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लॉकडाउन में भूख से मरते ग़रीब, लेकिन गिद्धभोज में जुटे हैं सत्ता के सरमायेदार


दिल्ली-जयपुर नेशनल हाइवे पर एक मजदूर भूख की वजह से मरे हुए कुत्ते का मांस खाने को मजबूर हो गया। ख़बर बस इतनी है। एक ऐसी ख़बर जिससे सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। गरीबों की आंखों के आंसू पोछने की बात कहने वाले नरेंद्र मोदी 6 साल से देश के प्रधानमंत्री हैं और उसी दिल्ली में रह रहे हैं, जहां से कुछ किलोमीटर की दूरी पर यह वाकया होता है।
देश की गरीबी दूर करने की बात कहने वाले भुखमरी तक हालात लेकर आ गए। लोकतंत्र को गाली देने वाले लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर गिद्धभोज करने लगे। सरकारें बिल्कुल फेल हो चुकी हैं, कृपया यह तस्वीर कोई सरकारों तक पहुंचा दे। खुद को राजनीति का चाणक्य कहने वाले बस चुनावी जयचंद बन कर रह गए हैं। जब अपना घर यानी देश त्रासदी से घिरा है, तो उनकी खोजखबर भी नहीं है। चुनाव जीतना, जोड़-तोड़ की राजनीति से सत्ता हासिल करना, फर्जी राष्ट्रवाद की आड़ में हिंदू-मुसलमान की खाई पैदा करना ही चाणक्य नीति नहीं होती है। वक्त बुरा है...वक्त बदलेगा, लोग भी बदलेंगे...
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दिल्ली-जयपुर हाईवे पर भूख को बर्दाश्त न करने वाली रोंगटे खड़े करने वाली तस्वीर क्या सत्ता में काबिज अंधों को नहीं दिखती। यह तस्वीर बताती है कि कोरोना वायरस को लेकर सरकार की नीतियों ने आम इंसानों को क्या बना दिया है। इंसान एक मरे हुए कुत्ते को खाने को मजबूर है। आख़िर यह सरकार किसकी है। बस अमीरों और नेताओं की, जिनकी भूख इन ग़रीबों की भूख से अलग है। ग़रीबों की भूख कुछ खाने की है, तो उनकी कुछ पाने की। गरीबों की भूख को बस रोटी चाहिए, इन नेताओं की भूख पैसा और सत्ता की मांग करती है।
इस लॉकडाउन में भूख से मौतों की घटनाएं आम हो रही हैं और अब यह नया मामला भी सरकार को अगर सोचने पर मजबूर नहीं करती है, तो सोचिए हालात कहां तक बदल गए हैं। पहली बार लॉकडाउन लागू होने के बाद से ही देश भर में लोगों को काम मिलना बंद हो गया। गरीब दिहाड़ी मजदूरों पर सबसे ज्यादा मार पड़ी। इसकी एक मिसाल यह है। घटना 31 मार्च की बिहार के भोजपुर ज़िले के आरा की है। मुसहर समुदाय से आने वाले आठ वर्षीय राकेश की मौत 26 मार्च को हो गई थी। उनकी मां का कहना है कि लॉकडाउन के चलते उनके पति का मजदूरी का काम बंद था, जिससे 24 मार्च के बाद उनके घर खाना नहीं बना था। इसके बाद 17 अप्रैल को मध्य प्रदेश में एक बुजुर्ग की भूख से मौत की खबर आई। बुजुर्ग सड़क किनारे बैठकर लोगों से मांगकर खाता था। लॉकडाउन में सब बंद हुआ तो उन्हें खाना देने वाला भी नहीं रहा। सरकारें तो दावा करत रहेंगी कि सबका ख्याल रखा जा रहा है, लेकिन किस तरह रखा जा रहा है, वह भूख से होने वाली मौतें साफ बयां कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में एक 60 साल के प्रवासी कामगार की भूख से मौत हो गईयह शख्स तीन दिन पहले महाराष्ट्र से अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ यात्रा शुरू की थीपरिवार के सदस्यों का कहना था कि कई दिनों से उन्होंने खाना नहीं मिलने पर कुच नहीं खाया था। फिर एक खबर आई 19 मई को कि झारखंड में महज पांच साल की बच्ची की भूख से मौत हो गई। सरकार अमला भूख से मौतों से इनकार करने में जुट गया, लेकिन जिस परिवार ने अपनी बच्ची को खोया कोई उसकी फरियाद नहीं सुनने वाला।
अगर किसी मामले का आकलन करने के लिए सैंपल सर्वे का सहारा लिया जाता है, तो भूख से होने वाली मौतें आखिर क्या कहती हैं। सिर्फ एक क्षेत्र या राज्य ही नहीं... लॉकडाउन के बाद और सरकारी सुस्ती के बीच भूख से मौतें हर तरफ हो रही हैं। हम वैसे मामलों को ही देख-सुन या जान पा रहे हैं, जो मीडिया में आ रहे हैं। कई मामलों को दबाया जा रहा है या फिर उसे अखबारों/मीडिया तक आने से पहले ही खत्म कर दिया जा रहा है।

मजदूरों का पलायनः आख़िर भागने की चुल काहे मची है इनको? कभी घर से तो कभी घर को भागना...


12 मई की घटना है। 35 साल के रंजन यादव पिछले तीन दिनों से सड़कों पर ऑटो भगा रहे थे। उस ऑटो को जिसे उन्होंने महज छह महीने पहले ही खरीदा था। 12 मई तक उन्होंने मुंबई से अपने घर पहुंचने के लिए करीब 1500 किलोमीटर की दूरी भी तय कर ली थी। घर अब बस 200 किलोमीटर के फासले पर रह गया था, तो ऑटो की स्पीड थोड़ी बढ़ा दी। तभी एक ट्रक से ऑटो जा टकराई। इस हादसे में रंजन की पत्नी और 6 साल की बेटी की मौत हो गई। रंजन यादव कहते हैं, कहां तो 1500 किलोमीटर की दूरी तय कर ली थी, सोचा था लॉकडाउन में अपने परिवार के साथ घर पर रहूंगा। लेकिन अब अपनी पत्नी और बेटी का शव लेकर घर जा रहा हूं।
आपको क्या लगता है? अगर सरकार सोच-समझकर लॉकडाउन लगाती। मजदूरों और रंजन यादव जैसे लोगों को घर पहुंचाने का इंतजाम करती, तो यह हादसा रुक नहीं सकता था। तब रंजन अपनी हंसती-खेलती 6 साल की बेटी और पत्नी के साथ घर पर खुशहाल जिंदगी जी रहे होते। लेकिन, सरकार की नासमझी और ऑटो चलाकर अपना जीवन गुजर बसर करने वाले रंजन की तो दुनिया ही बर्बाद हो गई। आख़िर कौन है इसका जिम्मेदार?
12 मई की ही घटना है। बिहार के बांका जिले के रहने वाले सुदर्शन दास दिल्ली के नांगलोई से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए था, ताकि ट्रेन पकड़ सकें। लेकिन रास्ते में किसी ने उनके टिकट और दो जोड़ी कपड़ों से भरा भाग साफ कर दिया। जब स्टेशन पहुंचे तो आंखों में आंसू और चेहरे पर मजबूरी थी। वह बताते हैं, मेरी पत्नी प्रेग्नेंट है। 9 महीने हो चुके हैं और कभी डिलिवरी हो सकती है। मैं यहां था, ताकि कुछ पैसे कमा सकूं और बच्चे के जन्म के समय घर पहुंच सकूं।
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सुदर्शनदास जैसे लोग आखिर क्यों घर जाना चाहते हैं? क्या दिल्ली में रहने के लिए उन्हें खाना नहीं मिल रहा है। मेरे एक साथी ने पूछा कि आखिर ये लोग पैदल भागे क्यों जा रहे हैं? कभी घर से भागकर नौकरी के लिए आते हैं, तो कभी यहां से घर के लिए। उन्होंने बोला, इतनी भी भागने की चुल काहे मची है इनको। कभी घर से भागेंगे तो कभी घर को भागना। सुदर्शन दास जैसे लोगों के पास है क्या उनके इस सवाल का जवाब।
रोहित कुमार को गुड़गांव से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुरी अपने घर जाना है। वह बताते हैं कि कुछ महीने पहले ही घर से आया था। जहां काम करता हूं, वहां कॉन्ट्रैक्टर ने बोला कि अब काम बंद है, तो सैलरी नहीं दे सकता। दो महीने तक इंतजार के बाद सारे पैसे खत्म हो गए। आखिर कब तक यह चलेगा किसी को पता नहीं। कभी खाना मिल पाता है, तो कभी नहीं। आखिर हम अपने घर जाएं, नहीं तो क्या करें? यहां किसके भरोसे रहें?
यह खबर हरियाणा की है। गुड़गांव में एक शख्स और उसके बेटे ने मणिपुर के इंफाल की रहने वाली 19 साल की लड़की की पिटाई कर दी। बाप-बेटे का आरोप था कि वह लड़की कोरोना वायरस फैला रही थी। मतलब कुछ भी और किसी भी तरह का आरोप लगाकर लोगों की पिटाई शुरू है। कुछ दिनों पहले तबलीगी जमात की आड़ में मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा था और अब सहूलियत के हिसाब से लोग अपना एजेंडा और खुन्नस निकालने के लिए किसी को भी टारगेट बना ले रहे हैं।
अपने घरों को लौट रहे इन तमाम लोगों पर मेरे कुछ दोस्तों और राष्ट्रवाद की अलख जगा रहे लोगों को सवाल कई हैं। पिछले दिनों ही मेरे मित्रों कुछ सवाल उठाए कि देश स्पेशल ट्रेनें चलने के बाद दिल्ली ने 41, महाराष्ट्र ने 36, गुजरात ने 33 कोरोना पॉजिटिव बिहार भेजे हैं। अन्य राज्य भी भागीदार हैं. ये तो रैंडमली टेस्ट के नतीजे हैं। मेरे इन्हीं मित्र को फिक्र होती है कि आखिर ये लोग भागे क्यों जा रहे हैं? कभी घर से भागकर नौकरी के लिए आते हैं, तो कभी यहां से घर के लिए।
लेकिन यही मित्र भूल जाते हैं कि जब वंदे भारत मिशन के तहत 12 मई को विदेशों से 351 लोग तमिलनाडु पहुंचे और उनमें से कई कोरोना पॉजिटिव पाए जाते हैं, तो उन पर सवाल उठाने के बजाय उनकी अंगुली टेढ़ी हो कर मुसलमानों की तरफ घूम जाती है। यह तो साफ बात है कि कोरोना वायरस हिंदुस्तान में पैदा नहीं हुआ। यहां बीमारी विदेशों से आने वाले लोगों ने फैलाई है। लेकिन विदेशों से आने वाले उन लोगों के लिए हमारे यही मित्र भागने जैसा कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि उनकी नजरों में विदेशों से जो भारतीय आ रहे हैं, वे वहां फंसे हुए थे। लेकिन हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में जो मजदूर फंसे हैं और अगर वे अपने-अपने गृह राज्यों को लौटना चाह रहे हैं, तो उनके हिसाब से यह लौटना नहीं, बल्कि भागना है। गजब की थ्योरी लाई है राष्ट्रवादी और छद्म दक्षिणपंथी विचारकों ने।
हम अपने घर से भेजे गए पैसों से अपना खाना-पानी चला रहे हैं। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। हमें तो यह भी पता नहीं है कि हम जिंदा घर लौटेंगे भी या नहीं। पंजाब के फगवाड़ा से अपने घर बिहार के भोजपुर जिले के लिए निकले 21 साल के ब्रिज किशोर का यह कहना है। करीब 1500 किलोमीटर का सफर है, जबकि 150ल किलोमीटर की दूरी वह साइकल से नाप चुके हैं। ब्रिज किशोर बताते हैं, मैं पंजाब के अमृतसर के एख मील में काम करता था, लेकिन वह बंद हो चुका है। हमारे रहने-खाने का कोई इंतजाम नहीं है। मुझे तो घर से पापा ने 800 रुपये भेजे तो उससे साइकल खरीदी और पिछले तीन दिनों से यही चला रहा हूं। पता नहीं कब पहुचूंगा। पहुंचूंगा भी या नहीं।
ऐसे कई मामले हैं, जो आपको दिखेंगे। अगर आप देखना चाहें। कोई अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को लेकर हाइवे पर चला जा रहा है। कोई बैलगाड़ी में कभी खुद तो कभी पत्नी को एक बैल की जगह जुतते हुए घरों को लौट रहा है। कोई जुगाड़ से स्केटिंग की गाड़ी बनाकर अपनी गर्भवती पत्नी और बच्चे को उस पर ढोकर ले जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चे इस तपती गर्मी में पैदल चले जा रहे हैं। आखिर कौन हैं ये लोग? क्यों जाना चाहते हैं? क्या वाकई इनको भागने की चुल्ल मची है? नहीं... आपको तब तक समझ नहीं आएगा, जब तक आपके अंदर दिल नहीं होगा। बस हिंदु-मुसलमान के चश्मे को उतारकर खुद को उनकी जगह रखकर देखें, तो अपनी जान की परवाह किए बिना हजारों किलोमीटर का सफर पैदल और जोखिम में कैसे काटे जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी कह दीजिए मैं झूठ नहीं बोलता, क्योंकि आपके वादे चीख-चीखकर झूठ की गवाही दे रहे हैं

-    इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त हैं,वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए।
जो सामान्य व्यक्ति हवाई चप्पल पहनकर घूमता है, वह मुझे हवाई जहाज में दिखाना है। 
यह दोनों ही बयान इसी देश के प्रधानमंत्री के हैं। या तो ये दोनों ही बयान झूठे हैं या प्रधानमंत्री झूठे हैं। अगर ऐसा भी नहीं है, तो उनके सारे दावे कागज़ी हैं और बातें बेमानी हैं। इस देश में लॉकडाउन है। बसें बंद हैं। ट्रेन बंद है और बंद है सारा मुल्क। अगर नहीं बंद है, तो देश के हुक्मरानों के झूठे दावे, झूठा वादा और दिलासा।
आज सुबह जब आंख खुली, तो खबर 17 मजदूरों के ट्रेन से कटकर होने वाली मौत की थी। प्रधानमंत्री का ट्वीट था, जिसमें उनका दुख था, लेकिन नहीं था तो मजदूरों का दर्द समझने वाला दिल। जिन मजदूरों की जांन गई, वे कौन थे? अपने घर ही तो जा रहे थे... ट्रेन की पटरियों पर लेटे थे कि ट्रेन आई और रौंदती हुई चली गई। पटरियों पर बिखरी सूखी रोटियां बता रही हैं कि आख़िर भूख ने किस कदर परेशान किया होगा? किन हालातों में अपने घरों के लिए निकले होंगे...
लॉकडाउन से प्रवासी मज़दूरों से सबसे ख़राब स्थिति मजदूरों की है। न काम है और न ही रहने को छत। फिर किस मुंह से किस सरकार के भरोसे शहरों में रुके रहें। 45 दिनों से देश बंद है और बंद हैं हुक्मरानों के दिल और दिमाग। वे नहीं समझना चाहते इनका दुख और दर्द। कोई 100 किलोमीटर पैदल चला जा रहा है, तो कोई साइकल से भागा जा रहा है। पुलिस लाठियां भांज रही हैं। प्रेग्नेंट महिलाएं हाईवे से सफर ऐसे तय कर रही हों, जैसे चंद मिनट में रफ्तार उन्हें हजारों मील दूर घर पहुंचा देगी। लेकिन, यह कोई बस नहीं है और न ही सेना के जहाज, जो विदेशों से अमीरों को लाने के लिए उड़ानें भर चुकी हैं। यहां पैदल जाना है, रास्ते में भूख को पेट दबाकर मार देना है।
चलते-चलते थक गए...टांगों में दर्द हो रहा है... जब 5-7 की बच्ची... 7-8 साल का बच्चा... अपने मां-बाप के साथ सड़कों पर यूं ही पैदल निकल पड़े हैं कि आख़िर कभी तो उस घर को पहुंचेंगे, जहां कोई अपना होगा...इस शहर की अमीरी और सरकारों की बेरहम नीतियों, झूठ से दूर कोई अपना तो होगा। 
आख़िर कौन हैं ये लोग...क्या ये सभी वही हैं, जिसके लिए देश के प्रधानमंत्री कहते हैं, ‘’इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए’’... क्या ऐसा हो रहा है... उन्हीं की पार्टी का एक मुख्यमंत्री प्रवासी मजदूरों को अपने घर जाने से सिर्फ इसलिए रोकता है कि उस राज्य के बिल्डर (अमीरों) कहते हैं कि मजदूर चले गए तो हमारा काम कौन करेगा...फिर इतनी ही चिंता है, तो मजदूरों का 45 दिनों से ख्याल क्यों नहीं रखा... बेंगलुरु में मजदूर जब कहता है, हम इन हालातों में रहने की जगह अपने घर पर मरना पसंद करेंगे...कर्नाटक के मुख्यमंत्री मजदूरों और फंसे लोगों को ले जाने वाली ट्रेन कैंसिल करने का फैसला करते हैं, तो देश के प्रधानमंत्री का ट्विटर जवाब दे जाता है...प्रवासी मजदूर अपने राज्यों/घरों को जाने के लिए गुजरात के सूरत में प्रदर्शन करते हैं, तो प्रधानमंत्री के ट्वीट से देश के इन गरीबों के लिए एक ट्वीट नहीं निकलता...एक शब्द खर्च नहीं होता।
आख़िर जवाब भी चाहिए, तो बस ट्विटर पर ही क्यों? क्या सरकार ट्विटर के भरोसे चल रही है? अगर चल ही रही है, तो फिर ऐसी तमाम ख़बरों से हुजूर नावाकिफ तो नहीं ही होंगे कि सात महीने के गर्भवती महिला लगातार 12 घंटे चले जा रही है...न पैसा है और न ही खाना...न सरकार-प्रशासन से कोई मदद। घर कब पहुंचेंगे, इसका भी कोई अंदाज़ा नहीं। लेकिन, प्रधानमंत्री का पुराना भाषण याद कीजिए...मैं चाहता हूं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही सुविधाएं देश के गरीबों को मिल रही हैं?
प्रधानमंत्री की पार्टी के सहयोग से बिहार में सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की पार्टी का उप-मुख्यमंत्री जबरन 222 मजदूरों को वापस भेज देता है, ताकि दूसरे राज्यों में श्रमिकों की कमी न हो...जब दूसरें राज्यों से मजदूरों को अपने गृह राज्य (बिहार) लाने की बात होती है, तो कभी ट्रेन की कमी, कभी बस की कमी, तो कभी पैसे की कमी का रोना रोती है सरकार...लेकिन लौट चुके लोगों को वापस भेजने वाली सरकार का मुखिया कैसा है? इस पर उप-मुख्यमंत्री अखबारों में इश्तिहार देकर ढिंढोरा पीटता है कि दूसरे राज्यों को बिहार की श्रम शक्ति का एहसास हुआ... कैसी सोच है यह? कतई ही गिरी हुई मानसिकता और उससे भी बदतर कही जाएगी। लेकिन इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
जब प्रधानमंत्री लॉकडाउन का सख्ती से पालन करने की बात कहते हैं, तो उन्हीं की पार्टी का मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) सरेआम उनकी बातों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बसों को दूसरे राज्य में भेजते हैं, ताकि फंसे हुए लोगों को अपने राज्य ला सकें...दूसरे राज्य का मुख्यमंत्री बंगले झांकता रहता है कि मुझे तो प्रधानमंत्री की बातों का पालन करना है....केंद्र सरकार के नियमों का हवाला देकर वह दूसरे राज्यों से अपने लोगों को न बुलाने को लेकर अपनी मजबूरी जाहिर कर देता है...
 अगर इन हताश प्रवासी मजदूरों की पीड़ा प्रधानमंत्री की आत्मा को नहीं झकझोर पा रही है, तो आख़िर क्या बचता है? सऊदी अरब से लोगों को लाने के लिए पांच उड़ानें...इन मजदूरों के नसीब में हाईवे पर पैदल चलने की मजबूरी है, क्योंकि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही वे सुविधाएं हैं, जो अमीरों को मिल रही है?
बाक़ी जगहों को छोड़ दीजिए देश के दिल दिल्ली में जहां, प्रधानमंत्री निवास के 10 किलोमीटर के दायरे यानी आईटीओ से मजदूरों का एक जत्था पैदल ही बिहार के भागलपुर जाने के लिए 1000 किलोमीटर से अधिक दूर के सफर पर निकल पड़ता है। लेकिन प्रधानमंत्री का ट्विटर शांत रहता है... एक शब्द या एक बार भी मुंह से नहीं निकलता कि मेरे देश के गरीबों मत जाओ...मैं तुम्हारे लिए हर वह इंतजाम करूंगा, जो इस देश के अमीरों को मिल रहा है...
कहां तो वंदे भारत मिशन के तहत एयर इंडिया की फ्लाइट से सिर्फ एक व्यक्ति को लेकर सिंगापुर के लिए उड़ान भरता है, लेकिन लाखों बेबस प्रवासी मजदूरों के लिए चलती भी है, तो क्या...वह ट्रेन जो 40 दिनों बाद चलाने का फैसला लिया गया। वह ट्रेन जिससे जाने पर किराया खुद उन मजबूरों को देना है, जिनकी नौकरी छीन गई है।
ग़रीब तो ग़रीब है, उसे अमीरों की ऐशो-आराम नहीं बस सम्मान की जिंदगी ही दे दीजिए प्रधानमंत्री जी। बस इतनी ही गुजारिश है आप से...देश में हर जगह त्राहिमाम है, कोरोना का संकट बड़ा है, लेकिन इस संकट की आड़ में अव्यवस्था, अराजकता और अनैतिकता बढ़ रही है।

लॉकडाउन: छबू मंडल की मौत सुसाइड नहीं, हत्या है! और, जिम्मेदार यह सरकार है


17 अप्रैल को उत्तर प्रदेश से लगभग 250 बसें राजस्थान के कोटा में पहुंचती। यह बस उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार की ओर से कोटा में फंसे लगभग 9,000 छात्रों को लाने के लिए भेजी गई। उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल के भी स्टूडेंट्स कोटा के विभिन्न कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई कर रहे हैं। अचानाक लॉकडाउन होने से ये स्टूडेंट्स यहां लंबे समय से फंसे हुए हैं। लेकिन बिहार सरकार इन स्टूडेंट्स को अपने यहां बुलाने पर राजी नहीं हुई। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने योगी सरकार के कदम निशाना भी साधा कि यह लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन है। लेकिन नियमों को कौन मानता है। जब उत्तराखंड से 1800 गुजरातियों को बसों से भेजा जा सकता है, तो यह तो कुछ नहीं है। सारे कायदे-कानून सिर्फ अमीरों के लिए हैं और मजदूरों के लिए लाठियां, भूख, गरीबी, बेरोजगारी और अंत में मौत। मौत इसलिए कि यही सच्चाई है।
छबू मंडल की पत्नी और उनके बच्चे। Photo: Indian Express
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर है। फ्रंट पेज पर। बिहार के एक प्रवासी शख्स की। 17 अप्रैल की बात है। बिहार के 35 वर्षीय छबू मंडल गुड़गांव में एक पेंटर (चित्रकार नहीं, घरों लंबी-लंबी इमारतों के बनने के बाद उन्हें रंगने का काम) के रूप में काम करते थे। छबू मंडल गुड़गांव में अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ रहते थे। उनका सबसे छोटा बच्चा सिर्फ पांच महीने का ही था। उन्हें मजबूरन अपना फोन 2,500 रुपये में बेचना पड़ा, ताकि परिवार को खिलाने के लिए कुछ राशन खरीद सकें। उस पैसे से उन्होंने एक पंखा भी खरीदा।
जब वह राशन का सामान लेकर घर लौटे, तो उसकी पत्नी बेहद पूनम खुश थी, क्योंकि घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था। इससे पहले भी उनका परिवार लोगों द्वारा मुफ्त में बांटे जा रहे खाने पर ही गुजर-बसर कर रहा था। या फिर उनके पड़ोसी उन्हें कुछ दे देते थे। खाना बनाने से पहले छबू मंडल की पत्नी वॉशरूम जाती हैं। उनकी मां बच्चों को लेकर बाहर एक पेड़ के नीचे बैठ जाती हैं। जब उनका परिवार बाहर होता है, तो मंडल अपने झोपड़ीनुमा घर का दरवाजा बंद करते हैं और घर के अंदर पंखे लटककर खुदकुशी कर लेते हैं। इंडियन एक्सप्रेस से उनकी पत्नी पूनम कहती हैं, लॉकडाउन के बाद से ही वह बहुत परेशान थे। हम हर रोज दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे थे। न काम था और न पैसा। हम पूरी तरह से लोगों की ओर से बांटे जाने वाले खाने पर निर्भर थे। लेकिन, यह भी हमें रोज नहीं मिलता था।
गुड़गांव की पुलिस का कहना है कि छबू मंडल "मानसिक रूप से परेशान" था।  जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भी 35 वर्षीय के "मानसिक रूप से परेशान" होने की बात पर जोर दिया। छबू मंडल के इलाके में ही रहने वाले फिरजो भी बिहार के रहने वाले हैं। उनका कहना है कि लोग बाहर निकलने से डर रहे हैं, क्योंकि पुलिस उनके साथ बेरहमी से पेश आ रही है। लेकिन क्या आपको पुलिस का ऊंचे ओहदों या फिर कोटा की तरह दूसरे इलाकों के लोगों के साथ जी-अदबी से पेश आती दिखी नहीं। वह तो लॉकडाउन की वजह से भूखे मरने, नौकरी गंवाने वालों की मौत, मजदूरों के पलायन करने से होने वाली मौतों को मानसिक रूप से परेशान बताने लगती है। उससे पहले जो मन आए और जिस तरह इच्छा उस तरह से पेश आती है।
बतौर इंडियन एक्सप्रेस छबू मंडल करीब 15 साल पहले बिहार के मधेपुरा से गुड़गांव आए थे। 10 साल पहले उनकी शादी हुई थी और उसके बाद अपने परिवार को भी गुड़गांव लेकर आ गए। पिछले कुछ वर्षों से वे गुड़गांव से सरस्वती कुंज इलाके में रहते थे। दो झोपड़ी किराए पर ली थी, जिसके लिए उन्हें 1500 रुपये महीने देने होते थे। पहले प्रदूषण की वजह से कंस्ट्रक्शन का काम बंद हुआ, तो आमदनी भी बंद। अब लॉकडाउन से सबकुछ बंद हुआ, तो फिर सब गया।
सरकार के दावे बड़े-बड़े कि इस लॉकडाउन में अपने किराए पर रहने वालों की मदद करें। कुछ महीनों का माफ करें या किसी भी तरह से मदद करें, लेकिन हो उल्टा रहा है। मंडल की पत्नी पूनम कहती हैं,
इस संकट में मकान मालिक की तरफ से एक-दो बार किराए के लिए पैसे की मांग की गई, जिससे उन पर दबाव बढ़ा। वह कहती हैं, एक दिन मेरे पति ने फैसला किया कि वह अपना फोन बेच देंगे, जिसे उन्होंने 10 हजार रुपये में खरीदा था, ताकि राशन के लिए कुछ सामान खरीदा जा सके।
मंडल के परिवार ने उनका अंतिम संस्कार गुड़गांव में ही 17 अप्रैल को किया। इसके लिए भी अपने पड़ोसियों, और दान के पैसे पर निर्भर रहना पड़ा। छबू मंडल की पत्नी कहती हैं, हम तो हमें इसी हकीकत के साथ रहना पड़ेगा कि अब परिवार में कमाने वाला कोई नहीं रहा। शायद मैं दूसरों के घरों में मेड का काम कर लूं, लेकिन अभी भी लॉकडाउन खत्म होने में 15 दिन बचे हैं।
यह लॉकडाउन में होने वाली कोई पहली मौत नहीं है। यह मौत कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से भी नहीं हुई है। यह मौत हुई सरकार की मनमानी नीतियों और छबू मंडल जैसे लोगों को बिना ध्यान में रखे लॉकडाउन लागू करने की वजह से हुई है। यह सिर्फ छबू मंडल की मौत नहीं है। यह भारत की आत्मा की मौत है, जिसकी हिफाजत इस देश के हुक्मरान नहीं कर सकते। यह किसकी सरकार है, जिसका मुखिया खुद को प्रधानसेवक कहता है। लेकिन इसी प्रधानसेवक की पार्टी का मुख्यमंत्री उसकी बातों की धज्जियां उड़ाते हुए 250 बसों को भेजता है, ताकि फंसे लोगों को लाया जा सके। फिर उन लाखों मजदूरों ने कौन-सा अपराध किया था, जिसके साथ भेड़-बकरियों की तरह पेश आया गया। छबू मंडल जैसे लोगों ने क्या अपराध किया था? पीएम केयर्स फंड का पैसा किसके लिए है? छबू मंडल की मौत कोई सुसाइड नहीं, बल्कि हत्या है। इस हत्या की जिम्मेदार इस सरकार की ग़ैर-जिम्मेदाराना सोच और नीतियां हैं। वह इससे बच नहीं सकती।

नीतीश कुमार की नाकामी और ‘चीन का वुहान’ बना बिहार का सीवान


भारत में अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण के 7598 मामले सामने आए हैं। इससे 246 लोगों की मौत हो चुकी है। www.worldometers.info › coronavirus के मुताबिक, भारत ने अभी तक 189111 टेस्ट किए हैं, जबकि आबादी 1 अरब 30 करोड़ से ज्यादा है। चलिए मान लेतें है कि दो लाख की होगी टेस्टिंग। वहीं, 33-34 करोड़ की आबादी वाला अमेरिका अभी तक 2489786 टेस्ट कर चुका है। अब अमेरिका से अपनी क्या तुलना करना। ज़रा पति करिए कि ईरान की आबादी कितनी है, लेकिन उसने 242,568 टेस्ट, तुर्की जैसा छोटा देश 8.2 करोड़ आबादी वाला 307,210 टेस्ट कर चुका है। अब हर देश का आंकड़ा देना भी उचित नहीं है वरना आप कहेंगे कि आंकड़ेबाज़ी में ही उलझा दिए। लेकिन तथ्य तो तथ्य ही। भले आप मानें या न मानें।
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लेकिन, बात भारत की नहीं। भारत में एक राज्य है बिहार। यहां एक दिन में सर्वाधिक 21 नए कोरोना पॉजिटिव मरीज मिले हैं। सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि बिहार के सीवान ज़िले की हालत चीन के वुहान जैसी हो गई। वुहान वही शहर है, जो कोरोना का केंद्र माना जाता है। सीवान में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या 20 हो गई है। बिहार में अब तक पहली बार ऐसा हुआ है कि एक ही दिन में वैश्विक महामारी कोरोना के सर्वाधिक मामले सामने आए हैं। 9 अप्रैल की सुबह से देर रात तक कुल 19 नए संक्रमितों की पहचान की गई। सैंपल जांच में सभी में कोरोना पाजिटिव पाया गया है। इनमें सीवान के 17 हैं। 30 मार्च को कोरोना के छह मरीज मिले थे। 7 अप्रैल को भी बिहार में एक ही दिन में कोरोना छह मरीज सामने आए थे। बिहार में 9 अप्रैल को 19 नए मरीजों के सामने आने के बाद कोरोना संक्रमितों की संख्या 39 से बढ़कर 58 हो गई। यहां एक व्यक्ति ने परिवार के 16 लोगों को संक्रमित किया। ओमान से सीवान में आए एक संक्रमित व्यक्ति ने आइसोलेशन में नहीं जाकर अपनी पहचान छिपाए रखी। अब इस परिवार की 12 महिलाएं और चार पुरुष अब तक कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके हैं। सीवान में एक अन्य व्यक्ति की भी पहचान कोरोना पॉजिटिव के रूप में की गई। यह युवक 16 मार्च को दुबई से आया था। इस तरह सीवान में सर्वाधिक 27 कोरोना के मरीज हो गए हैं।
इस पर तुर्रा यह कि उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी जी कह रहे हैं कि लॉकडाउन के 15 दिन बाद भी कोरोना के नए मरीजों की संख्या में वृद्धि से जाहिर है कि सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग बरतने के निर्देश का पालन करने में कई स्तरों पर चूक हो रही है। तो इस चूक को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है। जानता हूं यह भी जनता के मत्थे ही थोपा जाएगा।
अब आइए नज़र डालते हैं कि बिहार कोरोना वायरस के कितने टेस्ट किए और अभी तक कितने मामले आए। कहा जा रहा है कि बिहार में कुल 60 के करीब मामले आए हैं। जब किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं की जाएगी, तो आधिकारिक आंकड़ों में उसे अपराध हुआ माना ही नहीं जाएगा। यही हाल कोरोना के मामले में भी है। जब कोरोना वायरस का टेस्ट होगा ही नहीं या कम टेस्ट होगा तो मामला ज्यादा कैसे आएगा। उधर डॉक्टरों और स्थानीय लोगों का भी कहना है कि कोरोना के मरीजों की संख्या भले ही कम बताई जा रही हो, लेकिन यह संख्या इससे कहीं अधिक है। पटना एम्स के कुछ डॉक्टरों का तो यहां तक कहना है कि ऐसे पॉजिटिव मामले भी हैं, जिनके बारे में बताने से मना किया जा रहा है।
दूसरी तरफ इसको भी छोड़ दें तो नीतीश कुमार ने अपने 15 साल के शासन में बिहार के स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कुछ किया ही नहीं। इसका भी डर उनको होगा। पिछले साल मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का मामला सामने आए है कि कैसे बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई थी। बिहार से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सोते पाए गए थे। यह इस बात का भी प्रतीक है कि कोरोना महामारी पहले से ही बिहार की नाजुक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर बोझ बनने लगी है। ऐसे में खराब योजना, सुरक्षात्मक उपकरणों की कमी और सार्वजनिक जागरूकता की कमी भी चुनौती को बढ़ा रही है।
बिहार के डॉक्टर कैसे कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं, इसकी मिसाल यह है कि डॉक्टरों का कहना है कि प्रोटोकॉल के अनुसार हमें एन-95 मास्क, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट और सैनिटाइज़र दिया जाना चाहिए। हमारी स्थिति इतनी विकट है कि हम मरीजों का इलाज करते समय खुद को बचाने के लिए एचआईवी किट का उपयोग करते हैं। हम बिना उचित सुरक्षा उपकरण के मरीजों का इलाज करते हैं, तो आठ घंटे की ड्यूटी के बाद फिर इस्तेमाल किया हुआ दस्तानी ही पहनना पड़ता है। इससे डर है कि हमें भी कोरोन वायरस न हो जाए। पीएमसीएच बिहार के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है। यहां COVID-19 के रोगियों के लिए बेड उपलब्ध नहीं हैं।
बिहार में कोरोनो वायरस के लिए टेस्टिंग कम हो रहे हैं। इससे डॉक्टरों पर दबाव बन रहा है। उन्हें लग रहा है कि वे ऐसे मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जिनमें इस तरह के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में उन्हें यह बीमारी हो सकती है। बिहार में सिर्फ एक ही रिसर्च सेंटर है, जो कोरोना वायरस सैंपल का टेस्ट करता है। फिर उसकी पुष्टि के लिए पुणे भेजा जाता है। ऐसे में कोरोन वायरस का कम्युनिटी संक्रमण होता है, तो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त सकती है।