कोविड-19, चीन और WHO चीफ की चालाकियां


चीन ने 7 अप्रैल को पहली बार कोरोना वायरस संक्रमण की टाइमलाइन जारी की। 38 पेज की इस टाइमलाइन में कहा गया है कि इस वायरस का पता पहली बार वुहान में पिछले साल दिसंबर में लगा था। उस समय एक व्यक्ति में अज्ञात वजहों से निमोनिया होने का पता चला था। दिसंबर 2019 में उस एक केस के बाद 12 अप्रैल 2020 तक 17 लाख 68 हजार 19 केस हो चुके हैं। 1 लाख 8 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। अब इसमे विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की क्या भूमिका है? इसने कोरोना वायरस महामारी यानी कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए क्या किया? आख़िर इसने इतने कुछ किया, तो फिर इसके चीफ टेड्रोस गेब्रियेसस पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? आज इन्हीं सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं।
WHO चीफ गेब्रेयेसिएस व चीनी राष्ट्रपति चिनफिंग। फोटोः इंटरनेट
पहले शुरू करते हैं कोरोना वायरस के पहले मामले से। तो इसका आगाज होता है 1 दिसंबर, 2019 से। चीन के वुहान शहर में एक महिला में निमोनिया के लक्षण सामने आते हैं। माना जा रहा है कि वह कोरोना वायरस का सबसे पहली मरीज़ थी। दिसंबर में इस तरह के कई मामले आए, जिनका कारण पता नहीं चल पा रहा था। इन्हें सूखी खांसी, बुखार और सांस लेने में तकलीफ होती थी। इसके बाद चीन ने 31 दिसंबर, 2019 को WHO को इन अजीबोगरीब मामलों की जानकारी दी। फिर 7 जनवरी 2020 को यह पता चला कि ये तो वायरस का नया स्ट्रेन है। इसका नाम नोवेल कोरोना वायरस रखा गया। 11 जनवरी को चीन में इससे पहली मौत की घोषणा की गई। इसके बाद 13 जनवरी को चीन से बाहर थाईलैंड में पहला केस आया। 30 जनवरी तक यह वायरस चीन के अलावा 18 देशों तक पहुंच चुका था। 30 जनवरी को ही WHO ने कोरोना वायरस को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया। 11 मार्च को कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया।
लेकिन इन घटनाक्रमों के बीच काफी कुछ ऐसा भी घटा, जिससे आरोप लगने लगे हैं कि WHO ने कोरोना संकट के लिए चीन को बचाने का काम किया है? WHO के मुखिया पर आरोप लग रहे हैं कि कोविड-19 को लेकर उसने कमज़ोर, लेटलतीफ और ​बगैर सोचने-समझने की रणनीति अपनाई। बात-बात में चीन का बचाव करते दिखे, जबकि यह साफ है कि यह वायरस चीन से ही निकला और पूरी दुनिया में फैल गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल में टेड्रोस के चीनी समर्थक बयानों को लेकर कहा कि डब्‍ल्‍यूएचओ के महानिदेशक ने पक्षपात किया है। कोरोना वायरस संक्रमण के दुनिया भर में फैल जाने के पीछे चीन को ज़िम्मेदार ठहराए जाने के मामले में डब्ल्यूएचओ की तरफ से टेड्रोस ने चीन की तरफ़दारी की और चीन को दुनिया के संकट के लिए ज़िम्मेदार मानने से इनकार किया। वेबसाइट द हिल की रिपोर्ट कहती है कि चीन ने इथोपिया में भारी निवेश किया है, इसलिए टेड्रोस उसका बचाव करने पर मजबूर हैं। टेड्रोस इथोपिया से ही आते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वह इथोपिया के कम्युनिस्ट नेता रहे हैं।
ख़ैर हम लौटते हैं असल मुद्दे पर कि किस तरह से विश्व स्वास्थ्य संगठन औऱ टेड्रोस ने इस पूरे मामले को बिगाड़ा औऱ कोविड-19 को महामारी बनने दी। पूरी दुनिया को मौत की संख्या में झोंक दिया। दरअसल, इस बात के सबूत मिले हैं कि कोरोना वायरस अक्टूबर 2019 के बीच में ही इंसानों में फैल चुका था, लेकिन डब्लूएचओ ने कोई गंभीरता नहीं दिखाई। वहीं, जनवरी 2020 में महामारी के शुरुआती दौर में चीन द्वारा इसके लिए उठाए जा रहे कदमों और इसके महामारी बनने को लेकर पारदर्शिता अपनाने के लिए उसकी तारीफ की। हालांकि, 13 जनवरी को चीन के बाहर थाईलैंड इससे मौत का मामला आ चुका था। ताइवान ने WHO को इस बारे में दिसंबर में ही सावधान कर दिया था। इस बीच कोविड-19 महामारी दुनिया भर में तेजी से फैल रही थी। टेड्रोस और उनकी टीम फिर भी दुनिया के देशों को यात्राओं पर रोक न लगाने की बात कर रहे थे। जब अमेरिका ने जनवरी में ही चीन से आने वालों पर यात्रा प्रतिबंध लगाया, तो इसने अमेरिका की ही आलोचना की। आज पूरी दुनिया इस महामारी से बचने के लिए लॉकडाउन और ट्रैवल बैन लागू कर चुकी है, लेकिन WHO ने इसके उलट सलाह दी।
अब जबकि अमेरिका और चीन के बीच इस महामारी को लेकर तू-तू मैं-मैं जारी है, तो इसकी बड़ी वजह खुद टेड्रोस हैं। अमेरिकी सीनेटर टॉड यंग ने WHO प्रमुख डॉ. टेड्रोस को अमेरिकी सीनेट की फॉरेन रिलेशंस सबकमेटी के सामने पेश होने को कहा। उन्होंने पूछा कि आप बताइए कि आपके संगठन ने कैसे इस महामारी को संभाला? सीनेटर यंग ने कहा कि चीन कोरोना वायरस को संभालने में बुरी तरह से कमजोर साबित हुआ और उसने दुनिया को सही आंकड़े नहीं बताए। टॉड यंग ने कहा कि डब्ल्यूएचओ प्रमुख चीन के साथ ऐसे खड़े थे, जैसे कोई असिस्टेंट खड़ा रहता है।
उधर, ताइवान जिसने पहले इस वायरस को लेकर WHO को चेताया था, उसने टेड्रोस पर कई आरोप लगाए। दरअसल, टेड्रोस ने ताइवान पर निशाना साधते हुए कहा था कि तीन महीने पहले ताइवान ने मुझ पर निजी हमला किया। लेकिन ताइवान ने कहा कि टेड्रोस को अपने गैर जिम्मेदाराना बयान के लिए माफी मांगनी चाहिए। दरअसल, मामला तीन महीने पहले का है और डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस गेब्रेयेसिएस ने आरोप लगाया था कि कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई के दौरान तीन महीने पर उन्हें जान से मारने की धमकी मिली। मुझे नीग्रो और अश्वेत कहा गया। अब सवाल यह भी उठता है कि जब मामला तीन महीने पहले का है और उन पर अमेरिका सहित कई देश चीन का साथ देने और पूरी दिया को कोरोना वायरस को लेकर अंधेरे में रखने के आरोपों को लेकर हमला कर रहे हैं, तो इस तरह से खुद को डिफेंड करना किस हद तक जायज है। मुमकिन है कि उनके साथ हुआ हो, तो फिर सवाल यह भी है कि आख़िर यह बात अभी कैसे आई। वह भी तब जब उन पर हर तरह से हमले हो रहे हैं।

नीतीश कुमार की नाकामी और ‘चीन का वुहान’ बना बिहार का सीवान


भारत में अभी तक कोरोना वायरस संक्रमण के 7598 मामले सामने आए हैं। इससे 246 लोगों की मौत हो चुकी है। www.worldometers.info › coronavirus के मुताबिक, भारत ने अभी तक 189111 टेस्ट किए हैं, जबकि आबादी 1 अरब 30 करोड़ से ज्यादा है। चलिए मान लेतें है कि दो लाख की होगी टेस्टिंग। वहीं, 33-34 करोड़ की आबादी वाला अमेरिका अभी तक 2489786 टेस्ट कर चुका है। अब अमेरिका से अपनी क्या तुलना करना। ज़रा पति करिए कि ईरान की आबादी कितनी है, लेकिन उसने 242,568 टेस्ट, तुर्की जैसा छोटा देश 8.2 करोड़ आबादी वाला 307,210 टेस्ट कर चुका है। अब हर देश का आंकड़ा देना भी उचित नहीं है वरना आप कहेंगे कि आंकड़ेबाज़ी में ही उलझा दिए। लेकिन तथ्य तो तथ्य ही। भले आप मानें या न मानें।
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लेकिन, बात भारत की नहीं। भारत में एक राज्य है बिहार। यहां एक दिन में सर्वाधिक 21 नए कोरोना पॉजिटिव मरीज मिले हैं। सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि बिहार के सीवान ज़िले की हालत चीन के वुहान जैसी हो गई। वुहान वही शहर है, जो कोरोना का केंद्र माना जाता है। सीवान में कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या 20 हो गई है। बिहार में अब तक पहली बार ऐसा हुआ है कि एक ही दिन में वैश्विक महामारी कोरोना के सर्वाधिक मामले सामने आए हैं। 9 अप्रैल की सुबह से देर रात तक कुल 19 नए संक्रमितों की पहचान की गई। सैंपल जांच में सभी में कोरोना पाजिटिव पाया गया है। इनमें सीवान के 17 हैं। 30 मार्च को कोरोना के छह मरीज मिले थे। 7 अप्रैल को भी बिहार में एक ही दिन में कोरोना छह मरीज सामने आए थे। बिहार में 9 अप्रैल को 19 नए मरीजों के सामने आने के बाद कोरोना संक्रमितों की संख्या 39 से बढ़कर 58 हो गई। यहां एक व्यक्ति ने परिवार के 16 लोगों को संक्रमित किया। ओमान से सीवान में आए एक संक्रमित व्यक्ति ने आइसोलेशन में नहीं जाकर अपनी पहचान छिपाए रखी। अब इस परिवार की 12 महिलाएं और चार पुरुष अब तक कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके हैं। सीवान में एक अन्य व्यक्ति की भी पहचान कोरोना पॉजिटिव के रूप में की गई। यह युवक 16 मार्च को दुबई से आया था। इस तरह सीवान में सर्वाधिक 27 कोरोना के मरीज हो गए हैं।
इस पर तुर्रा यह कि उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी जी कह रहे हैं कि लॉकडाउन के 15 दिन बाद भी कोरोना के नए मरीजों की संख्या में वृद्धि से जाहिर है कि सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग बरतने के निर्देश का पालन करने में कई स्तरों पर चूक हो रही है। तो इस चूक को दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है। जानता हूं यह भी जनता के मत्थे ही थोपा जाएगा।
अब आइए नज़र डालते हैं कि बिहार कोरोना वायरस के कितने टेस्ट किए और अभी तक कितने मामले आए। कहा जा रहा है कि बिहार में कुल 60 के करीब मामले आए हैं। जब किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज ही नहीं की जाएगी, तो आधिकारिक आंकड़ों में उसे अपराध हुआ माना ही नहीं जाएगा। यही हाल कोरोना के मामले में भी है। जब कोरोना वायरस का टेस्ट होगा ही नहीं या कम टेस्ट होगा तो मामला ज्यादा कैसे आएगा। उधर डॉक्टरों और स्थानीय लोगों का भी कहना है कि कोरोना के मरीजों की संख्या भले ही कम बताई जा रही हो, लेकिन यह संख्या इससे कहीं अधिक है। पटना एम्स के कुछ डॉक्टरों का तो यहां तक कहना है कि ऐसे पॉजिटिव मामले भी हैं, जिनके बारे में बताने से मना किया जा रहा है।
दूसरी तरफ इसको भी छोड़ दें तो नीतीश कुमार ने अपने 15 साल के शासन में बिहार के स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कुछ किया ही नहीं। इसका भी डर उनको होगा। पिछले साल मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार का मामला सामने आए है कि कैसे बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुल गई थी। बिहार से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सोते पाए गए थे। यह इस बात का भी प्रतीक है कि कोरोना महामारी पहले से ही बिहार की नाजुक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली पर बोझ बनने लगी है। ऐसे में खराब योजना, सुरक्षात्मक उपकरणों की कमी और सार्वजनिक जागरूकता की कमी भी चुनौती को बढ़ा रही है।
बिहार के डॉक्टर कैसे कोरोना वायरस से लड़ रहे हैं, इसकी मिसाल यह है कि डॉक्टरों का कहना है कि प्रोटोकॉल के अनुसार हमें एन-95 मास्क, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) किट और सैनिटाइज़र दिया जाना चाहिए। हमारी स्थिति इतनी विकट है कि हम मरीजों का इलाज करते समय खुद को बचाने के लिए एचआईवी किट का उपयोग करते हैं। हम बिना उचित सुरक्षा उपकरण के मरीजों का इलाज करते हैं, तो आठ घंटे की ड्यूटी के बाद फिर इस्तेमाल किया हुआ दस्तानी ही पहनना पड़ता है। इससे डर है कि हमें भी कोरोन वायरस न हो जाए। पीएमसीएच बिहार के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक है। यहां COVID-19 के रोगियों के लिए बेड उपलब्ध नहीं हैं।
बिहार में कोरोनो वायरस के लिए टेस्टिंग कम हो रहे हैं। इससे डॉक्टरों पर दबाव बन रहा है। उन्हें लग रहा है कि वे ऐसे मरीजों का इलाज कर रहे हैं, जिनमें इस तरह के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में उन्हें यह बीमारी हो सकती है। बिहार में सिर्फ एक ही रिसर्च सेंटर है, जो कोरोना वायरस सैंपल का टेस्ट करता है। फिर उसकी पुष्टि के लिए पुणे भेजा जाता है। ऐसे में कोरोन वायरस का कम्युनिटी संक्रमण होता है, तो बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त सकती है।

ईरान-पाकिस्तान में धार्मिक ज़िद, कोरोना का रिलिजयस कनेक्शन

कोरोना वायरस महामारी पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। लेकिन एक देश है तुर्कमेनिस्तान, जो ईरान से सटा। हर देश कोरोना वायरस संक्रमण खत्म करने में जुटा है। पर तुर्कमेनिस्तान में कुछ अलग ही तरीका अपनाया गया है। यहां कोरोना शब्द पर ही बैन लगा दिया गया है। यहां कोरोना बोलने और लिखने वालों पर कार्रवाई हो रही है। मास्क पहनने पर पहले ही बैन है। अगर कोई नियमों को तोड़ता है, तो उसे जेल हो सकती है। दरअसल, तुर्कमेनिस्तान ईरान के दक्षिण में है। ईरान में कोरोना से 4110 लोगों की मौत हो चुकी है। 66 हजार से ज्यादा संक्रमित हैं। (10 अप्रैल 2:22 बजे तक) लिहाजा, तुर्कमेनिस्तान में इस तरह की पाबंदी पर कई देशों ने नाराजगी जाहिर की है।
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लेकिन, एक कहानी यही से शुरू होती है कि जब ईरान सटे तुर्कमेनिस्तान का रवैया कुछ अजीब है, तो यहां से पाकिस्तान की हालत कैसे ख़राब होती जा रही है। हम उस पर भी बात नहीं करेंगे। हम बात करेंगे ईरान की, जो एशिया में कोरोना वायरस की उत्पत्ति माने जाने वाले देश चीन को भी मौतों के मामले में पीछे छोड़ चुका है। साथ ही, इसी बहाने पाकिस्तान वाले कुछ इलाकों की भी बात करेंगे। तो फरवरी 2020 के अंतिम सप्ताह में बलूचिस्तान प्रांत की सीमा चौकी तफ्तान से 6,500 तीर्थयात्रियों को अपने-अपने घर पाकिस्तान लौटने की इजाजत दी गई. ये सभी कोरोना के संदिग्ध बताए जा रहे थे। ये सभी शिया तीर्थयात्री थे, जिन्होंने ईरान में क़ौम और मशहद जैसे पाक जगह की यात्रा की थी।
चीन ने फरवरी की शुरुआत में ही कोरोना वायरस संक्रमण के बारे में आगाह किया था। लेकिन ईरान ने कोई ध्यान नहीं दिया और चीन से लोगों का आना जारी रहा। यहां कौम में दुनिया भर से इकट्ठा हुए लोगों को क्वांरटीन करने का कोई बंदोबस्त नहीं किया गया। इस तरह ईरान ने अपने इस शहर को कोरोना वायरस का केंद्र या गढ़ बनने की एक तरह से इजाजत दे दी थी। भले ही अनजाने में। इसके अगले ही महीने यानी मार्च में पूरे मध्य पूर्व में लगभग 17,000 मामले कोरोना वायरस के दर्ज किए गए। इन 17 हजार मामलों में से 90 प्रतिशत का ताल्लुक ईरान से था। ईरान को सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनई ने 3 मार्च को कहा था कि कोरोना कोई बड़ी त्रासदी नहीं है। इस त्रासदी पर लोगों की दुआएं और पवित्र स्थल कहीं अधिक भारी है। लेकिन ईरान के 13 आला अधिकारियों की मौत और 30 के संक्रमित होने के बाद खामेनई ने महामारी के लिए अमेरिका को कोसना शुरू कर दिया।

उधर, तफ्तान में पाकिस्तान की ओर से क्वारंटीन में रखे गए हजारों लोगों की वायरस से सुरक्षा का शायह ही ध्यान रखा गया। लोगों भेड़ों की तरह एक टेंट में ठूस कर रखा गया। इससे जो लोग संक्रमित नहीं थे, वे भी वायरस की चपेट में आ गए। सारे के सारे शिया मुसलमान थे और अधिकांश का ताल्लुक पाकिस्तान के सिंध प्रांत से था। सिंध में ही 2.2 करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहर कराची है। चूंकि इनमें से किसी भी तीर्थयात्री में वायरस संक्रमण की जांच नहीं की गई, तो एक तरह से ये पूरे पाकिस्तान में वायरस फैलाने का जरिया बन गए। आज पाकिस्तान में 4489 लोग (हालांकि टेस्टिंग कम होने से आंकड़ा कम है) संक्रमित हैं औऱ 65 की जान जा चुकी है।
जिस तरह तबलीगी जमात को दिल्ली के निजामुद्दीन में धार्मिक कार्यक्रम किया। उस तरह जमात ने पाकिस्तान में भी अपना सालाना कार्यक्रम किया था। पाकिस्तानी अख़बार 'डॉन' की रिपोर्ट के अनुसार, 10 मार्च को हुए कार्यक्रम में 70 से 80 हजार लोगों ने शिरकत की थी। हालांकि, तबलीगी जमात ने दावा किया कि उनके कार्यक्रम में ढाई लाख से ज्यादा लोग पहुंचे थे। इसमें 40 देशों से करीब 3000 लोग शामिल थे। पाकिस्तान की तबलीगी जमात ने भी न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि दूसरों देशों में भी वायरस फैलाने का काम किया। इसमें शामिल किर्गिस्तान के कम-से-कम दो नागरिकों और दो फिलिस्तीनियों ने वापस देश के लिए उड़ान भरी। उनकी वजह से फिर गाजा पट्टी में वायरस फैला। इसी तरह, मलेशिया में तबलीगी जमात की धार्मिक सभा की वजह 620 लोगों को कोरोना हुआ। बाद ये सभी दक्षिण एशिया लौटे और फिर क्या हुआ होगा, आप सोच सकते हैं। 
पाकिस्तान में कोरोना वायरस संक्रमण के लिहाज से सबसे असुरक्षित जगह मस्जिद है, जहां लोग दिन में पांच बार नमाज के लिए आते हैं और कंधे-से-कंधा सटाकर खड़े होते हैं। पाकिस्तान में तकरीबन 5 लाख मस्जिद हैं। यहां 1947 के बाद के शुरुआती दिनों में ज्यादातर शुक्रवार को ही मस्जिदों में नमाज पढ़ते थे, लेकिन आज अधिकांश लोग पड़ोस की मस्जिदों ही हर रोज दिन में पांच बार नमाज करते हैं। अब लोग इतनी बार मिलेंगे और भीड़ में इकट्ठा होंगे, तो वायरस का संक्रमण किस रफ्तार से होगा?जब पाकिस्तान ने लॉकडाउन का फैसला किया, तो मस्जिद की सभाओं को नजरअंदाज करना पड़ा, क्योंकि अधिकांश मौलवी इसके ख़िलाफ़ थे। न्यूजवीक पाकिस्तान के खालिद अहमद बताते हैं कि तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने इस मामले को सर्वोच्च इस्लामी संस्था जमीयत अल-अजहर या अल-अजहर यूनिवर्सिटी मिस्र को इस मामले को रेफर किया। इसके बाद ही सभी मस्जिदों को बंद करने की नसीहत दी गई। फिर भी कुछ मौलवी इसके पक्ष में नज़र नहीं दिखते, लेकिन सऊदी अरब ने मक्का और मदीना को बंद करने का फैसला कर लिया। पाकिस्तान ने बीच का रास्ता निकाला, जो बेतुका औऱ नासमझी वाला लगता है। यहां फैसला किया गया कि मस्जिदें बंद नहीं होंगी, लेकिन नमाज के दौरान पांच से अधिक लोगों का समूह साथ में नहीं होगा।
कुछ इस तरह से कोरोना वायरस से जंग जीतने के लिए रेत पर तस्वीर बनाई जा रही है और जीतने की तमन्ना भी पाली जा रही है।

कोरोना वायरस से जंग में हिंदू-मुसलमान और थूकने, छिपने, वायरस फैलाने की खबर... सब फेक न्यूज़ है !


यह सच है कि दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात की वजह से देश में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जंग को नुकसान पहुंचा। इसकी वजह से कोरोना के हज़ारों मरीजों की संख्या बढ़ गई। कुछ अप्रत्याशित ख़बरें भी आईं। ऐसी ख़बरें आईं, जो साफ़ बताती है कि हमारा मीडिया कैसे इस्लामोफोबिया से ग्रसित है। इसकी वजह से वह फेक न्यूज़ फैलाने से भी बाज नहीं आता। ट्विटर पर दो मामलों में तो उत्तर प्रदेश पुलिस को बाकायदा चेतावनी तक देनी पड़ी। 
पहला मामला सहारनपुर का है, यहां ख़बर चलाई/छापी गई कि यहां क्वारंटीन किए गए तबलीगी जमात केलोग खाने में नॉनवेज न मिलने पर हंगामा कर रहे हैं। बाहर खुले में ही शौच कर देरहे हैं। सहारनपुर पुलिस ने बाकायदा नोटिस चस्पा करके इसका खंडन किया। पुलिस ने साफ कहा की ख़बर के बाद मामले की जांच की गई जो ग़लत निकली। फेक न्यूज़ थी। लेकिन इसका खंडन कहीं छपा नहीं। वैसे भी इस तरह एक धर्म विशेष के ख़िलाफ़ ख़बरे प्रमुखता से छपती हैं और खंडन कोने में। खंडन की यही विडंबना है। वैसेऐसी महामारी में झूठी खबरें फैलाने वाले किस जमात के लोग हैं? इनकी खबर कौन लेगा?
इसी तरह उत्तर प्रदेश के औरेया ज़िले का एक मामला है। यहां वॉट्सऐप के जरिए अफवाह फैलाई गई कि दिल्ली से आए 4-5 जमाती छिपे रहे और बाद में गायब हो गए। पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई की तो ख़ुद को पत्रकार कहने वाले एक शख्स को गिरफ्तार किया।
एक मामला है मशहूर न्यूज एजेंसी एएनआई का। एजेंसी ने डीसीपी के हवाले से ख़बर चलाई कि उत्तर प्रदेश के ही नोएडा के सेक्टर-5 के हरोला में तबलीगी जमात के संपर्क में आने वाले लोगों को क्वांरटीन किया गया है। बाद में डीसीपी नोएडा ने इसका खंडन किया और कहा कि हमने तबलीगी जमात का नाम नहीं लिया था। कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आने वाले लोगों को नियमों के हिसाब से क्वारंटीन किया गया है।डीसीपी नोएडा ने साफ कहा कि आप (न्यूज़ एजेंसी) गलत बात को कोट कर रहे हैं और फेक न्यूज फैला रहे हैं।
इसी तरह ज़ी न्यूज के उत्तरप्रदेश/उत्तराखंड ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया कि फिरोजाबाद में चार तबलीगी जमाती कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं औऱ जब उन्हें लेने मेडिकल टीम गई, तो उन पर पथराव किया गया। इस पर फिरोजाबाद पुलिस ने ट्विटर पर जवाब दिया कि आपके द्वारा असत्य और भ्रामक खबरे फैलाई जा रही हैं। फिरोजोबाद में न ही किसी मेडिकल टीम और न ही किसी एम्बुलेंस पर पथराव किया गया है। फिरोजाबाद पुलिस ने तत्काल जी न्यूज को ट्वीट डिलीट करने को कहा। इसके बाद जी न्यूज की तरफ से ट्वीट डिलीट भी कर दिया गया। यानी फेक न्यूज फैलाने वाले को बैकफुट पर आना पड़ा।
बात यहीं नहीं थमती। यह तो मेन स्ट्रीम मीडिया का हाल है। सोशल मीडिया पर भी इस तरह की कई बातें फैलाई जा रही हैं, जिनका सच्चाई से दूर-दूर तक लेना नहीं है। फैक्ट चेक वेबसाइट ऑल्ट न्यूज के मुताबिकफेसबुक पेज हिंदुस्तान की आवाज़ लाइव ने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, देखिए 14 दिन के एकांतवास में भी इन तबलीगी जमात के लोगों ने अश्लीलता और आतंक मचा रखा है…… क्वारंटीन में जमकर किया हंगामा। #सरम नाम की सारी हदें कर दी पार #खेला नंगा नाच. वीडियो हुवा वाइरल# प्रशासन है इन लोगो से परेशान#” ऑल्ट न्यूज ने जब फैक्ट चेक किया तो पता चला कि मामला तो पाकिस्तान का है। वहां के एक पुराने वीडियो को इस गलत दावे से शेयर किया जा रहा था कि आइसोलेशन वॉर्ड में तबलीगी जमात के लोग नंगा घूम रहे हैं और तोड़-फोड़ कर रहे हैं।
यह सारा शुरू हुआ निजामुद्दीन वाला मामला सामने आने के बाद। जब से जमात वाली ख़बर आई, तब से #CORONAJIHAD और #NizamuddinIdiot जैसे हैशटैग से मुसलमानों के खिलाफ तरह-तरह की फर्जी खबरें यानी फेक न्यूज और अफवाहें फैलाई जा रही हैं। फेक न्यूज़ ऐसी बाढ़ आई कि एक डॉक्यूमेट्री फिल्ममेकर यूसुफ सईद ने सोशल मीडिया पर पिछले कुछ सप्ताह के दौरान इन तमाम फेक न्यूज की लिस्ट बनानी शुरू कर दी। वह कहते हैं, ‘हम उनकी लापरवाही के लिए तबलीगियों का बचाव नहीं कर रहे हैं।लेकिन, इस तरह की फेक न्यूज़ का मकसद क्या है? सईद ने 5 अप्रैल को अपने फेसबुक पेज पर कुछ फर्जी यानी फेक न्यूज की रिपोर्ट और उससे जुड़े स्पष्टीकरण को पब्लिश किया है।
इनमें से एक उदाहरण देता हूं कि कैसे तबलीगी जमात का मामला सामने आने के बाद मुसलमानों से संबंधित पुराने वीडियो शेयर करने की बाढ़ आ गई है। जैसे- एक वीडियो खूब वायरल हुआ, जिसमें कुछ मुसलमान बर्तन को थूक से जूठा कर रहे हैं। वीडियो शेयर करने के दौरान कहा गया कि कोरोनो वायरस फैलाने के लिए जानबूझकर ऐसा किया जा रहा है। बाद में पता चला कि यह वीडियो 2018 का था। इसमें दाउदी बोहरा संप्रदाय के सदस्यों ऐसा कर रहे थे। दरअसल, दाउदी बोहरा संप्रदाय अनाज का एक भी दाना बर्बाद न करने में विश्वास करता है। इस वीडियों में वे बर्तन नहीं चाट रहे थे या जूठा कर रहे थे, बल्कि उसे धोने से पहले साफ कर रहे थे।
तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आख़िर कोरोना वायरस के नाम पर हम क्या कर रहे हैं? दरअसल, हमारे देश में जब तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात का मामला सामने नहीं आया था, तब तक कोरोना से हमारी जंग सही चल रही थी। टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने दिल्ली दंगों के बाद हिंदू-मुसलमान बंद ही किया था कि यह एक नई महामारी आ गई। उनकी मेहनत और ऊर्जा वैसी नहीं दिख रही थी, क्योंकि देश एकजुट होकर इस वैश्विक आपदा का सामना कर रहा था। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम की मीडिया तक में हम एकजुट होकर लड़ रहे थे, लेकिन तभी नया मसाला मिला। तबलीगी जमात का। यहीं से कोरोना से जंग ने रुख मोड़ लिया।

कोरोना वायरस, हिंदू-मुसलमान और श्वेत-अश्वेत


कोरोना वायरस। पूरी दुनिया इस महामारी से लड़ रही है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी लड़ाई भी चल रही है। सांप्रदायिकता की। नस्लवाद की। श्वेत-अश्वेत की और हिंदू-मुसलमान की। भारत में जब तक हजरत निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के मामला सामने नहीं आया था, तब तक कोरोना से हमारी जंग सही चल रही थी। टीवी चैनलों और कुछ अखबारों ने दिल्ली दंगों के बाद हिंदू-मुसलमान बंद ही किया था कि यह एक नई महामारी आ गई। उनकी मेहनत और ऊर्जा वैसी नहीं दिख रही थी, क्योंकि देश एकजुट होकर इस वैश्विक आपदा का सामना कर रहा था। सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम की मीडिया तक में हम एकजुट होकर लड़ रहे थे, लेकिन तभी नया मसाला मिला। तबलीगी जमात का। यहीं से कोरोना से जंग ने रुख मोड़ लिया।
अमेरिका में बंदूक की दुकान पर कतार में लोग। फोटोः इंटरनेट
पूछा जाने लगा कि आख़िर यही 'चंद लोग' हमेशा 'अल्लाहु अकबर' कह कर क्यों फट जाते हैं? कश्मीर से लेकर गाजा तक और नाइजीरिया से लेकर सीरिया तक, यही 'चंद लोग' दशकों से कत्लेआम क्यों मचा रहे? अगर आप कहते हैं कि कौम या मजहब को गाली मत दो तो आपको एक और सवाल का जवाब देना पड़ेगा। "जमात वालों ने अपनी करतूतों से बिरादरों के लिए एक नया शब्द गढ़ा है- थूकलमान। इसकी कड़ी निंदा करता हूं।अब थूकलमान शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है, आपको समझ आ रहा होगा। हालांकि, जिसके लिए और जिस संदर्भ में किया गया, उसकी पुष्टि हो नहीं पाई। आज चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी लगे हैं। फिर अस्पतालों से ऐसे वीडियो नहीं आए। ख़ैर मेरी चिंता यह नहीं है।
दरअसल, दिक्कत यह नहीं है कि यह सब भारत में हो रहा है। पूरी दुनिया में यही खेल चल रहा है। भारत में हिंदू-मुसलमान चल रहा है, तो अमेरिका में ब्लैक और व्हाइट यानी अश्वेत और श्वेत। हमारे यहां सांप्रदायिकता है, तो अमेरिका में भी एक तरह सांप्रदायिकता है, जिसे रेसिज्म यानी नस्लवाद कहते हैं। वह कैसे आइए देखिए। आज अमेरिका कोरोना वायरस की वजह से सबसे अधिक प्रभावित देश है। यहां (भारतीय समय के अनुसार रात 12:56 तक 24 घंटे में 1529 से ज्य़ादा मौतें हुईं, जबकि कुल मौत 12,400 वहीं, कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 3 लाख 90 हजार तक पहुंच गई। इतनी मौतों और संक्रमण के लोगों में भय सताने लगा है कि अगर राशन और खाने-पीने का सामान खत्म हुआ, तो फिर अराजकता की स्थित हो जाएगी। ऐसे में लोग गन कल्चर यानी बंदूक का रुख कर चुके हैं। यहां बंदूकों की दुकानों पर लोगों की कतारें देखी जा सकती हैं। यह खौफ खासतौर पर अफ्रीकी और एशियाई मूल के अमेरिकियों में देखा जा रहा है।
कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों कैलिफोर्निया,  न्यू यॉर्क और वॉशिंगटन में बंदूक और हथियारों की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है। ऑनलाइन हथियार बेचने वाली दुकान एम्मो डॉट कॉम के मुताबिक, 23 फरवरी के बाद से बिक्री में 68 प्रतिशत की तेजी आई है। कुछ खरीदारों ने बताया कि उन्हें डर है कि कामबंदी के हालात में देश में जरूरी वस्तुओं की कमी आ सकती है। इससे भोजन,  दवा आदि के लिए लूटपाट मच सकती है। ऐसी स्थिति में परिवार की सुरक्षा के लिए हथियार ही विकल्प होंगे। कई राज्यों में टॉइलेट पेपर से ज्यादा मांग बंदूकों और कारतूसों की हो गई। गन स्टोर्स के बाहर ग्राहकों की वैसे ही लाइन लगने लगी जैसे कि सुपर मार्केट्स में लग रही थी। 20 मार्च को ओरेगन पुलिस ने इंस्टेंट चेक सिस्टम के तहत 3189 आवेदन क्लियर किए। इलिनोय राज्य में भी पांच दिन में बंदूक खरीदने की 19 हजार अर्ज़ियां आ गईं। तुलना करें तो पिछले साल 9 से 20 मार्च के बीच बंदूक खरीदने के 17136 आवेदन आए थे, जबकि इस साल इन्हीं दिनों में 35473 आवेदन आए। कैलिफोर्निया में तो बंदूकों की बिक्री 800 फीसदी बढ़ गई है।
इसी बीच नस्लवाद भी बढ़ने लगा है। कुछ वैसे ही जैसे हमारे यहां एक खास वर्ग इन दिनों हावी है। उसी तरह अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के श्वेत-अश्वेत खाई बढ़ी है। एक रिपोर्ट की मानें, तो ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के दो महीने के भीतर ही 1052 मामले नस्लवाद के दर्ज किए गए। यह मौजूदा समय में भी दिख रहा है, जब कोरोना महामारी की वजह से अमेरिका में अनिश्चितता तेजी से बढ़ी है और लोग अपनी सुरक्षा के लिए बंदूकों की दुकान पर कतारबद्ध होने लगे हैं, जिसमें अधिकांश अश्वेत अमेरिकी हैं। (अगले लेख में विस्तार से...)