आइए हम सभी केजरीवाल से नफ़रत करें...!

बेहद ही अजीब है हमारा देश. नफ़रत करना हमें पसंद है. हम अपनी समस्याओं और सरकार की नाकामियों से इतने आजिज आ चुके हैं कि अब हमें नफ़रत करने के लिए मीडिया द्वारा उठाए गए मुद्दों की ज़रूरत पड़ गई है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में बिना किसी तर्क, औचित्य और सहिष्णुता के किसी को निशाना बनाया जा रहा है.
आम आदमी पार्टी (आप) के नेता अरविंद केजरीवाल ने हालिया लोकसभा चुनावों में बेहद सादगी से चुनाव लड़ा. अन्य दलों की तरह प्रचार-प्रसार का युद्ध नहीं छेड़ा, बस जनता से संपर्क की कोशिश की. इसके बावजूद आप के सिर्फ चार सांसद ही संसद पहुंच सके और खुद केजरीवाल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी से बनारस में तीन लाख 37 हज़ार से भी अधिक वोटों से हार गए. अगर ईमानदारी से कहूं, तो बनारस में मोदी को चुनौती देना केजरीवाल का मूर्खतापूर्ण कदम था. वे अपने लोकसभा क्षेत्र से लड़ सकते थे और अपनी सीट जीतकर संसद में जा सकते थे और अगले पांच वर्षों तक संसद में जाकर बहुत बड़ा अंतर पैदा कर सकते थे. क्या यह वही रास्ता नहीं था, जिसके आधार पर पहली नज़र में वे अन्ना हज़ारे से अलग हुए
अरविंद केजरीवाल के प्रति नफ़रत पिछले साल उस वक्त शुरू हुई, जब उन्होंने 49 दिनों के भीतर ही दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. हां, उन्होंने दिल्ली और पूरे देश के विश्वास के साथ धोख़ा किया, क्योंकि सबकी निगाहें केजरीवाल पर थी. यह निराशा नफरत में बदल गई और हम उसे फर्जीवाल, फेकरीवाल और भगोड़ा कहने लगे. यहां तक कि हिंदी के कुछ ऐसे पारंपरिक शब्दों का इस्तेमाल केजरीवाल के खिलाफ किया जाने लगा, जिसे शायद ही कोई सार्वजनिक तौर पर प्रयोग कर सकता है. अगर अधिक नहीं, तो कई बार उसे जस्टीफाई भी किया गया.
केजरीवाल ने इस सप्ताह लोगों से ज्यादा से ज्यादा से माफ़ी और एक और मौक़ा ही मांगा था. केजरीवाल ने दिल्ली और देश की जनता से माफ़ी मांगी. उन्होंने अपनी ग़लती और अनुभवहीनता को स्वीकार किया. उन्होंने इसकी वजह भी बताई और अपनी ग़लतियों को सुधारने के लिए एक और मौक़ा मांगा.
और हम क्या करते हैं? हम सोशल मीडिया पर केजरीवाल को भला-बुरा कह रहे हैं, नाटकबाज बता रहे हैं और इस तरह की तमाम आरोप लगा रहे हैं और सार्वजनिक तौर पर उनके पीटे जाने के बारे में बाते कर रहे हैं और क्या नहीं. यहां यह भी बताने की ज़रूरत है कि उनके समर्थकों को अंग्रेजी में आपटर्ड्स (जो अंग्रेज़ी की गाली का स्वरूप है) और हिंदी में आपिए (जो हिंदी में एक गाली का स्वरूप है) कहा जा रहा है. गनीमत है उन्हें नस्लभेदी नहीं कहा जा रहा.
चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल को कोई छूना नहीं चाहता था. केजरीवाल आए और उन्होंने देश के सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार और कालेधन का आरोप लगाया और इन आरोपों को ख़ारिज करने और केजरीवाल पर ही ऐसे आरोप लगाने के अलावा किसी ने कुछ नहीं किया. लेकिन, अब चुनावों में भाजपा भारी बहुमत से जीत चुकी है. नितिन गडकरी ने जो मानहानि का केस उन पर किया हुआ है. यह केस चुनावों से पहले किया गया था, लेकिन फिर भी वैसे तमाम अपराध जो लोग कर सकते हैं उन सभी मामलों में किसी को भ्रष्टाचारी कहने पर उसके ख़िलाफ़ केस दर्ज का मतलब समझा जा सकता है.
केजरीवाल ने जमानत या बेल बॉन्ड के 10 हजार रुपए की राशि जमा करने से इनकार कर दिया और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. हम केजरीवाल को कानून से ऊपर होने का आरोप क्यों लगाते हैं? किसी भी प्रतिवादी के पास बेल की राशि जमा न करने का अधिकार है. यह एक विकल्प है, न कि कोई क़ानून. उन्होंने कहा कि अदालती सुनवाई में वह अपना पक्ष रखेंगे. हालांकि, इसमें कोई शक़ नहीं कि उन्हें अदालत के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए था, जैसा कि उन्होंने हाईकोर्ट के कहने के बाद किया. केजरीवाल सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों के सवालों का जवाब देने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं. लोगों को यह समझने की आवश्यकता है. केजरीवाल के प्रति नफ़रत की भावना रखने से उन्हें कुछ नहीं मिलने वाला है.
अगर 2011 में जाएं, तो उस वक्त भी इन्हीं आरोपों के आधार पर वे जेल गए थे. उस वक्त वे महज एक्टिविस्ट थे, राजनीतिक नेता नहीं. उन्हें फंसाना आसान था. फिर भी उन्होंने इस वक्त भी जमानत की राशि नहीं दी. उसके बाद वे लोगों के बीच नायक की तरह पसंद किए जाने लगे. तब केजरीवाल को कानून से ऊपर क्यों नहीं माना गया. हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी खुद अंग्रेजों द्वारा कई बार जेल भेजे गए, उन्हें जमानत के तौर पर 1 रुपए की राशि देने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया.
हम हर बार अपराधियों को चुनकर संसद में भेजते हैं. भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में शामिल लोग, काले धन कमाने वाले बड़ी ठाठ से अपनी जिंदगी जीते हैं. सभी को माफ़ कर दिया जाता है और उन्हें दोबारा चुनकर संसद भेज दिया जाता है.
फिर केजरीवाल क्यों नहीं? एक स्वच्छ छवि, शिक्षित और बेदाग इतिहास एवं काम करने की ईमानदारी इच्छा वाले क्यों नहीं. आज कांग्रेस और भाजपा आप और केजरीवाल के बारे में जो हमें दिखाना चाह रही है हम वहीं देख रहे हैं. जो सुनाना चाह रही है, हम वहीं सुन रहे हैं. लेकिन, ज़रूरत है कि एक बार सोचने की. केजरीवाल को एक और अवसर देने की.

ओड़िशा: आदिवासियों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को माओवादी बना देती है नवीन पटनायक सरकार

फर्जी एनकाउंटर और मामलों की यह कहानी नरेंद्र मोदी के गुजरात की नहीं, बल्कि ओड़िशा के साफ और स्वच्छ छवि के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की है. लगभग 530 लोग फर्जी और झूठे माओवादी व अन्य मामले में विभिन्न जेलों में बंद हैं. इनमें 400 से अधिक गरीब आदिवासी हैं. पिछले 10 वर्षों में पुलिस फायरिंग में 30 लोग मारे गए. माओवाद के नाम पर फर्जी एनकाउंटर में 75 लोग मारे जा चुके हैं. 170 लोग बिना ट्रायल के अब भी जेल में हैं. राज्य मानवाधिकार आयोग के पास 17 से अधिक फर्जी एनकाउंटर के मामले जांच के लिए लंबित हैं.
http://hindi.gulail.com/how-navin-patnaik-government-makes-tribals-lawyers-and-social-activists-a-maoist-in-odisha/

(hindi.gulail.com)

ईश्वर-अल्लाह ''किसका'' नाम

मलेशिया की अदालत ने वर्ष 2009 में हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए फैसला दिया है कि देश में गैर-मुस्लिम अल्लाह शब्द का प्रयोग नहीं कर सकते हैं. वर्ष 2009 में मलेशिया की उच्च न्यायालय ने भगवान को संबोधित करने के लिए अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की इजाजत दी थी, लेकिन अब कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यह फैसला दिया. तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से हाईकोर्ट द्वारा 2009 में दिए गए उस फैसले को पलट दिया, जिसने मलय भाषा में छपने वाले अखबार 'द हेराल्ड' को अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की अनुमति दी थी. इस फैसले के पीछे मुख्य न्यायाधीश का तर्क था कि अल्लाह शब्द का प्रयोग ईसाई समुदाय की आस्था का अंग नहीं है. इस शब्द के इस्तेमाल से समुदाय में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होगी. मामले की सुनवाई के दौरान सरकार ने दलील दी थी कि अल्लाह शब्द मुस्लिमों के लिए बहुत विशिष्ट है. 
गौरतलब है कि 2008 में तत्कालीन गृहमंत्री ने अखबार को इस शब्द के इस्तेमाल की इजाजत देने से इन्कार कर दिया था. इसके बाद अखबार ने इसके खिलाफ अदालत में अपील की. 2009 में अदालत ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया. इस फैसले के बाद चर्चों और मस्जिदों को निशाना बनाया गया था. गौरतलब है कि मलेशिया की 2.8 करोड़ की आबादी में दो तिहाई मुसलमान हैं, जबकि नौ प्रतिशत आबादी ईसाइयों की है. ऐसे में अदालत के फैसले से चार साल पुराने विवाद को हवा मिलेगी. विवाद अल्लाह से जुड़ा है. वहां मलय जाति समूह के लोग कैथोलिक ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल को लेकर विरोध करते रहे हैं. इन लोगों को लगता है कि अल्लाह शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ वही कर सकते हैं, न कि कैथोलिक ईसाई. अधिकारों के इस लड़ाई की सुनवाई कोर्ट में भी हुई थी. कोर्ट ने भी ईसाइयों को अल्लाह शब्द के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी थी. हालांकि सरकार ने कोर्ट के फ़ैसले को ख़ारिज़ कर दिया. सरकार ने सर्वोच्च कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देने के इरादे से ऐसा नहीं किया है. बल्कि सारा विवाद भावनात्मक तौर पर इस क़दर उलझ चुका है कि इसे राजनीतिक तौर पर सुलझाना मुश्किल हो रहा है. सारा विवाद उस व़क्त सामने आया था, जब एक चर्च ने गॉड (ईश्वर) शब्द का अनुवाद अल्लाह शब्द के तौर पर किया. इस विवाद की वजह से हिंसा भी हुई. कुछ दिन पहले तीन चर्चों पर हमला किया गया. साठ के दशक मलयों और चीनियों के बीच हुई हिंसक घटनाओं को छोड़ दें, तो कुल मिलाकर वहां हमेशा शांति बनी रही है. लेकिन, एकबार फिर मलय-ईसाई एवं मलय-हिंदुओं के बीच संबंध बिगड़ने लगे हैं. इसी से तनाव पैदा हुआ है. जब ईसाइयों ने अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया तो मलयों ने इसकी मुख़ालफ़त की. उनके मुताबिक़ इससे भ्रमकी स्थिति पैदा होगी. वहीं ईसाई मिशनरी के मुताबिक वे अल्लाह शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह उनका अपना तर्क हो सकता है. पर दिक्कत यह है कि कुछ राजनेता इन विवादों को अपने फ़ायदे के हिसाब से भुनाना चाहते हैं. 
दरअसल, जो लोग ईसाइयों द्वारा अल्लाह शब्द के इस्तेमाल का विरोध कर रहे हैं, उनके पास विरोध की वाजिब वजह नही है. अल्लाह एक हैं और उसने हम सभी को बनाया है. इसलिए इसके इस्तेमाल पर किसी एक मजहब का हक़ नहीं हो सकता है. यदि ग़ैर मुसलमान भी गॉड या ईश्वर के लिए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो मुसलमानों को इसका स्वागत करना चाहिए. उन्हें यह समझना चाहिए कि इसके ज़रिए लोग इस्लाम को समझने की कोशिश कर रहे हैं, न कि इस्लाम पर अपना कब्जा कर रहे हैं. इसलिए होना तो यह चाहिए कि मलयों को उदारवादी बन कर इस्लाम के उदार चेहरे से लोगों को वाक़िफ करांए. आज जबकि हर तरफ आतंकवाद की बात हो रही है और लोग आतंकवाद का मतलब इस्लामिक आतंकवाद से ही लगा रहे हैं, जो कि कतई सही नहीं है. ऐसे में इस तरह के नज़ीर से सकारात्मक संदेश लोगों तक पहुंच सकेगा.

नेटवर्क-18 : अमीरों का नौकर बन गया है मीडिया

सोवियत संघ और इसके सैटेलाइट के लंबे अनुभव ने यह साबित किया कि अभिव्यक्ति, सूचना और तर्क-वितर्क की आजादी के लिए फ्री इंटरप्राइजेज (मुक्त बाजार) की आवश्कता है. उन दिनों टेलीविजन पूरी तरह राज्य सत्ता पर निर्भर था. टेलीविजन की इस निर्भरता से यूरोपीय देशों में सभी यह मानने लगे थे कि प्रतिद्वंद्विता के अभाव में मीडिया का स्तर लगातार गिरता जा रहा है. उसके बाद एक दौर वह भी आया जब अमेरिका में तीन कॉमर्शियल नेटवर्क और एयरवेव पर एकाधिकार हो गया. यानी मीडिया का मोनोपोलाइजेशन हुआ. मीडिया की राज्यसत्ता पर निर्भरता से लेकर बाजारवादी युग में प्रतिद्वंद्विता का समय भी आया. मीडिया पर किसी एक घराने का वर्चस्व भी हम देख रहे हैं. भारत में लगभग तमाम बड़े बिजनेस घरानों ने मीडिया में मोटा माल निवेश कर रखा है. मुकेश अंबानी ने इ-टीवी समूह को ही खरीद लिया, तो सीएनएन आईबीएन, आईबीएन-7 और सीएनबीसी आवाज में अंबानी का बड़ा शेयर है. इस बात को समझना कतई मुश्किल नहीं है कि आखिर बिजनेस घराने क्यों मीडिया में निवेश कर रहे हैं या उन्हें खरीद रहे हैं. तमाम तरह के कॉरपोरेट घोटालों और भ्रष्टाचार के मामले को मीडिया अमूमन सामने लेकर आता है. जब उसी मीडिया के मालिक अंबानी और तमाम बिजनेश घराने होंगे, तो फिर अपने मालिक पर भौंकने की हिम्मत किसी होगी. पत्रकारों के लिए दुम हिलाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं होगा. दक्षिण भारत में तो मीडिया के मालिकाना हक की कहानी तो और दिलचस्प है. आंध्रप्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक सत्तारूढ़ और विपक्षी पार्टियों के अपने-अपने मीडिया हाउस हैं, जिनकी टीआरपी और जनता के बीच अच्छी पकड़ है. आंध्रप्रदेश में कांग्रेस से टूटकर अलग हुए वाईएसआर कांग्रेस के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी का साक्षी चैनल हो या तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार के मालिकाना हक वाला कलइनार टीवी (इसका नाम टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के दौरान भी आया) या फिर दयानिधि मारन का सन टीवी. दक्षिण भारत में नेताओं का एकछत्र राज्य मीडिया पर है. नेता और बिजनेस घरानों के हाथ में मीडिया का चाबुक हो, तो फिर अभिव्यक्ति की आजादी और खबरों की हकीकत का अंदाजा आप लगा सकते हैं. नेटवर्क-18 से आज अगर सैकड़ों पत्रकारों को धकियाया गया है, तो इसलिए नहीं कि इनका प्रदर्शन बेहतर नहीं था. यह कॉस्ट कटिंग का सीधा मसला है. लेकिन, मीडिया किसी की निजी संपत्ति नहीं है. पैसा बिजनेस घरानों या नेताओं का भले ही हो, लेकिन मीडिया का बिजनेस जनहितों का बिजनेस है. ऐसे में हम भला यह कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि चंद मुट्ठीभर बिजनेस घरानों के मालिक जनहित के सबसे बड़े माध्यम को नियंत्रित करने लगे और वह भी उसकी बेहतरी नहीं, बल्कि सिर्फ अधिक मुनाफा कमाने के लिए. नेटवर्क-18 के साथ यही मसला है. ऐसे में भला हम संविधान के उस विश्वास और सरकार के उस दावे पर कैसे यकीन कर लें कि प्रेस पूरी तरह आजाद है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि मीडिया अल्पसंख्यक अमीरों का नौकर बन गया है. सभा और सेमिनारों में तो बड़े-बड़े संपादक लच्छेदार और लुभावनी बातों से मीडिया की आजादी की पुरजोर वकालत करते हैं. लेकिन, अपने पत्रकारों के लिए लड़ने का वक्त आता है, तो ट्विट करते नजर आते हैं. अगर सभी सहमत ही हैं कि मीडिया को स्वतंत्र होना चाहिए, तो फिर एक कानून क्यों नहीं बनाना चाहिए. और, उस कानून में पत्रकारों की नौकरी की सुरक्षा से लेकर खबरों की स्वतंत्रता को लेकर विस्तृत चर्चा हो. लेकिन, नहीं अगर मीडिया से संबंधित किसी कानून को लाने की बात होती है, तो सभी संविधान याद आने लगता है. अभिव्यक्ति की आजादी याद आने लगती है. लेकिन, आज जब सैकड़ों पत्रकार एक बिजनेस घराने की मनमर्जी और अधिक मुनाफा कमाने के लालच का शिकार हो रहे हैं, तो कहीं कोई शोर नहीं है. कल तक जो रणभेरी बजाया करते थे, आज आवाज उनकी धीमी हो गई है या वे गूंगे हो गए हैं. हमें अब कुछ नहीं लड़ने की जरूरत है. अपने ही नहीं अपनों के लिए भी...पाश भी यही कहते हैं कि बिना लड़े यहां कुछ मिलता नहीं...
                   हम लड़ेंगे,
                   जब तक दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है,
                   जब तक बंदूक न हुई, तब तक तलवार होगी
                   जब तक तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
                   लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
                   और हम लड़ेंगे साथी
                   हम लड़ेंगे कि बगैर लड़े कुछ नहीं मिलता।

म्यांमार की जातीय हिंसा, नागरिकता का सवाल और विस्थापन

म्यांमार में सांप्रदायिक हिंसा की घटना ऐसी कोई खबर नहीं, जिसे सुनने को दुनिया अधीर हो। दरअसल, जम्हूरियत की तरफ मुल्क के डगमगाते कदम बढ़ रहे हैं और ‘बदलाव की इस प्रक्रिया’ की निगरानी कर रही हैं नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की। लेकिन बदकिस्मती देखिए, पिछले कुछ दिनों से रखिन सूबे में बौद्ध अनुयायियों व रोहिंग्या मुसलमानों के बीच हुई सांप्रदायिक हिंसा को लेकर म्यांमार सुर्खियों में है। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की हालत बदतर है। उन्हें नागरिक मानने से इनकार किया जाता रहा है। दरअसल, म्यांमार की नस्लीय संरचना बेहद पेचीदा है। आधिकारिक तौर पर वहां 135 नस्ली समूहों की पहचान की गई है। लेकिन इसमें रोहिंग्या लोगों का नाम नहीं है, जबकि ये रखिन बौद्ध, चिटगांव के बंगाली और अरब सागर से आए कारोबारियों की संतानें हैं। वे बांग्ला की एक बोली का बतौर भाषा इस्तेमाल करते हैं। न्यूयॉर्क की ह्यूमन राइट्स वॉच संस्था के मुताबिक, वे दशकों से रखिन बौद्ध के साथ म्यांमार में रह रहे हैं। जब ब्रिटिश हुकूमत ने हिन्दुस्तान और म्यांमार की सरहद का डिमार्केशन किया, उससे भी पहले के तत्कालीन बर्मा में उनकी मौजूदगी थी। फिलहाल, मुल्क में उनकी आबादी अंदाजन आठ लाख है। दो लाख तो बांग्लादेश में भी हैं। रिपोर्टे यह भी कहती हैं कि म्यांमार का एक बड़ा तबका रोहिंग्या विरोधी है। यही संकट की जड़ है। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों को घुसपैठी माना जाता है. सबसे पहले मई में हिंसा की छिटपुट घटनाएं हुईं. इसके बाद हिंसक आग पूरे इलाके में फैल गई. 10 जून को राखिल प्रांत में इमरजेंसी लगा दी गई. शुरुआती दौर की हिंसा में दोनों पक्षों को नुकसान हुआ लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक अब मुसलमानों को ही निशाना बनाया जा रहा है. इस मामले में अंतरराष्ट्रीय राजनीति भी शुरू हो गई. ईरान ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की है कि वह इस मामले में दखल दे और म्यांमार सरकार से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए कहे. संयुक्त राष्ट्र में ईरान के राजदूत मुहम्मद काजी ने यूएन सचिव बान की मून को एक पत्र लिख कर हस्तक्षेप की मांग की है. म्यांमार में जातीय हिंसा का इतिहास पुराना है. हालांकि नई सरकार ने कई गुटों के बीच सुलह की कोशिश की है लेकिन कई मसले अभी भी अनसुलझे हैं. सरकार और विद्रोही गुटों के बीच देश के उत्तरी इलाके में जब तब हिंसक झड़पें होती रहती हैं. रोहिंग्या लोग मूल रूप से बंगाली हैं और ये 19वीं शताब्दी में म्यांमार में बस गए थे. तब म्यांमार ब्रिटेन का उपनिवेश था और इसका नाम बर्मा हुआ करता था. 1948 के बाद म्यांमार पहुंचने वाले मुसलमानों को गैरकानूनी माना जाता है. उधर, बांग्लादेश भी रोहिंग्या लोगों को नागरिकता देने से इनकार करता है. बांग्लादेश का कहना है कि रोहिंग्या कई सौ सालों से म्यांमार में रहते आए हैं इसलिए उन्हें वहीं की नागरिकता मिलनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक म्यांमार में करीब 8 लाख रोहिंग्या हैं. ये हर साल हजारों की तादाद में या तो बांग्लादेश या फिर मलेशिया भाग जाते हैं. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस समुदाय के लोगों को जबरन काम में लगाया जाता है. उन्हें प्रताड़ित किया जाता है और उनकी शादियों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक दुनिया का कोई आदमी बिना किसी देश की नागरिकता के नहीं रह सकता. अगर हुकूमत इस संकट को खत्म करना चाहती है, तो उसे अलोकप्रिय और सख्त फैसले लेने होंगे.