प्रधानमंत्री जी कह दीजिए मैं झूठ नहीं बोलता, क्योंकि आपके वादे चीख-चीखकर झूठ की गवाही दे रहे हैं

-    इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त हैं,वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए।
जो सामान्य व्यक्ति हवाई चप्पल पहनकर घूमता है, वह मुझे हवाई जहाज में दिखाना है। 
यह दोनों ही बयान इसी देश के प्रधानमंत्री के हैं। या तो ये दोनों ही बयान झूठे हैं या प्रधानमंत्री झूठे हैं। अगर ऐसा भी नहीं है, तो उनके सारे दावे कागज़ी हैं और बातें बेमानी हैं। इस देश में लॉकडाउन है। बसें बंद हैं। ट्रेन बंद है और बंद है सारा मुल्क। अगर नहीं बंद है, तो देश के हुक्मरानों के झूठे दावे, झूठा वादा और दिलासा।
आज सुबह जब आंख खुली, तो खबर 17 मजदूरों के ट्रेन से कटकर होने वाली मौत की थी। प्रधानमंत्री का ट्वीट था, जिसमें उनका दुख था, लेकिन नहीं था तो मजदूरों का दर्द समझने वाला दिल। जिन मजदूरों की जांन गई, वे कौन थे? अपने घर ही तो जा रहे थे... ट्रेन की पटरियों पर लेटे थे कि ट्रेन आई और रौंदती हुई चली गई। पटरियों पर बिखरी सूखी रोटियां बता रही हैं कि आख़िर भूख ने किस कदर परेशान किया होगा? किन हालातों में अपने घरों के लिए निकले होंगे...
लॉकडाउन से प्रवासी मज़दूरों से सबसे ख़राब स्थिति मजदूरों की है। न काम है और न ही रहने को छत। फिर किस मुंह से किस सरकार के भरोसे शहरों में रुके रहें। 45 दिनों से देश बंद है और बंद हैं हुक्मरानों के दिल और दिमाग। वे नहीं समझना चाहते इनका दुख और दर्द। कोई 100 किलोमीटर पैदल चला जा रहा है, तो कोई साइकल से भागा जा रहा है। पुलिस लाठियां भांज रही हैं। प्रेग्नेंट महिलाएं हाईवे से सफर ऐसे तय कर रही हों, जैसे चंद मिनट में रफ्तार उन्हें हजारों मील दूर घर पहुंचा देगी। लेकिन, यह कोई बस नहीं है और न ही सेना के जहाज, जो विदेशों से अमीरों को लाने के लिए उड़ानें भर चुकी हैं। यहां पैदल जाना है, रास्ते में भूख को पेट दबाकर मार देना है।
चलते-चलते थक गए...टांगों में दर्द हो रहा है... जब 5-7 की बच्ची... 7-8 साल का बच्चा... अपने मां-बाप के साथ सड़कों पर यूं ही पैदल निकल पड़े हैं कि आख़िर कभी तो उस घर को पहुंचेंगे, जहां कोई अपना होगा...इस शहर की अमीरी और सरकारों की बेरहम नीतियों, झूठ से दूर कोई अपना तो होगा। 
आख़िर कौन हैं ये लोग...क्या ये सभी वही हैं, जिसके लिए देश के प्रधानमंत्री कहते हैं, ‘’इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए’’... क्या ऐसा हो रहा है... उन्हीं की पार्टी का एक मुख्यमंत्री प्रवासी मजदूरों को अपने घर जाने से सिर्फ इसलिए रोकता है कि उस राज्य के बिल्डर (अमीरों) कहते हैं कि मजदूर चले गए तो हमारा काम कौन करेगा...फिर इतनी ही चिंता है, तो मजदूरों का 45 दिनों से ख्याल क्यों नहीं रखा... बेंगलुरु में मजदूर जब कहता है, हम इन हालातों में रहने की जगह अपने घर पर मरना पसंद करेंगे...कर्नाटक के मुख्यमंत्री मजदूरों और फंसे लोगों को ले जाने वाली ट्रेन कैंसिल करने का फैसला करते हैं, तो देश के प्रधानमंत्री का ट्विटर जवाब दे जाता है...प्रवासी मजदूर अपने राज्यों/घरों को जाने के लिए गुजरात के सूरत में प्रदर्शन करते हैं, तो प्रधानमंत्री के ट्वीट से देश के इन गरीबों के लिए एक ट्वीट नहीं निकलता...एक शब्द खर्च नहीं होता।
आख़िर जवाब भी चाहिए, तो बस ट्विटर पर ही क्यों? क्या सरकार ट्विटर के भरोसे चल रही है? अगर चल ही रही है, तो फिर ऐसी तमाम ख़बरों से हुजूर नावाकिफ तो नहीं ही होंगे कि सात महीने के गर्भवती महिला लगातार 12 घंटे चले जा रही है...न पैसा है और न ही खाना...न सरकार-प्रशासन से कोई मदद। घर कब पहुंचेंगे, इसका भी कोई अंदाज़ा नहीं। लेकिन, प्रधानमंत्री का पुराना भाषण याद कीजिए...मैं चाहता हूं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही सुविधाएं देश के गरीबों को मिल रही हैं?
प्रधानमंत्री की पार्टी के सहयोग से बिहार में सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की पार्टी का उप-मुख्यमंत्री जबरन 222 मजदूरों को वापस भेज देता है, ताकि दूसरे राज्यों में श्रमिकों की कमी न हो...जब दूसरें राज्यों से मजदूरों को अपने गृह राज्य (बिहार) लाने की बात होती है, तो कभी ट्रेन की कमी, कभी बस की कमी, तो कभी पैसे की कमी का रोना रोती है सरकार...लेकिन लौट चुके लोगों को वापस भेजने वाली सरकार का मुखिया कैसा है? इस पर उप-मुख्यमंत्री अखबारों में इश्तिहार देकर ढिंढोरा पीटता है कि दूसरे राज्यों को बिहार की श्रम शक्ति का एहसास हुआ... कैसी सोच है यह? कतई ही गिरी हुई मानसिकता और उससे भी बदतर कही जाएगी। लेकिन इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
जब प्रधानमंत्री लॉकडाउन का सख्ती से पालन करने की बात कहते हैं, तो उन्हीं की पार्टी का मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) सरेआम उनकी बातों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए बसों को दूसरे राज्य में भेजते हैं, ताकि फंसे हुए लोगों को अपने राज्य ला सकें...दूसरे राज्य का मुख्यमंत्री बंगले झांकता रहता है कि मुझे तो प्रधानमंत्री की बातों का पालन करना है....केंद्र सरकार के नियमों का हवाला देकर वह दूसरे राज्यों से अपने लोगों को न बुलाने को लेकर अपनी मजबूरी जाहिर कर देता है...
 अगर इन हताश प्रवासी मजदूरों की पीड़ा प्रधानमंत्री की आत्मा को नहीं झकझोर पा रही है, तो आख़िर क्या बचता है? सऊदी अरब से लोगों को लाने के लिए पांच उड़ानें...इन मजदूरों के नसीब में हाईवे पर पैदल चलने की मजबूरी है, क्योंकि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इस देश की जो सुविधाएं अमीरों को प्राप्त वह मेरे देश के गरीबों को भी मिलनी चाहिए। क्या यही वे सुविधाएं हैं, जो अमीरों को मिल रही है?
बाक़ी जगहों को छोड़ दीजिए देश के दिल दिल्ली में जहां, प्रधानमंत्री निवास के 10 किलोमीटर के दायरे यानी आईटीओ से मजदूरों का एक जत्था पैदल ही बिहार के भागलपुर जाने के लिए 1000 किलोमीटर से अधिक दूर के सफर पर निकल पड़ता है। लेकिन प्रधानमंत्री का ट्विटर शांत रहता है... एक शब्द या एक बार भी मुंह से नहीं निकलता कि मेरे देश के गरीबों मत जाओ...मैं तुम्हारे लिए हर वह इंतजाम करूंगा, जो इस देश के अमीरों को मिल रहा है...
कहां तो वंदे भारत मिशन के तहत एयर इंडिया की फ्लाइट से सिर्फ एक व्यक्ति को लेकर सिंगापुर के लिए उड़ान भरता है, लेकिन लाखों बेबस प्रवासी मजदूरों के लिए चलती भी है, तो क्या...वह ट्रेन जो 40 दिनों बाद चलाने का फैसला लिया गया। वह ट्रेन जिससे जाने पर किराया खुद उन मजबूरों को देना है, जिनकी नौकरी छीन गई है।
ग़रीब तो ग़रीब है, उसे अमीरों की ऐशो-आराम नहीं बस सम्मान की जिंदगी ही दे दीजिए प्रधानमंत्री जी। बस इतनी ही गुजारिश है आप से...देश में हर जगह त्राहिमाम है, कोरोना का संकट बड़ा है, लेकिन इस संकट की आड़ में अव्यवस्था, अराजकता और अनैतिकता बढ़ रही है।

कोरोना वायरसः जो 102 साल पहले की गलतियों को दोहराए उसका नाम अमेरिका है...


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अमेरिका में पिछले 24 घंटे में कोरोना वायरस की वजह से 2350 लोगों की मौत हुई है। लगभग 24 हजार संक्रमण के मामले आए हैं। इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले गिरना। अमेरिका में लॉकडाउन और पाबंदियों के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप भी अमेरिका के 50 में से 40 राज्यों में स्कूल खोलने के पक्ष में हैं, जबकि 35 से अधिक राज्य अर्थव्यवस्था को खोलने की योजना पेश कर चुके हैं। लेकिन जिस तरह कोरोना से मौतों का सिलसिला अमेरिका में बढ़ता जा रहा है, उससे लगता नहीं है कि इसने इतिहास से कुछ सबक सीखा है। पूरी दुनिया में कोरोना महामारी से 2 लाख 58 हजार से ज्यादा की मौत हो चुकी है, जबकि इनमें से अकेले अमेरिका में ही 72 हजार से ज्यादा की जान गई है। फिर भी लगता है इसने 1918 के स्पेनिश फ्लू महामारी से लॉकडाउन जल्दी हटाने के खतरों से कुछ सीखा नहीं है। 1918 में स्पेनिश फ्लू महामारी के दौरान जब अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को राज्य ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों में छूट दी, तो अचानक संक्रमण के मामले चरम पर पहुंच गए। महामारी का दूसरा दौर लौटकर आया, जो अमेरिकी इतिहास में विनाशकारी साबित हुआ। तब सैन फ्रांसिस्को ने स्पैनिश फ़्लू से जंग में ठीक वही गलती की, जो आज कई अमेरिकी राज्य कर रहे हैं।
तकरीबन 100 साल पहले सैन फ्रांसिस्को में हर किसी को फेस मास्क पहनने का आदेश दिया गया था, लेकिन आज अमेरिकी राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति ही इन नियमों की धज्जियां उड़ाते नजर आते हैं। स्पेनिश फ्लू के संक्रमण के बीच सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इन पाबंदियों ने असर दिखाना शुरू किया और नए मामलों की संख्या में हफ्ते भर में भारी गिरावट दिखनी शुरू हो गई। लेकिन, कोरोना वायरस के खिलाफ मौजूदा जंग में अमेरिका में संक्रमण की रफ्तार हल्की धीमी होने के बाद नेताओं ने सार्वजनिक समारोहों और आयोजनों पर से पाबंदी हटा ली। महज महीने भर के बाद ही बताने लगे कि अब मास्क पहनना जरूरी नहीं है। हालांकि, बाद में यह गलती सुधारी गई। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कोरोना वायरस ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और अब एक आकलन है कि मई के आखिरी सप्ताह के बाद से हर दिन लगभग दो लाख कोरोना वायरस के मामले आएंगे और रोजोना 3000 अमेरिकियों की जान इस वायरस की भेंट चढ़ने वाले हैं। ऐसे में वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं कि अमेरिका को 100 साल पहले की गलतियों के साथ मौजूदा गलतियों को भी सुधारने की जरूरत है। उसे हड़बड़ी में लॉकडाउन खत्म करने से पहले 100 बार सोचने की जरूरत है।
आइए जानते हैं कि 1918 में कैसे स्पेनिश फ्लू गिरफ्त में अमेरिका फंसा और आज वह उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है। 1918 में पहले विश्वयुद्ध के खत्म होने के बाद अमेरिकी सैनिक अपने देश लौट रहे थे। इसी दौरान सैनिकों का एक जत्था सितंबर 1918 में सैन फ्रांसिस्को पहुंचा और अपने साथ यह घातक महामारी भी लेते आए। जब अधिकारियों को इसका पता चला, तो उन्होंने 18 अक्टूबर को 'सार्वजनिक मनोरंजन के सभी स्थानों' को बंद करने का आदेश दिया। लेकिन फ्लू के मामले बढ़ रहे थे और 21 अक्टूबर 1918 तक लोगों को आदेश दिया गया कि वे सार्वजनिक जगहों पर फेस मास्क पहनकर निकलें या फिर जेल जाने के लिए तैयार रहें। बिना मास्क के पकड़े जाने पर जेल के अलावा उन पर भारी जुर्माना भी लगाया जाता था। नवंबर की शुरुआत में पूर सैन फ्रांसिस्को में स्पेनिश फ्लू के 20,000 मामले आ चुके थे और लगभग 1,000 की मौत हो चुकी थी। लेकिन अक्टूबर की तुलना में संक्रमण की संख्या में तेजी से कमी आने लगी थी। इस वजह से राज्य में सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क की अनिवार्यता सहित सभी प्रतिबंधों को हटा दिया गया।
लोग गलियों में जश्न मनाने लगे, सिनेमाघरों और स्टेडियमों में भारी संख्या में भीड़ जुटने लगी। ऐसा लगा कि अब स्पेनिश महामारी पूरी तरह नियंत्रण में चुकी है। लेकिन लगभग 15 दिनों के बाद ही भयंकर आपदा आ गई और फिर से फ्लू का संक्रमण व्यापक स्तर पर तेजी से फैलने लगा। अब सरकार में बैठे लोगों के बीच एक-दूसरे को कसूरवार ठहराने का दौर शुरू हो गया। कहा जाने लगा कि महामारी के दोबारा शुरू होने की वजह पहले लगाई गई तमाम पाबंदियों को जल्दबाजी में हटाना है।
1 जनवरी 1919 के बाद एक दिन में लगभग 600 नए मामले आए थे और शहर में फिर से महामारी को रोकने की कोशिश शुरू की गई। अधिकारियों ने पहले की लगाई गई पाबंदियों को फिर से लागू कर दिया। यानी सोशल डिस्टेंसिंग को लागू कर दिया गया। फिर से बिना फेस मास्क पहने बाहर नहीं निकल सकते थे। पार्कों, स्कूलों, थिएटर, स्टेडियम, औद्योगिक संस्थानों सभी को बंद कर दिया गया। लेकिन इस बार इन नियमों को पालन कराना पहले की तरह आसान नहीं था। जैसे आज अमेरिका में घरों में रहनेके आदेश के खिलाफ लगभग सभी राज्यों में लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे है, तब लोगों ने मास्क लगाने के फैसले के खिलाफ 'एंटी-मास्क लीग'  बना लिया। जिस तरह आज ट्रंप प्रदर्शनकारियों के साथ नजर आते हैं, भले ही उनकी राजनीतिक और चुनावी मजबूरी हो, तब भी जनता के दबाव के कारण मास्क की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया। लेकिन इसका नतीजा यह निकला कि अकेले सैन फ्रांसिस्को में स्पेनिश फ्लू के 45,000 से अधिक मामले आए। यह पहले लागू किए गए लॉकडाउन की तुलना में दोगुना से भी अधिक संख्या थी।
आज अमेरिका ठीक उन्हीं गलतियों को दोहरा रहा है, जो उसने 102 साल पहले की थी। आज पूरे अमेरिका में 72 हजार से अधिक लोगों की कोरोना वायरस महामारी से मौत हो चुकी है, लेकिन पाबंदियों में ढील को लेकर अमेरिकियों और राष्ट्रपति ट्रंप की जिद लाखों अमेरिकियों की जान ले सकती है। हालांकि, ट्रंप तो पहले ही कह चुके हैं कि अगर मौतों की संख्या को एक से दो लाख के बीच रख पाएं, तो यह उनकी सबसे बड़ी सफलता होगी, जो फिलहाल असफलता की ओर ही बढ़ती जा रही है।

कोरोना संकट, इटली का सिसली वाया ‘द गॉडफादर’ डॉन विटो कॉर्लियोन

इतालवी माफिया सेत्तिमो मिनेयो 
आपमें से अधिकांश लोगों ने डॉन विटो कॉर्लियोन का नाम ज़रूर सुना होगा। नहीं, तो माइकल कॉर्लियोन का तो जरूर ही। अच्छा यह भी नहीं तो यूरोप का एक देश है, इटली। इसे जानते ही होंगे। ख़ैर चलिए... जो लोग डॉन विटो और माइकल कोर्लियोन को जानते हैं, उनके लिए तो ठीक है। लेकिन इटली के नाम से वाकिफ लोगों को बता दूं कि कॉर्लियोन सरनेम वैसा ही जैसे किसी शहर या कस्बे के नाम पर कुछ लोग अपना सरनेम रख लेते हैं। दक्षिणी इटली में स्थित एक शहर है सिसली। वही सिसली जहां के द गॉडफादर के डॉन विटो कॉर्लियोन रहने वाले थे। कॉर्लियोन भी दरअसल सिसली का एक नगर या कस्बा कह लीजिए। यहीं विटो एंडोलिनी का जन्म हुआ था, जो बाद में यहां से निकलकर अमेरिका के न्यू यॉर्क तक पहुंच गया और वहां माफिया की दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत कायम की। अपराध की दुनिया की इस सल्तनत को विटो कॉर्लियोन के छोटे बेटे माइकल कॉर्लियोन आगे बढ़ाया... तब से या उससे पहले से ही इटली का सिसली अपराध और माफिया का गढ़ माने जाने लगा। हालांकि, सिसली में माफिया के पांव मज़बूत होने के पीछे उसकी कमोबेश रॉबिनहुड छवि भी है। जैसा कि अमूमन होता है कि माफिया फैमिली अपने इलाके के लोगों को आर्थिक और कुछ अन्य तरीकों से मदद करती रहती है, जिससे लोगों के बीच उनके प्रति सहानुभूति होती है। लेकिन माफिया की यह मदद एक तरफा नहीं होती, उस मदद के बदले लोगों को एक भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।
ख़ैर, कहानी फिल्मी हो उससे पहले लौटते हैं अपने असल मुद्दे पर। हम सभी जानते हैं कि आज पूरी दुनिया कोरोना महामारी की गिरफ्त में है। दुनिया भर में ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मौतों का सिलसिला सबसे पहले तेजी से यूरोप के इटली में बढ़ना शुरू हुआ। जैसे-जैसे कोरोना का संकट यहां बढ़ता गया संगठित गैंग और माफिया ने अपने वर्चस्व का खेल भी शुरू कर दिया। माफिया यहां जरूरतमंदों के घरों तक खाना पहुंचा रहा है, तो लोगों को पैसे से मदद भी कर रहा है। लोगों को अच्छी तरह पता है कि माफिया की मदद लेना सही नहीं है। उन्हें इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। लेकिन, इटली में संकट बड़ा है। लाखों लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। छोटे-मोटे काम करने वाले या भारत की तरह दिहाड़ी मजदूरी की तरह काम करने वालों का रोजगार पूरी तरह चौपट हो चुका है। उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ चुकी है। ऐसे में उन्हें द गॉडफादरफिल्म के डायलॉग ‘I’m going to make him an offer he can’t refuse.’ की तरह माफिया के ऑफर को ठुकरा नहीं सकते। एक तो लोगों की मजबूरी सबसे बड़ी और दूसरी तरफ मना किसे करना है, उसका जोखिम भी नहीं ले सकते।
सिसली में लोगों की मजबूरी का आलम यह है कि खुद कुख्यात माफिया फैमिली का एक सदस्य कहता है, लोग मुझे फोन करते हैं। वे फोन पर रोते हैं। मुझे कहते हैं कि उनके बच्चों के पास खाने के लिए कुछ भी नहीं है। एक महिला मुझे हर दिन बुलाती है। उसके पांच बच्चे हैं और उसे पता नहीं है कि बच्चों को कैसे खिलाना है?’
माफिया परिवार का यह सदस्य कहता है कि अगर ग़रीबों और जरूरतमंदों को खाना खिलाना माफिया कहलवाना है, तो उसे माफिया होने पर गर्व है। दरअसल, कोरोना वायरस तो नया है, लेकिन सिसली में जरूरतमंदों को खाने का पार्सल बांटना यहां की माफिया फैमिली की पुरानी रणनीति रही है।
सिसली की खुफिया एजेंसी और सरकारी मशीनरी में ऊंचे ओहदे पर काबिज निकोला ग्रेटरी कहते हैं कि माफिया का मकसद लोगों की बीच अपनी विश्वसनीयता और साख को हासिल करना है। माफिया खुद को यहां सरकार के विकल्प के रूप में पेश करता आया है और वह इस संकट में लोगों की मदद करके अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग सरकार की जगह उनकी ओर विकल्प के रूप में देखें। ऐसा हो भी रहा है, क्योंकि इन इलाकों तक सरकार की मदद पहुंच नहीं रहा है। इटली में पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी दर काफी बढ़ी है। अर्थव्यवस्था की हालत पहले से डंवाडोल है और मौजूदा कोरोना संकट ने उसकी कमर तोड़ दी है। लॉकडाउन की वजह से लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में उन्हें जो भी थोड़ी-बहुत कहीं से भी भले ही माफिया से मदद मिल रही है, वे ले रहे हैं। हालांकि, एंटी माफिया संगठन के लिए काम करने वाले एक शख्स का कहना है, यह बात लोगों को भी पता है कि खतरनाक है। उन्हें मालूम है कि यह कुछ वैसा ही है कि अगर तुम मेरी पीठ खुजलाते हो तो मैं तुम्हारी खुजलाऊंगा। यानी मदद एक तरफा नहीं है।
वह बतलाते हैं कि शुरू में तो माफिया इन छोटी-छोटी मदद के बदले कुछ नहीं मांगते हैं। लेकिन सभी को किसी-न-किसी रूप में इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, सिसली के पालेर्मो में रहने वाले एक व्यक्ति मार्सेलो को अपना रेस्तरां बंद करना था। उसे माफिया से ऑफऱ मिला, जिसे वह इनकार नहीं कर सका। कुछ पैसे उसके अकाउंट में डाले गए और कुछ कैश में दिए गए। मार्सेलो बताते हैं कि बाद यही माफिया आपसे वसूली भी करते हैं।
इसका एक उदाहरण यह भी है कि जब स्थानीय चुनाव होते हैं, तो माफिया फैमिली के लोग उन लोगों के पास जाते हैं, जिनकी उन्होंने मदद की होती है। फिर उनके बीच बातचीत कुछ इस तरह शुरू होती है, क्या मैं तुम्हे याद हूं? जब तुम्हें जरूरत थी तो मैंने तुम्हारी मदद की थी। और अब मुझे तुम्हारी मदद की जरूरत है। फिर वे अपने उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने का दबाव बनाते हैं, जिसे लोग मना नहीं कर सकते। मार्सेलो बताते हैं कि सिसली में माफिया सरकार से कई गुना अधिक प्रभावशाली है। संकट के समय में वह हमेशा लोगों की मदद के लिए पैसे के दरवाजे खोल देता है। सरकार कहीं पीछे छूट जाती है या जब तक सरकार की मदद पहुंचती है, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता है।
कुछ इस तरह इटली में माफिया सरकार की नाकामी का फायदा अपना वर्चस्व मजबूत करने में अपनी रॉबिनहुड छवि को भुना रहा है।

डॉक्टरों के काट रहे पैसे, पैदल चलते हुए मर जा रहे लोग...तो यह किसका सम्मान है साहेब?

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भारत में कोरोना वायरस के अभी तक (4 मई दोपहर 1 बजे तक) 42 हजार 533 मामले आ चुके हैं। 1373 लोगों की मौत हुई है। यही आधिकारिक आंकड़ा है। 30 अप्रैल को कोरोना से संक्रमितों की यह संख्या 32 हजार थी। उससे पहले 20 अप्रैल को 16 हजार यानी 30 अप्रैल को देश में कोरोना मरीजों की संख्या दो गुनी हो गई। अब चार दिन भी ठीक से नहीं हुए कि 10 हजार से अधिक केस और हो गए।
रविवार को सेना ने कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में पुष्पवर्षा और फ्लाई पास्ट किया। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से अहमदाबाद तक। देश के प्रमुख शहरों के जिन अस्पतालों में कोविड-19 पीड़ितों का इलाज हो रहा है, वहां भी हेलिकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। यह फैसला किसका था। स्वाभाविक रूप से सरकार का ही होगा। इस सरकार को कोरोना वॉरियर्स के सम्मान का बहुत ख्याल है, लेकिन इस कोरोना की वजह से सुरक्षा किट और बुनियादी जरूरतों की कमी से जूझ रहे डॉक्टरों और लोगों का ज़रा भी ध्यान नहीं। एक प्रेग्नेंट महिला लेबर पेन में बच्चे की डिलिवरी के लिए कश्मीर में 100 किलोमीटर तक पैदल चलती है। इसका ख्याल नहीं है। मणिपुर में अधिकांश डॉक्टर कोरोना मरीजों का इलाज काली पट्टी बांधकर कर रहे हैं, क्योंकि सरकार ने उनकी सैलरी में भत्ते को काटने का फैसला किया है। उन्हें मरीजों के इलाज के लिए बुनियादी सुरक्षा किट और मास्क नहीं मिल रहे हैं। डॉक्टर इस वैश्विक महामारी के समय सबसे अधिक काम कर रहे हैं, लेकिन क्या सरकार के इस कदम से उनका मनोबल बढ़ा होगा।
50 साल का एक शख्स महाराष्ट्र से अपने घर उत्तर प्रदेश जाने के लिए साइकल से निकलता है। तकरीबन 390 किलोमीटर तक साइकल चलाने के बाद वह मध्यप्रदेश पहुंचता है और वहीं दम तोड़ देता है। अभी उसे घर पहुंचने के 1600 किलोमीटर और साइकल चलानी थी। सरकार ने मजदूरों के लिए अब जाकर कुछ ट्रेनें चलाने का फैसला किया है, लेकिन मूल किराया पर 50 रुपये और जोड़कर ले रही है। तो क्या 50 साल के उस व्यक्ति की मौत के बाद उसके परिवार वाले खुद को सम्मानित महसूस कर रहे होंगेमध्य प्रदेश में फंसे महाराष्ट्र के सैकड़ों मजदूरों के पास खाने के लिए कुछ नहीं बचा और अब वे घर जाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो इन प्रदर्शनों से उनका सम्मान बढ़ा होगा? चंडीगढ़ की खबर है कि जीएमसीएच-32 में ड्यूटी दे रहे जूनियर रेजिडेंट को न तो पीपीई किट दिया जा रहा है और न ही एन-95 मास्क। अधिकारियों का कहना है कि पीपीई और एन-95 की पूरे देश में कमी चल रही है। थोड़ी परेशानी में काम करना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को जब देश में पहली बार लॉकडाउन की घोषणा की थी, तो कुल कोरोना मरीजों की संख्या सिर्फ 496 थी। तब देश को बंद करने का फैसला किया गया। अब यह संख्या 42 हजार से भी ज्यादा हो चुकी है, तो ठीक उल्टा फैसला लिया जा रहा है। साफ संकेत हैं कि शुरू से ही सरकार के पास इस महामारी से लड़ने की न तो कोई योजना थी और न ही उसे कुछ सूझ रहा था। बस बीच-बीच में हेडिंग और मीडिया मैनेजमेंट की बदौलत वाहवाही लूटने के लिए बयानबाजी और भाषणबाजी की जाती रही। कभी ताली-थाली, तो कभी दीये जलाना तो कभी सेना के विमानों से पुष्पवर्षा। पुष्पवर्षा कर डॉक्टरों का सम्मान किया गया, लेकिन उन्हें पीपीई किट नहीं दिया जा रहा है। आख़िर यह कैसा और किसका सम्मान है। कोरोना वॉरियर्स का तो बिलकुल नहीं।
मध्य प्रदेश के इंदौर-उज्जैन सीमा पर 18 के आसपास मजदूर मिक्सर मशीन से घर जाते पुलिस की चपेट में आ जाते हैं। यह तो वाकई देश के लिए सम्मान की बात है। गुजरात के सूरत से इलाहाबाद तकरीबन 1300 किलोमीटर का सफर। गोद में सालभर या उससे भी छोटा बच्चा। एक हाथ में सूटकेस। तेज धूप और लू-हवा के बीच चलती एक महिला की तस्वीर तो वाकई सम्मान करने वाली ही तस्वीर होगी। दरअसल, हम सवाल नहीं करना चाहते। सवाल करना गुनाह हो गया है। जब जिम्मेदार लोगों से सवाल नहीं किए जाएंगे, तो किससे पूछा जाएगा कि इस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या विपक्ष जिम्मेदार है? क्या मुसलमान जिम्मेदार है? (जारी...) 

कोरोना संकट, चीन का WHO और UN में वर्चस्व, अभी असली खेल बाक़ी है

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कोरोना वायरस को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जुबानी जंग जारी है। इन दोनों के बीच एक तीसरा है, जो कोरोना वायरस को सही तरीके से कंट्रोल नहीं करने को लेकर सिर्फ अमेरिकी ही नहीं, बल्कि कई देशों के निशाने पर है। बहरहाल, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ को कठघरे में खड़ा किया है। ट्रंप ने इस पर चीन के लिए किसी पीआर एजेंसी की तरह काम करने का आरोप लगाया है। ट्रंप ने साफ कहा, 'मुझे लगता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को शर्म आनी चाहिए, क्योंकि वह चीन के लिए एक पीआर एजेंसी की तरह है।'
ट्रंप अपने बेतुके बयानों या फिर अजीबोगरीब दावों के लेकर भले विवादों में रहे हों, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर वह पूरी तरह न सही, तो काफी हद तक सही हैं। अब देखिए न कि कैसे चीन न सिर्फ विश्व स्वास्थ्य संगठन, बल्कि संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन को अपने हितों के लिए हाईजैक कर रहा है। आख़िर किस तरह चीन इन संगठनों में अपने पूर्व मंत्रियों और अधिकारियों को ऊंचे और प्रभावी पदों पर बिठाकर काम कर रहा है? चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र और इससे जुड़े संगठनों में लगभग हर बड़े और अहम ओहदों से अपने हितों को साधने वाले फैसले करा रहा है।
आप मौजूदा कोरोना संकट में भले इन वैश्विक संगठनों को लेकर ट्रंप की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन चीन अपनी नीतियों में लगातार सफल होता जा रहा है। ज़रा सोचिए जिस चीन से कोरोना वायरस शुरू हुआ, वहां और अमेरिका में क्या हालात हैं। अमेरिका में अभी तक 11 लाख से ज्यादा केस आ चुके हैं, जबकि 65 हजार के पास लोगों की मौत हो चुकी है। चीन में लगभघ 83 हजार मामले और मौतें 4633 हुई हैं। इससे पहले अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध यानी ट्रेड वॉर चरम पर था, लेकिन एक झटके में कोरोना वायरस ने अमेरिकी महाशक्ति के अस्तित्व को ही हिला कर रख दिया।
अब आइए देखते हैं कि चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र के जरिए कैसे अपनी विस्तारवादी और आधुनिक औपनिवेशिक शक्तियों का प्रसार कर रहा है। जो लोग संयुक्त राष्ट्र में चीन की बढ़ती सक्रियता को करीब से देख रहे हैं, उनके लिए डब्ल्यूएचओ का चीन के प्रति रवैया कोई आश्चर्य नहीं है। चीन ने पिछले कई वर्षों में संयुक्त राष्ट्र से जुड़े कई संगठनों के प्रमुख के रूप में अपने नागरिकों को नियुक्त किया या करवाया है। चीन के उप कृषि मंत्री 2019 के बाद से संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि एजेंसी (UN Food and Agriculture) का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके बाद चीन के डाक और दूरसंचार मंत्रालय में अपना करियर शुरू करने वाले झाओ हौलिन को संचार नेटवर्क के लिए तकनीकी मानकों को स्थापित करने वाले एक महत्वपूर्ण संगठन इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन के महासचिव के रूप में नियुक्त किया गया। झाओ ने ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए 5जी के इक्विपमेंट को दुनिया भर में पहुंचाने के लिए हुवावे की मदद की।
पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने चीन के पूर्व विदेश उप मंत्री लियू झेनमिन को संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग में अहम पद पर नियुक्त किया। यहां तक ​​कि यूएन की एजेंसी अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन जो वैश्विक हवाई यात्रा को नियंत्रित करती है, इसके प्रमुख के भी तौर पर चीनी नागरिक फेंग लियू को बनाया गया है। लियू पर कोरोना वायरस मामले को लेकर ताइवान को लूप से बाहर रखने का आरोप लगाया गया है।
यूएन जैसे वैश्विक संगठनों में चीनी नागरिकों का प्रभुत्व दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ताकत और वर्चस्व को बतलाता है। हालांकि, यह भी एक हक़ीकत है कि पिछले कुछ वर्षों में खासकर ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की ओर यूएन हो या डब्ल्यूएचओ काफी हद तक निष्क्रियता दिखी, जिसका बखूबी फायदा चीन ने उठाया। जैसा कि चीन ने अपने हितों के यूएन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों को रीटूल करने की कोशिश की। चीन में अमेरिका में सशक्त नेतृत्व की कमी का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है और वह इसमें सफल भी रहा है। अगर इसी संदर्भ में देखें, तो ट्रंप सरकार की ओर से डब्लूएचओ की फंडिंग रोकने और उसके बाद चीन की ओर से उसके फंड में अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाने का फैसला, इसी का एक प्रमाण है। यानी अमेरिका का कमजोर नेतृत्व चीन के लिए वरदान साबित हुआ।