चाव से आप खाना खाते हैं या खा सकते हैं ? हो सकता है नहीं आपका जवाब बिल्कुल हां में ही होगा, कुछ लोगों की अपनी मज़बूरियां हो सकती हैं , जिसकी वजह से वो ना कहें।
दरअसल ये तस्वीर उस जगह की है, जब आप और हम ट्रेन से सफ़र करते हैं तो ट्वायलेट और दूसरी चीज़ों के लिए इस्तेमाल करते हैं। दूसरी चीज़ों से मतलब शौचालयों के लिए। आप और हम वहां खाने की सोच भी नहीं सकते, ज़रा सा साफ़ न रहे तो ट्वायलेट भी जाने से कतराते हैं। लेकिन खाने की बात तो सपने में भी नहीं सोच सकते भूख बर्दाश्त कर लेंगे लेकिन खाएंगे नहीं। अब बताइए क्या आप इतने मज़े से खा सकते हैं। जहां तक मैं अपनी बात करूं तो मैं तो कतई नहीं। लेकिन ये सिर्फ़ बस एक आदमी जो आपको तस्वीर मे दिख रहा है, उसी की कहानी नहीं है, काफी सारे लोग ऐसे ही खाते हैं, कम-से-कम मेरे साथ जो लोग सफर कर रहे थे वो तो खा ही रहे थे। अंतर इतना था कि ये ट्वायलेट रूम मे खा रहा था, बाक़ी उस रूम में रखें खाने को खा रहे थे, अनजाने में मैंने में भी पानी का बॉटल ले लिया, लेकिन जब ट्वायलेट के लिए गया तो सारा माजरा नज़र आया। आसपास काफी सारे लोग ठूंसे पड़े थे, बगल वाले ट्वायलेट को ही पेंट्रीकार बना दिया गया था। लोग ये देख भी रहे थे खाना-पानी कहां रखा है, फिर ख़रीद रहे थे और खा भी रहे थे, उनको कोई एलर्जी या दिक्कत नहीं थी। शाय़द वो इस बात के अभ्यस्त थे। और मेरे लिए नया अनुभव।
डरिए या घबराइए मत ये कहानी किसी ट्रेन के जनरल डब्बे की है, लेकिन दूसरे बोगियों की साफ़-सफाई और हालत भी इससे कुछ खास बेहतर है या नहीं, इससे अभी पाला नहीं पड़ा है। फिर भी हक़कीत हम सभी से छुपी नहीं है। यहां ये बताना भी ज़रूरी बन पड़ता है कि बड़े ही चाव से खा रहे खाने की क़ीमत पैंतीस रू है । मेरी गुजारिश है यदि इंडिया से फुर्सत मिले तो एक बार आप भी ऐसे ही जनरल बोगी में सफर कीजिए और एक नए भारत का दर्शन कीजिए। एक नई दुनिया की झलक आपको मिलेगी, चार की सीट पर कैसे आठ लोग बैठते हैं, सामान रखने वाली जगह पर कैसे चार लोग मज़े से सोते हुए सफर करते हैं। भारत कैसे जुगाड़ का देश है , ये भी आप सही तरीक़े से जान और समझ सकते हैं।
" कल नुमाइश में मिला वो चिथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदोस्तां है।"

हमें शर्म नहीं आती !




मेहनतकश बच्चे, बड़े होकर देश का बोझ उठाने को तैयार
चलता-फिरता दुकान

आख़िर इन्हें भी तो भूख लगती है- सेल्फ-डिपेंडेड बच्चे


नई-दिल्ली स्टेशन पर गंदे पानी का बोतल बेचने पर मज़बूर लड़का





हाल ही में संसद में शिक्षा का अधिकार बिल पारित हो गया और पिछले दिनों मैं अपने घर गया...आप सोच रहे होंगे कि इसका इन सबसे क्या नाता, तो बस आपको कुछ तस्वीरें दिखाना चाहता हूं, और आप पर छोड़ता हूं बाक़ी चीज़ों के लिए।

ये सारी तस्वीरें पंद्रह अगस्त के दिन खींची गई हैं, कुछ नई दिल्ली- स्टेशन तो कुछ पटना की हैं। ये उन्हीं ट्रेनें में पानी, पराग और कई चीज़े बेचते हैं। जिस ट्रेन से बड़े-बड़े अफ्सर और कभी-कभी कुछ नेता भी सफर करते हैं, वो भी ये सारी चीज़ें देखते हैं, लेकिन उनकी भी मज़बूरी है, वो क्या करें कहां तक और किस-किस की प्रॉब्लम दूर करते रहें।

शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो जाएगा, क्या ये बच्चे उसे कभी पा सकेंगे, देश की मुख्य धारा में कभी शामिल हो भी सकेंगे, कोई आश्चर्य नहीं कल इसी में से कोई पॉकेटमार या उससे भी आगे कुछ और बन सकता है, आइएस बनने की गुंजाइश तो है नहीं....इनके ऐसे सुनहरे भविष्य के लिए क्या ज़िम्मेदार हम भी हैं, अगर जवाब आपके पास है तो , हमें भी बताइगा
....

मीडिया की मृगमरीचिका

आख़िर हर कोई मीडिया को ही क्यों गाली देने पर तुला हुआ है। और क्यों दे रहा है ? एक तो बारबार यही रोना रोया जाता है कि इसका नैतिक पतन होते जा रहा है और ख़बरे दिखाई नहीं बेची जा रही है। जवाब यह मिलता है कि एक चैनल को चलाने में करोड़ों रूपये लगते हैं और उसे सही तरीक़े से चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है। जो उसे एडवरटाइज़िंग के जरिए मिलता है और ये एडवरटाइज़िंग उसे कॉरपोरेट क्षेत्र से मिलता है या कभी-कभी सरकार से भी। कॉरपोरेट वर्ल्ड एडवरटाइज चैनलों के टीआरपी के हिसाब से देते हैं। टीआरपी ये तय करती है कि किस चैनल को लोग सबसे ज़्यादा देखते हैं। उसे अधिक विज्ञापन मिलता है, तो कमाई होती है उस चैनल की। जिससे पूरा चैनल चलता है। अब आप ख़ुद समझदार हैं कि जो लोग विज्ञापन, चैनलों को देते हैं, वो अपने हितों को नज़रअंदाज नहीं कर सकते । साथ ही चैनल भी उनके हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी कम ही करते हैं, भला कोई अपने पेट पर लात थोड़े ही मारता है।

दूसरी बात ये कि सरकार अगर विज्ञापन देती है तो चुनावों के मौसम में क्योंकि उसे भी मालूम है कि कब चैनलों से अपना काम निकलवाना है। जिसे देख हमलोग हल्ला मचाने लगते हैं कि चैनल वाले पैसे लेकर किसी ख़ास पार्टी या कैंडीडेट की बातों को ख़बर के तौर पर दिखा रहे हैं। फिर वही बात आ जाती अपने-अपने हितों की, कि घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर ले तो खाएगा क्या ? कुल मिलाकर बात ये कि हम बाज़ारवाद के युग में जी रहे हैं और बाज़ार सारी चीज़ें तय कर रही हैं। एकबार एक प्रतिष्ठित चैनल के मैंनेजिंग एडीटर ने एक बात कही कि आज हम बाज़ार की ताकत को नकार नहीं सकते और आप भी यदि अपने हिसाब से ख़बरें देखना चाहते हैं तो पैसा लगाइए, फिर हम किसानों की आत्महत्या दिखाएंगे, बुंदेलखंड की समस्या दिखाएंगे , भारत को दिखाएंगे बजाय इंडिया के। सबसे बड़ी बात ये दुनिया हमारी बनाई हुई दुनिया ही है, अगर हमें वही दिखाया जा रहा है जो हम देख रहे हैं या देखना चाहते हैं। उसी से उनकी टीआरपी बढ़ती या घटती है, जिससे विज्ञापन कम या अधिक का मिलना अमुक चैनल को तय होता है। इस सिस्टम को हमीं ने मज़बूत किया है, हमी को कुछ करना होगा। बस बारबार गाली देना और उसी टीवी को देखना हमारी फितरत में शामिल हो चुकी है, न्यूज़-प्रोग्राम देखना और उसी की फज़ीहत करना, ऐसा करने से बाज आना होगा,जिसे ख़ुद बदलना होगा। न कि कोई हमारी मदद करने आएगा।

कुछ यूं तय की अपनी ज़िंदगी, मैंने.........

ज़िंदगी का कुसूर था कुछ ऐसा,
कि बस न मिलेगा सुकुन मेरे रूह को
ऐसा एहसास था, पता नहीं क्यूं
शायद मैं क़ाबिल नहीं तुम्हारे....
फिर भी, सासों की खुशबू ही काफी है,
तुम्हारे एहसास के लिए।


दिल की हर धड़कन के साथ तड़पता हूं,
अब तो बस तेरी यादों के साये में,
जीता हूं न मरता हूं...
हरपल एक कशिश को सीने से लगाए रहता हूं।



इबारत क्यों भला उस ख़ुदा की,
माना पनाह दी है, ज़िदगी तो नहीं,
गर ज़िंदगी दी तो मक़सद तो नहीं,
आज रूकसत कर रहा हूं,
अपने हबीब को, ये सोचकर...
शायद जिंदगी ने यही फ़ैसला किया है,
मेरी तन्हाइयों के लिए........

गोत्र, गांव और ग्लोब्लाइजेशन

कहने को तो हम मॉडर्न हो गए हैं। जी हां हो भी गए हैं, लेकिन वो इंडिया है या भारत। यदि दोनों है तो अभी तक न तो इंडिया शाइनिंग हुआ है और न ही भारत-निर्माण। भरत अभी भी गांवों में बसता है, वही उसकी आत्मा भी है। लेकिन ये भी हक़क़ीत है कि कुछ चीज़ें ऐसी भी हो जाती हैं कि इंसानियत को भी शर्मसार कर देती है। एक ही गोत्र में शादी को लेकर हत्या, इस तरह के मामले आजकल काफी सुनने में आ रहे हैं। ऐसा क्यों ? क्या अंग्रेजियत की धमक वहां तक नहीं पहुंच पाई है ? क्या ग्लोब्लाइज़ेशन की हवा से गांव अभी भी महरूम हैं ? ऐसा भी नहीं है। गांवों में भी अब प्रेम विवाह होने लगे हैं और मां-बाप, उन्हें तक़लीफ तो होती है कि बेटे ने उसकी नहीं सुनी और नाक कटवा दी, लेकिन इसके बावजूद बेटे-बहू को अपना लेते हैं। जबकि अभी से महज पांच साल पहले की ही बात है, ऐसी कोई भी बात वहां होना मतलब आप जाति-बिरादरी से निकाल दिए जाते। बस यही एक फ़ैसला। ऐसी बात नहीं है कि पंचायतों की परमपरा वहां नहीं है, अभी भी हैं। लेकिन एक फ़र्क है उन्होंने ख़ुद को ज़माने के मुताबिक़ बदला भी। लेकिन कुछ जगहों पर एक ही गोत्र में शादी को लेकर पंचायतों का कायराना फ़ैसला अभी भी हमें शर्म से पाना-पानी होने पर मज़बूर कर देता है। नया मामला हरियाणा के झझर का है...दरअसल देखा जाए तो राजस्थान, हरियाणा जैसे राज्यों में पंचायतों का काफी बोलबाला रहता है। यहां तक कि हाल में जब मामला हरियाणा के सीएम और राहुल बिग्रेड के युवा सांसद दीपेंद्र हुड्डा के इलाक़े का आया और जब उनसे इस पर प्रतिक्रिया मांगी गई तो एक शब्द भी हलक से नहीं निकला कि इस घटना की आलोचना भी कर सकें। उन्हें भी अपनी सीमाएं मालूम है। इन जगहों पर पंचायतों का फरमान तालिबानी फरमानों से कम नहीं होता और किसी नेता या मंत्री में ये कुव्वत नहीं होती के उसके ख़िलाफ़ एक शब्द भी बोल सके। यहां तक कि न्यायपालिका(कोर्ट) तक के आदेश को ताक पर रख दिया जाता है। तभी तो हाल में पुलिस को पीट-पीट कर भगा दिया और उस युवक की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जिसे अदालत ने सुरक्षा देने का जिम्मा प्रशासन को सौंपा था...उसके फैसले को पैरों तले रौंदते हुए ये सब हुआ तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क़ानून कि क्या हैसियत है इस मुल्क में। परंपरा रीति-रिवाज के नाम सरेआम तमाशा होता रहता है और ऐसा नहीं कि जो लोग ऐसा करते हैं वो अनपढ़, जाहिल या गंवार होते हैं। वेल एजुकेटेड लोग भी इस बात का समर्थन करते हैं, जैसा कि दीपेंद्र हुड्डा ने इसे परंपरा का हवाला देकर चुप्पी साध ली थी। आख़िरीतौर बात आकर ठहरती है कि “ समरथ कछु दोष नहिं गुसाईं “ जो कि एक कड़वी सच्चाई है।

मुल्क का बंटवारा ही है समाधान ।

कल सुबह से ही एक सवाल मेरे जेहन में है, जो काफी परेशान किए हुए है? अगर करता हूं, तो सांप्रदायिक होने का एहसास होने लगता है और नहीं करता हूं तो फ्रसट्रेशन फील होने लगता है। आज रहा नहीं गया। बाक़ी आप सभी जैसा सोचें। बात है तो काफी, नहीं तो थोड़ी पुरानी। इमरान हाशमी को लेकर। महेश भट्ट साहब को लेकर। एक सवाल उन्हे मुंबई में मनपसंद जगह घर नहीं मिल रहा है इसलिए कि वो मुसलमान हैं। हरकोई मुसलमान को शक के नज़रिए से देख रहा है। कहीं वो आतंकवादी तो नहीं। ऐसा इमरान हाशमी ने भी कहा- आई एम नॉट टेररिस्ट। उन्हें लगता है कि लोग सारे मुसलमान को आतंकवादी समझते हैं। इसलिए अपने मोहल्ले में घर नहीं देना चाहते। कई टीवी चैनलों पर इलको लेकर बहस भी हुई नतीजा निकला, हां भेदभाव तो होता है। बिल्कुल होता है मैं भी सहमत हूं, मेरी आंखों के सामने ही मेरे एक मुस्लिम दोस्त को इस तरह की प्रॉब्लम झेलनी पड़ी है। कल आईबीएन-७ पर आशुतोष भी अपने एजेंडा में यही बाक कर रहे थे। लेकिन हुआ यूं कि उनने जितने गेस्ट बुलाए सारे के सारे राष्ट्रवादी निकले। ख़ैर ये एक अलग ही बहस है। एक घर न मिलने की वजह से इतना हो- हल्ला होगा, अचरज की बात है। दरअसल एक मुसलमान को घर नहीं मिला, क्योंकि वह एक मुसलमान है, इसलिए इमरान हाशमी को घर नहीं मिला। इस बात से हंगामा है। शबाना आज़मी और जावेद साहब को घर नहीं मिला क्योंकि वो मुसलमान हैं। तो क्या वो अभी मुंबई से बाहर रह रहे हैं या किसी मुस्लिम सोसायटी में रह रहे हैं। मुंबई में कितनी प्रॉपर्टी है इन लोगों की जो ऐसी बातें कर रहे हैं। ये किसी हिंदू डायरेक्टर या सहयोगी के साथ काम क्यों कर रहे हैं, मुझे तो लगता है कि वहां भी इनको भेदभाव का सामना करना पड़ता होगा। अल्पसंख्यक होने की वजह से फिल्म इंडस्ट्री में भी इनके आरक्षण मिलना चाहिए। हर चौथी फिल्म में एक एक्टर और एक्ट्रेस मुस्लिम होंगे। मान लीजिए यदि ऐसा होने लगे तो देश का क्या होगा? इससे किसी को क्या मतलब। भांड़ में जाए देश।

आज देश की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में हर किसी को मनमाफिक जगह पर घर मिलना मुमकिन तो नहीं। फिर मजहब के नाम पर इस तरह का खेल खेलना कितना जायज है? छोटी-मोटी पब्लिसिटी के लिए इस तरह के कारनामें कितना ख़तरनाक है, शायद उनको इस बात का एहसास तक नहीं है। इसी तरह आगर देखा जाए तो कोई ये भी कह सकता है कि बिहारी होने के नाते मेरे साथ दिल्ली, मुंबई, गुजरात गोवा आदे में भेदभाव होता है, नौकरी नहीं मिलती, घर नहीं मिलता, लोग बिहारी कहकर ग़ाली देते हैं। ये हक़क़ीत भी है। इस तरह से देखा जाए तो देश किस हिसाब से एकजुट है। कर दीजिए देश के टुकड़े-टुकड़े। मौक़ा भी सुनहरा आ रहा है- पंद्रह अगस्त। गांधी, नेहरू और सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद के अरमानों को उनके साथ ही दफ़न हो जाने दीजिए। सबसे कम उम्र में फांसी के फंदे पर झूलने वाले ख़ुदीराम बोस, भगत सिंह, सुभाषचंद्र, अशफ़ाक़उल्ला की कुर्बानियों से हमें क्या लेना ? जीने दीजिए सभी को अपने-अपने ढंग से, आख़िर हरएक को जीने का हक़ जो है। क्योंकि हरकोई उत्तरदायित्व के कंधे पर बस हक़ की गोली चलाना ही तो चाह रहा है।