कंगारूओं के क़िले में सेंध

इंगलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को एशेज सीरीज़ में २-१ से मात देकर ये साबित कर दिया कि किस तरह शिखर पर पहुंचने के बाद का रास्ता सिर्फ नीचे की ही ओर आता है जब तक कि आप ख़ुद को वहां टिके रहने के क़ाबिल नहीं बना लेते। कई दफ़ा ये बहस का मुद्दा भी बना कि एक- दो सीरीज़ में हार से ही ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत पर सवालिया निशान लगाना मुनासिब नहीं हो सकता। लेकिन यदि देखें तो पिछले कुछ सीज़न में उसकी हालत वाकई में ख़स्ता बनी रही। दऱअसल अब ऑस्ट्रेलिया अपने खेल में ही मात खाता नज़र आ रहा है। इस बार इंगलैंड के हाथों मुंहकी खाने के बाद कम से कम ये बात तो साबित हो ही जाती है। याद कीजिए भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा, किस क़दर परेशान किया था, कंगारूओं ने। इस बार ठीक वैसा ही बर्ताव उनके साथ ब्रिटेन में हुआ। जिस तरह सिडनी टेस्ट भारत जीत रहा था, लेकिन माइकल क्लार्क और पोंटिंग के बदनीयती ने ऐसा होने नहीं दिया। ज़मीन को छूने के बावजूद क्लीन कैच करार देना और पोंटिंग का अंपायर की जगह आउट का निर्णय देना भला कौन भूल सकता है ? ठीक यही कंगारूओं के साथ स्ट्रॉस एंड कंपनी ने किया। दोनों के बीच जो टेस्ट एक विकेट न गिर पाने की वजह से ड्रॉ हो गया, कितना चपलता के साथ उसे स्ट्रॉस ने बचाया, तब पोंटिग की भन्नाहट बिल्कुल सामने आ गई थी, लेकिन उन्हें याद रखनी चाहिए कि आसमान का थूका अपने मुंह पर ही गिरता है।
अब कंगारूओं की टेस्ट रैंकिंग गिरकर चौथे पायदान पर आ गई है। अपना खोया रूतबा हासिल करना फिलहाल तो दूर की कौड़ी नज़र आ रही है, पोंटिंग एंड कंपना को। वजह साफ है, गेंदबाज़ी में न तो पहले जैसी धार है न ही फिल्डिंग में फुर्ती और न ही बल्लेबाज़ी में बादशाहत। मैक्ग्रा, शेन वार्न, गिलक्रिस्ट, हेडेन और लैंगर जैसे खिलाड़ियों के संन्यास के बाद मानो यह टीम बुरी तरह बिखड़ गई है।एक चैंपियन की हार का मलाल किसे नहीं होता, क्रिकेट का प्रशंसक होने के कारण कंगारूओं के क्रिकेट के खेलने के अंदाज़ का कायल बहुत सारे रहे होंगे, मैं भी था। लेकिन जब अपनी क़ाबिलियत को तराशने के बजाय उस पर कोई घमंड करने लगे तो उसका अंजाम भी क्या होता है, ऑस्टेलियाई क्रिकेट टीम हमारे सामने है।

3 comments:

  1. सत्य ही कहा आपने............
    अपने साथ भी तो टी-२० में कुछ ऐसा ही तो हुआ था.

    पर विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इस आते हुए घमंड पर सलेक्सन कमिटी कि निगाह नहीं पड़ती, आखिर उनका काम है ही क्या, उन्हें निर्णय की जिम्मेदारी वहन करनी ही होगी.........

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