कथनी करनी में अंतर न हो

नीरा राडिया टेप कांड पर मीडिया के कई धुरंधर जो अब तक चुप्पी बरते हुए थे, वो भी बिल से निकल आये हैं. उनकी नैतिकता भी अब उन्हें धिक्कारने लगी है. अब तक कहाँ थे तुम. आईबीएन सेवन के मैनेजिंग एडिटर के लेख का कुछ अंश आपके सामने पेश कर रहा हूँ. आशुतोष अपने लेख में कहते हैं, इन टेपों में पैसे के लेन-देन का जिक्र नहीं है। इसमें किसी को मंत्री बनाने के लिये लॉबिंग की जा रही है। पूरी बातचीत इशारा करती है- एक, किस तरह से बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं? दो, किस तरह से नेता इन कॉर्पोरेट घरानों का इस्तेमाल मंत्री बनने के लिये करते हैं? तीन, किस तरह से पत्रकार कॉर्पोरेट घराने और नेता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं? चार, किस तरह से इन तीनों का कॉकटेल सत्ता में फैले भ्रष्टाचार को आगे बढा़ता है? पत्रकार ये कह सकते हैं कि उसे खबरें पाने के लिये नेताओं और बिजनेस घरानों से बात करनी होती है। उन्हें अपना सोर्स बनाने के लिये नेताओं और विजनेस घरानों से उनके मन लायक बात भी करनी होती है। ये बात सही है लेकिन ये कहां तक जायज है कि पत्रकार बिजनेस हाउस से डिक्टेशन ले और जैसा बिजनेस हाउस कहे वैसा लिखे? या नेता को मंत्री बनाने के लिये उसकी तरफदारी करे? हाई प्रोफाइल पंच-संस्कृति अंग्रेजी की पत्रकारिता में इसे भले ही लॉबिंग कहा जाता हो या फिर खबर के लिये नेटवर्किंग लेकिन खाटी हिंदी मे इसे 'दल्लागिरी' कहते हैं और ऐसा करने वालों को 'दल्ला'। और मुझे ये कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि हम पत्रकारों को ये पता है कि हमारे बीच कौन पत्रकार 'दल्ला' है और कौन 'दल्लागिरी' कर रहा है। 
यहाँ मेरा एक सवाल यह है कि राजदीप सरदेसाई और आईबीएन सेवन ने जो रुख मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए संसद में नोट फॉर वोट कांड मामले में किया था उसके बारे में उनकी राय भी मेरे हिसाब से दल्ला वाली ही होगी. मुझे मालूम है मीडिया में होने के नाते मुझे एक दिन हो सकता है उनके यहाँ नौकरी मांगने जाना पड़े. चाहता हूँ वो वक़्त कभी न, पर मीडिया की दुनिया छोटी है सो इसकी सम्भावनाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. लेकिन मेरा सिर्फ इतना कहना है कि जितनी मुखरता से वह लेख लिखते हैं, उतनी हकीक़त उनके कारनामे में  तो होनी ही चाहिए. पर इसमें ज़मीन आसमान का अंतर भले ही न हो पर फासला तो है ही. यह फासला वह अपने लेखों से पाटने कि कोशिश करते हैं, बेहतर हो कारनामों से करें. यह किसी व्यक्ति विशेष के बारे में मैं नहीं कहना चाहता हूँ, एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार भी अब फसबुक पे बकबक करते नहीं दिख रहे. हाँ, अजित अंजुम के बारे में यह नहीं कह सकता उनके बारे में जितनी खरूश बातें सुनी वह सारी सही थीं, मतलब वह गुस्से वाले स्वाभाव के हैं, लेकिन काम के मामले में वह कोताही कभी नहीं बरतते. कहने का मतलब यह कि जो लोग नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते थे, वह सब दम दबाकर किसी बिल में छुप गए हैं. मतलब साफ़ है बात हो तो कथनी करनी में अंतर न हो नहीं तो कोई बात ही मत कीजिये.

4 comments:

  1. अन्तर कहाँ है, जो टेलीफोन में कहा, वही किया भी।

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  2. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  3. Don't talk like fools....Hindi patrakar doodh ke dhule nahin hain...reference ke liye is baar ka Hindi Outlook padhein...Aapka khud ka akhbar bhi achhota nahin hai aur na hi Prabhu chawla ko aap Angrezi ka patrakar kah sakte hain....

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  4. vyalok sir...aapka comment mujhse ek aur lekh kee mang karta hai, jo mai zarur aapke samne lekar aaunga...

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