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गृह राज्य मंत्री का बेटा... जज साहेब अदालतें मंदिर की घंटी बन चुकी हैं...

देश की न्याय व्यवस्था मंदिर के घंटे की तरह हो गई है। कोई भी आ रहा है और बजाकर चला जा रहा है। मंदिर के घंटे को बजाने का भी एक तय समय होता है, लेकिन न्याय व्यवस्था के साथ जिस तरह घंटी बजाई जा रही है, उसका को नियत समय नहीं है। देश के गृह राज्य मंत्री के बेटे से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर तक इस सिस्टम की घंटी नहीं, बैंड बजा रहे हैं। बस उम्मीद सिर्फ आम जनता, दबे-कुचले लोगों, जिनके पास दौलत नहीं है, प्रभावशाली नहीं है, उनसे की जाती है कि वे देश के तमाम कायदे-कानून को सर पर बिठाकर रखें। हालिया घटनाक्रम ने इस मीडिया, न्यायिक, पुलिसिया और राजनीतिक सिस्टम में भरोसे को खाई में ही धकेलने का काम किया है।

बॉलिवुड के बादशाह शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान इन दिनों मुंबई के ऑर्थर रोडजेल में बंद हैं। अदालत ने आर्यन को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा है। मामला क्रूज रेव पार्टी से जुड़ा है। शनिवार को कुल 18 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं। आर्यन खान के वकील ने मैजिस्ट्रेट कोर्ट में जमानत की अर्जी दी। खारिज हो गई। शनिवार को वकील ने सेशन कोर्ट का रुख किया। मामला खींचेगा। इस बीच, समझने की बात है कि शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान के पास से किसी भी तरह का ड्रग्स नहीं मिला है। एनसीबी के हवाले से कई मीडिया संस्थान खबरें चला रहे हैं कि आर्यन ने माना है कि ड्रग्स का सेवन किया। जमानत पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में आर्यन के वकील ने मैजिस्ट्रेट को बताया कि आर्यन खान ने ड्रग्स को लेकर अपना ब्लड टेस्ट देने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन एनसीबी के अधिकारियों ने सैंपल लेने से मना कर दिया। दो बातें साफ हैं...1. आर्यन खान के पास से ड्रग्स नहीं मिला। 2. सेवन का शक था, तो एनसीबी ने मेडिकल क्यों नहीं कराया यानी यहां भी आर्यन से कुछ हासिल नहीं हुआ।
अब चलते हैं उत्तर प्रदेश के लखमीपुर खीरी। यहां केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे पर चार किसानों पर खुलेआम जीप चढ़ा देने का आरोप है। मंत्री जी बेटे का बचाव करते रहे। आरोपी बेटा अपना बचाव करता है। हक है, करिए। लेकिन हत्या के आरोपी की गिरफ्तारी कब होती है। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा,
‘क्या हत्या के दूसरे के मामले में पुलिस इसी तरह मंत्री जी के बेटे की तरह नोटिस भेजकर बुलाती।’ दुनिया जानती ही कि अगर आम आदमी छोटा-मोटा अपराध कर दे, तो हवालात की हवा खाने तुरंत भेज दिया जाता है। यहां मंत्री जी के बेटे की आवभगत होती रही। हत्या के आरोपी को 5-6 दिनों के बाद गिरफ्तार किया गया। मंत्री जी के बेटे को भी 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में भेजा गया। आर्यन खान के पास से ड्रग्स बरामद भी नहीं हुआ, फिर भी पहले वह दो-तीन दिनों तक एनसीबी की हिरासत में रहा। फिर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में। यहां मंत्री जी का बेटा, चार लोगों पर गाड़ी चढ़ाने के चार दिन बाद तक मौज करते रहे, फिर 10 घंटे पूछताछ हुई। फिर गिरफ्तारी के बाद अरेस्ट किया गया। दूसरी बात यह कि जिसके पास से ड्रग्स तक बरामद नहीं हुआ, न सेवन का पता करने के लिए मेडिकल कराया गया। उधर, गुजरात के अडानी मुंद्रा पोर्ट से 3000 किलोग्राम की हेरोइन बरामद हुई। इस मामले में एनसीबी की सक्रियता किसी मुर्दा की तरह नजर आती है।

एनसीबी का कहना है कि आर्यन खान के वॉट्सऐप चैट से पता चलता है कि मुमकिन है कि वह नियमित तौर पर ड्रग्स का सेवन करता हो। यानी एनसीबी कंफर्म नहीं है। आर्यन के वकील ने कहा कि फुटबॉल के बारे में चैट है। एनसीबी का यह भी कहना है कि यह संभव है कि गिरफ्तार लोगों के तार जुड़े हो और उन्होंने पार्टी में शामिल होने की योजना बनाई। इससे आर्यन खान ने इनकार किया। एनसीबी का बड़ा दावा है कि आर्यन खान एक प्रभावशाली परिवार से हैं। अगर उन्हें जमानत पर छोड़ा गया तो वह सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। बिल्कुल सही बात है कि आर्यन एक प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखता है, तो क्या मंत्री जी का बेटा किसी चरवाहे के घर का है, जिसके पास फूस का घर है औऱ वह किसी सबूत से छेड़छाड़ नहीं कर सकता। इसीलिए पुलिस उसे चार-पांच दिनों तक छुट्टा छोड़े रखती है। फिर पूछताछ के लिए आने के लिए नोटिस भेजती है। जरा सोचिए, क्या आपको इस तरह की छूट मिलती? हत्या का आरोप ही छोड़िए, किसी की गाड़ी का एक्सिडेंट ही हो जाता और गलती से कोई जख्मी हो जाता तो भी इतनी रियायत आपको मिलती क्या? यहां मंत्री जी का बेटा पुलिस के नोटिस भेजने के एक दिन बाद तब आता है, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचता है। सुप्रीम कोर्ट जैसा कि इस तरह के मामलों में रिवाज है, सख्त टिप्पणी के बाद मामले को लंबे समय के लिए बोरिया-बिस्तर में डाल देता है। पेगासस जासूसी वाले में जिस-जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, अखबारों के पहले पन्ने पर हेडिंग बनी खबर। लेकिन अब उस मामले का क्या हुआ? इसी तरह लखीमपुर खीरी मामले में एक दिन की सुनवाई के बाद जज साहेब लोग छुट्टी पर चले गए और सुनवाई छुट्टियों के बाद करेंगे। जनता की जिंदगी की कीमत का फैसला छुट्टियों के बाद होगा।

कोरोना संकट, इटली का सिसली वाया ‘द गॉडफादर’ डॉन विटो कॉर्लियोन

इतालवी माफिया सेत्तिमो मिनेयो 
आपमें से अधिकांश लोगों ने डॉन विटो कॉर्लियोन का नाम ज़रूर सुना होगा। नहीं, तो माइकल कॉर्लियोन का तो जरूर ही। अच्छा यह भी नहीं तो यूरोप का एक देश है, इटली। इसे जानते ही होंगे। ख़ैर चलिए... जो लोग डॉन विटो और माइकल कोर्लियोन को जानते हैं, उनके लिए तो ठीक है। लेकिन इटली के नाम से वाकिफ लोगों को बता दूं कि कॉर्लियोन सरनेम वैसा ही जैसे किसी शहर या कस्बे के नाम पर कुछ लोग अपना सरनेम रख लेते हैं। दक्षिणी इटली में स्थित एक शहर है सिसली। वही सिसली जहां के ‘द गॉडफादर’ के डॉन विटो कॉर्लियोन रहने वाले थे। कॉर्लियोन भी दरअसल सिसली का एक नगर या कस्बा कह लीजिए। यहीं विटो एंडोलिनी का जन्म हुआ था, जो बाद में यहां से निकलकर अमेरिका के न्यू यॉर्क तक पहुंच गया और वहां माफिया की दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत कायम की। अपराध की दुनिया की इस सल्तनत को विटो कॉर्लियोन के छोटे बेटे माइकल कॉर्लियोन आगे बढ़ाया... तब से या उससे पहले से ही इटली का सिसली अपराध और माफिया का गढ़ माने जाने लगा। हालांकि, सिसली में माफिया के पांव मज़बूत होने के पीछे उसकी कमोबेश रॉबिनहुड छवि भी है। जैसा कि अमूमन होता है कि माफिया फैमिली अपने इलाके के लोगों को आर्थिक और कुछ अन्य तरीकों से मदद करती रहती है, जिससे लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति होती है। लेकिन माफिया की यह मदद एक तरफा नहीं होती, उस मदद के बदले लोगों को एक भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।
ख़ैर, कहानी फिल्मी हो उससे पहले लौटते हैं अपने असल मुद्दे पर। हम सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी की गिरफ्त में है। दुनिया भर में ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मौतों का सिलसिला सबसे पहले तेजी से यूरोप के इटली में बढ़ना शुरू हुआ। जैसे-जैसे कोरोना का संकट यहां बढ़ता गया संगठित गैंग और माफिया ने अपने वर्चस्व का खेल भी शुरू कर दिया। माफिया यहां जरूरतमंदों के घरों तक खाना पहुंचा रहा है, तो लोगों को पैसे से मदद भी कर रहा है। लोगों को अच्छी तरह पता है कि माफिया की मदद लेना सही नहीं है। उन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। लेकिन, इटली में संकट बड़ा है। लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। छोटे-मोटे काम करने वाले या भारत की तरह दिहाड़ी मजदूरी की तरह काम करने वालों का रोजगार पूरी तरह चौपट हो चुका है। उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ चुकी है। ऐसे में उन्हें ‘द गॉडफादर’ फिल्म के डायलॉग ‘I’m going to make him an offer he can’t refuse.’ की तरह माफिया के ऑफर को ठुकरा नहीं सकते। एक तो लोगों की मजबूरी सबसे बड़ी और दूसरी तरफ मना किसे करना है, उसका जोखिम भी नहीं ले सकते।
सिसली में लोगों की मजबूरी का आलम यह है कि खुद कुख्यात माफिया फैमिली का एक सदस्य कहता है, ‘लोग मुझे फोन करते हैं। वे फोन पर रोते हैं। मुझे कहते हैं कि उनके बच्चों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। एक महिला मुझे हर दिन बुलाती है। उसके पांच बच्चे हैं और उसे पता नहीं है कि बच्चों को कैसे खिलाना है?’
माफिया परिवार का यह सदस्य कहता है कि अगर ग़रीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाना माफिया कहलवाना है, तो उसे माफिया होने पर गर्व है। दरअसल, कोरोना वायरस तो नया है, लेकिन सिसली में जरूरतमंदों को खाने का पार्सल बांटना यहां की माफिया फैमिली की पुरानी रणनीति रही है।
सिसली की खुफिया एजेंसी और सरकारी मशीनरी में ऊंचे ओहदे पर काबिज निकोला ग्रेटरी कहते हैं कि माफिया का मकसद लोगों की बीच अपनी विश्वसनीयता और साख को हासिल करना है। माफिया खुद को यहां सरकार के विकल्प के रूप में पेश करता आया है और वह इस संकट में लोगों की मदद करके अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग सरकार की जगह उनकी ओर विकल्प के रूप में देखें। ऐसा हो भी रहा है, क्योंकि इन इलाकों तक सरकार की मदद पहुंच नहीं रहा है। इटली में पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी दर काफी बढ़ी है। अर्थव्यवस्था की हालत पहले से डंवाडोल है और मौजूदा कोरोना संकट ने उसकी कमर तोड़ दी है। लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत कहीं से भी भले ही माफिया से मदद मिल रही है, वे ले रहे हैं। हालांकि, एंटी माफिया संगठन के लिए काम करने वाले एक शख्स का कहना है, ‘यह बात लोगों को भी पता है कि खतरनाक है। उन्हें मालूम है कि यह कुछ वैसा ही है कि अगर तुम मेरी पीठ खुजलाते हो तो मैं तुम्हारी खुजलाऊंगा। यानी मदद एक तरफा नहीं है।’
वह बतलाते हैं कि शुरू में तो माफिया इन छोटी-छोटी मदद के बदले कुछ नहीं मांगते हैं। लेकिन सभी को किसी-न-किसी रूप में इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, सिसली के पालेर्मो में रहने वाले एक व्यक्ति मार्सेलो को अपना रेस्तरां बंद करना था। उसे माफिया से ऑफऱ मिला, जिसे वह इनकार नहीं कर सका। कुछ पैसे उसके अकाउंट में डाले गए और कुछ कैश में दिए गए। मार्सेलो बताते हैं कि बाद यही माफिया आपसे वसूली भी करते हैं।
इसका एक उदाहरण यह भी है कि जब स्थानीय चुनाव होते हैं, तो माफिया फैमिली के लोग उन लोगों के पास जाते हैं, जिनकी उन्होंने मदद की होती है। फिर उनके बीच बातचीत कुछ इस तरह शुरू होती है, ‘क्या मैं तुम्हे याद हूं? जब तुम्हें जरूरत थी तो मैंने तुम्हारी मदद की थी। और अब मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है।’ फिर वे अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने का दबाव बनाते हैं, जिसे लोग मना नहीं कर सकते। मार्सेलो बताते हैं कि सिसली में माफिया सरकार से कई गुना अधिक प्रभावशाली है। संकट के समय में वह हमेशा लोगों की मदद के लिए पैसे के दरवाजे खोल देता है। सरकार कहीं पीछे छूट जाती है या जब तक सरकार की मदद पहुंचती है, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है।
कुछ इस तरह इटली में माफिया सरकार की नाकामी का फायदा अपना वर्चस्व मजबूत करने में अपनी रॉबिनहुड छवि को भुना रहा है।

''भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार''

एक सुपरस्टार के तौर पर राजेश खन्ना का उदय और अस्त जिस नाटकीय अंदाज़ में हुआ, शायद ही ऐसा किसी कलाकार के साथ हुआ हो! 1969 से 1972 तक, राजेश खन्ना नामक एक फेनोमना ने बॉलीवुड को कदमों पर लाकर रख दिया. उन्होंने जो हिस्टीरिया  पैदा किया, वैसा फिल्म इंडस्ट्री में न पहले कभी देखा गया और न ही बाद में. दरअसल, 1969 से 1973 के इन तीन वर्षों में राजेश खन्ना ने एक के बाद एक 15 लगातार हिट फिल्में दीं. यह अभी तक एक रिकॉर्ड है. अभी तक यह कीर्तिमान कोई कलाकार या एक्टर नहीं तोड़ पाया है. ऑल इंडिया टैलेंट प्रतियोगिता जीतकर फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने वाला राजेश खन्ना की पहली फिल्म थी, आख़िरी ख़त. यह फिल्म 1966 में आयी थी. इसके बाद आयी राज़. लेकिन दोनों फिल्में ज्यादा नहीं चली. ऐसा कहा जाता है कि राजेश खन्ना एकमात्र स्ट्रगलिंग एक्टर थे, जो उन दिनों फिल्म निर्माताओं से काम मांगने अपनी कार से जाते थे. उनकी शुरुआती फिल्मों से करियर को कुछ ख़ास फायदा नहीं हुआ. लेकिन, 1969 में आयी आराधना ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया. बाप और बेटे के डबल रोल वाले किरदार ने उनके चाहने वालों को दीवाना बना दिया. आरडी बर्मन के संगीतों ने मेरे सपनों की रानी, कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा, रूप तेरा मस्ताना, गुनगुना रहे हैं भंवरे, गानों के साथ आराधना को गोल्डन जुबली हिट बना दिया. राज खोसला की दो रास्ते भी गोल्डन हिट रही. उन दिनों आलम यह था कि बांबे में एक सड़क के दोनों किनारे वाले थिएटर में से एक ओपेरा हाउस में आराधना लगी थी, तो दूसरी तरफ रॉक्सी में दो रास्ते. अब बांबे में किसी एक एक्टर के लिए इससे बड़ी बात उन दिनों कुछ नहीं हो सकती थी. 1969 तक तो हाल ये था कि लगता कि राजेश खन्ना कुछ भी ग़लत नहीं कर सकता है. एक के बाद एक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचा रही थीं. अभी तक उनकी फिल्मों एक मैनरिज्म झलकता था. लेकिन, उनमें इस मैनरिज्म से भी अधिक काफी कुछ था. 1969 की ख़ामोशी, सफर (1970) और आनंद (1970) में उन्होंने दिल से बेहद संवेदनशील किरदारों को निभाया. कैंसर से पीड़ित, लेकिन मरने से पहले अपनी पूरी ज़िंदगी जीने की चाहत रखने वाले शख्स के तौर आनंद संभवतः उनकी सबसे महान परफॉरमेंस वाली फिल्म थी. आनंद में राजेश खन्ना फ्रैंक काप्रा के अमर्त्य संबंधी विचारों को जस्टीफाइ की परिकल्पना से भी आगे ले गये..., ट्रैजडी वह नहीं है, जब एक्टर रोता है. ऑडिएंस का रोना ही ट्रैजडी है. फ़िल्म के अंत में जब अमिताभ राजेश खन्ना के मृत शरीर के बगल में बैठे होते हैं और टेपरिकॉर्डर से राजेश खन्ना की आवाज़ आती है, तो उस वक्त आपकी आंखे भर आती हैं और आप उस आंसू को रोक नहीं पाते. वह एक के बाद एक हिट फिल्में देते गये. यहां तक कि अंदाज (1971) में आयी फिल्म में उनकी मेहमान भूमिका को भी लोगों ने मुख्य हीरो शम्मी कपूर से अधिक पसंद किया. यह शम्मी कपूर काल के अंत और राजेश खन्ना काल के शीर्ष पर होने का प्रतीक था. हालांकि, राजेश खन्ना ने अपने दौर की शीर्ष अभिनेत्रियों वहीदा रहमान, नंदा, माला सिन्हा, तनुजा और हेमामालिनी के साथ काम किया, लेकिन उनकी जोड़ी सुपरहिट रही शर्मिला टैगोर और मुमताज़ के साथ. बीबीसी ने 1973 में अपने डॉक्यूमेंट्री सिरीज़ मैन अलाइव में राजेश खन्ना के बारे में बांबे सुपरस्टार नामक कार्यक्रम पेश किया. यह पहली बार था जब बीबीसी ने बॉलीवुड के किसी एक्टर पर डॉक्यूमेंट्री बनाने का फ़ैसला किया था. राजेश खन्ना ने निर्देशक शक्ति सामंत, संगीतकार आरडी बर्मन और गायक किशोर कुमार के साथ जबरदस्त तालमेल बनाया. यह तिकड़ी और राजेश खन्ना के साथ का ही नतीजा था कि लोगों को कटी पतंग (1970) और अमर प्रेम (1971) जैसी फिल्में देखने को मिली. ह्रषिकेश मुखर्जी के साथ बावर्जी (1972) में राजेश खन्ना के हरमनमौला रसोइया का किरदार कौन भूल सकता है, वहीं नमक हराम ने तो अमिट छाप छोड़ी. करियर के शीर्ष काल में राजेश खन्ना को देखने के लिए भीड़ का पागल हो जाना आम बात थी. कहा तो यहां तक जाता है कि लड़कियां उन्हें ख़ून से ख़त लिखा करती थी. उनकी तसवीर से शादी करती थीं. भारतीय सिनेमा में सुपरस्टार शब्द पहली बार राजेश खन्ना के लिए ही इस्तेमाल हुआ था. वह वाकई हमारे सुपरस्टार थे और रहेंगे.
                                                          (राजेश खन्ना मेरी नज़र से)

पुरस्कारों के लिए बनाई गयी फ़िल्म धोबी घाट

आमिर खान की फ़िल्म धोबी घाट. आमिर की पत्नी किरण राव निर्देशित है यह फ़िल्म. यानी आमिर के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. फ़िल्म का प्रोमो देखकर लगा बेहतरीन फ़िल्म होगी. लेकिन देखने के बात लगा पता नहीं फ़िल्म क्या बताना चाहती है. चार निराश, हताश और कुंठित लोगों की कहानी है. वह भी अनमने ढंग से कही गयी. फ़िल्म शुरू होती है और ख़त्म हो जाती और आप जब फ़िल्म देख बहार निकलते हैं तो ठगा सा महसूस करते हैं. शायद यह खास वर्ग के लोगों के लिए फ़िल्म बनाई गयी है. किरण राव भी यही मानती हैं. हालाँकि उनका यह भी कहना है कि अब आमिर खान प्रोडक्शन पर बेहतर फिल्मों को लेकर काफी दबाव होता है. लोग उम्मीद अधिक करने लगे हैं. धोबी-घाट की कहानी काफ़ी अलग किस्म की है और उसे दूसरी फ़िल्मों की तुलना में काफ़ी अलग अंदाज़ में पेश भी किया गया है. मुंबई पर गढ़ी गयी ये फिल्म एक डाक्यूमेंट्री है। जिसमें हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता एक शख्स मौजूद है। इस फिल्म में इंसान को प्यार भी मिलता है तो उसे दर्द भी नसीब होता है, कहीं फटकार मिलती है तो कही सहारा भी। बस इंसानी जज्बात और भावनाओं की कहानी है धोबी घाट जिसे संजीदा बनाने की भरपूर कोशिश की गयी है. कहना गलत नहीं होगा कि धोबी-घाट एक मास फिल्म नहीं बल्कि एक क्लास फिल्म हैं। जिसे शायद लोगों के मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि, पुरस्कार जीतने के लिए बनाया गया है. यह फिल्म में मुंबई पर लिखे गए कुछ फुटकर नोट जैसी है। जिसे हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से लेने के लिए स्वतंत्र है। कहानी कुछ ऐसा है कि महानगर में मौजूद हर वर्ग का आदमी किसी ना किसी कहानी में अपना अक्स तलाश लेगा। फिल्म में मसाला, भावुकता, प्यार एक भी ऐसा तत्व नहीं है जो आपको फिल्म में रोके रखने के लिए या आपको अच्छा लगाने के लिए या सहज महसूस कराने के लिए डाला गया हो। कुल मिलकर कहा जाये तो यह फ़िल्म एक प्रयोग है...

‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ यानी मौत गरीबों के मसीहा की

‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ बहुत दिनों बाद 70 के दशक की याद आई। जब फिल्मों का नायक गरीबी में बचपन गुजारने के बाद जवानी अमीरी में मौत और जीवन की खतरनाक खेल की बीच गुजारता है। जीत मौत की होती है। अफसोस हर किसी को होता है। जब इंसान अपराध की दुनिया छोड़ अच्छी राह बनाने की सोचता है, मौत ही उसे गले लगाती है। इसकी तुलना मैं अमिताभ बच्चन के फिल्मों से कतई नहीं करूंगा। अजय देवगन का एक अलग अंदाज है। उनमें अमिताभ जैसी बात न हो, शाहरूख जैसी फैन फॉलोइंड भले ही न हो, लेकिन आज के नायकों में वह बिल्कुल जुदा नजर आते हैं। रील लाइफ को रियल एहसास कराने का माद्दा उनमें ही दखता है। एक मोड़ पर वह इन सबसे बेहतर नजर आते हैं। ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ यही साबित करती है। लोग कह रहे हैं, यह फिल्म मशहूर (?) डॉन हाजी मस्तान, अजय देवगन का चरित्र (मस्तान) और इमरान हाशमी का दाउद इब्राहिम से प्रेरित है। मस्तान को मशहूर इसलिए कहा क्योंकि जब गरीबी छाई हो और पेट अन्न के दानों के बिना चिपटा जा रहा हो, दो रोटी देने वाला ही खुदा होता है। आजादी की वर्षगांठ एकबार फिर हम इस महीने की 15 तारीख को मनाने जा रहे हैं। यह 63वीं वर्षगांठ होगी यानी हमें आजाद हुए तिरेसठ बरस बीत गए, लेकिन आज भी बहुसंख्यक आबादी दो वक्त की रोटी की खातिर जान गंवा रहा है। कुछ नक्सली के नाम पर ढेर किए जा रहे हैं तो कुछ किसी और के नाम पर। सच्चाई तो वाकई यही है कि सन् 47 के पहले हम अंग्रेजों के गुलाम थे और उसके बाद गरीबी के। पहले हमें दूसरों ने लूटा अब अपने नोच- खसोट रहे हैं। इस फिल्म को देखकर हम अपनी गरीबी के मसीहा को पाते हैं। सुल्तान मिर्जा का किरदार यदि मस्तान से प्रभावित है तो वाकई वह उन लोगों के लिए खुदा था, जिसकी उसने मदद की। सरकार के खिलाफ उसने बेशक काम किए, क्योंकि सरकार जिस काम की इजाजत नहीं देती, वह वहीं काम करता था। वह काम वह कभी नहीं करता था, जिसकी इजाजत जमीर नहीं देता। इसकी तर्ज पर कहूं तो सरकार हर उस काम को नहीं करती या करने देती, जो उसके खिलाफ और जनता के हित में हो। इंसान का जमीर सरकार से बड़ी चीज है। सरकार गोली तो दे सकती है, पर रोटी नहीं। नक्सलियों को मार तो सकती है, लेकिन नक्सली बनने की वजह को नहीं मार सकती। लिखना तो फिल्म के बारे में ही चाहता था, लेकिन फिल्म दिल के इतना छू गई कि क्या कहूं मन का गुबार सामने आ गया। ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ के नायक अजय देवगन हकीकत में नायक नजर आने लगते हैं। वह हर उस शख्स की आंखों में उम्मीदों नजर आते हैं, जिसकी जिंदगी गरीबी में बीती है। इसे एहसास करने का दावा वही कर सकता है, जिसने गरीबी को जिया है। फिल्म में जब तक अजय देवगन जीवित रहते हैं, गरीबों का मसीहा, जिंदा रहता है। पर, उनके मरते ही, गरीब फिर से मनहूस जीवन को मजबूर हो जाते हैं। कड़वी सच्चाई यह है कि असल जिंदगी का फलसफा भी यही है। यहां गरीबों का परवाह करने वाला, उसके हक की लड़ाई करने वाला ज्यादा वक्त तक जिंदा नहीं रहता या रहने नहीं दिया जाता। यानी अमीरी ही हमेशा जिंदा रहती है तो मौत गरीबों के लिए। मेरे जेहन में यह सवाल बार-बार उठ रहा है, आखिर मौत हमेशा बदलते वक्त की क्यों होती है। बदलाव शायद सिर्फ संपन्न और सक्षम लोगों के लिए ही है।

रास आयी 'राजनीति'

एक वैरागी जिसने खेल के सारे नियम बदल डाले। वाकई राजनीति ऐसी ही रही। फिल्म की कहानी काफी कसी हुई लगी। शुरू से लेकर जब तक सूरज अपनी मां से नहीं मिलता तब तक आपको यह फिल्म इस कदर बांधे रहती है कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते, फिल्म का सवा दो घंटा कैसे गुजर गया। कई लोगों ने फिल्म देखने के पहले बताया था कि आखिरी के आधे घंटे को छोड़ दें, तो फिल्म ऐतिहासिक हो सकती थी। मुझे भी ऐसा ही लगा। हालांकि प्रकाश झा की तारीफ इस मायने में की जानी चाहिए उन्होंने इतने बड़े स्कारकास्ट को लेकर पहली बार कोई फिल्म बनाई। सभी ने उम्मीद से बेहतरीन प्रदशर्न किया। पर मनोज वाजपेयी को ज्यादा तरजीह शायद इसलिए कि वह एक ऐसे पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं जहां, राजनीति कूट-कूट कर रगों में बसती है। उनसे बेहतर उनका कैरेक्टर कोई प्ले भी नहीं कर सकता था। हां, एक वामपंथी के तौर पर नसीरुद्दीन शाह का रोल काफी छोटा और पलायनवादी नजर आया। फिल्म उनकी भूमिका की और अधिक की अपेक्षा थी। नसीर साहब के अलावा अजय देवगन की दलित भूमिका यानी सूरज कुमार की फिल्म में इंट्री तो धांसू होती है, पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वह अपनी धार खोते जाते हैं। एक दलित कैरेक्टर के तौर उनका चरित्र और भी सशक्त होने की उम्मीद थी। फिर भी इतने बड़े स्टारकास्ट को देखते हुए वह आपको निराश कतई नहीं करते हैं। शायद वह प्रकाश की फिल्म के लकी मास्कट हैं। अर्जुन रामपाल का किरदार मजबूत और राजनीतिक हिंसा की असलियत को बताती है। सबसे दुखद लगा राजनीति में टिकटों के बंटवारा की सच्चाई को देखकर। महिलाएं राजनीति में क्या हैसियत रखती हैं और उनका इस्तेमाल किस तरह होता है, इसे देखना हो तो राजनीति देखिए। राजनीति में महिलाओं की असली तस्वीर पेश की गई है। वह समझौता भी करती है और शासन भी। वह मजबूर भी है और मजबूत भी। कुछ महिलाएं राजनीति या कहें की जीवन के हर क्षेत्र समझौतावादी होकर तरक्की करती हैं। पर कभी-कभी उनका यह रवैया उनपर भारी पड़ता है। हमारे वास्तविक जीवन की यह असलियत है। शायद यूपी के मधुमिता और अमरमणि त्रिपाठी की दास्तां। नाना पाटेकर अपने किरदार में बेस्ट रहे। पर्दे के पीछे का खिलाड़ी जमीनी हक़ीक़त को बखूबी पहचानता है। उसके बगैर मैदान का खिलाड़ी अपंग और अपाहिज है। राजनीति की रणनीति बनाने में उसकी भूमिका को नजरअंदाज करना राजनीतिक कैरियर को खत्म करने जैसा है। वही हैं, नाना पाटेकर। महाभारत के कृष्ण और शकुनी मामा। राजनीति में सही या गलत कुछ भी नहीं होता, बस सही होता है तो जीत। कैटरीना मोम की गुड़िया से परिपक्व एक्टर की ओर एक और कदम बढ़ाती हुई। उसके साथ कदमताल करते रणवीर। इन दोनों के अभिनय में निखार फिल्म दर फिल्म आता जा रहा है। रणवीर कपूर और कैटरीना कैफ दोनों ऐसे कलाकार रहे हैं, जो मुझे कभी पसंद नहीं आए। रणवीर को मैंने वेक अप सिड और रॉकेट सिंह में देखा, तभी लगा मैं गलत था। हालांकि कैटरीना के लिए इस फिल्म को करने को कुछ था नहीं फिर भी अपनमी भूमिका को ईमानदारी और निष्टा से निभाती नजर आईं। इसमें कोई शक नहीं वह काफी मेहनती हैं और अपने काम के प्रति समर्पित रहती है। मनोज दा का तो कहना ही क्या! छा गए सरजी। सिंगल प्वाइंट एजेंडा है और करारा जवाब मिलेगा। संगीतकार आदेश श्रीवास्तव की तारीफ न हो तो बेमानी है। मोरा पिया मो से बोलत नाहि, द्वार जिया के खोलत नाहि....

बॉलीवुड की जुलिया रॉबर्ट्स

प्रीति जिंटा की तारीफों में आजकल उलझा हुआ हूँ। इसलिए बातें उनकी खूबसूरती की ही करूँगा। उनकी आँखें, जुल्फों और डिंपल वाली मुल्कान की तारीफ की जा सकती है। पर वह पारंपरिक तारीफ की श्रेणी में आएगा। कुछ इस तरह जैसे, हिंदी साहित्य के रीति काल में मंझन और जायसी की रचनाओं में नायिकाओं का नख-शिख का वर्णन। लेकिन प्रीति जिंटा इन सबसे अलग मुकाम पर है। उनमें आधुनिक नारी के संस्कार हैं, तो पारंपरिक स्त्री का चरित्र भी। बदलते समय के मुतिबक, बदलते नारी की छवि की झलक हमें प्रीति जिंटा में देखने को मिलती है। पहले उन्होंने फिल्मों की बदौलत पुरुषों की गुलाम दुनिया में अपनी उनमुक्तता साबित की। उसके बाद आईपीएल जैसे क्रिकेट टूर्नामेंट में, जहां कई टीमों के मालिक दुनिया के अग्रणी धनकुबेर हैं, वहीं पंजाब की टीम की सह मालकिन होना यह साबित करता है कि महिलाएं किसी भी मायनें में पुरुषों से पीछे नहीं है। उनमें स्वाभिमान भी, आत्मसम्मान भी और आत्मविश्वास भी। मुश्किल परिस्थितियों से लड़ने का जज्बा भी। तभी तो उनकी टीम हारती रही, हार का मलाल हर किसी को होता है, पर हार की हताशा प्रीति के चेहरे पर कभी नजर नहीं आई। आजादी के बाद भी भारत में महिलाओं को जिस तरह पुरुषों ने गुड़िया समझना जारी रखा। उस एक छलावे की दीवार को राजनीति में इंदिरा गांधी ने तोड़ा। उनके राजनीतिक सहयोगियों ने गूंगी गुड़िया कहकर सिर्फ इंदिरा ही नहीं, बल्कि एक सहनशील और मर्यादित महिला को कमजोर आंकने की भूल की। बाद में वहीं सारे पारंपरिक मिथकों को तोड़ती नजर आई। हालांकि इतनी तारीफ प्रीति जिंटा की नहीं करुंगा पर हां, इतना जरूर है कि वह जहां भी हैं, अपनी इन्हीं खूबियों की बदौलत है, जो उन्हें दूसरों से बाकी अलग साबित करता है। सबसे जुदा और सबसे अनूठा। प्रीति जिंटा के बारे में कहने को तो बहुत कुछ कहा जाता है। पर उसे बताने के लिए अगली बार कुछ ज्यादा मेहनत करूंगा। इसलिए अंत में यही कहना चाहूंगा कि मैं शार्षक अलग नहीं सोच सका। यह काफी दिनों से मेरे जेहन में घर कर गई थी। अगली बार कोशिश करूंगा थोड़ी खोजबीन करूं। ताकि प्रीति के लिए कुछ अलग और नया कह सकूं। साहित्यिक अंदाज में कहूं तो प्रीति के लिए नए प्रतिमानों की तलाश कर सकूं।

प्रीति जिंटा : बॉलीवुड की जुलिया रॉबर्ट्स

अद्भुत, अदम्य और साहस। प्रीति जिंटा। जी हां, कई महीनों से सोच रहा था कि प्रीति जिंटा के बारे में लिखूं। पर बहुत असमंजस में था। आखिर शुरुआत कहां से करूं। क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि सिर्फ लिखने के लिए लिखूं। किसी से तुलना भी नहीं करना चाहता था। हालांकि आज के आधुनिक समय में सारी चीजें किसी की तुलना पर ही टिकीं हैं। यदि आप बॉलीवुड में शाहरुख खान को महान बनाना चाहते हैं तो उनकी तुलना अमिताभ बच्चन से कर दीजिए या उनसे भी बढ़ा-चढ़ा कर गुणगान कर दीजिए। मतलब फंडा यह है किसी की यदि तारीफ करनी है तो उसकी तुलना उस क्षेत्र के दिग्गज से कर दीजिए। कंप्यूटर फील्ड में आप किसी को महान बताना चाहते हैं तो बस बिल गेट्स हमारी जुबान पर चढ़ जाते हैं। इसी तरह साहित्य के क्षेत्र में टैगोर या हरेक का अपना पंसदीदा नाम। इसी तरह सभी के लिए कोई न कोई तुलनात्मक नाम होगा। चूंकि वह एक एक्ट्रेस हैं तो जाहिर है खूबसूरती की बात भी होनी चाहिए। पर मैं उसे अपनी इस लेख की थीम नहीं बनउंगा। पर इसमें कोई शक नहीं कि वह बेहत खूबसूरत हैं। बॉलीवुड में उन्हें हॉलीवुड की जुलिया रॉबर्टस माना जाता है। जुलिया के बारे में हाल में खबर आई कि आज भी वह सुंदरता के मामले में लोगों की फेवरेट पसंद हैं। आज जुलिया 40 साल की हो चुकी हैं। उनके बच्चे भी हैं। शायद दो। फिर भी वह पूरी दुनिया में खूबसूरती और पर्सनिलटी क मामले में आज की कई तेजतर्रार और मिस वर्ल्ड से लेकर युनिवर्स भी उनकी अद्भुत सुंदरता के सामने फीकी नजर आती हैं। यही कहानी भारत में प्रीति जिंटा की है। यह उनकी तुलना नहीं बल्कि कुछ लोगों के लिए छोटा सा परिचय है। क्योंकि प्रीति की अभी शादी नहीं हुई। तो बच्चे की बात करना बेमानी ही है। खैर यह मजाक था। अब अपनी शुरुआत की बात कहूं तो मुझे कोई दूसरा शब्द नहीं मिल रहा था प्रीति के लिए। इसलिए मैंने शुरुआत बहुत संक्षिप्त और उनके नाम से ही की। शायद एक वजह यह है कि कोई भी बात शुरू करने में उसके इंप्रेशन को लेकर मैं हमेशा कॉन्शस रहा हूं। इस चक्कर में हमेशा शुरुआत गड़बड़ हो जाती है। यहां भी हुई। मुझे खुद अजीब लगा रहा है कि जिसके बारे में मैं इतना कुछ लिखना चाहता हूं, उसके लिए शब्दों को नहीं जुटा पा रहा हूं।