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हिंदुस्तान किससे लड़ रहा है? कोरोना या फिर मुसलमानों से...

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कोरोना धर्म देखकर नहीं होता। लेकिन धर्म देखकर आरोप लगाया जा रहा है कि किसी धर्म की वजह से कोरोना फैल रहा है। ख़ैर 'कोरोना धर्म देखकर नहीं होता इसलिए सबको एकजुट रहकर कोरोना से लड़ाई लड़नी है।' यह बिलकुल हालिया बयान है दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की। जबकि दिल्ली में ही धर्म देखकर कोरोना फैलाने के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार बताने की कई घटनाएं हुई हैं। मैं जहां रहता हूं, वहां का आंखों देखा हाल है। एक बीट कॉन्स्टेबल को कुछ लोग कहते हैं कि सब्जी बेचने वाले मुसलमानों को इस मोहल्ले में आने से रोकें। वह कॉन्स्टेबल मना कर देता है और कहता है कि मैं किसी को मुसलमान-हिंदू देखकर नहीं रोकूंगा। हालांकि, वह इससे रोकता भी नहीं है और कहता है कि अगर आपको हिंदू-मुसलमान देखकर रोकना है, तो रोको।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कह चुके हैं कि कोरोना से इस जंग को हमें मिलकर लड़ना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, कोरोना वायरस नस्ल, धर्म या पंथ के आधार पर भेदभाव नहीं करता है। इसलिए इसके खिलाफ हमारी लड़ाई में एकता और भाईचारे को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हम सभी इस लड़ाई में एकजुट हैं। हालांकि, उनकी यह प्रतिक्रिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन के मानवाधिकार संगठन द्वारा कोरोना वायरस के संदर्भ में मुसलमानों को निशाना बनाए जाने और देश में चलाए जा रहे इस्लामोफोबिक कैंपेन की निंदा करने के घंटों बाद आई। दरअसल, भारत में मुसलमान कोरोना वायरस संकट का खामियाजा भुगत रहे हैं। क्योंकि हर बात पर हर दिन यहां न्यूज चैनलों से लेकर सोशल मीडिया और लोगों के पर्सनल वॉट्सऐप ग्रुप में देश में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को लेकर मुसलमानों को हो दोषी ठहराया जा रहा है। यह दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के बाद 100 फीसदी पढ़ गया है। एक पार्टी विशेष के नेता और पार्टी से जुड़े संगठन कोरोना आतंकवादतक जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं। दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश यानी भारत में इस कोरोना वायरस संकट के बीच अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा, व्यापारिक बहिष्कार और नफरत फैलाने वाले बयानों में तेजी से वृद्धि आई है।
भारत में कोरोना वायरस के अभी तक 26 हजार 496 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। 824 लोगों की मौत हो चुकी है। अगर तबलीगी जमात के कोरोना मामलों को देखें, तो भारत में हर पांच से एक केस का ताल्लुक इसी से है। फिर बाकी चार का किससे है? मार्च में तीन दिनों धार्मिक जलसे में तकरीबन 8 हजार लोग इकट्ठा हुए थे। उसके पहले इस देश में कोरोना वायरस अपना रंग दिखाने लगा था। लेकिन मार्च की इस घटना के बाद देश में क्या चल रहा है? कोरोना का इस्लामीकरण। बड़ी सभाओं या देश में लॉकडाउन से पहले तबलीगी जमात ने दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में बड़ी धार्मिक सभा का आयोजन किया था। जमात के प्रवक्ता मुजीब-उर-रहमान का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 24 मार्च को 21 दिनों का लॉकडाउन लागू किए जाने के बाद वहां फंसे लोगों को रहने की जगह मुहैया कराई गई।
फिर छापे मारी हुई। कई विदेशी भी वहां से निकले। संक्रमण का खतरा बढ़ता चला गया। लोगों ने खुद को छिपाना भी शुरू कर दिया। देश में एक तरफ जहां कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों पर हमला हो रहा है। इलाज करने वाले डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को उनके पड़ोसी ही उनके खुद के घरों में रहने पर हंगामा मचा रहे हैं। एक डॉक्टर की मौत पर तो लोगों ने उनके दफनाने को लेकर बवाल मचा दिया। जब इस तरह का सोशल स्टिग्मा चल रहा हो, तो भला कौन खुद की पहचान जाहिर करेगा। हालांकि, जरूरत इस बात की है कि इसे लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाए, लेकिन जागरूकता अभियान की जगह मुसलमानों के खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है।
मुसलमानों को निशाना बनाकर झूठी खबरें/फेक न्यूज़ फैलाना शुरू कर दिया गया। कथित रूप से अधिकारियों पर उनके थूकने की खबरें फैलाई गई। बाद में यह झूठ साबित हुआ। सरकार की तरफ से भी कैसे इस बहस को आगे बढ़ाया गया, उसकी मिसाल भी देख लीजिए। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस धार्मिक कार्यक्रम का नाम लिया। ब्रिटिश अखबार की वेबसाइट मेल ऑनलाइन के मुताबिक, उन्होंने 5 अप्रैल को कहा कि वायरस के मामलों की संख्या के 4.1 दिनों में दोगुनी हो रही थी। यह रफ्तार 7.4 दिनों की होती, 'अगर तबलीगी जमात की वजह से कोरोना के अतिरिक्त मामले सामने नहीं आते।
उसी दिन दिलशाद मोहम्मद ने अपनी जान ले ली। हिमाचल प्रदेश के रहने वाले दिलशाद ने जमात के दो लोगों को अपनी बाइक पर लिफ्ट दी थी। और जमात को लेकर पूरे देश में दहशत और कलंक का माहौल इतना फैला दिया गया कि इससे उसने अपनी जान ले ली। वहां के एसपी ने भी इस आत्महत्या के मामले को स्टिग्मा यानी कोरोना को लेकर सामाजिक कलंक को जिम्मेदार ठहराया।
राजस्थान में एक गर्भवती मुस्लिम महिला को उसके धर्म के कारण सरकार अस्पताल में भर्ती करने से मना कर दिया गया। इसकी वजह से महिला के पेट में पल रहे सात महीने के बच्चे की मौत हो गई।
उत्तराखंड में कुछ हिंदू युवाओं ने फल बेचने वाले मुसलमान शख्स को सामान बेचने से रोक दिया। हालिया मामला यह है कि झारखंड के जमशेदपुर के कदमा में एक फल की दुकान पर लिखा था, विश्व हिंदू परिषद द्वारा अनुमोदित दुकान। मुसलमानों की दुकानों का बहिष्कार और इस तरह की दुकानों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
दिल्ली से सटे गुड़गांव के एक मस्जिद में गोलीबारी की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल को 15 मिनट के लिए अपनी स्वेच्छा से लोगों को घरों की लाइट बंद करने की अपील की। यह पूरी तरह से स्वैच्छिक था, लेकिन हरियाणा में एक मुसलमान परिवार ने लाइट बंद नहीं की, तो उसके पड़ोसियों ने हमला बोल दिया। यह तो चंद उदाहरण हैं।
इससे पहले डॉक्टर कोरोना को लेकर पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि कोरोना महामारी से अधिक इसे लेकर सोशल स्टिग्मा अधिक लोगों की जान ले सकता है। यहां पहले से ही मुसलमानों के खिलाफ रोज नई बहस खड़ा करने की कोशिश की जाती है और ऐसे में जब कोरोना वायरस ने भारत में दस्तक दी, तो मुस्लिम पहले ही बैकफुट पर नजर आए।

पालघर मॉबलिंचिंगः मर्ज को जाने बिना इलाज नामुमकिन है


महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस मॉब लिंचिंग में तीनों को जान गंवानी पड़ी। किसी ने उनके चोर होने की अफवाह उड़ा दी। इसके बाद दर्जनों लोगों की भीड़ उन पर टूट पड़ी। यह पूरी घटना वहां मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई। 110 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। लापरवाही के आरोप में महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने पुलिस के दो अधिकारियों को सस्पेंड किया है।
Photo: Express
एक अफवाह ने तीन बेकसूरों की जान ले ली। अब लाख कोशिश कर ली जाए... पुलिस को सस्पेंड करो, दोषियों को सजा दो, उन तीनों की जिंदगी तो वापस नहीं आ सकती न। इसलिए पालघर की लिंचिग घटना बेहद शर्मनाक है! लेकिन, आज जिस तरह कुछ वर्ग विशेष के चंद लोग इस घटना से तमतमाए हुए हैं, अगर पहले ही हम इस तरह की तमाम हिंसा पर सरकार से सवाल करते और जिम्मेदार ठहराते तो ऐसी नृशंस हत्या करने से पहले गुनहगार 100 बार सोचता... अगर मॉब लिंचिंग के आरोपियों को मोदी सरकार का कोई मंत्री फूल-मालाओं से स्वागत नहीं करता, तो ऐसी हिम्मत किसी क न होती। अगर मॉब लिंचिंग करने वालों के पक्ष में नारे नहीं लगाए जाते, तो ऐसी हिम्मत कोई नहीं कर पाता। और, आज दोनों साधु हमारे सामने जीवित होते। लेकिन नहीं, जब तक सहूलियत के हिसाब से मॉब लिंचिंग एक मजहब विशेष के लोगों के साथ होती रही, लोग चुप रहे। मरने वालों को चोर-उचक्का कहने लगे और मारने वालों का यशोगान करते रहे। ये भूल गए कि यह अफवाह एक भस्मासुर है और इस आग में एक दिन खुद भी भस्म होना होगा। फिर भी कुछ लोग सुधर नहीं रहे और पालघर में मॉब लिंचिंग की घटना में सांप्रदायिक ऐंगल निकालने में लगे हैं... पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर सौ से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया है। लेकिन कुछ निहायत घटिया लोग इसे सांप्रदायिकता का रंग देने में जुटे हैं।
जब मैंने कल इस पर सवाल उठाया, तो तकरीबन 15 साल से पत्रकार साहब ने उल्टा सवाल कर दिया। उनका कहना था कि इस पालघर लिंचिंग की घटना पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है, ना मीडिया गैंग, ना जमाती, ना जेहादी, ना वाम, ना हाथ, ना सेलेब्स, ना लिबरटार्ड... देश बोल रहा है। देश से उनका तात्पर्य था ट्विटर। जब सवाल किया कि क्या 1.3 अरब की आबादी ट्विटर पर है। ट्विटर पर कैसे चंद ट्रोल ट्रेंड कराने लगते हैं किसी विषय को और  क्या ट्विटर ही देश है, तो मुझसे सवाल पूछा गया कि चोर तबरेज के लिए ट्वीट करने वाले आम आदमी थे, साधु मारा गया सब ट्रोल ही ट्वीट कर रहे हैं। मतलब उनकी नज़रों में 24 साल का तबरेज अंसारी, जिसकी झारखंड में भाजपा की सरकार के दौरान मॉब लिंचिंग की गई, वह चोर था।
दरअसल, सारी समस्या की जड़ यही है। जब तक हम सहूलियत के हिसाब से घटनाओं को देखेंगे, पालघर जैसी मॉब लिंचिंग से बेकसूरों के जान गंवाने की वारदात होती रहेगी। अगर हमें इसे रोकना है, तो सारे मामले को एक चश्मे से देखना ही होगा।
सबसे पहले हमें सांप्रदायिकता के चश्मे को उतारना होगा। वरना जब अगस्त 2019 में पटना में 20 से अधिक अफवाह बच्चा चोरी की उड़ाई जाती है और भीड़ लाठी-डंडों से बेकसूबर दूसरे मजहब के लोगों की पिटाई कर हत्या कर देती है, तब हम कहां होते हैं?
सितंबर 2019 में जब भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह में मानसिक रूप से कमजोर और दिव्यांग मुस्लिम समुदाय के लड़के को पीटकर अधमरा कर देती है, तो हमारी आवाज़ कहां होती है? जब यूपी के ही संभल में ऐसे ही मामले में भीड़ मॉब लिंचिंग में हत्या कर देती है, तब भी खामोशी की चादर बिछी रहती है।  
पालघर में जिस बेरहमी से दोनों साधुओंपर भीड़ हमला कर रही है, वह बीभत्स है। पुलिस एक घर से उसे हाथ पकड़कर लाती दिख रही है। फिर अचानक भीड़ साधु को मारना शुरू कर देती है। पुलिस वाले खुद को बचाते दिख रहे हैं। जब पुलिस ऐसे भीड़ वाले मामले में खुद फंसती है, तो पहले अपनी जान बचाती नजर आती है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर हालात बेकाबू कहां से हुए। किन वजहों से इन वारदात को अंजाम दिया गया। हमें इस तरह की भीड़ की मानसिकता के तहत तक जाना होगा। वरना मर्ज को जाने बिना इलाज नामुमकिन है।
यही सही है कि इस तरह की वारदात के साथ कुछ तथाकथित (वामपंथियों और छद्म सेकुलरों) बुद्धिजीवियों का दोहरा चेहरा सामने आने लगता है। हालांकि, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश इन छद्म बुद्धिजीवियों से बना है। हमें उनसे भी पार पाना है और इस तरह की मॉबलिंचिंग की मानसिकता और इसे बढ़ावा देने वाली सोच से भी। यह दोनों तरफ के लोग हैं।
अब जैसा कि पहले ही कहा कि इसमें भी कुछ निहायत ही घटिया और संकीर्ण सोच वाले लोग सांप्रदायिकता का एंगल तलाश रहे हैं।

मोदी के भारत में कोरोना वायरस ने बढ़ाई हिंदू-मुसलमानों की खाई


यह भारत सवा अरब भारतीयों का है। इसी सवा अरब भारतीयों पर कोरोना वायरस महामारी का संकट भी है। अब वैश्विक संकट है, तो दोष सरकार पर नहीं ही लगाया जा सकता है। लेकिन इस संकट के समय में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, उसके लिए सरकार जरूर जिम्मेदार है।
मीडिया हाउस अल-जजीरा की ख़बर है कि गुजरात के अहमदाबाद के सरकारी हॉस्पिटल में कोरोना मरीजों का इलाज हिंदू मरीज और मुस्लिम मरीज के आधार पर किया जा रहा है। गुजरात के इस सरकारी अस्पताल में कोरोना के हिंदू मरीजों के लिए अलग वॉर्ड है, तो मुसलमानों के लिए अलग। दावा यह कि ऐसा करने के लिए सरकार से आदेश आया है।आमतौर पर किसी भी अस्पताल में किसी भी वॉर्ड को पुरुष और महिला वॉर्ड के तौर पर बांटा जाता है। लेकिन, यहां के सरकारी अस्पताल में मुस्लिम वॉर्ड और हिंदू वॉर्ड के तौर पर बांटा गया है, ताकि कोरोना वायरस के मरीजों का इलाज किया जा सके। इंडियन एक्सप्रेस से अहमदाबाद सिविल हॉस्पिटल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉक्टर गुनवंत एच. राठौड़ कहते हैं, यह सरकार का फैसला है और आप सरकार से ही इस बार में पूछिए। यह उसी गुजरात के हॉस्पिटल की कहानी है, जहां 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी 2001 के बाद से लगातार 13 साल तक मुख्यमंत्री थे।
अब कहानी को थोड़ा मोड़ते हैं। बात 12 अप्रैल की है। तमिलनाडु के मदुरै में जलीकट्टू और धार्मिक यात्राओं में शामिल होने वाले एक बैल के अंतिम संस्कार में हजारों की संख्या में लोगों की भीड़ जुट गई। 15 अप्रैल की बात है। मुंबई के बांद्रा की ही तरह दिल्ली में हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर यमुना किनारे जमा हो गए। राजस्थान के जैसलमेर के पोखरण क्षेत्र में भी मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन जैसे हालात पैदा हो गए। देश में लॉकडाउन को फिर से 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा के बाद प्रवासी मजदूर यहां जुटने लगे। कुछ ही समय में सैकड़ों प्रवासी मजदूर परिवार सहित सड़कों पर उतर आए। इनमें अधिकांश यूपी और बिहार राज्यों के कामगार थे, जिनकी मांग थी कि उन्हें  अपने-अपने राज्य लौटने की इजाजत दी जाए। भले ही ट्रेन या बस से नहीं, तो पैदल ही, लेकिन जाने दिया जाए।
उधर, गुजरात के सूरत में 14 अप्रैल के बाद 15 अप्रैल को भी लगातार दूसरे दिन प्रवासी मजदूरों की भीड़ सड़कों पर नजर आई। दरअसल, सूरत के कारखानों में काम करने वाले उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों के हजारों प्रवासी यहां फंस गए हैं। पर चर्चा और बहस का केंद्र मुरादाबाद और मुसलमान। तो फिर पंजाब में निहंगों का हमला क्यों नहीं? हालांकि, यह सही है कि एक हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा नहीं है। फिर भी बहस का केंद्र घूमफिर कर मुसलमान ही क्योंयह सच है कि चंद मुसलमानों की वजह से साख का संकट गहरा रहा है, लेकिन यही बात सरकार पर भी तो लागू होती है।
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महाराष्ट्र में लोगों को सड़कों पर आने के लिए उकसाने वाला विनय दुबे क्यों नहीं मीडिया के बहस के केंद्र में आता है। क्यों नहीं विनय और निहंग समुदाय की हिंसा के बाद इनके पूरे समुदाय पर सवाल उठने लगते है? क्यों फेसबुक से लेकर ट्विटर तक पर एंटी मुसलमान विषय ट्रेंड करने लगते हैं? इसकी वजह भी है। वजह यह है कि जब पहले से ही मन-मस्तिष्क में एजेंडा भरा हो, तो आपको सिर्फ वही दिखाई देता है और उसे शह मिलती है सत्तारूढ़ सरकार से।
कुल मिलाकर कोरोनो वायरस महामारी के दौरान देश के हिंदुओं और अल्पसंख्यक मुसलमानों की एक बड़ी आबादी के बीच खाई बढ़ी ही है। कहां तो उम्मीद थी कि इस संकट में महामारी के खिलाफ पूरा देश एकजुट होकर लड़ेगा। लेकिन, मीडिया और कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी और मुसलमान विरोधी या फिरकापरस्त तबके को ज़रा भी मौका मिलता है, वह मुसलमानों के खिलाफ हो-हल्ला शुरू कर देता है। दरअसल, मोदी सरकार में मुसलमानों का या उनके प्रति अविश्वास कुछ महीने पहले नागरिकता संशोधन कानून और फिर एनआरसी की चर्चाओं को लेकर तेज हुआ। अभी तक आधिकारिक तौर पर कोरोना वायरस फैलने को लेकर किसी धर्म को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। लेकिन दिल्ली के निजामुद्दीन से तबलीगी जमात का मामला सामने आने के बाद कई मुसलमानों को लगता है कि इस संक्रमण के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसे लेकर बेहद ही सनसनीखेज तरीके से न्यूज चैनलों और अखबारों द्वारा खबरों की रिपोर्टिंग की गई। एक बहस शुरू की गई कि देश में कोरोना फैलने की वजह मुसलमान ही हैं। फिर हिंदुत्व के कुछ झंडाबरदार नेता भी इस बहस में कूद पड़े। सोशल मीडिया पर कोरोना जिहाद ट्रेंड कराया जाने लगा। तबलीगी जमात के कार्यक्रम से जुड़े करीब 1000 लोगों में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई। कुछ मुस्लिम नेताओं का कहना है कि चंद लोगों में यह गलतफहमी थी या फिर उनकी एक सोच हो गई कि उनके मजहब में यह नहीं फैलेगा। यह भी कि कहीं उनके खिलाफ साजिश तो नहीं। लेकिन, उनका यह भी कहना है कि इसे लेकर मस्जिदों से इस तरह की गलतफहमी दूर करने की कोशिश भी हो रही थी।
आखिर ऐसा क्यों हुआ कि मुसलमान इस तरह की सोच रखने लगे। गुजरात के एक मुस्लिम नेता का कहना है कि सरकार और सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति मुसलमानों में गहरा अविश्वास है। वह बताते हैं, इस तरह के लोगों को यह समझाने में काफी कोशिश करनी पड़ी कि मेडिकल सुविधाओं और इलाज के लिए डॉक्युमेंट्स की जरूरत पड़ती है।
ऐसे में जब कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में स्वास्थ्यकर्मी कोरोना के मामलों का पता लगाने गए, तो कुछ मुसलमानों को लगा कि यह अवैध प्रवासियों का डेटा इकट्ठा करने की सरकारी कवायद है।
यह सिर्फ भारत में ही है कि अगर किसी समुदाय की वजह से संक्रमण बढ़ रहे हैं, तो उसके खिलाफ एक पल में एक फौज खड़ी नजर आने लगती है। सिर्फ भारत में ही है कि धर्म के आधार पर कोरोना से जंग लड़ी जा रही है। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल के शिनचोनजी चर्च के 61 साल महिला में कोरोना के लक्षण थे। वह इस बात से अनजान रही और चर्च की सार्वजनिक बैठकों में शामिल होती रही और कोरोना संक्रमण फैलता चला गया। बात 18 फरवरी की है। उस दिन महिला को कोरोना पॉज़िटिव पाया गया। तब दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस के सिर्फ 31 मामले थे। 28 फरवरी को यह संख्या 2000 से ज़्यादा हो गई थी।
इसी तरह फ्रांस के म्यूलहाउस शहर के एक चर्च में पांच दिनों का सालाना कार्यक्रम हुआ, जिसमें यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के हजारों लोग शामिल हुए। म्यूलहाउस शहर फ्रांस की सीमा को जर्मनी और स्विट्जरलैंड से जोड़ती है। इस सालाना धार्मिक उत्सव में कोई कोरोना पॉजिटिव था, जिससे पूरे फ्रांस और अन्य देशों में कोरोना फैला। करीब 2500 पॉजिटिव केस का लिंक इसी से जुड़ा पाया गया।
इस तरह के कई मामले हैं, जहां धार्मिक सभा या कार्यक्रमों की वजह से कोरोना के खिलाफ लड़ाई कमजोर हुई। लेकिन किसी भी देश ने धर्म विशेष को निशाना नहीं बनाया। लेकिन हमारे यहां क्या हो रहा है। हमारे एक साथी हैं मनीष। वह लिखते हैं, तबलीगी जमात के जिस मौलाना साद के बारे में पुलिस और मीडिया ने खबर उड़ाई कि वह फरार है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है। बाद में पता चला कि यह झूठ था और साद अपने घर में आइसोलेशन में है। कोविड-19 टेस्ट में निगेटिव पाए जाने के बाद भी उसकी गिरफ्तारी/हिरासत की कोई खबर नहीं आई है। उधर, दिल्ली के ही डिफेंस कॉलोनी में गार्ड मुस्तकीम के बारे में भी यही खबर उड़ाई गई कि वह फरार है और पुलिस को उसकी तलाश है। बाद में पता चला कि यह भी झूठ था और उसे उसके घर में ही क्वारंटीन/आइसोलेशन में रखा गया था और टेस्ट में अब उसकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। हां, रिपोर्ट आने से पहले ही उसके खिलाफ केस जरूर दर्ज हो गया।
सबसे बड़ी बात कि इन तमाम तरह के हथकंडों और सांप्रदायिक ख़बरों को लेकर सरकारी सुस्ती और निष्क्रियता ही दिखती है।

कोरोना वायरस से जंग में हिंदू-मुसलमान और थूकने, छिपने, वायरस फैलाने की खबर... सब फेक न्यूज़ है !


यह सच है कि दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की वजह से देश में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग को नुकसान पहुंचा। इसकी वजह से कोरोना के हज़ारों मरीजों की संख्या बढ़ गई। कुछ अप्रत्याशित ख़बरें भी आईं। ऐसी ख़बरें आईं, जो साफ़ बताती है कि हमारा मीडिया कैसे इस्लामोफोबिया से ग्रसित है। इसकी वजह से वह फेक न्यूज़ फैलाने से भी बाज नहीं आता। ट्विटर पर दो मामलों में तो उत्तर प्रदेश पुलिस को बाकायदा चेतावनी तक देनी पड़ी। 
पहला मामला सहारनपुर का है, यहां ख़बर चलाई/छापी गई कि यहां क्वारंटीन किए गए तबलीगी जमात केलोग खाने में नॉनवेज न मिलने पर हंगामा कर रहे हैं। बाहर खुले में ही शौच कर देरहे हैं। सहारनपुर पुलिस ने बाकायदा नोटिस चस्पा करके इसका खंडन किया। पुलिस ने साफ कहा की ख़बर के बाद मामले की जांच की गई जो ग़लत निकली। फेक न्यूज़ थी। लेकिन इसका खंडन कहीं छपा नहीं। वैसे भी इस तरह एक धर्म विशेष के ख़िलाफ़ ख़बरे प्रमुखता से छपती हैं और खंडन कोने में। खंडन की यही विडंबना है। वैसेऐसी महामारी में झूठी खबरें फैलाने वाले किस जमात के लोग हैं? इनकी खबर कौन लेगा?
इसी तरह उत्तर प्रदेश के औरेया ज़िले का एक मामला है। यहां वॉट्सऐप के जरिए अफवाह फैलाई गई कि दिल्ली से आए 4-5 जमाती छिपे रहे और बाद में गायब हो गए। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की तो ख़ुद को पत्रकार कहने वाले एक शख्स को गिरफ्तार किया।
एक मामला है मशहूर न्यूज एजेंसी एएनआई का। एजेंसी ने डीसीपी के हवाले से ख़बर चलाई कि उत्तर प्रदेश के ही नोएडा के सेक्टर-5 के हरोला में तबलीगी जमात के संपर्क में आने वाले लोगों को क्वांरटीन किया गया है। बाद में डीसीपी नोएडा ने इसका खंडन किया और कहा कि हमने तबलीगी जमात का नाम नहीं लिया था। कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आने वाले लोगों को नियमों के हिसाब से क्वारंटीन किया गया है।डीसीपी नोएडा ने साफ कहा कि आप (न्यूज़ एजेंसी) गलत बात को कोट कर रहे हैं और फेक न्यूज फैला रहे हैं।
इसी तरह ज़ी न्यूज के उत्तरप्रदेश/उत्तराखंड ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया कि फिरोजाबाद में चार तबलीगी जमाती कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं औऱ जब उन्हें लेने मेडिकल टीम गई, तो उन पर पथराव किया गया। इस पर फिरोजाबाद पुलिस ने ट्विटर पर जवाब दिया कि आपके द्वारा असत्य और भ्रामक खबरे फैलाई जा रही हैं। फिरोजोबाद में न ही किसी मेडिकल टीम और न ही किसी एम्बुलेंस पर पथराव किया गया है। फिरोजाबाद पुलिस ने तत्काल जी न्यूज को ट्वीट डिलीट करने को कहा। इसके बाद जी न्यूज की तरफ से ट्वीट डिलीट भी कर दिया गया। यानी फेक न्यूज फैलाने वाले को बैकफुट पर आना पड़ा।
बात यहीं नहीं थमती। यह तो मेन स्ट्रीम मीडिया का हाल है। सोशल मीडिया पर भी इस तरह की कई बातें फैलाई जा रही हैं, जिनका सच्चाई से दूर-दूर तक लेना नहीं है। फैक्ट चेक वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के मुताबिकफेसबुक पेज हिंदुस्तान की आवाज़ लाइव ने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, देखिए 14 दिन के एकांतवास में भी इन तबलीगी जमात के लोगों ने अश्लीलता और आतंक मचा रखा है…… क्वारंटीन में जमकर किया हंगामा। #सरम नाम की सारी हदें कर दी पार #खेला नंगा नाच. वीडियो हुवा वाइरल# प्रशासन है इन लोगो से परेशान#” ऑल्ट न्यूज ने जब फैक्ट चेक किया तो पता चला कि मामला तो पाकिस्तान का है। वहां के एक पुराने वीडियो को इस गलत दावे से शेयर किया जा रहा था कि आइसोलेशन वॉर्ड में तबलीगी जमात के लोग नंगा घूम रहे हैं और तोड़-फोड़ कर रहे हैं।
यह सारा शुरू हुआ निजामुद्दीन वाला मामला सामने आने के बाद। जब से जमात वाली ख़बर आई, तब से #CORONAJIHAD और #NizamuddinIdiot जैसे हैशटैग से मुसलमानों के खिलाफ तरह-तरह की फर्जी खबरें यानी फेक न्यूज और अफवाहें फैलाई जा रही हैं। फेक न्यूज़ ऐसी बाढ़ आई कि एक डॉक्यूमेट्री फिल्ममेकर यूसुफ सईद ने सोशल मीडिया पर पिछले कुछ सप्ताह के दौरान इन तमाम फेक न्यूज की लिस्ट बनानी शुरू कर दी। वह कहते हैं, ‘हम उनकी लापरवाही के लिए तबलीगियों का बचाव नहीं कर रहे हैं।लेकिन, इस तरह की फेक न्यूज़ का मकसद क्या है? सईद ने 5 अप्रैल को अपने फेसबुक पेज पर कुछ फर्जी यानी फेक न्यूज की रिपोर्ट और उससे जुड़े स्पष्टीकरण को पब्लिश किया है।
इनमें से एक उदाहरण देता हूं कि कैसे तबलीगी जमात का मामला सामने आने के बाद मुसलमानों से संबंधित पुराने वीडियो शेयर करने की बाढ़ आ गई है। जैसे- एक वीडियो खूब वायरल हुआ, जिसमें कुछ मुसलमान बर्तन को थूक से जूठा कर रहे हैं। वीडियो शेयर करने के दौरान कहा गया कि कोरोनो वायरस फैलाने के लिए जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है। बाद में पता चला कि यह वीडियो 2018 का था। इसमें दाउदी बोहरा संप्रदाय के सदस्यों ऐसा कर रहे थे। दरअसल, दाउदी बोहरा संप्रदाय अनाज का एक भी दाना बर्बाद न करने में विश्वास करता है। इस वीडियों में वे बर्तन नहीं चाट रहे थे या जूठा कर रहे थे, बल्कि उसे धोने से पहले साफ कर रहे थे।
तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आख़िर कोरोना वायरस के नाम पर हम क्या कर रहे हैं? दरअसल, हमारे देश में जब तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात का मामला सामने नहीं आया था, तब तक कोरोना से हमारी जंग सही चल रही थी। टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने दिल्ली दंगों के बाद हिंदू-मुसलमान बंद ही किया था कि यह एक नई महामारी आ गई। उनकी मेहनत और ऊर्जा वैसी नहीं दिख रही थी, क्योंकि देश एकजुट होकर इस वैश्विक आपदा का सामना कर रहा था। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम की मीडिया तक में हम एकजुट होकर लड़ रहे थे, लेकिन तभी नया मसाला मिला। तबलीगी जमात का। यहीं से कोरोना से जंग ने रुख मोड़ लिया।

ईश्वर-अल्लाह ''किसका'' नाम

मलेशिया की अदालत ने वर्ष 2009 में हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए फैसला दिया है कि देश में गैर-मुस्लिम अल्लाह शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते हैं. वर्ष 2009 में मलेशिया की उच्च न्यायालय ने भगवान को संबोधित करने के लिए अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की इजाजत दी थी, लेकिन अब कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह फैसला दिया. तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से हाईकोर्ट द्वारा 2009 में दिए गए उस फैसले को पलट दिया, जिसने मलय भाषा में छपने वाले अखबार 'द हेराल्ड' को अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की अनुमति दी थी. इस फैसले के पीछे मुख्य न्यायाधीश का तर्क था कि अल्लाह शब्द का प्रयोग ईसाई समुदाय की आस्था का अंग नहीं है. इस शब्द के इस्तेमाल से समुदाय में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी. मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने दलील दी थी कि अल्लाह शब्द मुस्लिमों के लिए बहुत विशिष्ट है. 
गौरतलब है कि 2008 में तत्कालीन गृहमंत्री ने अखबार को इस शब्द के इस्तेमाल की इजाजत देने से इन्कार कर दिया था. इसके बाद अखबार ने इसके खिलाफ अदालत में अपील की. 2009 में अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया. इस फैसले के बाद चर्चों और मस्जिदों को निशाना बनाया गया था. गौरतलब है कि मलेशिया की 2.8 करोड़ की आबादी में दो तिहाई मुसलमान हैं, जबकि नौ प्रतिशत आबादी ईसाइयों की है. ऐसे में अदालत के फैसले से चार साल पुराने विवाद को हवा मिलेगी. विवाद अल्लाह से जुड़ा है. वहां मलय जाति समूह के लोग कैथोलिक ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल को लेकर विरोध करते रहे हैं. इन लोगों को लगता है कि अल्लाह शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ वही कर सकते हैं, न कि कैथोलिक ईसाई. अधिकारों के इस लड़ाई की सुनवाई कोर्ट में भी हुई थी. कोर्ट ने भी ईसाइयों को अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी थी. हालांकि सरकार ने कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज़ कर दिया. सरकार ने सर्वोच्च कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने के इरादे से ऐसा नहीं किया है. बल्कि सारा विवाद भावनात्मक तौर पर इस क़दर उलझ चुका है कि इसे राजनीतिक तौर पर सुलझाना मुश्किल हो रहा है. सारा विवाद उस व़क्त सामने आया था, जब एक चर्च ने गॉड (ईश्वर) शब्द का अनुवाद अल्लाह शब्द के तौर पर किया. इस विवाद की वजह से हिंसा भी हुई. कुछ दिन पहले तीन चर्चों पर हमला किया गया. साठ के दशक मलयों और चीनियों के बीच हुई हिंसक घटनाओं को छोड़ दें, तो कुल मिलाकर वहां हमेशा शांति बनी रही है. लेकिन, एकबार फिर मलय-ईसाई एवं मलय-हिंदुओं के बीच संबंध बिगड़ने लगे हैं. इसी से तनाव पैदा हुआ है. जब ईसाइयों ने अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया तो मलयों ने इसकी मुख़ालफ़त की. उनके मुताबिक़ इससे भ्रमकी स्थिति पैदा होगी. वहीं ईसाई मिशनरी के मुताबिक वे अल्लाह शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह उनका अपना तर्क हो सकता है. पर दिक्कत यह है कि कुछ राजनेता इन विवादों को अपने फ़ायदे के हिसाब से भुनाना चाहते हैं. 
दरअसल, जो लोग ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं, उनके पास विरोध की वाजिब वजह नही है. अल्लाह एक हैं और उसने हम सभी को बनाया है. इसलिए इसके इस्तेमाल पर किसी एक मजहब का हक़ नहीं हो सकता है. यदि ग़ैर मुसलमान भी गॉड या ईश्वर के लिए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो मुसलमानों को इसका स्वागत करना चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि इसके ज़रिए लोग इस्लाम को समझने की कोशिश कर रहे हैं, न कि इस्लाम पर अपना कब्जा कर रहे हैं. इसलिए होना तो यह चाहिए कि मलयों को उदारवादी बन कर इस्लाम के उदार चेहरे से लोगों को वाक़िफ करांए. आज जबकि हर तरफ आतंकवाद की बात हो रही है और लोग आतंकवाद का मतलब इस्लामिक आतंकवाद से ही लगा रहे हैं, जो कि कतई सही नहीं है. ऐसे में इस तरह के नज़ीर से सकारात्मक संदेश लोगों तक पहुंच सकेगा.

इस्लाम में हाथ मिलाना गुनाह है?

पुरुष महिलाओं से और महिलाएं पुरुषों से हाथ नहीं मिला सकते।
नार्वे का रानी सोंजा पिछले साल इस्लामिक सांस्कृतिक केंद्र घूमने गईं। वहां के इमाम ने उनसे हाथ मिलाने से साफ मना कर दिया। हॉलैंड का भी मामला ठीक इसी तरह का है। इस देश में भी हाथ मिलाने या न मिलाने की घटना सुर्खियों में छाईं हैं। हालांकि हॉलैंड की सरकार ने अपने मुल्क के इमामों को कहा है कि आप हमारे मुल्क की परंपराओं और रीति रिवाजों का सम्मान करें। दरअसल यहां का मामला यह है कि डच सरकार की एक महिला मंत्री रिटा वर्डोंक मुसलमानों की एक संस्थान के समारोह में पहुंची। जब उन्होंने इमाम से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया तो इमाम ने उनसे हाथ मिलाने से मना कर दिया। इस पर डच सरकार की इस महिला मंत्री ने इमाम साहब से बड़े अदब से कहा कि मुझे लगता है अभी हमें एक-दूसरे को समझने की जरूरत है। ठीक इसी तरह इमाम के साथ या आसपास खड़ी मुस्लिम महिलाओं ने भी मंत्री साहिबा के पुरुष अधिकारियों से हाथ मिलाने से मना कर दिया। इस तरह देखें तो बुर्का की तरह हाथ मिलाना या न मिलाना भी बड़ी तेजी से एक मुद्दा बनता जा रहा है।
पर सबसे दिलचस्प बात यह है कि स्वीडन कोर्ट के फैसले से पहले इस तरह का मसला कभी सुना नहीं गया। इसके बाद स्वीडन की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के महिला विंग की प्रमुख नलिन पेगुल (वह खुद कुर्द जाति की हैं) ने इस पूरे मामले की मुखालफत की। उन्होंने कुरआन का हवाला देते हुए जोर शोर से कहा कि इस्लाम कभी महिलाओं को यह नहीं कहता कि आप पुरुषो से हाथ न मिलाएं या पुरुष महिलाओं से हाथ न मिलाएं। उन्होंने इसके लिए कई मुस्लिम मुल्कों का उदाहरण भी दिया। कहा कि मुस्लिम तहजीब में कुछ देशों में मुस्लिम महिलाएं पुरुषों से हाथ मिलाती हैं तो कुछ मुल्कों में वह ऐसा नहीं करती हैं। यह एक पूरी तरह सामाजिक और सांसकृतिक मसला है।
हम सांस्कृतिक मामलो को सुलझाने के लिए मजहब का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। हाथ मिलाना या न मिलाना किसी समाज की सामाजिक संबंधों या सांस्कृतिक मूल्यों की पहचान का मसला है। पश्चिमी मुल्को में महिलाओं से हाथ न मिलाना उनका अपमान करना माना जाता है। यहां तक कि यदि आप उनसे मजहब के नाम पर हाथ मिलाने से मना करते हैं तो भी। वह भी खासकर ऐसे मामलों में जब किसी को बधाई या शुभकाममाएं दे रहे हों। इस तरह देखें तो स्वीडन की अदालत ने अपना यह फैसला देकर, कि कोई भी धर्म के नाम पर हाथ मिलाने न मिलाने को आजाद है, एक गलत और खतरनाक फैसला दिया है। इस तरह धर्म और संस्कृति या मजहब और तहजीब में घालमेल से कई और विवाद पैदा होंगे।
दरअसल इन सारे मामलों की हकीकत यह है कि बुर्का, हाथ मिलाना या न मिलाना, अलग मदरसा और इस तरह के कई मुद्दे चरमपंथी राजनेताओं के चोंचले होते हैं। ये चरमपंथी, अतिवादी और अलगाववादी ताकतें बुर्का पर पाबंदी को लेकर या जब इनके हित की बात होती है तो मानवाधिकार का रोना रोने लगते हैं, जब मामला पुरुष और महिलाओं के हाथ मिलाने का आता है तो मजहब का सहारा लेने लगते हैं। पर जब सही मायनो में बात मजहब या धर्म की आती है तो ये मजहबी लोग किसी की परवाह नहीं करते हैं।

इस्लाम बनाम विवादों की कहानी

कोई भी धर्म विवादों से अछूता नहीं है। पर बुर्का के बाद अब एक नया विवाद खड़ा हो गया है। हाथ मिलाने का विवाद। जी हां। यदि आप मुसलमानों से हाथ मिलाते हैं तो आपको जुर्माना देना होगा। इसकी वजह यह है कि इस्लाम में इसे हराम माना गया है। पर जरा ठहरिए। आप मुझे गलत समझे इससे पहले मैं सारा माजरा ही साफ किए देता हूं। कहानी भारत की नहीं है। होता तो अब तक शायद बहुत बड़ा बवाल खड़ा हो जाता। हमारी हिंदू सेना (आरएसएस, विश्वहिंदू परिषद और राम सेना) या कई राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने तरीके से इनका मरम्मत करने में जुट जातीं। मामला स्वीडन का है। यहां की एक सरकारी संस्था ने 60,000 स्वीडीश क्रोनर (स्वीडीश मुद्रा) एक मुसलमान को जुर्माने के तौर पर देने का हुक्म दिया है। साल 2006 में एक शख्स ने दक्षिणी स्वीडन की एक कंपनी में काम करने के लिए इंटरव्यू दिया। अपने इंटरव्यू के दौरान उसने कंपनी की महिला सीईओ से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। इंटरव्यू के बाद उस मुस्लिम युवक के आवेदन को फाड़ दिया गया यानी उसे नौकरी नहीं मिली। यहां हम आपको बता दें कि एक सच्चा और सक्रिय मुसलमान होने के नाते उस शख्स ने महिला सीईओ से हाथ मिलाने से मना कर दिया था। इसकी कोई दूसरी वजह नहीं थी। हालांकि कंपनी की महिला सीईओ के मुताबिक, उस मुस्लिम युवक के आवेदन को उसके बधाई देने के तरीके की वजह से रद्द नहीं किया गया। पर हां, जिस तरह से उसने मेरे साथ व्यवहार किया, उससे मुझे बेइज्जती का एहसास हुआ। मुझे अपमान का एहसास हुआ। उस लड़के ने मेरे अलावा सभी से हाथ मिलाया। जब उस लड़के का जॉब में सेलेक्शन नहीं हुआ तो उसने स्वीडन के पब्लिक एंप्लॉयमेंट सेंटर में मामले के खिलाफ अपील की। हालांकि वहां उस मुस्लिम लड़के की यीचिका को खारिज कर दिया गया। फिर वह लड़का स्वीडन के भेदभाव की सुवाई करने वाले लोकपाल अदालत में मामले को लेकर गया। कोर्ट ने लड़के के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी मुसलमान को धार्मिक वजहों के चलते एक महिला से हाथ न मिलाने का पूरा अधिकार है। इसलिए इस आधार पर उसकी नौकरी रद्द नहीं की जा सकती है।
इसी तरह का एक किस्सा और है। उसे अगले पोस्ट में आपके सामने लेकर हाजिर होऊंगा।

होली में हिंदूवादी होने का भय!

आज होली का दिन है। रंगों से सराबोर उत्सव। पर कुछ और कहना या पूछना चाहता हूं। आप कह सकते हैं जानना चाहता हूं। दरअसल मुझे हमेशा इस बात का भय बना रहता है कि कहीं मैं भी हिंदू कट्टरवादी, संघी मानसिकता या एक तरह से कहें कि एक्सट्रमिस्ट न समझ लिया जाऊं। असल मुद्दे पर आने से पहले मैं आप से अपनी व्यक्तिगत बातें कहना चाहता हूं। कहना इसलिए चाहता हूं कि ये बातें अक्सर मुझे कचोटती है। हाल में भारत के मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन का मसला उठा तो यह काफी हद तक प्रासंगिक भी लगा। दरअसल बात कुछ साल पहले की है। यानी मेरे कॉलेज के दिनों की। करीब तीन साल हुए। हमारे एक गुरूजी कहते थे कि आजकल हम और आप भगवन का नाम उतना नहीं लेते, जितना कि समाज के निचले वर्ग के लोग। चाहे वह दलित हो या महादलित अथवा उनके भी नीचे के लोग। हम और आप हमेशा संबोधन में गुड मॉर्निंग या नमस्ते बोलते हैं। पर वे लोग राम राम बाबूजी या किसी और भगवान का नाम लेकर आपसे या हम से कुशल खैर पूछते हैं। बात सही भी है। आज के आधुनिक युग में हमें या आपको ऐसे संबोधन में शर्मिंदगी महसूस होती है। लेकिन इत्तेफाक से मेरी आदत है कि जब मुझसे कोई पूछता है कि आप कैस हैं या क्या चल रहा है तो मैं जवाब देता हूं, सब बजरंग बली की कृपा है। पहले तो कॉलेज में मुझे मेरे साथियों ने शक की निगाहों से देखा। वजह हमारे एक सर का नाम ही बजरंग बिहारी तिवारी था। यानी दूसरे शिक्षक भी आंख दिखाने लगे कि यह उसके ग्रुप का है। कॉलेज के बाहर आया तो लोग कहने लगे कि भई तुम संघी मानसिकता के हो... आरएसएसवादी हो....अब भला मैं उन्हें कैसे बताऊ कि मुझे भी अक्सर इसी बात का डर बना रहता है...अपने एक मित्र को मैंने फोन किया और बोला भई राम राम कैसे हो...जवाब मिला तुम संघी हो गए हो...मैंने कहा यह गंभीर समस्या आन पड़ी है, मेरे सामने...उसने मेरी स्थिति समझते हुए कहा दरअसल दिक्कत यही है। आज जमाना बदल रहा है। मान-सम्मान या सिविल सोसायटी में अपनी जगह बनानी है तो अल्ला का नाम लेना शुरू कर दो...उसने कहा तुम हजार बार अल्ला का नाम लो तुम्हें को ई कुछ नहीं कहेगा, पर एकबार राम कानाम लोग तुम्हे सब मजहबी कहने लगेंगे...आज जो अल्पसंख्यकों की बात करता है, वहीं धर्मनिरपेक्ष माना जाता है। पर मैंने कहा भई मैं तो राम और हनुमान का ही नाम लूंगा और वंचितों के हित की बात करूंगा, चाहे वह किसी मजहब का हो या जाति का...जवाब सुनकर मैं दंग रह गया...तब तो तुम गए, तुम्हारा कुछ नहीं होने वाला...तभी से मैं अपनी धर्मनिरपेक्षता को लेकर धर्मसंकट मे फंसा हूं....

चंद चरमपंथी धर्म के ठेकेदार नहीं हो सकते

ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द का इस्तेमाल से भय स़िर्फ उन्हीं लोगों को हो सकता है, जो यह समझते हैं कि मजहब का पालन केवल भाषाई तौर पर ही होता है. आज मलेशिया में मलय और मुसलमान एक दूसरे की पहचान बन चुके हैं. ऐसे में इस तरह के भय को सही कैसे ठहराया जा सकता है?
कुछ साल पहले की बात है. एक मलय मुसलमान ने इस्लाम धर्म से दूसरा धर्म अपना लिया. इस पर का़फी शोर शराबा हुआ. यहां तक कि शरिया अदालत ने उसे सज़ा भी दी थी. उसे फिर से इस्लाम धर्म को क़बूलना पड़ा. ऐसे में भला इस बात को न्यायोचित कैसे ठहराया जा सकता है कि पूरा जनसमुदाय धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन जाएगा. और, आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में कोई किसी को क़ानून का भय दिखाकर अपना मज़हब बदलने से नहीं रोक सकता है. यदि कोई धर्म परिवर्तन करता है तो यह मसला अल्लाह और उसके बीच का है. इन मामलों में कोई इंसान स़िर्फ ख़ुदा के प्रति ही जवाबदेह होता है.
फिर भी, यदि सही मायनों में देखें तो यह सारा मसला मज़हबी नहीं, बल्कि राजनीतिक है. बहुसंख्यक समुदाय यह महसूस करता है कि वह अल्पसंख्यक बन जाएंगे. इसीलिए वह इसकी मुख़ाल़फत कर रहे हैं. भारत में हिंदुवादी ताक़तें भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में क़ानून बना रहे हैं. ताकि वह हिंदुओं को ईसाई या मुसलमान बनने से रोक सकें. लेकिन, यदि कोई मुसलमान या ईसाई हिंदु धर्म क़बूलता है तो वह इसका स्वागत करते हैं. इस तरह यह मसला राजनीतिक स्वार्थ से जुड़ा है, न कि धर्म परिवर्तन से. धर्म परिवर्तन का मुद्दा बेहद ही निजी है. यदि ऐसा नहीं होता है तो हमारा लोकतांत्रिक अधिकार ख़तरे में पड़ जाएगा.
कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यकों में डर का माहौल पैदा करने के लिए यह सारा मुद्दा खड़ा किया है. मलेशिया में भी इन्हीं वजहों से विवादों को तूल दिया गया है. और, जब भारत में भाजपा ने ऐसा ही विवादास्पद मुद्दा रामजन्मभूमि के बारे में उठाया तो नरसिंहा राव की अगुवाई वाली कांग्रेस पार्टी ने बाबरी मस्जिद को गिरने दिया. मलेशियाई सरकार भी सहमी हुई है और इसी चलते वह उच्च न्यायालय के फैसले को लागू नहीं कर रही है.
किसी भी बहु धार्मिक और बहु सांस्कृतिक लोकतंत्र को आदर्श माहौल में काम करना मुश्किल होता है. यहां तक कि पश्चिम के विकसित मुल्कों में भी धर्म को लेकर तनाव पैदा होते रहते हैं. फ्रांस में अफ्रीकी मुसलमान और गोरे फ्रेंच के बीच अक्सर तनाव होता रहता है. यह मसला धार्मिक नहीं, बल्कि उससे अधिक आर्थिक और राजनीतिक है. ऐसी विवादों के पीछे दक्षिणपंथी ताक़तें भी होती हैं. हाल में, फ्रेंच सरकार ने बुरक़ा पर प्रतिबंध लगाया है. यदि किसी को बुरक़े में देखा गया तो उसे पर 750 यूरो दंड देना होगा. ग़ौरतलब है कि फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी भी वैचारिक तौर पर दक्षिणपंथी हैं. किसी को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, यदि एक विकसित लोकतंत्र इस बात का फैसला करता है तो यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है. फ्रेंच सरकार ने बुरक़ा को ग़ुलामी का प्रतीक माना है और यदि ऐसा है भी तो सरकार को इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि कोई क्या पहनता है. कोई मज़हब न तो चंद चरमपंथियों की वजह से ख़तरे में पड़ सकता है और न धर्मनिरपेक्षता ही फ्रांस में महिलाओं के बुरक़ा पहनने से कभी ख़तरे में पड़ेगी।

साभार...न्यू एज़ इस्लाम

अल्लाह पर किसका हक़ है?

मलेशिया में इन दिनों एक नया विवाद सुर्ख़ियों में है. विवाद अल्लाह से जुड़ा है. वहां मलय जाति समूह के लोग कैथोलिक ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल को लेकर विरोध कर रहे हैं. इन लोगों को लगता है कि अल्लाह शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ वही कर सकते हैं, न कि कैथोलिक ईसाई. अधिकारों के इस लड़ाई की सुनवाई कोर्ट में भी हुई. और कोर्ट ने भी ईसाइयों को अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी थी. हालांकि सरकार ने कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज़ कर दिया. सरकार ने सर्वोच्च कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने के इरादे से ऐसा नहीं किया है. बल्कि सारा विवाद भावनात्मक तौर पर इस क़दर उलझ चुका है कि इसे राजनीतिक तौर पर सुलझाना मुश्किल हो रहा है.
सारा विवाद उस व़क्त सामने आया जब एक चर्च ने गॉड (ईश्वर) शब्द का अनुवाद अल्लाह शब्द के तौर पर किया. इस विवाद की वजह से हिंसा भी हुई. कुछ दिन पहले तीन चर्चों पर हमला किया गया. साठ के दशक मलयों और चीनियों के बीच हुई हिंसक घटनाओं को छोड़ दें, तो कुल मिलाकर वहां हमेशा शांति बनी रही है.
लेकिन, एकबार फिर मलय-ईसाई एवं मलय-हिंदुओं के बीच संबंध बिगड़ने लगे हैं. इसी से तनाव पैदा हुआ है. जब ईसाइयों ने अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया तो मलयों ने इसकी मुख़ालफ़त की. उनके मुताबिक़ इससे भ्रम’ की स्थिति पैदा होगी. वहीं ईसाई मिशनरी के मुताबिक वे अल्लाह शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह उनका अपना तर्क हो सकता है. पर दिक्कत यह है कि कुछ राजनेता इन विवादों को अपने फ़ायदे के हिसाब से भुनाना चाहते हैं.
दरअसल, जो लोग ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं, उनके पास विरोध की वाजिब वजह नही है. अल्लाह एक हैं और उसने हम सभी को बनाया है. इसलिए इसके इस्तेमाल पर किसी एक मजहब का हक़ नहीं हो सकता है. यदि ग़ैर मुसलमान भी गॉड या ईश्वर के लिए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो मुसलमानों को इसका स्वागत करना चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि इसके ज़रिए लोग इस्लाम को समझने की कोशिश कर रहे हैं, न कि इस्लाम पर अपना कब्जा कर रहे हैं. इसलिए होना तो यह चाहिए कि मलयों को उदारवादी बन कर इस्लाम के उदार चेहरे से लोगों को वाक़िफ करांए. आज जबकि हर तरफ आतंकवाद की बात हो रही है और लोग आतंकवाद का मतलब इस्लामिक आतंकवाद से ही लगा रहे हैं, जो कि कतई सही नहीं है. ऐसे में इस तरह के नज़ीर से सकारात्मक संदेश लोगों तक पहुंच सकेगा.

साभार...न्यू एज़ इस्लाम

मुल्क का बंटवारा ही है समाधान ।

कल सुबह से ही एक सवाल मेरे जेहन में है, जो काफी परेशान किए हुए है? अगर करता हूं, तो सांप्रदायिक होने का एहसास होने लगता है और नहीं करता हूं तो फ्रसट्रेशन फील होने लगता है। आज रहा नहीं गया। बाक़ी आप सभी जैसा सोचें। बात है तो काफी, नहीं तो थोड़ी पुरानी। इमरान हाशमी को लेकर। महेश भट्ट साहब को लेकर। एक सवाल उन्हे मुंबई में मनपसंद जगह घर नहीं मिल रहा है इसलिए कि वो मुसलमान हैं। हरकोई मुसलमान को शक के नज़रिए से देख रहा है। कहीं वो आतंकवादी तो नहीं। ऐसा इमरान हाशमी ने भी कहा- आई एम नॉट टेररिस्ट। उन्हें लगता है कि लोग सारे मुसलमान को आतंकवादी समझते हैं। इसलिए अपने मोहल्ले में घर नहीं देना चाहते। कई टीवी चैनलों पर इलको लेकर बहस भी हुई नतीजा निकला, हां भेदभाव तो होता है। बिल्कुल होता है मैं भी सहमत हूं, मेरी आंखों के सामने ही मेरे एक मुस्लिम दोस्त को इस तरह की प्रॉब्लम झेलनी पड़ी है। कल आईबीएन-७ पर आशुतोष भी अपने एजेंडा में यही बाक कर रहे थे। लेकिन हुआ यूं कि उनने जितने गेस्ट बुलाए सारे के सारे राष्ट्रवादी निकले। ख़ैर ये एक अलग ही बहस है। एक घर न मिलने की वजह से इतना हो- हल्ला होगा, अचरज की बात है। दरअसल एक मुसलमान को घर नहीं मिला, क्योंकि वह एक मुसलमान है, इसलिए इमरान हाशमी को घर नहीं मिला। इस बात से हंगामा है। शबाना आज़मी और जावेद साहब को घर नहीं मिला क्योंकि वो मुसलमान हैं। तो क्या वो अभी मुंबई से बाहर रह रहे हैं या किसी मुस्लिम सोसायटी में रह रहे हैं। मुंबई में कितनी प्रॉपर्टी है इन लोगों की जो ऐसी बातें कर रहे हैं। ये किसी हिंदू डायरेक्टर या सहयोगी के साथ काम क्यों कर रहे हैं, मुझे तो लगता है कि वहां भी इनको भेदभाव का सामना करना पड़ता होगा। अल्पसंख्यक होने की वजह से फिल्म इंडस्ट्री में भी इनके आरक्षण मिलना चाहिए। हर चौथी फिल्म में एक एक्टर और एक्ट्रेस मुस्लिम होंगे। मान लीजिए यदि ऐसा होने लगे तो देश का क्या होगा? इससे किसी को क्या मतलब। भांड़ में जाए देश।

आज देश की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। ऐसे में हर किसी को मनमाफिक जगह पर घर मिलना मुमकिन तो नहीं। फिर मजहब के नाम पर इस तरह का खेल खेलना कितना जायज है? छोटी-मोटी पब्लिसिटी के लिए इस तरह के कारनामें कितना ख़तरनाक है, शायद उनको इस बात का एहसास तक नहीं है। इसी तरह आगर देखा जाए तो कोई ये भी कह सकता है कि बिहारी होने के नाते मेरे साथ दिल्ली, मुंबई, गुजरात गोवा आदे में भेदभाव होता है, नौकरी नहीं मिलती, घर नहीं मिलता, लोग बिहारी कहकर ग़ाली देते हैं। ये हक़क़ीत भी है। इस तरह से देखा जाए तो देश किस हिसाब से एकजुट है। कर दीजिए देश के टुकड़े-टुकड़े। मौक़ा भी सुनहरा आ रहा है- पंद्रह अगस्त। गांधी, नेहरू और सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद के अरमानों को उनके साथ ही दफ़न हो जाने दीजिए। सबसे कम उम्र में फांसी के फंदे पर झूलने वाले ख़ुदीराम बोस, भगत सिंह, सुभाषचंद्र, अशफ़ाक़उल्ला की कुर्बानियों से हमें क्या लेना ? जीने दीजिए सभी को अपने-अपने ढंग से, आख़िर हरएक को जीने का हक़ जो है। क्योंकि हरकोई उत्तरदायित्व के कंधे पर बस हक़ की गोली चलाना ही तो चाह रहा है।