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गृह राज्य मंत्री का बेटा... जज साहेब अदालतें मंदिर की घंटी बन चुकी हैं...

देश की न्याय व्यवस्था मंदिर के घंटे की तरह हो गई है। कोई भी आ रहा है और बजाकर चला जा रहा है। मंदिर के घंटे को बजाने का भी एक तय समय होता है, लेकिन न्याय व्यवस्था के साथ जिस तरह घंटी बजाई जा रही है, उसका को नियत समय नहीं है। देश के गृह राज्य मंत्री के बेटे से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर तक इस सिस्टम की घंटी नहीं, बैंड बजा रहे हैं। बस उम्मीद सिर्फ आम जनता, दबे-कुचले लोगों, जिनके पास दौलत नहीं है, प्रभावशाली नहीं है, उनसे की जाती है कि वे देश के तमाम कायदे-कानून को सर पर बिठाकर रखें। हालिया घटनाक्रम ने इस मीडिया, न्यायिक, पुलिसिया और राजनीतिक सिस्टम में भरोसे को खाई में ही धकेलने का काम किया है।

बॉलिवुड के बादशाह शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान इन दिनों मुंबई के ऑर्थर रोडजेल में बंद हैं। अदालत ने आर्यन को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा है। मामला क्रूज रेव पार्टी से जुड़ा है। शनिवार को कुल 18 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। आर्यन खान के वकील ने मैजिस्ट्रेट कोर्ट में जमानत की अर्जी दी। खारिज हो गई। शनिवार को वकील ने सेशन कोर्ट का रुख किया। मामला खींचेगा। इस बीच, समझने की बात है कि शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान के पास से किसी भी तरह का ड्रग्स नहीं मिला है। एनसीबी के हवाले से कई मीडिया संस्थान खबरें चला रहे हैं कि आर्यन ने माना है कि ड्रग्स का सेवन किया। जमानत पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में आर्यन के वकील ने मैजिस्ट्रेट को बताया कि आर्यन खान ने ड्रग्स को लेकर अपना ब्लड टेस्ट देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन एनसीबी के अधिकारियों ने सैंपल लेने से मना कर दिया। दो बातें साफ हैं...1. आर्यन खान के पास से ड्रग्स नहीं मिला। 2. सेवन का शक था, तो एनसीबी ने मेडिकल क्यों नहीं कराया यानी यहां भी आर्यन से कुछ हासिल नहीं हुआ।
अब चलते हैं उत्तर प्रदेश के लखमीपुर खीरी। यहां केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे पर चार किसानों पर खुलेआम जीप चढ़ा देने का आरोप है। मंत्री जी बेटे का बचाव करते रहे। आरोपी बेटा अपना बचाव करता है। हक है, करिए। लेकिन हत्या के आरोपी की गिरफ्तारी कब होती है। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
क्या हत्या के दूसरे के मामले में पुलिस इसी तरह मंत्री जी के बेटे की तरह नोटिस भेजकर बुलाती। दुनिया जानती ही कि अगर आम आदमी छोटा-मोटा अपराध कर दे, तो हवालात की हवा खाने तुरंत भेज दिया जाता है। यहां मंत्री जी के बेटे की आवभगत होती रही। हत्या के आरोपी को 5-6 दिनों के बाद गिरफ्तार किया गया। मंत्री जी के बेटे को भी 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेजा गया। आर्यन खान के पास से ड्रग्स बरामद भी नहीं हुआ, फिर भी पहले वह दो-तीन दिनों तक एनसीबी की हिरासत में रहा। फिर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में। यहां मंत्री जी का बेटा, चार लोगों पर गाड़ी चढ़ाने के चार दिन बाद तक मौज करते रहे, फिर 10 घंटे पूछताछ हुई। फिर गिरफ्तारी के बाद अरेस्ट किया गया। दूसरी बात यह कि जिसके पास से ड्रग्स तक बरामद नहीं हुआ, न सेवन का पता करने के लिए मेडिकल कराया गया। उधर, गुजरात के अडानी मुंद्रा पोर्ट से 3000 किलोग्राम की हेरोइन बरामद हुई। इस मामले में एनसीबी की सक्रियता किसी मुर्दा की तरह नजर आती है।

एनसीबी का कहना है कि आर्यन खान के वॉट्सऐप चैट से पता चलता है कि मुमकिन है कि वह नियमित तौर पर ड्रग्स का सेवन करता हो। यानी एनसीबी कंफर्म नहीं है। आर्यन के वकील ने कहा कि फुटबॉल के बारे में चैट है। एनसीबी का यह भी कहना है कि यह संभव है कि गिरफ्तार लोगों के तार जुड़े हो और उन्होंने पार्टी में शामिल होने की योजना बनाई। इससे आर्यन खान ने इनकार किया। एनसीबी का बड़ा दावा है कि आर्यन खान एक प्रभावशाली परिवार से हैं। अगर उन्हें जमानत पर छोड़ा गया तो वह सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। बिल्कुल सही बात है कि आर्यन एक प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखता है, तो क्या मंत्री जी का बेटा किसी चरवाहे के घर का है, जिसके पास फूस का घर है औऱ वह किसी सबूत से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। इसीलिए पुलिस उसे चार-पांच दिनों तक छुट्टा छोड़े रखती है। फिर पूछताछ के लिए आने के लिए नोटिस भेजती है। जरा सोचिए, क्या आपको इस तरह की छूट मिलती? हत्या का आरोप ही छोड़िए, किसी की गाड़ी का एक्सिडेंट ही हो जाता और गलती से कोई जख्मी हो जाता तो भी इतनी रियायत आपको मिलती क्या? यहां मंत्री जी का बेटा पुलिस के नोटिस भेजने के एक दिन बाद तब आता है, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है। सुप्रीम कोर्ट जैसा कि इस तरह के मामलों में रिवाज है, सख्त टिप्पणी के बाद मामले को लंबे समय के लिए बोरिया-बिस्तर में डाल देता है। पेगासस जासूसी वाले में जिस-जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, अखबारों के पहले पन्ने पर हेडिंग बनी खबर। लेकिन अब उस मामले का क्या हुआ? इसी तरह लखीमपुर खीरी मामले में एक दिन की सुनवाई के बाद जज साहेब लोग छुट्टी पर चले गए और सुनवाई छुट्टियों के बाद करेंगे। जनता की जिंदगी की कीमत का फैसला छुट्टियों के बाद होगा।

कोरोना संकट, इटली का सिसली वाया ‘द गॉडफादर’ डॉन विटो कॉर्लियोन

इतालवी माफिया सेत्तिमो मिनेयो 
आपमें से अधिकांश लोगों ने डॉन विटो कॉर्लियोन का नाम ज़रूर सुना होगा। नहीं, तो माइकल कॉर्लियोन का तो जरूर ही। अच्छा यह भी नहीं तो यूरोप का एक देश है, इटली। इसे जानते ही होंगे। ख़ैर चलिए... जो लोग डॉन विटो और माइकल कोर्लियोन को जानते हैं, उनके लिए तो ठीक है। लेकिन इटली के नाम से वाकिफ लोगों को बता दूं कि कॉर्लियोन सरनेम वैसा ही जैसे किसी शहर या कस्बे के नाम पर कुछ लोग अपना सरनेम रख लेते हैं। दक्षिणी इटली में स्थित एक शहर है सिसली। वही सिसली जहां के द गॉडफादर के डॉन विटो कॉर्लियोन रहने वाले थे। कॉर्लियोन भी दरअसल सिसली का एक नगर या कस्बा कह लीजिए। यहीं विटो एंडोलिनी का जन्म हुआ था, जो बाद में यहां से निकलकर अमेरिका के न्यू यॉर्क तक पहुंच गया और वहां माफिया की दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत कायम की। अपराध की दुनिया की इस सल्तनत को विटो कॉर्लियोन के छोटे बेटे माइकल कॉर्लियोन आगे बढ़ाया... तब से या उससे पहले से ही इटली का सिसली अपराध और माफिया का गढ़ माने जाने लगा। हालांकि, सिसली में माफिया के पांव मज़बूत होने के पीछे उसकी कमोबेश रॉबिनहुड छवि भी है। जैसा कि अमूमन होता है कि माफिया फैमिली अपने इलाके के लोगों को आर्थिक और कुछ अन्य तरीकों से मदद करती रहती है, जिससे लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति होती है। लेकिन माफिया की यह मदद एक तरफा नहीं होती, उस मदद के बदले लोगों को एक भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।
ख़ैर, कहानी फिल्मी हो उससे पहले लौटते हैं अपने असल मुद्दे पर। हम सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी की गिरफ्त में है। दुनिया भर में ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मौतों का सिलसिला सबसे पहले तेजी से यूरोप के इटली में बढ़ना शुरू हुआ। जैसे-जैसे कोरोना का संकट यहां बढ़ता गया संगठित गैंग और माफिया ने अपने वर्चस्व का खेल भी शुरू कर दिया। माफिया यहां जरूरतमंदों के घरों तक खाना पहुंचा रहा है, तो लोगों को पैसे से मदद भी कर रहा है। लोगों को अच्छी तरह पता है कि माफिया की मदद लेना सही नहीं है। उन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। लेकिन, इटली में संकट बड़ा है। लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। छोटे-मोटे काम करने वाले या भारत की तरह दिहाड़ी मजदूरी की तरह काम करने वालों का रोजगार पूरी तरह चौपट हो चुका है। उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ चुकी है। ऐसे में उन्हें द गॉडफादरफिल्म के डायलॉग ‘I’m going to make him an offer he can’t refuse.’ की तरह माफिया के ऑफर को ठुकरा नहीं सकते। एक तो लोगों की मजबूरी सबसे बड़ी और दूसरी तरफ मना किसे करना है, उसका जोखिम भी नहीं ले सकते।
सिसली में लोगों की मजबूरी का आलम यह है कि खुद कुख्यात माफिया फैमिली का एक सदस्य कहता है, लोग मुझे फोन करते हैं। वे फोन पर रोते हैं। मुझे कहते हैं कि उनके बच्चों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। एक महिला मुझे हर दिन बुलाती है। उसके पांच बच्चे हैं और उसे पता नहीं है कि बच्चों को कैसे खिलाना है?’
माफिया परिवार का यह सदस्य कहता है कि अगर ग़रीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाना माफिया कहलवाना है, तो उसे माफिया होने पर गर्व है। दरअसल, कोरोना वायरस तो नया है, लेकिन सिसली में जरूरतमंदों को खाने का पार्सल बांटना यहां की माफिया फैमिली की पुरानी रणनीति रही है।
सिसली की खुफिया एजेंसी और सरकारी मशीनरी में ऊंचे ओहदे पर काबिज निकोला ग्रेटरी कहते हैं कि माफिया का मकसद लोगों की बीच अपनी विश्वसनीयता और साख को हासिल करना है। माफिया खुद को यहां सरकार के विकल्प के रूप में पेश करता आया है और वह इस संकट में लोगों की मदद करके अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग सरकार की जगह उनकी ओर विकल्प के रूप में देखें। ऐसा हो भी रहा है, क्योंकि इन इलाकों तक सरकार की मदद पहुंच नहीं रहा है। इटली में पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी दर काफी बढ़ी है। अर्थव्यवस्था की हालत पहले से डंवाडोल है और मौजूदा कोरोना संकट ने उसकी कमर तोड़ दी है। लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत कहीं से भी भले ही माफिया से मदद मिल रही है, वे ले रहे हैं। हालांकि, एंटी माफिया संगठन के लिए काम करने वाले एक शख्स का कहना है, यह बात लोगों को भी पता है कि खतरनाक है। उन्हें मालूम है कि यह कुछ वैसा ही है कि अगर तुम मेरी पीठ खुजलाते हो तो मैं तुम्हारी खुजलाऊंगा। यानी मदद एक तरफा नहीं है।
वह बतलाते हैं कि शुरू में तो माफिया इन छोटी-छोटी मदद के बदले कुछ नहीं मांगते हैं। लेकिन सभी को किसी-न-किसी रूप में इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, सिसली के पालेर्मो में रहने वाले एक व्यक्ति मार्सेलो को अपना रेस्तरां बंद करना था। उसे माफिया से ऑफऱ मिला, जिसे वह इनकार नहीं कर सका। कुछ पैसे उसके अकाउंट में डाले गए और कुछ कैश में दिए गए। मार्सेलो बताते हैं कि बाद यही माफिया आपसे वसूली भी करते हैं।
इसका एक उदाहरण यह भी है कि जब स्थानीय चुनाव होते हैं, तो माफिया फैमिली के लोग उन लोगों के पास जाते हैं, जिनकी उन्होंने मदद की होती है। फिर उनके बीच बातचीत कुछ इस तरह शुरू होती है, क्या मैं तुम्हे याद हूं? जब तुम्हें जरूरत थी तो मैंने तुम्हारी मदद की थी। और अब मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। फिर वे अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने का दबाव बनाते हैं, जिसे लोग मना नहीं कर सकते। मार्सेलो बताते हैं कि सिसली में माफिया सरकार से कई गुना अधिक प्रभावशाली है। संकट के समय में वह हमेशा लोगों की मदद के लिए पैसे के दरवाजे खोल देता है। सरकार कहीं पीछे छूट जाती है या जब तक सरकार की मदद पहुंचती है, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है।
कुछ इस तरह इटली में माफिया सरकार की नाकामी का फायदा अपना वर्चस्व मजबूत करने में अपनी रॉबिनहुड छवि को भुना रहा है।

पालघर मॉबलिंचिंगः मर्ज को जाने बिना इलाज नामुमकिन है


महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस मॉब लिंचिंग में तीनों को जान गंवानी पड़ी। किसी ने उनके चोर होने की अफवाह उड़ा दी। इसके बाद दर्जनों लोगों की भीड़ उन पर टूट पड़ी। यह पूरी घटना वहां मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों के सामने हुई। 110 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। लापरवाही के आरोप में महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने पुलिस के दो अधिकारियों को सस्पेंड किया है।
Photo: Express
एक अफवाह ने तीन बेकसूरों की जान ले ली। अब लाख कोशिश कर ली जाए... पुलिस को सस्पेंड करो, दोषियों को सजा दो, उन तीनों की जिंदगी तो वापस नहीं आ सकती न। इसलिए पालघर की लिंचिग घटना बेहद शर्मनाक है! लेकिन, आज जिस तरह कुछ वर्ग विशेष के चंद लोग इस घटना से तमतमाए हुए हैं, अगर पहले ही हम इस तरह की तमाम हिंसा पर सरकार से सवाल करते और जिम्मेदार ठहराते तो ऐसी नृशंस हत्या करने से पहले गुनहगार 100 बार सोचता... अगर मॉब लिंचिंग के आरोपियों को मोदी सरकार का कोई मंत्री फूल-मालाओं से स्वागत नहीं करता, तो ऐसी हिम्मत किसी क न होती। अगर मॉब लिंचिंग करने वालों के पक्ष में नारे नहीं लगाए जाते, तो ऐसी हिम्मत कोई नहीं कर पाता। और, आज दोनों साधु हमारे सामने जीवित होते। लेकिन नहीं, जब तक सहूलियत के हिसाब से मॉब लिंचिंग एक मजहब विशेष के लोगों के साथ होती रही, लोग चुप रहे। मरने वालों को चोर-उचक्का कहने लगे और मारने वालों का यशोगान करते रहे। ये भूल गए कि यह अफवाह एक भस्मासुर है और इस आग में एक दिन खुद भी भस्म होना होगा। फिर भी कुछ लोग सुधर नहीं रहे और पालघर में मॉब लिंचिंग की घटना में सांप्रदायिक ऐंगल निकालने में लगे हैं... पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर सौ से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया है। लेकिन कुछ निहायत घटिया लोग इसे सांप्रदायिकता का रंग देने में जुटे हैं।
जब मैंने कल इस पर सवाल उठाया, तो तकरीबन 15 साल से पत्रकार साहब ने उल्टा सवाल कर दिया। उनका कहना था कि इस पालघर लिंचिंग की घटना पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है, ना मीडिया गैंग, ना जमाती, ना जेहादी, ना वाम, ना हाथ, ना सेलेब्स, ना लिबरटार्ड... देश बोल रहा है। देश से उनका तात्पर्य था ट्विटर। जब सवाल किया कि क्या 1.3 अरब की आबादी ट्विटर पर है। ट्विटर पर कैसे चंद ट्रोल ट्रेंड कराने लगते हैं किसी विषय को और  क्या ट्विटर ही देश है, तो मुझसे सवाल पूछा गया कि चोर तबरेज के लिए ट्वीट करने वाले आम आदमी थे, साधु मारा गया सब ट्रोल ही ट्वीट कर रहे हैं। मतलब उनकी नज़रों में 24 साल का तबरेज अंसारी, जिसकी झारखंड में भाजपा की सरकार के दौरान मॉब लिंचिंग की गई, वह चोर था।
दरअसल, सारी समस्या की जड़ यही है। जब तक हम सहूलियत के हिसाब से घटनाओं को देखेंगे, पालघर जैसी मॉब लिंचिंग से बेकसूरों के जान गंवाने की वारदात होती रहेगी। अगर हमें इसे रोकना है, तो सारे मामले को एक चश्मे से देखना ही होगा।
सबसे पहले हमें सांप्रदायिकता के चश्मे को उतारना होगा। वरना जब अगस्त 2019 में पटना में 20 से अधिक अफवाह बच्चा चोरी की उड़ाई जाती है और भीड़ लाठी-डंडों से बेकसूबर दूसरे मजहब के लोगों की पिटाई कर हत्या कर देती है, तब हम कहां होते हैं?
सितंबर 2019 में जब भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह में मानसिक रूप से कमजोर और दिव्यांग मुस्लिम समुदाय के लड़के को पीटकर अधमरा कर देती है, तो हमारी आवाज़ कहां होती है? जब यूपी के ही संभल में ऐसे ही मामले में भीड़ मॉब लिंचिंग में हत्या कर देती है, तब भी खामोशी की चादर बिछी रहती है।  
पालघर में जिस बेरहमी से दोनों साधुओंपर भीड़ हमला कर रही है, वह बीभत्स है। पुलिस एक घर से उसे हाथ पकड़कर लाती दिख रही है। फिर अचानक भीड़ साधु को मारना शुरू कर देती है। पुलिस वाले खुद को बचाते दिख रहे हैं। जब पुलिस ऐसे भीड़ वाले मामले में खुद फंसती है, तो पहले अपनी जान बचाती नजर आती है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर हालात बेकाबू कहां से हुए। किन वजहों से इन वारदात को अंजाम दिया गया। हमें इस तरह की भीड़ की मानसिकता के तहत तक जाना होगा। वरना मर्ज को जाने बिना इलाज नामुमकिन है।
यही सही है कि इस तरह की वारदात के साथ कुछ तथाकथित (वामपंथियों और छद्म सेकुलरों) बुद्धिजीवियों का दोहरा चेहरा सामने आने लगता है। हालांकि, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश इन छद्म बुद्धिजीवियों से बना है। हमें उनसे भी पार पाना है और इस तरह की मॉबलिंचिंग की मानसिकता और इसे बढ़ावा देने वाली सोच से भी। यह दोनों तरफ के लोग हैं।
अब जैसा कि पहले ही कहा कि इसमें भी कुछ निहायत ही घटिया और संकीर्ण सोच वाले लोग सांप्रदायिकता का एंगल तलाश रहे हैं।

साइबर युद्ध : सबसे बड़ा खतरा और हमारी असफलता

ऐसा बहुत ही कम होता है कि कोई अपनी असफलता को स्वीकार लेता है. और ऐसा तो शायद ही कभी हुआ होगा कि किसी क्षेत्र या उद्योग विशेष से जुड़ी सभी कंपनियां एक साथ अपनी असफलता स्वीकार कर ले. लेकिन, ऐसी असफलता आज की कड़वी हकीकत है और साइबर क्षेत्र पर पूरी तरह लागू होती है. आज भारतीय जांच एजेंसी सीबीआइ से लेकर अमेरिकी रक्षा विभाग का मुख्यालय पेंटागन तक साइबर हमलों के शिकार रहे हैं. नये तरह के खतरनाक वायरस से ईरान के न्यूक्लिर प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है और ऐसे वायरस की काट ढूंढ़ने में एंटी वायरस कंपनियां पूरी तरह असफल साबित हो रही हैं.  
फ्लेम यानी साइबर जासूस : यह एक स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर है, जिसे कुछ इस तरह डिजाइन किया गया है कि यदि आप अपने कंप्यूटर के की-बोर्ड पर अंगुलियां रखते हैं तो उसकी आवाज से ही यह चोरी-छिपे आपके कंप्यूटर की सारी जानकारियां रिकॉर्ड कर लेगा और उसे ट्रांसमिट भी कर देगा. फ्लेम नाम का यह वायरस जानकारी चुराता है, इसलिए इसे साइबर जासूस का नाम दिया गया है. यह ऑडियो बातचीत पर भी नजर रख सकता है. यह कंप्यूटर के स्क्रीनशॉट लेकर हमलावर को भेज देता है. इतना ही नहीं, यह डिवाइस का ब्लूटूथ ऑन करके आसपास रखे अन्य ब्लूटूथ डिवाइस से भी जानकारी चुराता है.
स्टक्सनट के आगे भी घुटने टेके : स्टक्सनट भी फ्लेम की ही तरह एक और वायरस है. इस वायरस के हमले की गंभीरता उस वक्त पता चली, जब 2010 में इसने ईरानी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया और उसके यूरेनियम संवर्धन प्रोग्राम को बाधित किया, साथ ही कई जानकारियां इसके हमलावर तक पहुंचा दी. लेकिन, इस वायरस की खोज के दो साल बाद भी इसका कोई एंटी-वायरस विकसित नहीं किया जा सका है. फ्लेम के बाद यह दूसरा ऐसा वायरस है, जिसके लिए हम एंटी वायरस विकसित करने में अब तक असफल रहे हैं. यह खतरे की घंटी की तरह है. यदि आपके न्यूक्लियर प्रोग्राम पर किसी अप्रत्यक्ष डिजिटल हमले का खतरा मंडरा रहा है और पुलिस भी कोई कार्रवाई करने में लाचार और बेबस है, तो ऐसी में स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है. हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि मौजूदा वैश्‍विक परिप्रेक्ष्य में साइबर हमलों की क्षमता को भी सामरिक क्षमता का एक अंग माना जाने लगा है. एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ ईरान ने ही हाल के महीनों में अपनी साइबर क्षमताओं की सुरक्षा और अन्य देशों पर साइबर हमलों की क्षमता विकसित करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किये.
पांच सबसे बड़े साइबर खतरे : वायरस किसी भी कंप्यूटर के लिए सबसे बड़ी समस्या के तौर पर जाना जाता है. पिछले कुछ वर्षों में यह समस्या काफी जटिल हो गयी है. रूसी कंप्यूटर सुरक्षा फर्म कास्पर्सकी के मुताबिक, आने वाले समय में इनसे ये पांच सबसे बड़े ख़तरे हो सकते हैं.
कंप्लीट डार्कनेस : पिछले दिनों ईरानी कंप्यूटर सिस्टम में वायरस के हमले के कारण उसके प्रमुख तेल संस्थानों के कंप्यूटर अचानक ही ऑफलाइन हो गये. आने वाले समय में ऐसा हमला और भी व्यापक स्तर पर हो सकता है. इससे पूरा बिजली संयंत्र ही प्रभावित हो सकता है और हमारे पास इस समस्या का कोई तात्कालिक समाधान नहीं होगा. यदि ऐसा होता है तो हम कंप्लीट डार्कनेस के साथ दो सौ साल पहले की स्थिति यानी पूर्व विद्युत युग में पहुंच जाएंगे.
बदल देगा हमारी सोच : सोशल नेटवर्किंग सिस्टम के माध्यम से लोगों के सोच को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया जा सकता है. कंप्यूटर सुरक्षा फर्म कास्पर्सकी के प्रमुख इजीन कास्पर्सकी का कहना है कि द्वितीय विश्‍व युद्धके दौरान हवाई जहाजों से शत्रु देशों में अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार-प्रसार के लिए पर्चे गिराये जाते थे. आज यही काम सोशल नेटवर्किंग साइटों के जरिए हो रहा है. पिछले महीने चीन में ब्लॉग पर यह खबर तेजी से फैली कि देशमें विद्रोह हो गया है और सेना की टैंक सड़कों पर तैनात हैं. बाद में यह खबर झूठी निकली. अरब क्रांति के दौरान सोशल साइटों ने प्रदर्शन को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई.
वेब किड्स : तीसरा सबसे बड़ा खतरा यह हो सकता है कि इंटरनेट पीढ़ी इसी के साथ व्यस्त हो जायेगी. आज के बच्चे डिजिटल वर्ल्ड में बड़े हो रहे हैं. कुछ समय बाद वे बड़े हो जाएंगे और उन्हें वोट भी देना होगा. अगर ऑनलाइन वोटिंग सिस्टम की सुविधा नहीं होगी, तो वे वोट देने ही नहीं जाएंगे. इस तरह तो पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही बिगड़ जायेगी. इसके अलावा बो और अभिभावक के बीच की खाई भी बढ.ती जायेगी.
अकाउंट हैकिंग : किसी भी कंप्यूटर यूजर के लिए साइबर अपराध वर्षों से चिंता की बात रही है. कोई भी कंप्यूटर वायरस से सुरक्षित नहीं है. साइबर अपराधी प्रतिदिन पूरी दुनिया में हैकिंग के वायरस फैला रहे हैं. हाल में यह खतरा स्मार्टफोन तक फैल गया है.
निजता (प्राइवेसी) का खतरा : आजकल प्राइवेसी खत्म-सी हो रही है. गूगल स्ट्रीट व्यू, सीसीटीवी कैमरा और कृत्रिम उपग्रह के जरिए सभी की नजर हम पर होती है. इमेल, सोशल वेबसाइट आदि के इस्तेमाल में भी निजी सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है, जिसके सार्वजनिक होने का खतरा रहता है. वायरस के जरिए इन सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ भी की जा सकती है.
तो इसलिए है खतरा : फ्लेम नामक वायरस का सबसे पहले पता लगाने वाली कंपनी रूस की कास्पर्सकी का कहना है कि सभी देशों को इस तरह के हमलों की विभीषिका को समझते हुए उन पर रोक के लिए प्रयास करना चाहिए. जिस तरह से फ्लेम जैसे वायरस का हमला बढ़ा है और एंटी वायरस कंपनियां उसका काट ढूंढने में अब तक नाकाम रही हैं, उससे खतरा और बढ़ता जा रहा है. सबसे बड़ी चिंता तो इस बात की है कि हैकर समूह के अलावा कई देश भी इस तरह के साइबर हमले करने लगे हैं, लेकिन कोई भी देश या समूह ऐसे हमलों की जिम्मेदारी नहीं लेता. साइबर जासूसी का यह हथियार पारंपरिक हथियारों की तरह नहीं है. यदि एक बार ने इन्हें छोड़ दिया गया तो यह नियंत्रण से बाहर हो जाता है और अपने लक्षित उद्देश्यों के साथ-साथ अन्य चीजों को भी निशाना बना सकते हैं. उसमें बदलाव करके उसे दोबारा भी छोड़ा जा सकता है. ये वायरस भस्मासुर की तरह हैं, जो बाद में इन्हें छोड़ने वाले को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

बलात्कार, एन्काउंटर और पूर्वोत्तर !

पहले एक लड़की के साथ छेड़छाड़, फिर एक लड़के का एनकाउंटर...ये दोनों वारदात पूर्वोत्तर राज्यों के हैं और दोनों वहां मौज़ूद सेना ने किया है। ये बात ध्यान रखने वाली है कि आख़िर हम किस तरह की सोसायटी में जी रहे हैं। कहते हैं सिविल सोसायटी लेकिन कम-से-कम मुझे तो ये सब बस एक खेल-सा लगता है। आज अगर भारत सबसे ज़्यादा कहीं परेशानियों से जूझ रहा है तो वो है-नक्सलवाद और आतंकवाद के मुद्दों से। जिसके समाधान के लिए वह कभी भी संजीदा नहीं रहा। आज हिंदुस्तान एक ऐसा मुल्क़ है, जहां क़ानून का पालन करने वाले निराश और हताश हैं जबकि क़ानून तोड़ने वाले सरकार पर हावी रहते हैं। पूर्वोत्तर में जो लोग समस्या पैदा करते हैं, उनको प्रशासन या सेना तो कभी पकड़ पाती नहीं, जब दबाव पड़ता है तो वह ऐसे ही बेबस, निर्दोष और बेग़ुनाहों का क़त्लेआम करती रहती है। ये सही है कि इस तरह के मामलों में कुछ निर्दोष लोगों की जान जाती ही हैं, लेकिन इसके नाम पर जो खेल खेला जा रहा है, वो बेहद ही भयानक है। इस तरह से हम प्रॉब्लम सुलझाने के बजाय उसे उलझाते ही जा रहे हैं। हम कभी भी वहां के लोगों का दिल जीतने की कोशिश नहीं करते और चाहते हैं कि ज़बरदस्ती अपने साथ बनाए रखें, उन पर जुल्मोसितम करते रहें। चाहे मामला वहां की महिलाओं के साथ छेड़छाड़, बलात्कार या शोषण का हो या मासूम लोगों को गोलियों का निशाना बनाने का...हम कभी उनकी समस्याओं को उनकी नज़रिए से समझने की कोशिश तक नहीं करते कि आख़िर वो चाहते क्या है, उनकी वाजिब समस्याएं क्या हैं, बल्कि इन सब की जगह उन्हें चुप कराने का बस एक ही तरीक़ा हमें नज़र आता है, उन पर गोलियां बरसाना , ख़ौफ दहशत का माहौल कायम करना। क्या सरकार वहां की समस्या इसलिए सुलझाना नहीं चाहती कि वहां से भारत सरकार को कोई ख़ास राजस्व नहीं मिलता, उल्टे ख़र्च ही करना पड़ता है ? अगर ऐसा है, तो बस ख़ुद और देश के लिए मैं शाहिर लुधियानवी की इन पंक्तियों को ही कह सकता हूं कि.......मुबारक कह नहीं सकता, मेरा दिल कांप जाता है।

डॉन की ख़ूनी साज़िश का राज़



एक सनसनीख़ेज ख़ुलासा... एक ऐसा ख़ुलासा जो अंडरवर्ल्ड की दुनिया में मचा देगा खलबली... आज हम आपको बताएंगे डॉन के दूर होते दहशत का रहस्य !....... और दाउद किससे मिलाने जा रहा हाथ.....
डर्टी डॉन अब खुद है दहशत में........ जी हाँ, हिंदुस्तान के बाद, अब कराची भी नहीं रहा उसके लिए महफूज ठिकाना...... मँडराने लगा है, उस पर मौत का खतरा......ख़त्म होने लगा है, डॉन के दहशत का साम्राज्य........ दाउद अब कराची छोड़ पहुँच चुका है मालदीव.......दे रहा है अब वहीं से अपने नेटवर्क को अंजाम..... लेकिन अब उसकी ताकत पहले जैसी नहीं रही....... और अपने भाई नूरा की मौत के बाद बौखला गया है वो....... लेना चाहता है अपने भाई की मौत का बदला...... इसलिए जुट गया है अब अपने कुनबे को जोड़ने में........हम आपको बताने जा रहे हैं एक नया ख़ुलासा....... जी हाँ, मिलने जा रहे अब देश के दो गद्दार...... फिर बरपाएंगे क़हर एक साथ........ जी हाँ, हम बात कर रहे हैं, अंडरवर्ल्ड डॉन और डी कंपनी के सरगना दाउद इब्राहिम कासकर और छोटा राजन की........
ये वही छोटा राजन है जो कभी दाउद का खासमखास हुआ करता था....... और दाउद के एक इशारे पर ही मचा देता था कोहराम.......लेकिन कहते हैं न धंधा है पर गंदा है ये...........वक्त ऐसा भी आया जब मासूमो के ख़ून से होली खेलने वाले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गये....... जी हाँ, मुंबई बम धमाको ने दाउद और छोटा राजन के बीच दुश्मनी की लंबी दीवार खड़ी कर दी........ फिर तो शुरू हो गया, गैंगवार........ आ गये दोनो एक दूसरे के निशाने पर........ एक-दूसरे के कुनबे को ख़त्म करने की खा ली कसम.......बस क्या था, शुरू हो गया दो अंडरवर्ल्ड डॉन के बीच मौत का तांडव....... इसी बीच दाउद ने छोटा राजन के मौत की साज़िश रची......और उस पर करवाए एक के बाद एक कातिलाना हमले....... लेकिन हर बार बाल-बाल बचता रहा छोटा राजन.......
साल दो हज़ार दो में बैंकॉक में दाउद ने छोटा शकील से छोटा राजन पर ज़बरदस्त हमला करवाया....... जिसमें छोटा राजन तो बच गया लेकिन उसका खासमखास रोहित वर्मा और उसकी बीवी मारे गये......... छोटा राजन किसी तरह बच निकलने में कामयाब हो गया......लेकिन ये तो गैंगवार का महज आगाज़ था.......उसके बाद तो छोटा राजन, करने लगा दाउद और छोटा शकील को ही ख़त्म करने की साज़िश...... सबसे पहले छोटा राजन ने विनोद शेट्टी और शरद शेट्टी को मारा....... जिसके लिंक से दाउद ने उस पर बैंकॉक मे हमला करवाया था....... आज भी छोटा राजन उस ख़ौफनाक मंजर को नहीं भूल पाया है....... सालों तक सुलगता रहा बदले की आग में........
लेकिन अब दो जानी दुश्मन मिलाने जा रहे हैं हाथ.........लेकिन इन सबके लिए हुआ है एक सौदा, वो भी मौत का.....मौत भी डॉन के खासमखास गुर्गे छोटा शकील की...वजह बैंकॉक में साल २००० में राजन पर शकील का अटैक करना...

. हत्यारों की हक़ीक़त से हारी पुलिस



एक हत्यारा जो कामयाब हो जाता है अपने गुनाह को अंजाम देने मे और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है पुलिस तक पहुचीं एक ख़बर ही बन जाती है कत्ल की वज़ह .... आख़िर कितने भरोसे लायक है पुलिस।

ख़ूनी, अपने ख़तरनाक इरादों में कामयाब रहा और पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ये कहानी, बहुत पुरानी है, लेकिन यही करेगी, हत्यारों के नापाक इरादों का, हम आपको बताएंगे, क़ातिलों का कबूलनामा। करेंगे, ग़ुनाहगारों के नापाक मंसूबो का पर्दाफाश। खोलेंगे ग़ुनाहगारों की गुत्थी। और कैसे, पुलिस हरबार की तरह हत्यारों तक पहुँचने में रही नाकामयाब । वहीं अपनी नाकामी से बौखलाई पुलिस दावा कर रही है, वह बहुत जल्द हत्यारों को करेगी बेनक़ाब । गुड़गांव बन चुका है, गुनाहगारों के लिए मुफीद ठिकाना और उनके निशाने पर हैं तमाम हाई-प्रोफाइल लोग। जो वक़्त-बेवक़्त बन जाते हैं इन क़ातिलों के शिकार।

वारदात हुई ऐसी जगह जो राजधानी दिल्ली से महज कुछ ही दूर है। प्रवीण, जो एक बेहद ही महत्वाकांक्षी नौजवान था। बस अपनी ही दुनिया में खोया रहने वाला। जिसकी तमन्ना थी, पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने की। अपने इन्हीं ख़्वाबों को पूरा करने के लिए उसने दिन-रात एक कर दी । जिसकी बदौलत रियल एस्टेट की जेएलएलएम जैसी कंपनी भी सफलता की ऊँचाईयां छूने लगी। फिर क्या था, उसकी ज़िंदगी में तो मानो खुशियों के चार चाँद लग गए । प्रवीण, जिसने अपने ख़्वाबों की हक़ीक़त को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दी। अब अपनी मज़बूत इरादों की बदौलत वह आसमान की बुलंदियों को छू रहा था। यहाँ तक कि अब उसे दूसरी कंपनियों से भी मोटी रकम की पेशकश होने लगी थी। लेकिन कहीं एक साज़िश थी रची जा रही, कोई कर रहा था उसकी मौत का इंतजार। कहते हैं, जब इंसान कामयाबी की बुलंदियों को छूने लगता है तो, अनजाने में ही अपने आसपास दुश्मनों की एक ऐसी फौज़ तैयार कर लेता है। जो उसकी कामयाबी से परेशान, रचने लगता है गहरी साज़िश। फिर शुरू हो जाता है शह और मात का खेल। और इंसान अपनी कामयाबी में इतना खो जाता है कि हो जाता है उसका काम तमाम। बिछ जाती है बिसात मौत की। शुरू होता है एक ऐसा खेल जिसका पलड़ा झुका होता है क़ातिल की ओर। जिसके एक भी वार का अंजाम होता है, सिर्फ और सिर्फ मौत।
उस रात, प्रवीण भी अपनी कामयाबी का जश्न मनाने के बाद अपनी कार से घर लौट रहा था। उसके हाथ लगा था एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट। वो बेहद खुश नज़र आ रहा था। लेकिन उसे कहाँ मालूम था, ये उसकी आख़िरी रात होगी, खुशी का आख़िरी पल होगा। फ़ोन पर मंगेतर से की गई बात उसकी ज़िदगी की आख़िरी बात होगी और वो पल उसकी ज़िदगी का आख़िरी पल होगा।

प्रवीण की हत्या ने लोगों को झकझोड़ कर रख दिया है। जगह गुड़गांव, इलाक़ा डीएलएफ सिटी। और हत्या की गई एक रियल एस्टेट कंपनी के एसोसिएट मैनेजर की। छह जनवरी की रात। और रात के साये में एक मारूती कार आगे बढ़ रही थी, तभी गूँज उठा डीएलएफ गुड़गांव का यह इलाक़ा गोलियों की आवाज़ से। उस वक़्त प्रवीण अपनी मंगेतर से फोन पर बात कर रहा था। इस आवाज़ से घबराई उसकी मंगेतर ने वजह पूछनी चाही, तभी उसके कानों में एक गुमनाम आवाज़ गूँजती है। प्रवीण का अपहरण कर लिया गया है और इसके पिता से बोलो पचास हज़ार की फिरौती लेकर आए। सेक्टर पाँच में रहने वाले प्रवीण के पिता को यह ख़बर दी गई। और उन्होंने ये ख़बर पुलिस को दी। बस यही एक ग़लती, जिसने ले ली प्रवीण की जान। जी हां, पुलिस को दी गई ख़बर, उन हत्यारों तक भी पहुँच चुकी थी। फिर तो जो होना था वही हुआ। उन दरिंदों ने प्रवीण को गोलियों से भून डाला।और एक पिता अपने बेटे की ज़िदगी से हो गया महरूम । पुलिस की तफ्तीश अभी जारी है। लेकिन एक बात साफ़ है, ये ज़ुर्म की दास्तां बदस्तूर जारी है वो भी पुलिस की नाक के नीचे।


2. ख़तरनाक मंसूबों से कभी परेशान ना हो।
वक़्त खोलेगा हर राज़, तुम हैरान ना हो।।

हत्यारे की हत्या की साज़िश

रची जा रही है, एक हत्यारे की हत्या की साज़िश। जी हां, अपने कारनामों से मुंबई को दहला देने वाले क़साब की हत्या की साज़िश। जिसने अपनी ख़तरनाक मंसूबों से ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जिसकी अब इबारत लिखी जा चुकी है। आतंकी वारदातों में, इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, ख़ून की स्याही से दर्ज मुंबई पर 26/11 की आतंकी हमले का नाम सबसे ऊपर आएगा। जी हाँ, उस आतंकी की हत्या की साज़िश का पर्दाफाश, जो हमले में पकड़ा गया एकमात्र ज़िदा आतंकी है।

एक-एक कर खुलते जा रहे हैं, अब पाकिस्तान के नापाक इरादों का राज़। पाकिस्तान की काली करतूतों का सनसनीख़ेज ख़ुलासा। एक ऐसी साज़िश जिसका ग़ुनहगार और राज़दार है, ख़ुद पाकिस्तान। अपने ही चाल में मात खाने के बाद तिलमिला गया है, पाकिस्तान। अब तक बड़ी ही चालाकी से अपने मक़सद को अंजाम देने के बाद वह अपने ही जाल में फँस चुका है। मुंबई हमले की साज़िश ने पहली बार उसे कर दिया बेनक़ाब। कसाब के क़बूलनामे ने उसके होश पख़्ता कर दिए, फिर तो पाक की हालत न घर की रही न घाट की। और इसी बौखलाहट में वो रचने लगा है, एक साज़िश। जी हाँ, मुंबई हमले में पकड़े गए एकमात्र आतंकी की हत्या की साज़िश। और ये ख़ुलासा किया है, मुंबई पुलिस ने। मुंबई हमले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी राकेश मारिया के मुताबिक़, पुलिस ने पाकिस्तान में क़साब की हत्या की साज़िश का पर्दाफ़ाश किया है। पुलिस की मानें तो, लश्कर-ए-तैयबा के इस आतंकवादी की सुरक्षा ही अब उसके लिए जी का जंजाल बन चुका है। मुंबई पुलिस के इस ख़ुलासे ने एकबार फिर पाक के नापाक मंसूबों का कच्चा-चिट्ठा खोल दिया है।
लगातार दो दिनों तक ख़ूनी खेल खेलने वाले इस आतंकवादी पर अब अपने आकाओं की ही टेढ़ी नज़र पड़ने लगी है। और होने लगी है साज़िश मौत की। उस क़साब की जिसने दिया था अंजाम हिंदुस्तान में अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी वारदात को। पाक का यह पैंतरा देख अब उड़ जाएंगे उसके बाक़ी मोहरों के भी होश। देखकर अपने साथी के ख़िलाफ़ हत्या की साज़िश।