हादसे वाली ट्रेन ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस से दो नन्हीं जुड़वां बच्चियां भी अपने अम्मी-अब्बू के साथ मुंबई जा रही थीं। शिरिन और शरमिन। उन्हें शायद यह भी पता नहीं था, माओवादी कौन होते हैं और न ही यह कि नक्सलियों न उनके ट्रेन को क्यों निशाना बनाया? शिरिन और शरिमन की यह पहली छुट्टियां थी। उस रात आंखों में मुंबई देखने का सुनहरा सपना लिए दोनों बहनें एक-दूसरे को गले लगाकर सोई थीं। और, इसी तरह उन्होंने दुनिया को भी अलविदा बोला। शुक्रवार सुबह जब सीआरपीएफ के कठोर दिल जवानों ने जब शिरिन-शरमिन को एस-4 डिब्बे से बाहर निकाला तो उनकी आंखों से भी आंसू छलक पड़े। उनके माता-पिता सैय्यद जावेद आलम-साबिया स्कूल टीचर थे। अपनी जुड़वा बेटियों को सात दिनों की खुशी देने के लिए इन्होंने वर्षों तक इंतजार किया था। वह भी इस हादसे में मौत के शिकार हो गए। बचाव दल ने पहले जावेद और साबिया शव ही बाहर निकाला था। फिर अचानक उनकी नजर छोटी-छोटी अंगुलियों, गाल और गहरे भूरे रंग से गूंथी बालों पर पड़ी। सीआरपीएफ के बचाव अभियान ने तेजी पकड़ ली, लेकिन उनका यह पहला बचाव कार्य जल्द ही मातम में बदल गया। शिरिन और शरमिन को एस-4 से बाहर निकाला तो दोनों बहनें उस कुचले हुए बर्थ पर पड़ी हुई थीं। एक-दूसरे को जोर से पकड़े हुए थीं, एक का सिर दूसरे के सीने में धंसा था। शिरिन और शरमिन एक जैसी ही फ्रॉक पहने हुए थीं। एक के फ्रॉक का रंग हरा तो दूसरे का पीला था। ऐसा लगता था, मानों दोनों अभी भी सोई हैं। पर...उनके चेहरे पर खून का थक्का जमा था। दोनों बहनों को एक-दूसरे से अलग करने में जवानों को काफी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ी। मानों वे किसी दो गुथ्थम-गुत्थे शव को अलग नहीं, बल्कि दो बहनों को हमेशा के लिए एक-दूसरे जुदा कर रहे हों। ट्रेन पर चढ़ने से पहले, शिरिन-शरमिन की अम्मी साबिया बेहद खुश और उत्साहित नजर आ रही थी। वह खुश थी कि उनकी बेटियां मुबंई देखेगी। वह ट्रेन के सफर के दौरान कई चीजों को देख सकेगी, लेकिन उनका सफर चंद घंटों में ही हमेशा के लिए खत्म हो गया। भला किस्मत किसी के साथ इतना क्रूर कैसे हो सकता है? शिरिन और शरमिन का क्या कसूर था? वे तो दो नन्नी परियां थीं। जिन चीजों से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था, उसने शिरिन-शरमिन और उनकी अम्मी-अब्बू से छीन लिया।
नक्सलियों ने छिनी शिरिन-शरमिन की खुशियां
हादसे वाली ट्रेन ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस से दो नन्हीं जुड़वां बच्चियां भी अपने अम्मी-अब्बू के साथ मुंबई जा रही थीं। शिरिन और शरमिन। उन्हें शायद यह भी पता नहीं था, माओवादी कौन होते हैं और न ही यह कि नक्सलियों न उनके ट्रेन को क्यों निशाना बनाया? शिरिन और शरिमन की यह पहली छुट्टियां थी। उस रात आंखों में मुंबई देखने का सुनहरा सपना लिए दोनों बहनें एक-दूसरे को गले लगाकर सोई थीं। और, इसी तरह उन्होंने दुनिया को भी अलविदा बोला। शुक्रवार सुबह जब सीआरपीएफ के कठोर दिल जवानों ने जब शिरिन-शरमिन को एस-4 डिब्बे से बाहर निकाला तो उनकी आंखों से भी आंसू छलक पड़े। उनके माता-पिता सैय्यद जावेद आलम-साबिया स्कूल टीचर थे। अपनी जुड़वा बेटियों को सात दिनों की खुशी देने के लिए इन्होंने वर्षों तक इंतजार किया था। वह भी इस हादसे में मौत के शिकार हो गए। बचाव दल ने पहले जावेद और साबिया शव ही बाहर निकाला था। फिर अचानक उनकी नजर छोटी-छोटी अंगुलियों, गाल और गहरे भूरे रंग से गूंथी बालों पर पड़ी। सीआरपीएफ के बचाव अभियान ने तेजी पकड़ ली, लेकिन उनका यह पहला बचाव कार्य जल्द ही मातम में बदल गया। शिरिन और शरमिन को एस-4 से बाहर निकाला तो दोनों बहनें उस कुचले हुए बर्थ पर पड़ी हुई थीं। एक-दूसरे को जोर से पकड़े हुए थीं, एक का सिर दूसरे के सीने में धंसा था। शिरिन और शरमिन एक जैसी ही फ्रॉक पहने हुए थीं। एक के फ्रॉक का रंग हरा तो दूसरे का पीला था। ऐसा लगता था, मानों दोनों अभी भी सोई हैं। पर...उनके चेहरे पर खून का थक्का जमा था। दोनों बहनों को एक-दूसरे से अलग करने में जवानों को काफी मेहनत-मशक्कत करनी पड़ी। मानों वे किसी दो गुथ्थम-गुत्थे शव को अलग नहीं, बल्कि दो बहनों को हमेशा के लिए एक-दूसरे जुदा कर रहे हों। ट्रेन पर चढ़ने से पहले, शिरिन-शरमिन की अम्मी साबिया बेहद खुश और उत्साहित नजर आ रही थी। वह खुश थी कि उनकी बेटियां मुबंई देखेगी। वह ट्रेन के सफर के दौरान कई चीजों को देख सकेगी, लेकिन उनका सफर चंद घंटों में ही हमेशा के लिए खत्म हो गया। भला किस्मत किसी के साथ इतना क्रूर कैसे हो सकता है? शिरिन और शरमिन का क्या कसूर था? वे तो दो नन्नी परियां थीं। जिन चीजों से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था, उसने शिरिन-शरमिन और उनकी अम्मी-अब्बू से छीन लिया।
इस मातम का कोई नाम नहीं
नक्सलियों का तांडव और सरकारी मुआवजा

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों की कारस्तानी सभी ने देखी। देश के 76 सपूत शहीद हो गए। ऐसी वारदात के बाद इनके परिजनों के लिए सरकार मुआवजे की घोषणा जरूर करती है। एक तरह से मरे हुए लोगों की कीमत तय करती है। यानी मुर्दे की कीमत भी हमारे यहां ही तय होती है। जिनका सम्मान और ख्याल सरकार उनके जीते जी नहीं कर पाती मरने के बाद सहानुभूति के तौर पर मुआवजा देकर उनके मौत की कीमत लगाती है। मरने के बाद इन लोगों का हिसाब किताब लगाया जाता है। बिल्कुल बनिए की तरह। खून की कमत तय करके दे दी जाती है। कुछ इस तरह... नक्सली हमले में मारे गए सीआरपीएफ के सभी 75 जवानों के परिजनों को केंद्र सरकार ने 15-15 लाख रुपये की मुआवजा राशि देने की घोषणा की। गृह मंत्रालय ने कहा कि हर मृतक जवान के परिवार को 38 लाख रुपये से अधिक की सहायता प्रदान की जाएगी, जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से 15 लाख रुपये की अनुग्रह राशि, सीआरपीएफ जोखिम कोष से 10 लाख रुपये, राज्य सरकार की तरफ से तीन लाख रुपये की अनुग्रह राशि, राज्य सरकार की तरफ से नक्सल निरोधी अभियान के लिए योजना के तहत 10 लाख रुपये और सीआरपीएफ केंद्रीय कोष से 60 हजार रुपये की राशि शामिल है। जो घायल होकर अस्पताल में हैं उसे भी सरकार कुछ न कुछ जरूर देगी। इस तरह हो गया हिसाब साफ!
इसके बाद सरकार मुमकिन है नक्सलियों के बारे में मिली खुफिया जानकारी को नजरअंदाज किए जाने के चलते हुई इस बर्बर कांड के बारे में जांच कमीशन भी बिठा दे कि आखिर चूक (चिदंबरम ने कहा ह कि कहीं न कहीं चूक हुई है) कहां और किन अधिकारियों से हुई। जांच कमीशनों का क्या इतिहास रहा है हमारे यहां सभी को मालूम है। पर जब सरकार कोई जांच कमीशन बिठाती है तो लगता है वह किसी अद्भुत चीज को खोजना चाहती है। जैसे कि यह समस्या या नक्सली कहीं कंदराओं में रहते हैं या उनसे जुड़े लोग इस तरह की कुख्यात वारदात क अंजाम देकर बरमूडा ट्रैंगल में छिप जाते हैं और फिर बाहर निकल आते हैं। हालांकि वहां से कोई कभी वापस नहीं आता। सरकार ने भी ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू किया ही, अब और तेज करेगी वह अभियान। हवाई हमले हो या न हो पर अभी भूमिका कुछ उसी तरह की बांधी जा रही है। पर असली समस्या और उसके समाधान की ओर किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा है। जबकि न जाने सरकार और नक्सली दोनों से ही ओर से खेले जाने वाले खूनी खेल में कितने ही मांओं ने अपने बेटे गंवा दिए, पत्नियों ने मांग की सिंदूर पोछ डाली, बहनों ने राखी खरीदना छोड़ दिया और बेटा अनाथ कहलाने लगा। सारी समस्या पर मुझे नागार्जुन की चंद पंक्तियां याद आती हैं......
देश हमारा भूखा-नंगा घायल है बेकारी से,
मिले न रोजी -टी भटके बने दर-दर भिखारी से,
स्वाभिमान सम्मान कहां है, होली है इंसान की,
बदला सत्य, अहिंसा बदली, लाठी-गोली डंडे हैं,
कानूनों की सड़ी लाश पर प्रजातंत्र के झंडे हैं।।
सन्याल के सपनों का मर जाना

नक्सली आंदोलन के दौरान सन्याल भूमिगत हो गए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अगस्त 1970 में गिरफ्तार किया गया। और, उन्हें पार्वतीपुरम केस के मामले में विशाखपत्तनम जेल में सात साल की सजा काटनी पड़ी। गौरतलब है कि इस मामले को इतिहास का सबसे बड़ी साजिश वाला मामला माना जाता है, जिसमें इन पर आरोप था कि इन्होंने आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में जमींदारों के खिलाफ संगठित सशस्त्र आंदोलन की साजिश रची। इसी दरम्यान जुलाई 1972 में सन्याल के साथी मजूमदार को उनके गुप्त ठिकाने से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के 15 दिनों बाद ही उनकी मौत हिरासत में हो गई। लेकिन तब तक वामपंथी पार्टी बंगाल की सत्ता में आ चुकी थी। 1977 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने सन्याल की रिहाई में अग्रदूत की भूमिका निभाई।
अपनी रिहाई के बाद सन्याल ने हिंसा का रास्ता छोड़ एक कम्यूनिस्ट संगठन की नींव रखी। आगे चलकर संन्याल सीपीआई-एमएल के महासचिव बने। लेकिन एकबार फिर 18 जनवरी 2006 को इनको गिरफ्तार किया गया। इस बार ये बंगाल में चाय बगान के लोगों के समर्थन में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। फिर सिंगूर और नंदीग्राम में सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण के तौर तरीकों के खिलाफ भी अपना स्वर मुखर किया। उन्होंने बंगाल के सीपीआई-एम सरकार को बात को लेकर जमकर लताड़ लगाई कि वह अब पूंजीवादियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है।
यह भी बेहद दिलचस्प है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन की अगुआई करने वाले सन्याल ने अक्सर माओवादी आंदोलन की आलोचना की। वह भी तब जबकि वह इसके संस्थापकों में एक थे। लेकिन अब जो नक्सलवाद की हालत और विचारधारा हो गई थी उसकी वजह से अक्सर वह इसकी मुखालफत करते। वह इस बात से बेहद खफा थे कि ये माओवादी गरीबो और गरीब किसानों एवं आदिवासियों के अपना निशाना बनाते हैं।
कानू संन्याल और नक्सलवाद
कानू संन्याल ने मंगलवार को आत्म हत्या कर ली। इस बात पर यकीन नहीं हो रहा है। भारत में नक्सल मूवमेंट की नींव रखने वाला शख्स भला आत्महत्या कर ले, किसी को भला यकीन कैसे हो सकता है। संन्याल एक ऐसे क्रांति के जनक थे, जिसन भारत में कम्यूनिस्ट राजनीति की दशा और दिशा बदल कर रख दी। जब हम कानू संन्याल की बात करते हैं तो हमारे जेहन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि कौन थे कानू संन्याल? एक नजर यदि संन्याल 81 साल के जीवन इतिहास पर डालें तो सबसे पहली बात जो उनके बारे में कही जा सकती है, वह यह कि कानू संन्याल नक्सली आंदोलन के संस्थापक सदस्यों में एक थे। कुछ यूं जिंदगी शुरू हुई थी संन्याल की।साल 1932 में दार्जलिंग जिले के कुर्सियांग में एक शख्स का जन्म हुआ। यह आगे चलकर राजस्व विभाग में एक सामान्य कलर्क बना। लेकिन दरम्यान पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय को काला झंडा दिखाने के चलते इसे गिरफ्तार कर लिया गया। दरअसल इस शख्स ने भारत सरकार द्वारा कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया पर प्रतिबंध लगाने के फैसले का विरोध किय था। गिरफ्तारी के बाद संन्याल को जलपाईगुड़ी जेल में रखा गया। यहां इनकी मुलाकात सीपीआई के जिला सचिव सदस्य और भविष्य के कामरेड-इन-आर्म्स चारू मजूमदार से हुई। संन्याल जेल में मजूमदार की विचारधारा से बेहद प्रभावित हुए और छूटते ही उन्होंने सीपीआई की सदस्यता ले ली। आगे चलकर भारत-चीन के बीच हुए जंग को लेकर विवाद के बाद संन्याल सीपीआई-एम के साथ हो लिए। फिर संन्याल ने अपने वामपंथी क्रांतिकारी साथी चारू मजूमदार के साथ मिलकर 25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन की बुनियाद रखी। हालांकि इन दोनों के सशस्त्र आंदोलन को प्रशासन ने बड़ी बेरहमी से महज चंद महीनो में ही कुचल दिया, लेकिन इसके बावजूद नक्सलवाद एक विचारधारा के तौर खुद को जिंदा रखा। आगे चलकर इस विचारधारा ने माओवादी विद्रोह की शक्ल अख्तियार कर ली, जिसे आज भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया जा रहा है। इसकी वजह नक्सिलयों की ओर से की जाने वाली हिंसा बताई जाती है। पर राज्य की ओर से जो हिंसा होती है, उसका क्या? राज्य की हिंसा में जब हजारों बेगुनाह मौत की आगोश में चले जाते हैं उनका क्या? कही इसका मतलब यह तो नहीं राज्य को कानूनी तौर पर हत्या का अधिकार मिल गया है?
खैर, इस दौरान बहुत जल्द संन्याल अपने जुझारू और फायरब्रांड राजनीति के लिए पहचाने जाने लगे। फिर 1967 में उन्होंने उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में सशस्त्र किसान आंदोलन नेतृत्व किया। शुरु में यह सशस्त्र वामपंथी संघर्ष सरकार के विरुद्ध थी, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लपटें आंध्रप्रदेश और उड़ीसा जैसे दूसरे राज्यों में भी फैलने लगी। दरअसल उस दौरान मई 1967 में दार्जलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव में जमींदारों के अत्याचार और दमन के खिलाफ सशस्त्र किसानों का विद्रोह फूट पड़ा था। इस बगावत की अगुआई संन्याल और मजूमदार ने सक्रिय तौर पर की। यह आंदोलन किसानों के विद्रोह के तौर पर शुरु हुआ जो सामंती व्यवस्था खत्म करने की जिद ठाने बैठे थे। इस दौरान संन्याल और मजूमदार दोनों ने सशस्त्र विद्रोह का न सिर्फ समर्थन किया, बल्कि इसे सही भी ठहराया। जब प्रशासन आंख रहते हुए भी अंधा हो जाता है, सरकार कानों में रूई डालकर सो जाती है तो अक्सर ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं। हालांकि तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय की अगुवाई वाली राज्य पुलिस ने क्रूरता से इस आंदोलन को कुचल दिया। लेकिन असंतुष्ट और हाशिए पर रहने वालों और वंचित तबके का गुस्सा बंगाल में ज्वालामुखी की तरह आग उगलता रहा। इस आग का गवाह बना 1960 का आखिरी और 1970 का शुरुआती दशक। जारी.......
आख़िर कसूर किसका ?
