मीडिया की मृगमरीचिका

आख़िर हर कोई मीडिया को ही क्यों गाली देने पर तुला हुआ है। और क्यों दे रहा है ? एक तो बारबार यही रोना रोया जाता है कि इसका नैतिक पतन होते जा रहा है और ख़बरे दिखाई नहीं बेची जा रही है। जवाब यह मिलता है कि एक चैनल को चलाने में करोड़ों रूपये लगते हैं और उसे सही तरीक़े से चलाने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है। जो उसे एडवरटाइज़िंग के जरिए मिलता है और ये एडवरटाइज़िंग उसे कॉरपोरेट क्षेत्र से मिलता है या कभी-कभी सरकार से भी। कॉरपोरेट वर्ल्ड एडवरटाइज चैनलों के टीआरपी के हिसाब से देते हैं। टीआरपी ये तय करती है कि किस चैनल को लोग सबसे ज़्यादा देखते हैं। उसे अधिक विज्ञापन मिलता है, तो कमाई होती है उस चैनल की। जिससे पूरा चैनल चलता है। अब आप ख़ुद समझदार हैं कि जो लोग विज्ञापन, चैनलों को देते हैं, वो अपने हितों को नज़रअंदाज नहीं कर सकते । साथ ही चैनल भी उनके हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी कम ही करते हैं, भला कोई अपने पेट पर लात थोड़े ही मारता है।

दूसरी बात ये कि सरकार अगर विज्ञापन देती है तो चुनावों के मौसम में क्योंकि उसे भी मालूम है कि कब चैनलों से अपना काम निकलवाना है। जिसे देख हमलोग हल्ला मचाने लगते हैं कि चैनल वाले पैसे लेकर किसी ख़ास पार्टी या कैंडीडेट की बातों को ख़बर के तौर पर दिखा रहे हैं। फिर वही बात आ जाती अपने-अपने हितों की, कि घोड़ा अगर घास से दोस्ती कर ले तो खाएगा क्या ? कुल मिलाकर बात ये कि हम बाज़ारवाद के युग में जी रहे हैं और बाज़ार सारी चीज़ें तय कर रही हैं। एकबार एक प्रतिष्ठित चैनल के मैंनेजिंग एडीटर ने एक बात कही कि आज हम बाज़ार की ताकत को नकार नहीं सकते और आप भी यदि अपने हिसाब से ख़बरें देखना चाहते हैं तो पैसा लगाइए, फिर हम किसानों की आत्महत्या दिखाएंगे, बुंदेलखंड की समस्या दिखाएंगे , भारत को दिखाएंगे बजाय इंडिया के। सबसे बड़ी बात ये दुनिया हमारी बनाई हुई दुनिया ही है, अगर हमें वही दिखाया जा रहा है जो हम देख रहे हैं या देखना चाहते हैं। उसी से उनकी टीआरपी बढ़ती या घटती है, जिससे विज्ञापन कम या अधिक का मिलना अमुक चैनल को तय होता है। इस सिस्टम को हमीं ने मज़बूत किया है, हमी को कुछ करना होगा। बस बारबार गाली देना और उसी टीवी को देखना हमारी फितरत में शामिल हो चुकी है, न्यूज़-प्रोग्राम देखना और उसी की फज़ीहत करना, ऐसा करने से बाज आना होगा,जिसे ख़ुद बदलना होगा। न कि कोई हमारी मदद करने आएगा।

9 comments:

  1. जानते हैं सब की गलत है पर पहल कैसे हो ...........

    ReplyDelete
  2. bilkul practical baat ki hai....jo sach hai usay manna hi chahiye,par kya karein...kuch to log kahenge logo ka kaam hai kehna......hai ki nahin.

    ReplyDelete
  3. बात तो सही कही आपने. दरअसल कामर्सिअल का चक्कर समझ आता है लगभग सभी को ,पर हम भाग जाते हैं ,हम पलायन वादी हो गए हैं चन्दन , गलत को सिर्फ़ गलत कहने भर से काम नहीं होता ,सही कर कर दिखलाना होगा ,पर करेगा कौन ? मुझे और आपको ही करना होगा . जैसे हम जॉब के साथ ब्लॉग्गिंग करते हैं यह भी करना होगा ,मैं सिर्फ़ समस्या बताऊ ,समाधान नहीं ,काम नहीं चलेगा ,काम चलता भी नहीं हैं करना होता हैं . मुझको,आपको,हम सबों को . जैसे किसी ने कहा पैसा लागाएए ,कुछ सही खबर दिखा सकते हैं ,पर हमारे समाज में यह भी थोड़े दिन तक ही होगा ,नए इलेक्ट्रानिक विद्युत मीटर का तोड़ निकल लेने वाला समाज आसानी से अपना चौरिपन नहीं खोयेगा ,.........................खैर मैं भी कता कहाँ की बात लेकर बैठ गया ,आपसे गुजारिश हैं की इसी विषय पर थोडा शोधपूर्ण कार्य कर जाग्रती लावे ........आभार

    ReplyDelete
  4. कुछ पेशे एक नैतिकता की विशेष दरकार रखते हैं. जैसे चिकित्सा और शिक्षा. उसी तरह संचार माध्यमों से भी यही अपेक्षा की जाती है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया से बहुत पहले प्रिंट मीडिया ने इस ओर सकारात्मक काम किया भी है.यदि
    मीडिया थोडा संयम से काम ले तो समाज का बड़ा हित कर सकता है.

    ReplyDelete
  5. आप सभी ने इस विषय पर अपने विचार वाकई बेहतरीन तरीक़े से रखे , इसके लिए बहुत-बहुत शुक्रिया...दरअसल हक़क़ीत यही है , अच्छी बातें तो सभी करते हैं लेकिन अमल कोई नहीं, ख़ासकर बड़े लोग तो और फिर भी उम्मीद तो हारी नहीं जा सकती

    ReplyDelete
  6. धन्यवाद शीतल

    ReplyDelete
  7. बिल्कुल आदित्यजी

    ReplyDelete