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| कांग्रेस प्रवक्ता मनु सिंघवी |
सेक्स ही सत्य है, बाकी सब सिंघवी है!
तुम्हारा कहानी बन जाना!
शाम हो आयी है. सड़क पर लोगों की चहलकदमी पहले की ही तरह है. रात भर यहां
ऐसे ही रहता है. लोग-आते जाते रहते हैं, किसी को फर्क़ नहीं पड़ता है.
हज़ारों लोगों की भीड़ में वह भी एक था, बिल्कुल मेरी तरह. पर, कभी लगता
था, किसी चीज की तलाश में है. लेकिन किस चीज की यह शायद किसी को पता नहीं
था? दोस्तों ने कभी समझने की कोशिश ही नहीं. क्योंकि हर किसी की अपनी एक
कहानी थी. सभी अपनी-अपनी कहानियों में एक गुमनाम जीवन जी रहे थे. बात यह थी
कि मैं किसी कहानी में खोना नहीं चाहता था. अकसर उसे भी लगता कि मैंने उसे
ग़लत समझ लिया. जैसा मैं सोचता हूं वह वैसी बिल्कुल नहीं है. गुस्सा तो
मुझे भी कभी-कभी आता था, अगर मैं उससे इतनी बातें कर रहा हूं तो क्यों?
क्या वह इतना भी नहीं समझ सकती थी. शायद वह भी अपनी छवि और कहानी को लेकर
सतर्क थी. मुझे इससे कभी एतराज़ नहीं रहा और न है. लेकिन, एक सवाल तो हमेशा
से रहा है और है भी? शायद वह सवाल उसके जवाब में छिपा है, जो अभी तक मुझे
नहीं मिला. शायद उसे भी किसी बात का इंतज़ार हो. अब इतनी बात कर लेने के
बाद भी उसे मुझे अनजान नहीं मानना चाहिए. लगता है परखना चाहती हो. लेकिन
किसे, क्या वाकई मुझे? उसे जो एक पहलेनुमा घेरा अपने चारों ओर लेकर चलता
है. एक ऐसा घेरा जिसे वह ख़ुद आजतक नहीं तोड़ पाया. ऐसा नहीं कि मैं इससे
बाहर नहीं आना चाहता है. दादी अकसर कहती थी, वह फलाने नगर (वक्त के साथ
दादी के किस्सों का शहर कहीं खो-सा गया है, इसलिए नाम याद नहीं) का
राजकुमार जब भी उदास होता तो एक चिड़िया आती और उससे बातें करने लगती थी.
उसकी आवाज़ किसी राजकुमारी की तरह थी. एक दिन राजकुमार ने फ़ैसला किया इस
रहस्य का वह पता लगायेगा. फिर एक दिन पता चला कि उसके ही महल में एक
नौकरानी थी, जिसने एक राजकुमारी को काले जादू से चिड़िया बनाया था. यह बात
पता चलते ही राजकुमार ने नौकरानी को मौत की सजा दी लेकिन एक शर्त रखी कि
अगर वह राजकुमारी को उसका सही रूप लौटा दे तो उसे छोड़ दिया जायेगा. ऐसा ही
हुआ. जब राजकुमारी अपने असली रूप में आयी तो राजकुमार ने पूछा मेरे उदास
रहने पर तुम अकसर मेरे पास क्यों आ जाया करती थी? यही सवाल मेरे साथ है. जो
अभी तक उसकी समझ में नहीं आया और शायद जो अभी तक गुस्सा नहीं थी, सच में
गुस्सा हो गई वह. नहीं भी हुई हो, लेकिन मुझे कैसे पता? शायद अभी यह बताने
का वक्त का नहीं था. नहीं, तो वह बता चुकी होती. लेकिन मैं जो ठहरा अधीर,
मां भी कहती थी तुम्हें सारी मिठाइयां एक-साथ चाहिए. एक-एक करके खाओ फिर और
दूंगी. लेकिन नहीं, मुझे तो एक-साथ पांच-छह चाहिए थी. अभी मुझे पांच-छह तो
नहीं बस एक ही चाहिए, लेकिन वह धीरज या धैर्य कहां से लाऊं, ताकि मैं
इंतज़ार कर सकूं. और अकसर यही होता है अंत में मैं फ्रस्ट्रेट होकर परेशान
हो जाता हूं. कुछ दिनों तक डिस्टर्ब रहता हूं और धीरे-धीरे वह भी कहानी बन
जाती है. क्या इस बार भी यही होगा?
तो मीडिया है पाक साफ !
इसीलिए जब पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट से रियाटर होने के बाद मार्कंडेय काटजू ने मीडिया को सवालों के घेरे में लेना शुरू किया है तो लोगों को जलने लगी है। लेकिन, कुछ अतिशयोक्ति वाले उनके बयान को छोड़ दिया जाये तो काटजू साहब के बयान से सहमत होने में कोई अपराध नहीं है। कुल मिलाकर बात सिर्फ इतनी है कि चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट (टीवी या अख़बार) ''पेड न्यूज़'' दोनों जगह है. कुछ पत्रकार दलालों के वर्ग के हैं, तो कुछ मजबूर. मजबूर वाले वर्ग को तेज़ धार वाली अपनी ख़बर की धार कुंद करनी पड़ती है, क्योंकि बॉस ने बोला है। हालांकि आज के कारोबारी दुनिया में पेड न्यूज़ का चलन खत्म हो जाए, यह मुमकिन नहीं। क्योंकि जो मीडिया घराने हैं, उनके कई बिजनेस हैं। अगर सरकार का आप साथ नहीं देंगे तो सरकार तो सरकार है, हर कदम पर आपके लिए तलवार लटका देगी। इस तलवार की मार असली वाले से कई गुना होता है, आख़िर अर्थतंत्र ही तो सारे तंत्रों को नियंत्रित करने का काम करती है।
भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन का झुनझुना
भ्रष्टाचार की नौंटकी अभी जारी रहेगी। अभी कुछ दिनों तक देश में कालेधन को लाने का मामला गूंजता रहेगा। लोकपाल विधेयक का भी मसला मीडिया में चलता रहेगा। पर, मेपी मानिए तो यह सब ड्रामा और नौटंकी के अलावा कुछ भी नहीं। सरकार को झुकाने का जो अभियान इन चंद लोगों ने जो छेड़ रखा है, उनकी मंशा कभी पूरी नहीं होगी। वैसे भी देखिए तो जिन्हें जनता ने चुना उनको चुनौती देने का हक़ इन बिना चुने लोगों को किसने दे दिया। है हिम्मत तो उतरें चुनावी समर में और फिर बनाएं मनपसंद कानून। कमर टूट जाएगी। जमानत जब्त हो जाएगी। लेकिन कभी संसद में पैर तक नहीं रख पाएंगे। जिस जनता के लिए लड़ने की बात ये चंद लोग कर रहे हैं, वही जनता इन्हें चारो खाने चित कर देगी और ये हाथ मलते रह जाएंगे। ऐसे में यह कौन सा दावा कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए क़ानून अब जनता के चुने हुए प्रतिनिध नहीं, बल्कि चंद मुट्ठी भर लोग करेंगे, जिनके पास अरब की आबादी वाले देश में लाखों का भी समर्थन हासिल नहीं है। पहले अनशन करते हैं। फिर सरकार को ब्लैकमेल करने की कोशिश। यह सिविल सोसायटी की तानाशाही नहीं कही जा सकती क्या? बिल्कुल है। अगर देश में वाकई किसी तरह का करप्शन है तो क्यों नहीं लोग सड़कों पर आ जाते हैं। क्यों दिल्ली के जंतर मंतर पर चंद लोगों के इकट्ठा होने को पूरी आबादी का प्रतिनिधत्व मान लिया जा रहा है। {नीचे की पंक्तियां दिलीप मंडल के फेसबुक वाल से हैं...} जो आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू हुआ था, वह पहले तो जन लोकपाल बिल के समर्थन का आंदोलन बना, फिर लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का आंदोलन बना, फिर कमेटी का चेयरमैन बनने का आंदोलन बन गया और आखिरकार देखिए यह कहां पहुंच गया है? सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि जस्टिस संतोष हेगड़े कर्नाटक में लोकायुक्त है। इन पर उस बिल को बनाने की जिम्मेदारी है, जिससे देश भ्रष्टाचार खत्म होना है। कर्नाटक में भ्रष्टाचार को ये पूरी तरह से रोक चुके हैं!!!! इनका एक परिचय यह भी है कि इनके दिए फैसले यूथ फॉर इक्वैलिटी को खूब पसंद आते हैं। दो हफ्ता पहले सिविल सोसायटी करप्शन के बारे में बात कर रही थी। आज भी वह करप्शन के बारे में ही बात कर रही है। जिन लोगों ने ज्यादा उम्मीदें पाली थीं, और जो अब ज्यादा निराश हैं, उनके प्रति सहानुभूति है। मैं अगर रॉकफेलर फाउंडेशन चलाता हूं (यह दुनिया के सबसे बदनाम कंपनी का फाउंडेशन है) और भारत में अपनी पसंद का लोकपाल बनाना चाहता हूं तो मैं अपने पैसे से दिया जाने वाला मैगसेसे अवार्ड किसी अपने आदमी को दूंगा। अरविंद केजरीवाल और सिविल सोसायटी ने जनलोकपाल के लिए जो विधेयक बनाया है, उसमें मैगसेसे आवार्ड विनर को लोकपाल की सलेक्शन कमेटी में रखने की बात है।
जनलोकपाल बिल की चुनौती
दिग्भ्रमित हूं। चाहता हूं जो लोग चाहते हैं जनलोकपाल विधेयक बने और बने तो कैसे बने, कौन बनाए... वे लोग कृपया कुछ सुझाव दें तो मैं बहुत आभारी रहूंगा। सिविल सोसायटी के बारे में, विरोध में, सरकार विरोधी और पक्ष में काफी बातें की जा सकती हैं। मेरा सवाल है विरोधी और समर्थन वाले ज़रा कुछ राय आर भी दीजिए कि कानून बने तो कैसे, कौन बनाए। सरकार और नेता मिलकर बनाएंगे तो अपने हिसाब से ही बनाएंगे। तभी तो देखते हैं कानून अमीरों और नेताओं की रखैल की तरह है और ग़रीब बेचारा सालों तक बिना कुछ करे जेल की चक्की में पीसता रहता है। कोई देशद्रोही तो कोई नक्सली होने के आरोप में सरकार द्वारा जबरन जेल में डाल दिया जाता है। बिनायक सेन का मामले अभी ताजा है। निचली अदालत से लेकर ऊपर तक सभी ने दोषी करार दे दिया। यह है देश का संविधान। सुप्रीम कोर्ट से उन्हें जमात मिली और सरकार को बताया कि देशद्रोह क्या होता है। अहर सरकार की तले तो वह नेताओंऔर उनके रिश्तेदारों द्वारा किए जाने वाले हर काम को जायज और उनके विरोध में किए जाने वाले काम को गैर कानून बना दे। लेकिन चलती नहीं। संविधान में कई ऐसे पहलू हैं जो कारगर नहीं हैं। अलग-अलग देशों के मसौदे को कट, कॉपी और पेस्ट कर दिया गया है जो भारतीय संदर्भ में लागू नहीं होते इसी का फा़यदा नेता लोग उठाते हैं अपने हिसाब से संशोधन करते हैं। यही हाल आईपीसी और सीआरपीसी का भी है। मेरी समस्या यह है कि इसका समाधान क्या है क्या हम सिर्फ फेसबुक पर इसके समर्थन और विरोध में बातें करें। कौन बनाएगा कानून और कौन नहीं ये बातें करें। जो बनाने जा रहा है वो पाक साफ है या नहीं। बहुत जटिल मामला है। ज़रा मेरी जिज्ञासा शांत करें। अंदर बेचैनी बढ़ती जा रही है। भइया मुझे पता है इस हमाम में सभी नंगे हैं इसलिए मैं चाहता हूं आप इस ड्राफ्टिंग कमिटी में सिविल सोसायटी की नुमाइंदगी करें। मुझे पता है आप भी इनकार कर देंगे। आप कह रहे हैं कि जनता बिना चुने लोग कैसे किसी कानून को बना सकते हैं तो आप चुने हुए लोगों से बनवाइए...शरद पवार, कलमाड़ी, ए राजा जैसों से ...बाहर बैठे खामियां निकालना बहुत आसान है। कुछ लोग पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं।
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