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लॉकडाउन में पलायनः यह अंधा नहीं, सुप्रीम कोर्ट का धंधेबाज कानून है...

सुप्रीम कोर्ट ने लॉकडाउन में प्रवासी मजूदरों की घर वापसी और हादसों में उनकी मौतों के मामले पर याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत का कहना है कि अगर लोग रेलवे ट्रैक पर सो जाएंगे तो इसमें क्या किया जा सकता है? जिन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया है, उन्हें कोर्ट कैसे रोक सकता है?
Photo: Internet
सुप्रीम कोर्ट की यह बात पूरी तरह सही है। आखिर अदालतें कैसे रोक सकती है कि कोई पैदल क्यों जा रहा है?  इस शीर्ष अदालत का चीफ (पूर्व) जस्टिस तो उन्हीं मामलों की सुनवाई करेगा, जिसमें खुद पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा हो। मजेदार बात कि अपने ऊपर लगे आरोपों की सुनवाई के बाद जज साहब खुद के पक्ष में फैसला भी सुना देते हैं।
ऐसे में जब सुप्रीम कोर्ट कहता है कि कोर्ट के लिए यह निगरानी करना असंभव है कि कौन ट्रैक पर चल रहा है और कौन नहीं चल रहा है? सही बात है। सुप्रीम कोर्ट तो बस इस बात की निगरानी करेगा कि जब गुजरात हाईकोर्ट ने बीजेपी के एमएलए और राज्य के कानून मंत्री को अयोग्य ठहरा दिया, तो उसकी अयोग्यता के फैसले पर कैसे विराम लगाना है।
मजदूरों और बेसहारा लोगों को लेकर आखिर याचिका में क्या कहा गया था? यही न कि अदालत केंद्र सरकार से सड़कों पर चलने वाले प्रवासी मजदूरों की पहचान करने, उन्हें भोजन और रहने का ठिकाना देने के लिए कहे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को क्या फर्क पड़ता है कि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में रेलवे पटरियों पर सो रहे 16 मजदूर मालगाड़ी की चपेट में आएं या फिर उत्तर प्रदेश के औरैया में भीषण सड़क हादसे में 24 मजदूरों की मौत हो जाए। ये मजदूर तो अपनी गलती और खुद की मर्जी से जा रहे हैं न... तो इन मजदूरों की ही जवाबदेही बनती है कि उनके साथ क्या होता है सही बात है कि सुप्रीम कोर्ट उनके साथ क्या कर सकता है? तब तो सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन को हटवा देना चाहिए। वायरस से मजदूर मरते हैं तो मरने दें। इससे पहले 31 मार्च को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि सड़कों पर अब एक भी दिहाड़ी मजदूर नहीं है। बजाय केंद्र सरकार के इस झूठ पर लताड़ लगाने के लिए कोर्ट मजदूरों को ही दोषी ठहरा रहा है। 
देशव्यापी लॉकडाउन की वजह मजदूरों के पास अब नौकरी और रहने के लिए ठिकाना नहीं है। इस वजह से हजारों मजदूर हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर जा रहे हैं। कोई पैदल चल रहा है, तो कोई साइकल चलाकर जा रहा है तो कोई ट्रक पर बैठकर अपने गांव जा रहा है। लेकिन जज साहब को इन मामलों पर सुनवाई से क्या मतलब? जज साहब को तो बस खास बंगले, सड़क पर आवारा पशुओं के घूमने से आपत्ति होती है, गाड़ी के शीशे पर काली फिल्म की मोटाई से दिक्कत होती है? इन सब मामलों पर सुनवाई के लिए बहुत समय है। दरअसल, मजदूरों का मामला गरीबी से जुड़ा है। इन मामलों की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का कोई हित नहीं जुड़ा है। मामला जैसे ही राजनीतिक या फिर अमीरों से जुड़ा हो तो जज साहब तुरंत कुर्रसी लेकर बैठ जाएंगे और फैसला भी उनके हक में सुना देंगे। लेकिन पैदल चल रहे बेबस प्रवासी मजदूरों के हादसों की याचिका पर सुनवाई से साफ मना कर देंगे।
जज साहब को यह भी नहीं दिखता कि कोई 15 दिनों से चल रहा है। मध्य प्रदेश जाना है। बच्चे को चोट लगी है, तो खाट पर लेटा कर कंधे पर ढोते हुए उसे ले जा रहे हैं। महिला सड़कों पर बच्चे को जन्म दे रही है, कोई पैदल ही चलकर दम तोड़ दे रहा है। जज साहब को यह भी नहीं दिखता कि किसी ने पैर गंवाए तो सने कृत्रिम पांव से दोबारा चलना सीखा होगा, लेकिन क्रूर हालात इम्तिहान ले रहे हैं, अब वो पैदल परिवार के साथ शहर से घर को निकली है तमाम मुश्किलों के बावजूद उसका हौसला टूटा नहीं है, लेकिन क्या यह सब देखने के बावजूद सरकार कहां है? सरकारों को तो छोड़िए, अदालतों को क्यों लकवा मार गया है?
कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनवाने और आतंकवाद के आरोपी के मामलों कीसुनवाई के लिए आधी रात में खुलने वाली देश की सबसे बड़ी अदालत आज वाकई अंधी हो गई। लॉकडाउन के बीच सुप्रीम कोर्ट दूसरे कई मामलों को लंबित करके रखता है। लेकिन, सत्ता और भाजपा से अघोषित ताल्लुक रखने वाले रिपब्लिक टीवी के मालिक और सेलिब्रिटी एंकर अर्नब गोस्वामी की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में मामला सामने आने के चंद घंटों में ही समय दे दिया गया, जबकि प्रवासी मजदूरों के घर जाने जैसे अहम मामलों को प्राथमिकता नहीं मिली। अब प्राथमिकता तो छोड़िए, मजदूरों की याचिका को सुनने लायक भी नहीं माना।
जबकि यही सुप्रीम कोर्ट लॉकडाउन में तमिलनाडु में शराब की दुकानों को बंद करने के फैसले को पलटकर उसे खोलने का फैसला देता है। लेकिन मजदूरों की याचिका सुनने के लायक नहीं मानता। अगर हालिया कुछ फैसलों को देखें, तो कैसे सुप्रीम कोर्ट वक्त-दर-वक्त जन-विरोधी फैसले करता चला गया है और तमाम फैसले अमीरों और सरकार के पक्ष में देता गया। चाहे पटना हाई कोर्ट के फैसले को पलटने की ही बात क्यों न हो? कहां तो संविधान समानता की बात करता है और जब बिहार में स्थायी और अस्थायी शिक्षकों की सैलरी समान करने की बात आई तो सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में अपना दे दिया। हाल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता रिटायर हुए हैं। इस मौके पर विदाई समारोह में उन्होंने भी खुद माना कि जब कोई किसी गरीब की आवाज उठाता है तो कोर्ट को उसे सुनना चाहिए और जो भी गरीबों के लिए किया जा सकता है वो करना चाहिए। जज ऑस्ट्रिच यानी शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर नहीं छिपा सकते।
(जारी...)

ठिठुरता गणतंत्र और परसाईजी


पिछले दिनों दिल्ली में ठंड काफी बढ़ गई थी। लगभग पांच या छह वर्षों बाद इतनी सर्दी पड़ी है।  सर्दी और गणतंत्र दिवस का बड़ा गहरा नाता है। गणतंत्र दिवस के साथ मुझे याद आ रहे हैं, मेरे प्रिय व्यंग्य साहित्यकार परसाई जी। हरिशंकर परसाई। जितने याद परसाई जी आ रहे हैं, उतना ही उनकी रचना ठिठुरता गणतंत्र भी। वह दिल्ली में चार बार गणतंत्र दिवस का जलसा देख चुके हैं। लेकिन पांचवी बार का साहस नहीं जुटा पाए। पर, उनकी चिंता इस अवसर पर ही घिसी-पिटी बातें नहीं, जो देश के नाम संबोधन में किया जाता है। दरअसल, वह भी मौसम की मार से परेशान हैं। पता नहीं क्यों हर साल छब्बीस जनवरी को आसमान में बादल छा जाते हैं, बूंदा-बांदी होने लगती है और सूरज कहीं छुप जाता है। बकौल परसाई जी, जिस तरह दिल्ली की अपनी अर्थ नीति नहीं है, ठीक उसी तरह अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति डॉलर, पौंड, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या विदेशी सहायता से तय होता है, उसी तरह  दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि से तय करते हैं। लेकिन लगता है इस बार उन्हें फिर गणतंत्र दिवस का मौका मिले, क्योंकि इस बार बादल नहीं और सूरज खिल के निकल रहा है। शायद वैश्विक आर्थिक मंदी और मंहगाई आदि ने दिल्ली की अर्थनीति आदि को कुछ पल के लिए समान कर दिया है।
हरबार गणतंत्र दिवस पर मौसम खऱाब होने से परसाई जी थोड़े नाराज़ हो जाते हैं। इस बाबत वह कांग्रेसी से भिड़ पड़ते हैं। वह पूछते हैं क्या बात है कि हर छब्बीस जनवरी पर सूरज छिप जाता है। कांग्रेसी उन्हें जवाब देता है, मुझे तो लगता है कि इस बार पाकिस्तान कोई बड़ी साज़िश रच रहा है या फिर चीन कृत्रिम बारिश करा सकता है तो संभवतः इस बार वह भारत में सूरज को उगने ही नहीं देना चाहता है। मुमकिन है ये दोनों हमारे पड़ोसी किसी बड़ी साज़िश में लगे हैं और हमारी ख़ुफ़िया एजेंसी को भी इसकी भनक नहीं लगी। चूंकि वह कांग्रेसी गृह मंत्रालय में मंत्री थे सो कहा कि हमने सारा दोष राज्यों पर मढ़ दिया है कि प्रत्येक राज्य अपने क्षेत्रों में सूरज के न उगने का पता लगाएं। इसके लिए उच्च स्तरीय जांच बिठाएं हो सके तो जेपीसी की मदद भी ली जाए। इस बीच, बंगाल से ख़बर आई कि वहां सूरज ठीक से उगा। बंगाल के मुख्यमंत्री ने जांच में शामिल होने या किसी तरह की मदद से मना कर दिया और गृहमंत्री की बैठक में शामिल होने से भी इंकार कर दिया।
परसाई जी यहीं नहीं रूके। उन्हें गणतंत्र दिवस की झांकी बहुत पसंद थी। वह इन झांकियों में अद्भुत चीज़ खोज निकाले थे। उनके हिसाब से हर राज्य की झांकियां अपने राज्य का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं। जैसे 2002 और 2003 की झांकियों में वह बड़े उत्साह से गुजरात की झांकियों को देखने पहुंचे थे कि उसमें दंगों को दिखाया जाएगा, लेकिन निराशा हाथ लगी। आंध्र में हरिजन को जलाता हुआ दिखाया जाएगा वह भी नदारद। इस साल उन्हें उम्मीद है कि राष्ट्रमंडल खेलों में घपले, टू जी स्पेक्ट्रम सहित उत्तर प्रदेश में अनाज घोटाला आदि को दिखाया जाएगा। लेकिन लगता है जिस तरह कांग्रेस इन घपलों को ढकने में लगी है, उससे तो इसबार भी उनकी उम्मीद अधूरी ही रहने वाली है। भारत में पिछले साल घोटालेबाजों और भ्रष्टाचारियों का बोलबाला रहा और परसाई के साथ आम जनता को भी उम्मीद है कि इस बार के छब्बीस जनवरी के परेड में उन्हें कुछ इसी तरह की झलकियां दिखाई जाएंगी। लेकिन, लगता है इस ठिठुरती ठंड में लोगों को यह सब देखने का मौक़ा न मिले। और लगता है परसाई जी भी अपने पहले के अनुभवों से सीख लेते हुए गणतंत्र दिवस नहीं देखने जाना चाहते। क्योंकि जो इस साल हुआ व तो झांकी में दिखाया जाएगा ही नहीं तो नकली भारत की तस्वीर क्या देखें। घर बैठे ही आईपीएल और बिग-ब़स की पुरानी झलकी देख के दिल बहलाएंगे।

झूठ का उदाहरणशास्त्र

बात अब उदाहरणों की. पिछले लेख में मैंने झूठ का तर्क-कुतर्क लिखा. लोग क्यों झूठ बोलते हैं और उनका इरादा क्या होता है? मेरे एक मित्र ने कहा, आपने जो लिखा वह तो सही था लेकिन उदहारण से समझा देते तो सोने में सुहागा वाली कहावत साबित हो जाती. मैंने उसे बताया, यदि मैं ऐसे करता हूँ तो मेरा संबंध कई लोगों से पटरी से उतर सकता है. फिर भी, मैंने सोचा अगर अभी से ही संबंधों के बारे में सोचने लगूं तो हुआ. यह उम्र की युवा अवस्था है. और मुझे याद आ रही है एक कविता जो बचपन में हमें पढ़ाई जाती थी. 'झूठ का तर्क-कुतर्क' पर उदहारण लिखने से पहले मैं उससे आपको वाकिफ कराना चाहता हूँ.
हवा हूँ हवा मैं, बसंती हवा हूँ,
सुनो बात मेरी, अनोखी हवा हूँ,
बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्त मौला,
नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ...
अब बात शुरू करते हैं, दरअसल एक बार हुआ यह कि मैं अपने ऑफिस जल्दी पहुँच गया था. वजह मुझे जल्दी आने को कहा गया, क्योंकि हमारे एक साथी अवकाश पर थे. इसके दो दिन पहले तक मैंने भी छुट्टी ली थी. मेरे साथी अकेले पड़ गए. तो उस दिन मैं जब पहुंचा तो काफी खबरें मैंने बनाई. वो भाई साहब अपना व्यक्तिगत काम करते रहे. जब पेज पर खबर लगाने की बरी आयी तो. मुझे भी खबर की ज़रुरत पड़ी. मैंने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा मैंने 'यह' खबर बनाई है तुम लगा लो. मैंने लगा तो लिया लेकिन जिस खबर की बात हो रही थी, वह उनकी नहीं बल्कि, मेरी ही बनाई थी. इन भाई साहब को समस्या यह है कि इन्हें काम का क्रेडिट लेने की बीमारी है. इस चक्कर में यह भूल गए कि, झूठ भी बोलूँ तो किसके सामने. खैर मैंने उनसे कुछ नहीं कहा, नहीं तो उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ती. वैसे भी उस वक़्त मेरा थोडा बुरा समय भी चल रहा था. तो कहना यह यह कि कुछ लोग दूसरों का हक मरने के लिए भी झूठ बोलते हैं. 
एक झूठ यह भी कि किसी को अपनी गलती की ज़िम्मेदारी लेने की लत नहीं होतो. हाँ, यह लत ही तो है. खैर, तो अपनी खामी को उस शक्श पर थोप देते हैं जो काम तो बहुत ईमानदारी से करता है, लेकिन थोड़ा दब्बू हो और किसी तरह के तिकरम में पड़ना नहीं चाहता हो. मुझे लगता मुझे लगता है यह एक उदहारण काफी है. एक बार में यदि एक ही पर पर कुल्हाड़ी मारी जाये तो ठीक है. दूसरे पर मरने से पहले पहले का घाव भरना भी तो चाहिए. नहीं तो अपंग को कोई नहीं पूछता और इस दुनिया में इंसान खुद पर जब तक निर्भर है तब तक वह सब की आँखों का चहेता है. जैसे ही वह पर निर्भर की रह पर चला उसे धकियाने वालों की संख्या भी बढ़ती जाएगी. चलते-चलते यह कि मैं भी झूठ बोलता हूँ. मैं कोई हरिश्चंद्र नहीं. लेकिन कोशिश होती है, उससे किसी का नुकसान न हो. कभी-कभी मकसद लोगों के चहरे पर मुस्कराहट देखना होता है. मैं भी इन्सान हूँ तो कभी कभी झूठ बोलने का मकसद मानवीय प्रकृति भी होती है.

झूठ का तर्क-कुतर्क

हम झूठ क्यों बोलते हैं? सभी जानते हैं कि यह हमारी फितरत कभी नहीं रही है. इसके बावजूद झूठ बोलने का हमारा सिलसिला बदस्तूर जारी है. मुझे लगता है झूठ इंसान दो वजहों से बोलता है. एक, खुद का बचाव करने के लिए और दूसरी वजह है यह कि  दूसरों पर इलज़ाम या आरोप लगाने के लिए. इसके अलावा भी और कई वजहें हैं, जो लोगों को झूठ बोलने के लिए उकसाते हैं. पहले वाले दो वजह में मकसद किसी गलती से अपना पल्ला छुड़ाना होता है या नुकसान पहुंचाना, वहीं बाकी मामलों में झूठ हम आदतन बोलते हैं. अपनी तारीफ सुनने-सुनाने के लिए और दूसरों की चापलूसी करने के लिए. ये चार तरह के जो झूठ हैं, भारतीय समाज या मोटामोटी कह सकते हैं किसी भी समाज में आपको देखने को मिल जायेंगे. झूठ  के और भी कर प्रकार हो सकते हैं. ज़रुरत है शोध की. फ़िलहाल दो और पराकारों की बात मैं कर सकता हूँ. एक- जो किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए बोले जाते हैं और दूसरा, जिसके बोलने से किसी का कोई अहित नहीं होता है. कुछ लोग इसलिए भी झूठ बोलते हैं कि वह कुछ कहना चाहते हैं. बस कहना चाहते है और चुप रहना उनकी आदत नहीं. उदहारण के तौर पर, इसे कुछ इस तरह से समझा जा सकता है. मै आजकल इम्तिहान दे रहा हूँ. तो इम्तिहान शुरू होने से पहले हम कुछ दोस्त इकट्ठा होते हैं और चंद सवालों पर चर्चा करते हैं. मेरे पास कहने को कुछ खास नहीं होता है फिर मैं चाहता हूँ कि बेवक़ूफ़ न समझा जा सकूं तो उनके बीच मैं भी कुछ कहना शुरू कर देता हूँ. हालाँकि, अगर मैं कुछ न भी कहूं तो भी काम चल जाता, लेकिन मैं बोलता हूँ.
झूठ का विभाजन यदि हम आधिकारिक तौर पर करें तो, इसमें पहला झूठ होगा, कार्यालयी या दफ्तरी झूठ. यह दफ्तर में बॉस को या अपने से वरिष्ठ अधिकारी को तेल लगाने के लिए बोला जाता है. अपना नंबर बढ़ाने के लिए. तेल संप्रदाय का चलन जेएनयू से चला है, जहाँ लोगों को एक दूसरे से चिपकने की आदत होती है, उन्हें इस सम्प्रदाय में रखा जाता है. हालाँकि, यह एक अलग ही प्रजाति या सम्प्रदाय है, जिसके बारें में फिर कभी बात विस्तार से की जा सकती है. झूठ के बारें में इतना कुछ लिखने के बाद कह सकता हूँ कि अभी भी मेरा ज्ञान इस विषय में बहुत काम है. शोध और खोज की बेहद ज़रुरत है. इसके लिए वक़्त की ज़रुरत है. कह सकता हूँ कि वक़्त का रोना रो कर जो मैं बहाना बना रहा हूँ, यह भी एक तरह का झूठ है. मेरा यह झूठ इसलिए है कि मुझे लगता है मैंने इस लेख को तरह से धारदार नहीं बनाया जिसकी कामना मैंने की थी.  पर, इतनी बात ईमानदारी से कह सकता हूँ कि अगली बार पूरी तैयारी से अपने काम को अंजाम दूंगा. बगैर हथियार (शोध) के मैदान में कभी नहीं कदम रखूंगा.

मीडिया का महासमर

कृष्ण ब्रेक के बाद एक बार फिर आपके सामने हैं. वह पत्रकार से कॉरपोरेट मालिक हो गए हैं. उन्हें इस महा मीडिया समर का योद्धा माना जाता था. लेकिन सरकार बचाने के लिए उन्होंने जो कारनामे किये उसने उनका विश्वास कम कर दिया है. अब छद्म नामों को छोड़कर बात सीढ़ी कि जाये तो बेहतर. बात करने में भी मुझे आसानी होगी और आपको समझने में भी. कृष्ण हैं एक टीवी चैनल के मालिक जो दूसरे चैनल में कम कर चुके हैं. अब एक अंग्रेजी चैनल और हिंदी चैनल के करता धता के तौर पर कम कर रहे हैं. उनकी पत्नी भी उसी अंग्रेजी चैनल में काम करती हैं. खैर, यह कोई बहस का मुद्दा नहीं होना चाहिए. और मेरे लिए है भी नहीं. द्रौपदी की कहानी भी कुछ कम नहीं है. एक रिपोर्टर से करियर शुरू करने वाली यह महिला एडिटर-इन-चीफ़ बन चुकी हैं और उनका उस चैनल में कुछ मालिकाना शेयर भी है. यानी कृष्ण और द्रौपदी एक ही पेशे में हैं, लेकिन कृष्ण को तो द्रौपदी के बचाव में आना ही था. पेशेवर मजबूरी की वजह से वह आये भी, लेकिन भाई साहब आते-आते बड़ी देर कर दी. कुछ कहा और सुना भी. यहाँ मुझे नरेन्द्र कोहली की रचना महासमर की याद आ रही है. 
द्रोण ने अपनी पलकें उठाकर अश्वत्थामा की ओर देखा तो लगा कि उन्हें उस प्रकार पलकें उठाना भी जैसे भारी पड़ रहा है। लेकिन यहाँ मीडिया में राडिया कांड के कर्म योद्धाओं को किसी तरह का अफ़सोस या मलाल नहीं. वो आँखों में आँखें डाल कर बातें कर रहे है, जैसे गलती जनता की है. अश्वात्थामा ने पूछा, ‘‘आप सहज प्रसन्न नहीं दीखते ?’’ द्रोण की दृष्टि में अश्वात्थामा के लिए भर्सना थी। क्या वह इतनी-सी भी बात नहीं समझता ? पर अपनी उस दृष्टि का अश्वात्थमा पर कोई प्रभाव न देखकर बोले, ‘‘भीष्म धराशायी हो चुके हैं।’’यहाँ भीष्म प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार को मान सकते हैं तो हरिवंश जी जैसे पत्रकारों को उनका प्रतिनिधि. श्रवण गर्ग भी उस मानक पत्रकारिता के आखिरी स्तम्भ के तौर पर ही जाने जायेंगे.  
अब एक बात और यहाँ गुरु द्रोण अश्वत्थामासे बताते हैं मैं तो अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी नहीं मानता. यहाँ भी कोई पत्रकार किसी को बेहतर नहीं मानता बस तंग खिचाई में लगा रहता है. अश्वत्थामा पिता से पूछता है, तो आप उसे संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी नहीं मानते थे ? नहीं ! मैं उसे श्रेष्ठ धनुर्धारी ही मानता था. तो आपने एकलव्य का अँगूठा क्यों लिया ? अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी बनाए रखने के लिए नहीं ? मुमकिन है यहाँ भी एकलव्य रुपी कई लोगों से कई द्रोणों ने कुर्बानियां मांगी  है. उनसे दलाली करवाई है और न जाने कैसे कैसे कुकर्म करवाए हैं. इसी तरह यदि पत्रकारों के निजी जीवन को खंगाला जाये तो कालिख उन सभी के चेहरों पर नज़र आएगी, जो अब तक नैतिकता का पाठ पढ़ते और पढ़ाते आ रहे हैं. उनमें खबर वही जो सच दिखाने वाले से लेकर डंके की चोट पर बात करने वाले भी शामिल हैं, क्योंकि यही भाई लोग नैतिकता की बात ज्यादा करते है और इन्होंने ही नैतिकता का ज्यादा कबाड़ा किया है.

मीडिया का महाभारत

मीडिया में तांडव मचा हुआ है. सारे दिग्गज मंथन में लगे हैं. यह जो दाग लगे हैं वो अच्छे नहीं हैं. इसलिए कि इसे कोई ऋण सुप्रीम भी नहीं धो सकता. एक तरफ धृतराष्ट्र को आँखें मिल गयी हैं, संजय ने उन्हें अपनी आँखें दान में दे दी. फिर भी धृतराष्ट्र अंधे होने का ढोंग कर रहे हैं. ठीक उसी तरह जैसे दुर्योधन के मामले में उन्होंने किया था. मीडिया भी अपनी साख और विश्वसनीयता खो रहा है. विदुर समझा रहे हैं महाराज आप पुत्र प्रेम में कहीं आप दुर्योधन की जान ही न ले लें. लेकिन धृतराष्ट्र कहते हैं विदुर माना तुम मेरे सलाहकार हो, लेकिन अब मैं अँधा नहीं रहा और तुम पांडवों की लौबी करना छोड़ दो. विदुर इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाए और दरबार से कल्टी मार लिए. शायद उन्हें आभास हो गया कि अब द्रौपदी नहीं बचने वाली है. मीडिया का चीरहरण हो रहा है. पर यहाँ तो कुछ और ही नज़ारा है कृष्ण भी दुर्योधन के खेमे में जा बैठे हैं. अपनी सेना पांडवों को दे दी है.  मामा शकुनी के कहने पर कृष्ण को कौरवों का प्रमुख लौबीकार बना दिया गया है. पांडवों के खेमें में अच्छी पैठ होने के चलते कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं. अर्जुन को संचार मंत्री बनाने का लालच दिया जा रहा है. अर्जुन कह रहे रहें हे देविकीनंदन फिर बड़े भैया का क्या होगा. मेरे अलावा पांडवों कोई चक्रव्यूह भेदना जनता भी नहीं. कृष्ण अर्जुन को यहीं गीता का ज्ञान देते हैं. देखो मीडिया में कोई किसी का भाई-बंधु नहीं होता. अगर कुछ है तो वह है प्रतिद्वंद्विता. तुम्हे यह भेद समझना होगा. अर्जुन कन्फ्यूज हो जाता है. अभी तो आप मुझे संचार मंत्री बना रहे थे और अभी मीडिया कहाँ से आ गया. कृष्ण कहते हैं, देखो अर्जुन ज्यादा उतावले मत हो. तुम बगैर मीडिया लौबी के मंत्री नहीं बन सकते और इस बारें में तुम्हे घबराने की ज़रुरत नहीं है. सारी बातें हो चुकी है. बस मंत्री बनाते ही तुम्हे इतना करना है कि मीरा माडिया के कहने पर तुम्हे कुछ काम करने पड़ेंगे. माडिया ये कौन है कहीं आप नाम तो गलत नहीं बता रहे मुझे कृष्ण. वो तो नीरा है न. नहीं अर्जुन तुम्हें जितना कहा जाये उतना ही करो. ये सब अन्दर कि बातें है. नाम का खुलासा तुम मत करो. अर्जुन की दुविधा शांत नहीं होती है. वह फिर सवाल करता है, देविकीनंदन आप ज़रा विस्तार से समझाएं. देखो मीडिया में हमारे कई लोग हैं जो हमसे पैकेज लेते हैं और हमारे मुताबिक खबरों को छपते है या दिखाते हैं. ये सभी शीर्ष पदों पर है और हमसे मेहनताना पाते हैं. इनमें एक अंग्रेजी अखबार की बड़ी हस्ती है तो दूसरी एक अंग्रेजी चैनल की संपादक है. इन पर कीचड़ न उछलना चाहिए, इनका काम विश्वास का है. और विश्वास नहीं टूटना चाहिए. इतना कहते ही कृष्ण ब्रेक लेते हैं और कहते हैं हम अगली बात आपको अगले अंक में बताएँगे अर्जुन...

भारत कथा

सोचता हूं, जिस देश में एकदम से इतने साधु हों, उस जनता की अंदरूनी हालत क्या है? वह क्यों भला चमत्कार पर इतनी मुग्ध है? वह जो गैस सिलिंडरों, राशन के लिए लाइन लगाती है और राशन नहीं मिलता है, वह लाइन छोड़कर साधु की शरण में चली जाती है। मुझे लगता है 63 सालों में देश की जनता की मानसिकता है ऐसी हो गई है कि वह जादू देखो और ताली पीटो। बाकी हम पर छोड़ो। भारत-पाक युद्ध इसी तरह का जादू था। मुंबई पर जो हमला हुआ, इस मामले में जादू थोड़ा बड़े स्केल पर दिखाया गया और जा रहा है। जनता अभी तक ताली पीट रही है। उधर, राशन की दुकान की लाइन बढ़ती जा रही है। देशभक्तों से मैं क्षमा चाहता हूं, पर मुझे लगता है शिमला या आगरा शिखर वार्ता टाइप की एक और बैठक होगी। हाल में हमारे विदेशमंत्री पाक गए थे, गरिया के भेज दिए गए, अब हम उनके विदेशमंत्री कुरैशी को भारत बुला रहे हैं, लेकिन कुरैशी ने भांप लिया कि मेरी भी बेइज्जती भारत बुलाकर होगी, इसलिए उन्होंने भारत आने से पहले शर्त रख दी। अब भारत पसोपेश में है कि क्या करे? कैसे बेइज्जती और भारतीय जनता के लिए चमत्कार की तरकीब निकाली जाए।
हर तरफ भारत का ही नाक कटने को तैयार है। हम खामोश हैं। देश परेशान है। लोग मस्त हैं। राष्ट्र हैरान है। राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर जो देशभक्त तमाम तैयारियां करवा रहे हैं, उन्ही पर भारत के चीरहरण का आरोप लग रहा है। यह आरोप से बढ़कर है। भारत में आजकल यह होने लगा है कि कोई भी अवसर पैसा कमाने का जरिया समझा जाने लगा है। यह नई प्रवृत्ति चंद लोगों को बहुत भाने लगा है। हालांकि, अधिकांश लोग भी उसकी ओर जाने की सोचने लगा हैं। उन्हें तकलीफ इस बात की है कि ज़िंदगी भर ईमानदारी और आदर्श का लबादा ओढ़ने से कुछ नहीं, बस गरीबी और घुटन की मौत मिलने वाली है। नतीजतन वह भी अपना रास्ता बदलने लगे हैं या बदलने की सोच रहे हैं। एक तरह आज हम सभी संक्रमण की दौर से गुजर रहे हैं। यह संक्रमण कहां तक ले जाता है, इसा कुछ अता-पता नहीं हैं। मंजिल लोगों को मालूम नहीं, पर रास्ते तैयार हैं। लोग चल रहे हैं, चलते जा रहे हैं। जाना कहां है, मालूम नहीं। ऐसे में अंजाम की परवाह कोई करने को भी तैयार नहीं। कोई रुकना नहीं चाहता। उसे पिछड़ जाने का भय है।
यह लेख कुछ दिन पहले का है, पर पता नहीं मुझे लगा कि आपसे मुझे साझा करना चाहिए.

स्वतंत्रता दिवस- चाहिए साधु और मंत्री

१५ अगस्त जल्द आने वाला है. राष्ट्रमंडल खेल भी. ऐसे में मुझे मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई याद आ रहे हैं. वो हमेशा इन अवसरों पर उदास रहते थे.वजह नीचे है..इसे उनकी रचना के आधार पर आपके सामने लेकर हाज़िर हूँ...
हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूं कि साल भर में कितना बढ़े हम। एकबार फिर 2009 के बाद 15 अगस्त 2010 आ गया। यह स्वतंत्रता दिवस है। पर, स्व और तंत्र की हालत क्या है, यह मत पूछिए। स्व कोई रहा नहीं, सारे के सारे पर में बदल रहे हैं। तंत्र नाम की कोई चीज रह नहीं गई। पहले गणतंत्र हुआ करता था। वह भी गनतंत्र हो गया। इस पूरे साल मैंने दो चीजें देखीं। दो तरह के लगो बढ़े- साधु और मंत्री। सोचता था आम आदमी के जीवन में इससे तरक्की आएगी। उसकी समस्याएं कम होंगी, पर नहीं। बढ़े तो साधु और मंत्री। मेरा अंदाजा था, इससे आम आदमी की मुश्किलें कम होंगी-मगर नहीं। बढ़े तो ये ही दोनों। दोनों हमजोली हो गए। कभी-कभी सोचता हूं कि क्या साधु और मंत्री गरीबी हटाओ प्रोग्राम के तहत ही आ रहे हैं। क्या इसमें कोई योजना है। रोज अखबार उठाकर देखिए तो सामने आएगा, वैद्य रहमानी के पास आइए, सारे कष्ट दूर भगाइए। बीवी से लड़ाई हो, प्रेमिका से बन आई हो, या प्रेमिका को करना हो वश में या फिर दोस्त बन गया हो दुश्मन, ये विज्ञापन अटे पड़े होते हैं। हमारे पास आइए समस्या का समाधान पाइए। साधु हर तरह की समस्याओ को दूर कर रहा है। क्यों न फिर भारत के शीर्ष पद पर बैठा दिया जाए. आम आदमी की समस्याएं आसानी से खत्म हो जाएंगी। इधर, सुना भी है कि अगले लोकसभा चुनाव में साधु सबकी समस्या दूर करेंगे। वह खुद चुनावी दंगल में कूदेंगे। सारे बाबा लोग एक से एक तरकीब सुना रहे हैं। एक बाबा के आश्रम में बच्चों की मौत लगातार होती रही है। सुना उनके आश्रम में काला जादू होता है। बाबा रिद्धि-सिद्धि करते हैं। शायद जादू-टोना इसलिए कि देश को सभी समस्याओं से मुक्ति दिला सकें। एक बाबा योग के जरिए राजनीति में घुसपैठ करना चाहते हैं। वह लोगों को तरह-तरह के योग सिखाते हैं, ताकि वे स्वस्थ रहें, कभी लौकी का जूस तो कभी करैला का। लौकी से कोई मर जाता है तो वह बचाव में सामने आ बैठते हैं। एक बाबा क आश्रम में प्रसाद बटने के दौरान भगदड़ मचती है, सैंकड़ों काल के गाल में समा जाते हैं. बाबा कहते हैं यह ऊपर की कृपा है, उसने अपने भक्तों को बुला लिया, तो मेरा क्या कसूर।
जारी...

योग्यता बढ़ाने की वजह

अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए मैंने इसबार लॉ में दाखिला लिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस फैकल्टी ऑफ लॉ। अगर सब टीवी पर दिखाए जाने वाले शरद जोशी कहानियों का पता- लापतागंज वाले स्टाइल में कहूं तो बिजी इन डूइंग लॉ लाइक बिजी पांडे। तीन साल का कोर्स है। ज्यादा नहीं है, बस तीन ही तो है। हां, जब हमारे देश की सरकारों को आम आदमी का विकास करने में पांच साल भी कम लगते हैं, तो मुझे तो ये तीन साल और भी कम लगने चाहिए। हां, भई देखते नहीं हैं, जब-जब चुनाव का मौसम आता है, सरकारें लोक कल्याणकारी योजनाओं की बौछार कर देती हैं। उनका दावा होता है कि जो भी राज्य में इस दौरान काम हुआ वह उनकी ही देन है। हालांकि कुछ नहीं हुआ होता है। पर गिनाने को तो वह आजाद हैं। चूंकि हुआ नहीं होता है तो उनको लगता है वक्त कम पड़ गया। जनता के बीच जाते हैं और कहते हैं इस बार उन सभी कामों को करना है। यानी पांच साल कम है, इसलिए जनता उन्हें फिर पांच साल दे। जनता देती भी है। फिर भी कुछ नहीं होता, वह एकबार फिर अधूरे कामों का रोना लेकर जनता की अदालत में पांच साल के भीख मांगने हाजिर हो जाते हं। यानी निष्कर्ष यही निकला कि नेताओं के पास वक्त की कमी होती है। हालांकि, मुझे लॉ कितने साल में पूरा करना है इस पर मैं बाद में विचार करूंगा। पर, मुझे इसके लिए किसी के पास जाने और न ही कुछ कहने की जरूरत है। मेरा कुछ न करना ही मेरे लॉ के तीन साल के कोर्स की अवधि को बढ़ाने के लिए काफी है। खैर, इसकों भी छोड़ते हैं। दरअसल, मैं लॉ कैंपस से इन दो चार दिनों की कुछ सुनहरी बातें आपसे साझा करना चाहता था। पर, उसे अगली बार आपके साथ साझा करूंगा। अभी थोड़ा डोज ज्यादा हो गया। लिखने की शुरुआत उन्हीं बातों से की थी। पर, अचानक से विचारों की तन्मयता टूटी। विचार दूसरी जगह गोते लगाने लगे। इस तरह जाना था जापान और पहुंच गए चीन की तरह मेरा यह लेख बन गया। एक बात और कहते चलूं, ताकि अगली बार वही बात कहूं जो आप से इस बार कहना चाहता था। बात यह है इस बार जब घर गया तो कुछ अच्छे पढ़े-लिखे और ऊंचे ओहदेदार लोगों के घर शादी में जाना हुआ। वहां लड़के के भाव की चर्चा ज्यादा थी यानी दहेज की। हाल में मेरे चचेरे भाई की नौकरी एयरफोर्स में हुई है। इससे उसका रेट भी बढ़ गया है। पहले लोग उसकी शादी के लिए अगुअई के लिए आते तो हजार में ही दाम लगाकर निकल लेते थे। अब मेरे सरकारी नौकरीशुदा भाई की कीमत लाखों में लगाई जाने लगी है। घर वाले भी खुश हैं। इस बीच मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी। मैं एक अखबार में काम करता हूं, सब एडिटर हूं। घर जाता हूं तो रुआब झाड़ने के लिए खुद को पत्रकार बतलाता हूं। हां तो मैं अपने मामा के लड़के की शादी में गया था। वहां मामाजी ने जब अपने समधि से परिचय कराया, पत्रकार के तौर पर। मामाजी के समधि ने कहा, हां वो तो ठीक है पर तनख्वाह कम है। उस वक्त तो कसम से दिल को बहुत बुरा लगा। वजह यह कि सैलरी तो सभी को हमेश कम ही लगती है। मुझे भी लगती है। पर अभी मैंने छह महीने पहले कैरियर की शुरुआत की है तो भाई लोग ठीक-ठाक दे देते हैं। पर उनकी बातों से लगा, पत्रकार लोगों का मार्केट डाउन है। उनकी कीमत बाजार में कम ही लगती है। सो मैंने अपनी योग्यता बढ़ाने की ठानी पहले तो सोचा आईएएस बनूंगा, सीधे करोड़ों में अपने आप को बेचूंगा। पर, यहां आकर शुरुआत लॉ से की है। इसलिए मैंने शुरू में लिखा भी है, योग्यता बढ़ाने के लिए मैंने लॉ में दाखिला ले लिया है। मकसद आपको बता दिया। इसकी एक सच्चाई बाद में, जो सबसे अहम है। 

गऊ होता है उंगलीबाज

आजकल एक विचित्र तरह का प्रचलन बन-चल पड़ा है। विरोध के नाम पर विरोध करना। मुद्दों के आधार पर नहीं, बल्कि वह कुछ भी कहे, मुझे उसकी हर बात काटनी है। मसला चाहे कोई भी हो, उसकी हर बात में  उंगली करनी है। कुछ दिनों पहले कहीं ब्लॉग पर ही पढ़ा था, इस तरह के लोगों को उंगलीबाज कहते हैं। ब्लॉगर भाई साहब इस तरह के प्राणी का बहुत ही मनोरम वर्णन किया था। काफी दिनों बाद मुझे उनकी याद आई और उससे अधिक उनके उंगलीबाज। इस तरह के लोग बात-बात में मिनमेख निकालकार उसका फलूदा निकालते हैं। इस तरह के लोगों से बचने की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। वजह यह कि भाई लोग बड़े ही शातिर और तिलिस्मी प्रतिभा से भरे होते हैं। इनकी विद्वता का लोहा हर कोई मानता है, ज्ञान का नगारा चौतरफा सुनाई पड़ता है। हालांकि, आम लोग इन्हें सुपिरियरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित भी बताते हैं। इनकी इस बीमारी का स्तर उनके कुंठित होने के पैमाने से मापा जाता है। यह जितना अधिक होगा, उंगलीबाज की हरकतें भी उतनी ज्यादा बढ़ती जाती है। वह बेतरतीब सा अपनी ही दुनिया में मगन रहता है। लेकिन इनको झेलना उतना ही मुश्किल होता है, जितना मरखाह गाय को खूंटे से बांधना। मतलब समझ ही गए होंगे। वैसे गाय सबसे मासूम जीव है, ऐसा लोग कहते हैं, तो मैं भी मान लेता हूं। उसके जैसा सीधा-साधा और भोला-भाला जीव कोई नहीं। पर, यह भई लोग कहते हैं कि सीधा-साधा और भोला-भाला अपने रंग में रंगता है तो वह सांड़ से भी खतरनाक बन जाता है। इसलिए उसे लोग मरखाह गाय भी कह देते हैं। दूसरी बात यह कि अक्सर कामकाजी महिलाओं को भी गऊ यानी गाय मान लिया जाता है, क्योंकि वह सारा काम बिना कुछ पूछे-रुठे या फिर बिना विरोध के चुपचाप कर लेती है। यहां तक कि अपनी गलती न होने पर पति का मार भी खा लेती है। हालांकि, कुछ कहानी इसके ठीक उलट भी होती है। पर, ऐसा कम ही होता है। अपवाद की तरह। लेकिन, उंगलीबाज के बारे में कोई अपवाद काम नहीं करता है। वह आपको  इतना परेशान करता है कि आप अक्सर तनाव में रहने लगते हैं। उसकी संगति से आप इन चीजों से लाभान्वित होते हैं। मसलन ब्लडप्रेशर, तनाव, क्रोध, खीझ, चिड़चिड़ापन आदि। आत्ममुग्ध इस महामानव की एक खासियत यह भी होती है कि वह आपको बार-बार एहसास दिलाता रहता है कि आर कितने निकम्मे हैं और वह काबिल। उसे अपनी मार्केटिंग भी अच्छी तरह से करने आती है। वह जहां जाता है या तो सबकी आंखों का तारा बन जाता है या आंखों की किरकिरी। सबसे जरूरी सूचना यह कि इन्हें पहचानना जितना आसान है, उतना मुश्किल भी। बस अनुभवी और पारखी नजर वाले ही इस तरह के विभूतियों को पहचान पाने में सक्षम होते हैं। इसलिए, बंधु आपको इस तरह के चरित्र वाले कुछ अद्भुत प्राणी मिलें तो क्या करना है यह आप खुद तय कीजिए....क्योंकि वक्त के साथ-साथ ये अपना चाल-चिरत्र-चेहरा और चिंतन बदलते रहते हैं।

उसे गरीबी और इज्जत की जिंदगी पसंद नहीं थी।

उसे गरीबी और इज्जत की जिंदगी पसंद नहीं थी। गरीबी भगाने के लिए वह भाग गई......पिछले अंक में आपने यहाँ तक पढ़ा, अब आगे की कहानी आपके सामने है
फिर गांव में शादी थी। उसी के घर में थी। उसकी बहन की शादी। तीन बहन थी। बड़ी वाली तो वह खुद, जिसने भाग के शादी कर ली। मझली की शादी में वह नहीं आई थी। इस पर, उसकी मां पागलों की तरह हो गई थी। शायद, बड़ी बेटी के न होने का गम सालता हो। आखिर मां कैसे अपने कोख की औलाद को भुला दे। पर, बाप लोकलाज के डर से नहीं बुलाना चाहता था। मुझे अभी भी याद है, जब उनकी मझली लड़की के तिलक के रस्म में गया था तो चाचाजी ने मुझसे कहा था कि अगर कोई पूछे कि कितने बहन हैं तो कहना, दो। बड़ी वाली का नाम मत लेना। हालांकि मुझे किसी को कुछ बतलाने की नौबत नहीं आई। एक तो इसलिए कि किसी ने मुझसे पूछा ही नहीं या फिर दूसरी बात यह हो सकती है कि उन्हें सब पता हो और वह कोई बखेरा खड़ा करना नहीं चाहते थे। इस बार शादी चाचाजी के छोटी बेटी की थी। दो-चार दिन पहले से ही ऐसा माहौल था कि इस बार तो बड़ी बेटी जरूर आएगी। यदि ऐसा हुआ तो चाचाजी कुछ कर बैठेंगे या खुद भाग जाएंगे। यह बात मुझे शादी वाले दिन ही पता चली। नतीजतन मेरा सारा ध्यान चाचाजी पर था कि शुभ विवाह में कहीं अशुभ न हो जाए। दरवाजे पर बारात आए और लड़की का पिता भाग जाए या कुछ कर ले, इसकी भी जगहंसाई हो सकती थी। हम सभी इसी तरह लोगों को खिलाने-पिलाने और मेहमानों के स्वागत-सत्कार में लगे थे, तभी एक बोलेरो गाड़ी चाचाजी के दकवाजे पर आकर रूकी। एक खूबसूरत महिला उससे निकली और सभी को हाथ जोड़े सीधे घर में दाखिल हो गई। हाथ जोड़ते हुए वह सबकी ओर कनछपी निगाहों से देख रही थी, शायद सभी को पहचानने की कोशिश कर रही हो। उसके घर में प्रवेश करने के बाद एक हैंडसम सा 40 साल (हालांकि वह 40 का लग नहीं रहा था) का शख्स दो-तीन लोगों के साथ दरवाजे के सामने कुर्सी पर बैठ गया। समाज में इज्जत के तमाम ठेकेदार देखते रह गए या सन्न रह गए। दबी जुबान में भले ही सभी ने बहुत कुछ कहा हो, लेकिन किसी ने भी साफ तौर पर कुछ नहीं कहा। बाद में भी किसी ने कुछ नहीं कहा। उस वक्त जो लोग बड़े ताव में नजर आ रहे थे, इस वक्त उनक खून ठंडा पड़ा हुआ था। पहले सुना करता था कि ऐसा होने पर समाज के लोग उस परिवार को बहिष्कृत कर देते थे। शादी के कल होकर इस मसले पर थोड़ी-बहुत फुसफुसाहट सुनने को मिली। पर, सबकुछ शांत रहा।

मेरे चाचा की भागी हुई बेटी

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। वह कुछ बात क्या है, यह मत पूछिए। पर कुछ बात है जो हमारी हस्ती मिटने नहीं देती है। मुझे अभी भी याद है, हालांकि उस वक्त मै बहुत छोटा था। यही कोई 4-5 साल का। हमारे चाचा की लड़की घर से भाग गई थी। गांव में शादी थी। शादी के पहले रस्म को वह बुआ और बहन के साथ देखने गई थी। दूसरी दफा अकेली गई तो लौटी नहीं। सुबह ही पता चल सका कि वह तो राजपूत के लड़के के साथ भाग गई है। उस लड़के के साथ जिसके खानदान का सात पुश्त गुंडा यानी क्रिमिनल था। उसके भागने के बाद गांव में बहुत हंगामा हुआ था। हालात मारकाट के थे। चाचाजी इतने गुस्से में थे कि वह कुछ भी करने को तैयार थे। आखिर में गांव के बुद्धिजीवी और तथाकथित इज्जतदार लोगों ने एक सुझाव दिया। वह जिसके साथ भागी है, उसके पास जाया जाए। इन सबको लगता था कि वह भागी नहीं, बल्कि भगाई गई है। लेकिन, जब दो-चार लोग उसे बुलाने के लिए लड़के के ठिकाने पर गए तो लड़की ने अपने बाप यानी हमारे चाचाजी और अपने चाचाजी को पहचानने से ही इंकार कर दिया। बाद में मामला पुलिस तक पहुंचा। कुछ लोगों को चाचाजी ने बेटी को भगाने के जुर्म में फंसाया। उन पर मुकदमा दर्ज करवाया। पर, बाद में सुना गया कि चाचाजी का बेटा खुद अपनी भागी हुई बहन के यहां आता-जाता है। वहां से अपने घर के लिए धन लाता है। दकअसल, हमारे चाचा बहुत गरीब थे। सिंचाई विभाग में नौकरी करते थे। पर, बिहार सरकार की छंटनी के बाद बेकार हो गए थे। वह कहीं काम की तलाश में भी नहीं गए। घर पर निठल्लों की तरह बैठे फिर से बहाली की बाट जोहते रहते थे। इस तरह, घर की माली हालत बदतर होती गई। शायद इसीलिए बेटी भाग गई। क्योंकि उसे गरीबी और इज्जत की जिंदगी पसंद नहीं थी। गरीबी भगाने के लिए वह भाग गई, क्योंकि अक्सर सुना करता था कि जिस लड़के के साथ वह भागी है, उसके पास 4-5 किलो सोना और ढेर सारा रुपया है। वह बनारस में रहता है और वहां गांजा, चरस और अफीम वगैरह का कारोबार करता है। यह उसका पुश्तैनी बिजनेस था, क्योंकि पापा बताते थे कि उसके दादा भी यही काम करते थे। बाप तो इससे भी बढ़कर निकला। उसने पैसे की खातिर दो शादियां भी की थीं। पहले वाली शादी से समाज में नाम हुआ, दूसरे से बिजनेस में। बचपन के बाद एक बार फिर से 20 साल बाद चाचाजी की उसी बेटी को देखा।
                                                                                           अगले अंक में जारी...

नेता पर भारी जनता बेचारी

हम भारतीय जनता बेवजह अपनी हालत पर रोते हैं। नेताओं पर लांछन लगाने की आदत हमारी गई नहीं। हमारा यह आरोप भी निराधार ही होता है कि नेताओं के पास बेइंतहा दौलत है। यह इल्जाम भी हमारा बेकार होता है कि नेता जनता के पैसे पर अय्याशी करते हैं। घोटाला वगैरह करके चंद दिनों में रोड पति से करोड़पति हो जाते हैं। इन सारे आरोपों और बातों का कोई तुक ही नहीं बनता। हमारे देश में नेता चाहे जितने घोटाले करें, अरबों रुपए जमा कर लें, स्विस बैंक भी काला धन के तौर पर क्यों न भर लें। आम आदमी की तरह वह विकास नहीं कर सकते। वह उससे हमेशा पीछे ही रहेंगे। लोकतंत्र इसी का तो नाम है। जब नेहरू भी लोकतंत्र के कमांडर बने तब भी कमोबश यही हालत थी, आज मनमोहन हैं तो भी वही। अक्सर लोगों को कहते सुनता हूं, जनता की वोटों से नेता मंत्री बन रात भर में अरबपति बन जाते हैं। उनके विकास की गति देश की विकास गति से भी कई गुणा अधिक होती है। मैं कहता हूं, ऐसा नहीं है। फिर लोग मुझसे सवाल करते हैं कि आपके पास क्या सबूत है? अब यही मैं मात खा जाता हूं। अक्सर मेरा सबूत चलता फिरता रहता है। उसे तुरंत पकड़ कर मैं नहीं दिखा सकता, यही मेरी कमजोरी है। लेकिन इस बार एक छोटी सी मिसाल लेकर आया हूं। झारखंड का किस्सा। देश के बड़े-बड़े नेताओं का किस्सा। किस्सा कुर्सी का। इससे मुझे पहली बार लगा कि मैं साबित कर पाउंगा कि नेता कैसे पीछे रह गए और आम आदमी आगे बढ़ गया। तो दोस्तों, जरा ध्यान से सुनिएगा। हुआ यह कि यहां लोकतंत्र के रास्ते पर आम आदमी तो आगे बढ़ गया, क्योंकि उसका ध्यान चलने पर ही है। मगर नेता पीछ रह गए। क्योंकि उनका ध्यान एक-दूसरे को लती मारकर गिराने पर ही रहा। यहां नेता गिरते हैं, फिर उठते हैं, अपनी चोट सहलाते हैं, एक-दूसरे पर थूकते हैं, फिर लात मारते हैं। तो हुआ न कि जो इंसान गिरगिर के चलेगा, वह तो नौ दिन में ढाई कोस ही चलेगा।
नेता जब मंच पर खड़ा होकर कहता है कि भाइयों, तुम्हें देश का निर्माण करना है तो लोग फुसफुसाते हैं- इसलिए कि तुमने देश का नाश कर दिया है। आजकल नेता छात्रों को राजनीति से जोड़ने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। एकबार यूं ही छात्रों को संबोधित करते हुए नेताजी कह रहे थे, युवकों, तुम्हें चरित्रवान होना है, तो बीच से एक लड़का उठा और कहा-इसलिए कि तुम चरित्रहीन हो और सुधर नहीं सकते। इस तरह दोस्तों साबित हुआ कि नहीं कि हम काफी आगे निकल आ गए और वो पीछे रह गए। यदि नहीं तो एक और मिसाल लीजिए। नेता आज जब भाषण देने खड़ा होता है तो वही कहता है, जो पांच साल पहले कह चुका होता है। वहीं आश्वासन लोगों को देता है, जो पांच-दस साल पहले दे चुका होता है। देखा वह आगे बढ़ता ही नहीं। नई चीज सोच ही नहीं पाता, जबकि हम कहीं आगे निकल चुके होते हैं। उसकी बातों पर ध्यान ही नहीं देते।

भारत भ्रष्ट महान

आजादी के पहले तक या उससे 4-5 साल बाद तक भ्रष्टाचार की बात पिछड़ी नहीं लगती थी। वह चौंकाती थी। उस पर गुस्सा आता था। पर आज तो इसकी बात करने पर लोग कहेंगे यह तो अभी भी एक मुद्दे पर अटका हुआ है। पिछड़ा हुआ है। कभी तरक्की नहीं करेगा। हमारे देश में एक नई बात है। अफसर को भ्रष्टाचारी कौन बनाता है? व्यापारी! और व्यापारी को भ्रष्टाचार करने की छूट कौन देता है? अफसर! एक पवित्र कार्य में दोनों लगे हैं। इनमें लड़ाई होना वैसे ही है, जैसे पहले अमेरिका-रूस और अब अमेरिका-चीन के बीच हथियारों का जखीरा जमा करने का झगड़ा। इससे भी एक कदम बढ़कर बात करे तो इन दोनों की लड़ाई, जैसे प्रभु के दो भक्तों की लड़ाई। प्रभु के चरणामृत को लेकर झगड़ा है यह। तूने ज्यादा चरणामृत ले लिया, तूने भोग में से ज्यादा मिठाई ले ली। उसके बाद आजकल बड़े-बड़े अफसरों और नेताओं की संपत्ति की सीबीआई जांच का चलन बन पड़ा है। सीबीआई जांच किस तरह होती है, यह सभी जानते हं। उत्तरप्रदेश में मायावती से छत्तीस का आंकड़ा होने के बावजूद मायावती ने संसद में कांग्रेस सरकार बचाने के लिए उसके पक्ष में वोट डाला। फिर लालू जी विरोध कांग्रेस का करते रहे, पर उसके खिलाफ वोट डालने के बजाय संसद से बाहर चले गए। यही हाल मुलायम सिंह यादव का रहा। इन तीनों में एक समानता है कि तीनों पर आय से अधिक संपत्ति का मामला चल रहा है। इनमें से किसी ने कांग्रेस के विरोध में वोट डालने की जुर्रत की होती तो अब तक इन पर सीबीआई स्वरूपी सांढ़ छोड़ दिया गया होता। फिर सवाल यह भी है कि जांच कौन करे? अफसर अकेला तो खाता नहीं है। वह नीचे भी खिलाता है और ऊपर भई खिलाता है। ऊपर जो जांच करने वाला है, वह भी तो खाता होगा।

भारत भ्रष्ट महान- भ्रष्टाचार भी एक कला है।

अपनी इच्छा से किसी चीज को चुनना वरदान से कम नहीं होता। सुख का मतलब है कि हम अपना चुनाव खुद कर सकें। लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिल्कुल दूसरी बात। हम एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी में हमेशा गोता लगाना चाहते हैं। कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ, न कहीं पहुंचता हुआ। ऐसी निराशा का नतीजा तो त्रासदी और अंधेरे परिवेश में ही हो सकती है। यहां यही हुआ भी है। एक शुरुआत गलत हो गई। भ्रष्टाचार की बात करना अब वैसा ही है, जैसे सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा सुनाना। सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी है इस देश के भ्रष्टाचार की कथा। पढ़ाई के शुरुआती दिनों में जब हरिश्चंद्र की कथा पढ़ाई जाती है, तब वह नई लगती है और चौंकाती है। वाह, कितना सत्यवादी राजा था। सपने में जिसे दान दे दिया, जागने पर उसकी खोज कराके उसे राज दे देता है। खुद चांडाल के यहां नौकरी करता है और अपने बेटे के कफन के टैक्स के रूप में अपनी पत्नी से उसकी दी साड़ी मांगता है। पर यही कथा जब बी।ए. में पढ़ाई जाए, तो छात्र कहते हैं कि कितने पिछड़े प्रोफेसर हैं। अरे यह कथा तो हम प्राइमरी में पढ़ चुके हैं। साल दर साल दोहराते हैं। जरा इस कथा को इस तरह बनाते हैं। हरिश्चंद्र ने सपने में एक ब्राह्मण को राज्य दान में दे दिया। सुबह उन्होंने अपने सपने को याद किया। सोचा, यह सपने वाला ब्राह्मण है, जिसकी नजर मेरे राज पर लगी है। यह कभी भी आकर भीख में राज्य मांग सकता है। यह किसी राजा को उकसाकर मेरे राज्य पर हनला करवा सकता है। उन्होंने मंत्री को हुक्म दिया- जाओ पता लगाओ इस शक्ल-सूरत के ब्राह्मण का और उसे मेरे सामने हाजिर करो। वह ब्राह्मण राजा के सामने लाया जाता है। राजा उससे कहता है- क्यों रे उधम, स्वपन में मुजे बेखबर जानकर मेरा राज्य दान मे लेता है। राजा सिपाही को आदेश देता है- इस बम्हन का सिर काट लो! सत्यवादी की कथा इस तरह एक नई कथा बन जाती है। ऐसा नहीं कि वही बरसों पुरानी कहानी दोहराते चले आ रहे हैं। ईमानदारी इस देश में विलुप्त चीज हो गई है। बेईमानी इतनी पुरानी बात हो गई है कि कोई बेईमानी की बात करे तो लगता है, बड़ा पिछड़ा हुआ आदमी है। अब कौन सी बातें हमें चौंकाती हैं। जैसे- अखबारों में कभी-कभी छपता है- ईमानदार अभी भी जिंदा है! मिसाल होती है- एक रिक्शावाला सवारी को छोड़कर लौटा, तो उसने देखा कि रिक्शे में नोटों से भरा एक बटुआ पड़ा हुआ है। वह तुरंत उस सज्जन के घर गया, जिन्हें उसने अभी छोड़ी था। फिर उनका बटुआ वापस किया। इस जमाने में ईमानदार जिंदा हैं। यह समाचार कभी नहीं छपता कि एक सज्जन ने 20 रुपए में रिक्शा ठहराया, मगर सिर्फ 10 रुपया देकर निकल लिए। उसने दस रुपए और मांगे तो उसे पीटकर भगा दिया।

इस लेख को मैं परसाई जी की रचना को आधार बनाकर और उससे उधार ले कर लिख रहा हूँ,

आईपीएल से डगमगाया सरकार का इंद्रासन

शिक्षा व्यवस्था को लेकर तमाम तरह के सवाल उठते रहते हैं। पर इसकी जड़ में अहम सवाल को अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। अभी तो आईपीएल देश की सभी समस्याओं पर इस कदर हावी है कि बाकी किसी भी मसले पर बात करना बेमानी ही है। चूंकि शिक्षा में गिरावट के लिए सरकार का रोल बहुत व्यापक है। इसलिए वह अपने दायित्वों से बचने की हर मुमकिन कोशिश करेगी। कभी आईपीएल विवाद में अड़ंगा डालकर तो कभी फोन टैपिंग का मामला सामने लाकर तो कभी किसी और तरीके से। उसे हमेशा खतरा बना रहता कि कहीं जनता जागरूक हो गई तो उसके खिलाफ कहीं बगावती तेवर न अपना ले। जनता की जागरूकता से सरकार की सत्ता ठीक उसी तरह डगमगाने लगती है, जैसे पुराणों में वर्णित कथा के मुताबिक, जब कोई आम आदमी भी तपस्या करता तो इंद्र को हमेशा भय सताता की यह तपस्या उसकी गद्दी छीनने के लिए की जा रही है। फिर इससे बचने के लिए वह दस तरह की तरकीबें आजमाता। काम, क्रोध, लोभ, मोह माया इत्यादि शत्रुओं को वह उस तपस्या को भंग करने के लिए भिरा देते थे। कभी रंभा तो कभी मेनका की मोहनी मूरत का सहारा लेते। हमारी सरकार भी ठीक यही करती है। सबसे पहले बाबरी मस्जिद पर लिब्रहान कमेटी की रिपोर्ट आई तो अपनी नाकामी से बचने के लिए रंगनाथ का मामला लीक हो गया। जिसके तहत अल्पसंख्यक मुसलमानों को आरक्षण देना था। जब यह मामला तूल पकड़ा तो गुजरात में गोधरा दंगा पर रिपोर्ट सामने पटक दिया। फिर महंगाई के मामले में घिरती नजर आई तो नरेंद्र मोदी को एसआईटी के सामने पेश कराकर उससे ध्यान भंग कराया। मोदी का मामला खत्म हुआ तो आईपीएल में अपने कारिंदे थरूर के जरिए बखेरा खड़ा दिया। यह सबसे बखेरा ही तो है। क्योंकि यदि सरकार के इरादे स्पष्ट होते तो अब जो वह वित्त मंत्री और आयकर विभाग जांच के नाम पर तमाशा कर रही है, वह पहले भी कर सकती थी। जब आईपीएल शुरू हुआ तब भी केंद्र में वही सरकार थी, जो आज तीन साल बाद है। सत्ता परिवर्तन से इसका कोई लेना देना नहीं है। एक तरह से कहें तो इंद्र की तरह सरकार घबरा और डर गई है।

थरूर के लगातार ट्विटिंग से सरकार की किरकिरी रूक नहीं रही थी तो उसे भी तो मजा चखाना था। इसी बीच कहीं से उड़ती खबर आई कि थरूर तीसरी शादी करेंगे। उनकी भावी पत्नी ने आईपीएल में हाथ आजमाए हैं। थरूर को आखिर उनकी औकाद बता दी गई । फिर महज तीन साल में ही आईपीएल से ललित मोदी दुनिया की सबसे ताकतवर बोर्ड बीसीसीआई को चुनौती दे रहे हैं। पहले शरद पवार की चूलें हिली। वह भी आए दिन कांग्रेस की कमीजें फाड़ रहे थे। जब थरूर ने अपना वर्चस्व दिखाना चाहा तो मोदी ने उनकी एक न चलने दी। मोदी ने अपने मोहरे से थरूर का गरूर तो चूर कर ही दिया। इससे सरकार को लगा कि बात काफी आगे निकल गई है तो उसने ठान लिया कि अब किसी कीमत पर मोदी को मिट्टी में मिलाकर ही वह दम लेगी। मोदी के लिए बाहर का रास्ता तैयार वह कर ही चुकी है। अभी क्लाइमेक्स तो बाकी ही है। बात निकल चुकी है, पर लगता नहीं कि दूर तलक जाएगी।

थरूर की तीसरी शादी ! और कुंआरे का दर्द

भारतीय विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को लेकर विवादों का दौर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। विपक्षी दलों ने उनको बर्खास्त करने की मांग की है। अब सुना है सरकार इस बरे में सोच भी रही है। पर वह थरूर को हटाने की नहीं, बल्कि उनके लिए एक अलग मंत्रालय बनाने की सोच रही है। विवाद मंत्रालय (controversial affairs ministry)। इस मसले पर सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री से बात भी कर चुकी हैं। आज हमारे देश में सरकार को इस मंत्रालय की सख्त जरूरत है। देश की बुनियादी मुद्दों से आम जनता का ध्यान भटकाने के लिए। विपक्षी दलों को मुद्दा विहीन करने के लिए। अपनी ही सरकार में विरोधी सहयोगियो को निपटाने के लिए। हमारी सरकार इसका बखूबी इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि वह अभी कर भी कर रही है। पर ज्यादा अनुभव नहीं होने के चलते पकड़ में आ जाती है, क्योंकि अक्सर विपक्षी दल आरोप लगा ही देते हैं कि सरकार एक मसले से ध्यान हटाने के लिए दूसरा विवाद खड़ा कर देती है। यह अलग बात है कि विपक्षी दल भी उसी झांसे में आ जाती है।

सुना है शशि थरूर तीसरी शादी करने जा रहे हैं। जिस दिन यह खबर पढ़ी, उसी दिन एक और खबर सामने आई। भारत के किसी राज्य में एक ऐसा भी गांव है, जहां युवक कुंवारे ही बूढ़े हो रहे है। कहते हैं भगवान ऊपर ही जोड़ियों को बनाता है। पर क्या भगवान ने ऊपर थरूर के लिए तीन और इन बेचारों के लिए एक भी नहीं बनाई थी। यह भगवान का भेदभाव है। भगवान भी अब गरीबों और बेसहारों में भेद करने लगा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह देश के हुक्मरान और इलीट तबका गरीबों के मूलभूत अधिकारों और जरूरतों पर मुंह मारते आ रहे हैं, अब वह इनके तकदीर में लिखी पत्नियों पर भी हक मारने लगे हैं। तभी तो कोई कुंवारा मर जाता है। कोई तीन-चार शादी करके भी हिम्मत नहीं हारता है। मेरे ख्याल से तो यह गरीबी मिटाने का सबसे कारगर तरीका है। इस तरह न गरीबों की शादी होगी। न उनकी तादाद बढ़ेगी। फिर आने वाले 25-30 वर्षों में गरीब नाममात्र के भी नहीं रह जाएंगे। जो होंगे भी तो उन्हें इलीट तबका म्यूजियम में रख देगें। ताकि भविष्य में अपने बच्चों को भापत का इतिहास बताएंगे तो यह भी बताएंगे कि बेटा पहले इस मुल्क में गरीब नाम की प्रजाति भी होती थी। अब वह विलुप्त हो चुकी है। या फिर जिस तरह आजकल डायनासोर के कई जीवाश्म मिल रहे हैं, उसी तरह गरीबों के जीवाश्म भी मिला करेंगे। एक तरह से गरीब दुनिया से विलुप्त होकर लोगों को रोजगार का अवसर दे जाएंगे। लोग गरीबों के जीवाश्म पर रिसर्च किया करेंगे। एमए. एम फिल, पीएच डी, आदि।

मुआवजा या मुर्दे के मूल्य

हाल में कृपालु महाराज के आश्रम में भगदड़ की खबर तो आप सभी ने सुनी और देखी ही होगी। मंदिरों और बाबाओं के आश्रम में भगदड़ से लोग तो मरते ही रहते हैं। इसके अलावा लोगों की मौत और भी दूसरे तरीके से होती है। आज सेना में बहाली की जगह पर युवकों की तादाद ज्यादा होने और धांधली होने के चलते भगदड़ का होना आम बात है। यहां देश के लिए मरने से पहले उस योग्य होने के लिए लोग खेत आ जाते हैं। हाल मे बेंगलुरू के कर्लटन टावर में आग से भी कुछ लोगों की जानें जाती हैं। पुलिस और पब्लिक के बीच प्रदशर्न से भी कुछ लोगों की मौत हो जाती है। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन का मामला ज्यादा पुराना नहीं है। इन सभी में मरने वालों के बीच एक ही समानता है। इनके मरने के बाद इनके परिजनों के लिए सरकार मुआवजे की घोषणा जरूर करती है। एक तरह से मरे हुए लोगों की कीमत तय करती है। यानी मुर्दे की कीमत भी हमारे यहां ही तय होती है। जो जीते जी अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पाते, वह मरने के बाद अपने परिवार को मालामाल कर जाते हैं। मरने के बाद इन लोगों का हिसाब किताब लगाया जाता है। बिल्कुल बनिए की तरह। खून की कमत तय करके दे दी जाती है। कुछ इस तरह... जो मरा उसको पांच हजार दे देंगे। जो घायल होकर अस्पताल में हैं उसे हजार रुपए। जिसकी सिर्फ मरहम पट्टी हुई है, उसे ढाई सौ रुपए। हो गया हिसाब साफ!

अब इस पर मरने वाले परिवार की औरतें बात करती हैं- हमारी तो किस्मत फूट गई। हमारे मर्द को मामूली मरहम पट्टी हुई तो तो हमें सौ रुपए ही मिलेंगे। तू भगवान है बाई कि तेरा मरद मर गया तो तुझे पांच हजार मिलेंगे। हमारा मरद से शूरू निखट्टू है। पड़ोसी का घरवाला फिर भी ठीक है तो अस्पताल मे पड़ा है तो उसे हजार रुपए मिलेंगे। सरकार ने मरने वालों के परिवार का मनोबल कितना बढ़ा दिया है कि रोटी के बदले लोग गोली खाने यानी मरने को भी तैयार हैं। सरकार को शायद रोटी से गोली सस्ती पड़ती है। इसलिए वह रोटी क बदले गोली सप्लाई ज्यादा करती है। खैर, इनके अलावा भी लोग सरकार के हाथों या उसके जरिए मरते हैं। नक्सलवाद के नाम पर आदिवासी, आतंकवाद के नाम पर बेकसूर और बेगुनाह मुसलमान, अपराधी के नाम पर फर्जी मुठभेड़ के चलते पुलिस के ही मुखबिर या आम आदमी। पर इनकी या इनके परिवार वालों की करम फूटी है। इन्हें सरकार की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिलता। लेकिन बेकसूर मुसलमान, आदिवासी, आम आदमी को मारने अफसरों को तरक्की या ईनाम की राशि जरूर मिलती है। पहले वाली स्थिति में फायदा परिवार को, जबकि दूसरी हालत में फायदा किसे आप समझ ही रहे हैं....इसलिए दोस्तों मरने का कौन सा विकल्प चुना जाए..................

नोट- टर्म एंड कंडीशन अप्लाई!

जमाना मिसफिट का है

आज परसाई साहब को पढ़ रहा था। उनकी रचनाओं मे एक तरह का जादू है। जो बात उन्होंने अपनी व्यंग्य रचना के जरिए आज से वर्षों पहले कही थी। वह आज भी सटीक और मारक है। उदाहरण के तौर यदि मैं बात करूं अपने लोकतंत्र की, जहां संसद में हर साल अपराधियों और गुंडों की टोली बढ़ती जा रही है। तो परसाई जी ने इस पर क्या खूब कहा था कि यह शायद हमारे ही जनतंत्र में होता है कि गुंडे भी चुनाव जीतकर शासन करने पहुंच जाते हैं। जुए के घर चलाने वाले, शराबखोरी करने वाले, गुंडागिरी करने वाले बड़े-बड़े निर्वाचित पदों पर हमारे ही मुल्क में विराजमान हैं।
हाल में जब लोकसभा का चुनाव हुआ तो उस दौरान यह भी शोर उठा था कि हम अपनी तुलना अमेरिका से तो करते हैं, लेकिन हन उनकी अच्छाइयों को क्यों नहीं अपनाते? मसलन उनके नेता येल यूनिवर्सिटी से पढ़कर चुनाव लड़ते हैं तो हमारे नेता जेल से चुनाव लड़ते हैं। अभी इस साल बिहार में चुनाव होना है, देखते हैं कितने ऐसे नेता अपनी किस्मत बंद कोठरी से आजमाते हैं और आज जो जेल के हवलदार से सर-सर कहकर बात करते हैं कल जेलर को हुक्म देने लगेंगे।
एकबार फिर परसाई साहब की शब्दों में कहूं तो यह जमाना मिसफिट्स का हो गया है भाई। जिसे जुआखाना चलाना चाहिए वह मंत्री है, जिसे क्रिमिनल होना चाहिए वह पुलिस अफसर है, जिसे दलाला होना चाहिए वह प्रोफेसर है। जिसे जेल में होना चाहिए वह मजिस्ट्रेट है। यानी जिसे जहां होना चाहिए वह वहां नहीं है।

इनको मिले भ्रष्टाचार का भारत रत्न

शहर में कॉफी हाउस, सेमीनार, लाइब्रेरी और विधानसभा या संसद की जो उपयोगता है, वहीं देहात में सड़क के किनारे बनी हुई पुलिया की है। यानी लोग यहीं बैठते हैं और गप लड़ाते हैं। पर यदि शहरों की बात करें तो यहां बुद्धिजीवियों की तादाद बहुत ज्यादा है। ये एक विचित्र प्रजाति के जीव होते हैं। इनका काम पानी पी-पीकर सभा, गोष्ठी या फिर जहां मौका मिल जाए वहीं गरीबों को आदर्श का ज्ञान देने लगते हैं। बड़ी-बड़ी इमारतों में बैठकर गरीबी दूर करने की बात करते हैं। अमेरका और ब्रिटेन की नीतियों पर चलने के लिए भारत और उसकी सरकार को खुलेआम मुंहफट होकर गालियों की पुष्पमाला भेंट करते हैं। पर हालत यह है कि हैं तो बुद्धिजीवी, विलायत या अमेरका का चक्कर लगाने के लिए यह साबित करना पड़ जाए कि हम बाप की औलाद नहीं हैं, तो साबित भी कर देंगे। चौराहे पर इनको दस जूते मार लो, पर एकबार अमेरिका भेज दो। ये हैं बुद्धिजीवी। जब बात शहरों की चली है और आजकल शीला सरकार दिल्ली को कॉमनवेल्थ खेल के नाम पर दिल्ली को शंघाई और पेरिस बनाना चाहती है तो जरा इस पर भी ध्यान दे देते हैं इसका असर किस तरह पड़ेगा। आजादी मिलने के बाद यदि भारत के किसी एक वर्ग ने तरक्की की है तो वह है साइकिल-रिक्शाचालकों का वर्ग। जिस तेजी से यह वर्ग पनपा है, उससे यही साबित होता है कि हमारी आर्थिक नीतियां बहुत बढ़ियां हैं और यहां के घोड़े बहुत घटिया हैं। पहले घोड़ा गाड़ी का जो इस्तेमाल होता था। खैर इससे यह भी साबित होता है कि समाजवादी समाज की स्थापना के सिलसिले में हमने पहले तो घोड़े और मनुष्य के बीच भेदभाव को मिटाया है और अब मनुष्य एवं मनुष्य के बीच भेदभाव को मिटाने की सोचेंगे। क्योंकि पहले जिनके पास घोड़े थे वह घोड़ा घास खाकर भले ही जिंदा रह लेता हो, घोड़ागाड़ी वाला भी इसी तरकीब से जी लेता होगा, यह मानना कठिन है। एक बात यह है कि खाद्य विज्ञान का सिद्धांत कहता है कि आदमी की अक्ल तो घास खाकर जिंदा रह लेती है, आदमी खुद इस तरह नहीं रह सकता।
एक और बात तो आधुनिक युग के हिसाब से सबसे बड़ा क्रांतिकारी बदलाव है। वह यह कि लोग अब किसी भी तरकीब से अमीर बन जाने से ही सम्मानपूर्ण बन जाते हैं। इसीलिए देश की किसी भी संस्था, मंत्रालय, विभाग या आम आदमी के टैक्स का पैसा खा लेने भर से आदमी का सम्मान नष्ट नहीं होता है। मधु कोड़ा पांच हजार से भी ज्यादा करोड़ रुपए खाकर अपनी बीवी को चुनाव जीता ही लिया। लालू चारा खाकर रेल मंत्री बने ही। मायावती, जयललिता, मुलायम सिंह और सांसद जिनकी आमदनी आर्थिक मंदी में भी १० करोड़ के हिसाब से बढ़ी। वह भी सम्माननीय हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें सम्माननीय मानते हुए इन मामलो में जांच के आदेश नहीं देने का फैसला लिया है। काम के नाम पर ये नेता हर काम चुनाव के पहले ही कराना पसंद करते हैं। शायद चुनाव कानून में लिखा है या पता नहीं क्यों सभी बड़े या छोटे नेता चुनाव के कुछ महीना पहले अपने-अपने चुनाव-क्षेत्र का सुधार कराते हैं। कोई सड़कें बिछवाता है, कोई पुल बनवाता है तो कोई गरीबों को कपड़े और कंबल दान में देता है।
सहयोग-राग दरबारी