Showing posts with label फुटकर कविताएँ. Show all posts
Showing posts with label फुटकर कविताएँ. Show all posts

बेमतलब

मैंने मान लिया है
क्या
ये सोचना अभी बाकी है
लेकिन
इतना तो तय है कि मैंने तय किया है थोड़ा रास्ता
बाकी रास्ता भी नाप लूंगा
तुम अगर यह मान सको 
तो बड़ा एहसान होगा और रास्ता छोटा

मैंने सुन लिया है
क्या
यह कह नहीं सकता
लेकिन
जो भी है वह किसी शीशे की दीवार जैसा है
टूट सकता है
थोड़ी सी मुस्कराहट से ही
तुम अगर मुस्करा सको
तो बात एक होगी और टुकड़े कई

पर मैं जानता हूं
ऐसा कुछ भी नहीं है
कोई रास्ता नहीं है, कोई बात नहीं है
कोई  दीवार,कोई एहसान भी नहीं
है तो बस
तुम और मैं
और
एक दिन
ये भी नहीं रहेगा
बचेगी तो बस ये बेमतलब कविता
                   ---पावस नीर---
यह कविता क्यों लिखी गयी इसका जवाब नहीं मिल पाया. लेकिन जैसा कि हर रचना की अपनी नियति और महत्व होता है, यह बात इस पर भी लागू होती है. लेकिन, यह कविता भला क्यों तो इसका जवाब है आज की भाग दौर भरी ज़िंदगी में जब एक युवा बहुत ही व्यस्त शेड्यूल में अचानक ही कुछ सोचता है तो वह क्या है और भला वह ऐसा क्यों सोचता है इसकीझलक मिलती है.

मैं सोच रहा हूँ

आजकल बहुत परेशान हूँ,
पता नहीं किन बातों से हैरान हूँ,
कभी-कभी ऐसा भी होता है,
हमें हमारी परेशानियाँ पता नहीं होती,
ऐसे में हम सोचते हैं,
आखिर मर्ज़ क्या है ये,
मैं भी सिर्फ सोच ही रहा हूँ,
सोचने का सिलसिला बदस्तूर जारी है,
यही सोच कर ज़रा हैरान हूँ.
मैं क्या चाहता हूँ?
मेरी मंजिल क्या है?
सोच कर हैरान हूँ,
शिकायतों से सबकुछ हासिल नहीं होता,
सोचने से कुछ नहीं होता,
कुछ करना पड़ेगा,
फ़िलहाल मैं सोच रहा हूँ.
जब सोचना बंद करूँगा,
तो कुछ ज़रूर करूँगा.
फ़िलहाल मैं सोच रहा हूँ,
और क्या सोच रहा हूँ,
ये मत पूछए, क्योंकि
आजकल हर कोई सोच रहा है,
अंतर इतना है कुछ को पता है,
मुझे अभी पता करना है,
कि मै क्या सोच रहा हूँ?

पांच बरस बीत गए

ख़त्म होती जा रही है संवेदनशीलता,
दूरियां क्या रिश्तों को भी
कमजोर कर देती है,
पांच बरस रहा अपनों से दूर,
खूब घूम-घूम और विघ्नों को चूम,
जब दिक्कत थी, तो दुनिया भी थी,
जब सपने थे, तो अपने भी थे,
पांच बरस कैसे बीते, सोचने पर पछताता हूँ,
पर बीती बातों को सोचने से क्या होता है,
आगे बढ़ने से नहीं होगा हासिल कुछ,
रिश्ते तो बिखर गए न,
जिनमे यकीं बाकी हैं,
वो भी दरकने लगे हैं.
बीत गए पांच बरस बिरह में,
टूट गयी आस अब मिलन की,
न दर्द रहा न उसका अहसास,
बाकी है तो बस यादों की चंद घरियाँ,
जिनमें अब भी गुज़रती है,
मेरी सबसे अच्छी शाम.
पांच बरस बीत गए,
बिना किसी को भूले,
यादों को सजोने में थोडा वक़्त लगता है,
उनमें भी अच्छी और बुरी यादें भी,
बुरी यादों का भी भाव बढ़ने लगा है,
उसे याद कर रोने वाले,
और छुप कर पीने वाले,
गले लगाने लगे हैं.

हम नहीं हैं काबिल, कह दें वो सरेआम ज़रा

बेमतलब की बातों में उलझना बेकार है,
पर हर बात को बेकार समझ, 
लोगों का दिल दुखाना,
ये किस खता का कसूर है.
माना आपकी तरह हम नहीं काबिल,
नहीं हममे में वो बात, न ही ज़ज्बात,
जो आपमें में है,
पर हमें नज़रअंदाज़ करे वो,
ये गवारा नहीं.
हम नहीं उनके काबिल तो कह दे सरेआम,
न कोई शिकवा और न ही पछतावा होगा, 
होगा तो बस दर्द और चुभन
पर, यूँ हमारी गैर मौजूदगी में 
खुद का दिल दुखाना,
पसंद नहीं. 
अब तक ऐतबार करता आया,
आगे भी कर लेंगे यकीं उनका,
पहले पसंद थे अब हैं नापसंद उनका.    

मौत का यह सिलसिला

ये मौत है उनकी,
जिनका कोई कसूर नहीं,
मरने-मरने वालों का आपस में कोई नाता नहीं,
बह रहे फिर भी खून,
जैसे जीवन का कोई मोल नहीं
हर मौत के बाद मातम,
फिर मौत,
जनता के रखवाले कर रहे हैं ठेकेदारी,
छोड़ राजीनीति, कूद पड़े हैं धंधे में,
सिलसिला ये कब थमेगा,
आँखों में चिंगारी लिए,
पूछ रहा हरकोई यही सवाल,
कब थमेगी लाशों की राजनीति,
कब रुकेगा नक्सलवाद,
और कब बुझेगी असमान विकास की प्यास।

लोकतंत्र की शानदार जिन्दगी

आज हम अपनी उस दुनिया से बेगाने होते जा रहे हैं, जिसमें रहकर हम दुनियावालों की दुनिया में अपनापन महसूस करते थे। वह हमारी खास दुनिया या तो नकली उदासीनता या खोखली दिलचस्पी से कमोबेश छिन्न-भिन्न हो चली है। यदि कोई चीज उसे संभाले हुए है तो वह यह जिद की हमारी भी एक अपनी दुनिया होगी। पर हमें पहले उस दूसरी दुनिया को देखें, जिसमें हमें पहले से ज्यादा रहना पड़ रहा है। जबिक इस दुनिया से न हमें लगाव है और न ही विलगाव। लोकतंत्र ने हमें शानदार जिंदगी और कुत्ते की मौत के बीच पतली दीवार में दबा रखा है। ऐसी हालत में सबसे आसान यही लगता है कि अपनी व्यक्तिगत आजादी की अभी तक बची-खुची सुविधा का फायदा उठाकर अपने लिए कुछ रियायत ले सकूं। वरना मेरे दोस्त तो यहां तक कहते हैं कि मैं जिस रफ्तार से जिंदगी जी रहा हूं, वह कछुए की चाल से भी धीमी है। खरगोश तेंदुआ से भी तेज दौड़ लगा रहा है। अक्सर उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता हूं। पर कई मर्तबा सोचता हूं, तो लगता है वह सही हैं। मेरी आदत दस कदम चलकर दूरी को नापने की है। जबिक बाकियों की आदत हर बाधा दौड़ के बाद अगले दौड़ की तैयारी की है। ऐसे में इस दुनिया में बने रहने के लिए मेरे पास एक ही विकल्प बचता है। वह यह कि मैं सब सेनाओं में लड़ूं। किसी में ढाल के साथ तो किसी में बगैर कवच के। क्योंकि आज ऐसा लगता है कि दुनिया की इस अंधी दौड़ और भीड़ को समाज में तब्दील करने का सिर्फ एक ही साधन है। वह है उस सत्ता का उपयोग जो हरेक व्यक्ति अलग-अलग फैसलों से कुछ हाथों में देता है।
रघुवीर सहाय की कविताओं से उधार लेकर कुछ पंक्तियां कहूं तो,
आज हम
बात कम, काम ज्यादा करना चाहते हैं
इसी क्षण
मारना या मरना चाहते हैं
और एक बहुत बड़ी आकांक्षा से डरना चाहते हैं
ज़िलाधीशों से नहीं।
कुछ भी लिखने से पहले हंसता और निराश
होता हूं मैं
कि जो लिखूंगा वैसा नहीं दिखूंगा।
बहुत दिन हुए तब मैंने कहा था लिखूंगा नहीं
किसी के आदेश से।
एक मेरी मुश्किल है जनता
जिससे मुझे नफरत है सच्ची और निस्संग
जिस पर कि मेरा क्रोध बार-बार न्योछावर होता है।

मुलाकातों का इंतज़ार

जाने कहां बिछड़ गए वो दिन,

जब दिल में एक तमन्ना होती था,

किसी से मिलने को बेताब रहता था,

चंद पलों के दीदार से खुशियों की रौनक होती थी,

और होती थी हरएक बात उनकी,

बातें अब भी बाकी हैं,

मुलाकातों का इंतजार अब भी है,

पर ना अब वो हैं, ना ही वह वक्त।

उनकी यादें जब सताती है तो,

आंखों से आंसू नहीं बहता है,

कई बार सोचा, वह क्यों आती है यादों में,

जब प्यार नहीं है तो भूला क्यों नहीं देते,

पर हर बार भूलने की असफल कोशिश,

हरबार भूलकर उसी को याद करना,

यादों में उसकी धुंधली छवि,

लटों का धीरे से उठाकर पलकें झुकाना,

अब वो यादें गईं, वक्त के साथ मोहब्बत गई,

और साथ जीने की तमन्ना।